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25 May, 2019

द्रोपदी के जन्म कि कथा। Draupadi Birth Story.

द्रौपदी का परिचय:

महाभारत में पांडवों कि पत्नी और राजा ध्रुपद कि पुत्री थी "द्रौपदी", जन्म से उनका नाम "कृष्णा" रखा गया है। द्रौपदी के भाई का नाम दृष्टद्युम्न था साथ ही भगवान श्रीकृष्ण को भी वो अपना भाई मानती थी। द्रौपदी का स्थान पंचकन्याओं में भी है। यह एक आम धारणा है कि महाभारत युद्ध का सबसे बड़ा कारण द्रौपदी है, जो कि सर्बदा गलत है। क्योंकि जब अधर्म कि ताकत बढ़ जाती है तो उसका अंत करने के लिए धर्म को आगे आना पड़ता है, उसी अधर्म पे धर्म का विजय के लिए महाभारत युद्ध हुआ।




द्रौपदी के जन्म की कथा:

राजा द्रुपद और पांडवों के गुरु आचार्य द्रोण मित्र थे। एक बार द्रोणाचार्य को कुछ गायों कि जरूरत थी क्योंकि उन्हें अपने पुत्र को दूध पिलाना था। परंतु ध्रुपद नरेश ने न तो गाय दी अपितु उनका बहुत अनादर किया। जब द्रोणाचार्य द्वारा कौरवों और पांडवों की शिक्षा पूर्ण हुई तो, सभी ने गुरु दक्षिणा मांगने के लिए कहा। तो द्रोणाचार्य ने बताया कि कैसे ध्रुपद ने उनका अनादर किया था अतः उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाए जाने का गुरुदक्षिणा मांगा। 

सबसे पहले दुर्योधन अपनी अगुवाई में कौरव सेना लेकर ध्रुपद के राज्य में चढ़ाई की परंतु विजय प्राप्त नही हुई। उसके बाद पांडव बिना किसी सेना के रण में गए और ध्रुपद को हराकर बंदी बनाकर गुरु के पास ले आये। द्रोणाचार्य ने ध्रुपद का आधा राज्य लेकर छोड़ दिया।

ध्रुपद को इस हार से बहुत दुख हुआ और उन्होने एक शक्तिशाली पुत्र कि कामना से एक यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिसके द्वारा द्रोणाचार्य का वध हो सके। 
यज्ञ के अंत मे यज्ञ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम दृष्टद्युम्न रखा गया और साथ मे एक दिव्य कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम "कृष्णा" रखा गया जो बाद में "द्रोपदी" और "पांचाली" नाम से जानी गयी।

द्रोपदी के पूर्व जन्म का वरदान:

पूर्व जन्म में द्रोपदी एक ऋषि कन्या थी जो तेजस्वी थी। परंतु उनको कोई अपनी पत्नी नही बना रहा था। तो उन्होंने भगवान शिवजी की तपस्या करने लगी। तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी प्रगट हुए और द्रोपदी से वरदान मांगने को कहा।
द्रोपदी ने शिवजी से पाँच अलग अलग गुण वाले पुरुष से पति के रूप में मिलने का वरदान मांगा। शिवजी बोले तुमने जिन पांच गुण वाले पुरुष कि कामना कि है वो एक पुरुष में होना संभव नही है, पर तुमने वरदान मांगा है तो तुम्हारा विवाह पांच पुरुषो से होगा जिनके जो सर्व गुनी होंगे। शिवजी ने द्रोपदी को चीर कुमारी होने का वरदान दिया था।

द्रोपदी ने जो पति के गुण मागे थे वो थे कि उनका पति सत्यवादी हो, सर्वशक्तिमान हो, सबसे बड़ा धनुर्धर हो, सबसे अधिक सुंदर हो, तथा सबसे अधिक गभीर रणनीतिकर हो। 

द्रोपदी का विवाह:

द्रोपदी एक दिव्य कन्या थी अतः उनके विवाह के लिए ध्रुपद नरेश ने एक स्वयंवर रखा जिसमे एक दिव्य धनुष में प्रत्यंचा चढ़ाकर, मछली कि आंख में तीर मारना था वो भी नीचे तेल में देखकर।
आर्यावर्त के सभी वीर उस स्वयंवर में आये पर धनुष नही उठा सके, केवल कर्ण ने ऐसा किया पर द्रोपदी ने कर्ण का सूद्र पुत्र होने की वजह से विवाह से इनकार कर दिया था। अर्जुन जो एक मुनिवेश मे आये थे उन्होने स्वयंवर जीतकर द्रोपदी से विवाह किया। बाद में कुंती के वचन को मानकर द्रोपदी पांचों पांडवो की पत्नी बनी।

द्रोपदी और भगवान श्रीकृष्ण का रिश्ता:

द्रोपदी भगवान श्रीकृष्ण को अपना भाई, मित्र और आदर्श मानती थी। तथा जब शिशुपाल का वध करने के लिए सुदर्शन चक्र भगवान कृष्ण के छोड़ा तो उनकी उंगली कट गयी, तब द्रोपदी ने अपना पल्लू फाड़कर उनकी उंगली में बंधा था। भगवान श्रीकृष्ण ने भी जब द्रोपदी का चिर हरण हो रहा था तो अपनी माया से द्रोपदी कि लाज बचाई थी।




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