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05 April, 2019

सती अनुसूइया की कथा जिन्होंने त्रिदेव को बालक बना दिया था। Story of Sati Anusuya.

सती अनुसुइया का परिचय:

सती अनुसुइया "प्रजापति कर्मद" की नौ कन्याओं में से एक थी, इनके पति का नाम महाऋषि "अत्रि" था। अनुसुइया महान पतिव्रता नारी थी जिनके तेज के अनुभव करके देवताओं ने उन्हें सती की मान दिया था। तुलसीदास कृत रामचरितमानस में कहा गया है कि श्रीराम जी लक्ष्मण और सीता के साथ पंचवटी के निकट उनके आश्रम में गए थे। वहां पर सती अनुसुइया ने माता सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी, तथा विदाई करते समय उपहार स्वरूप आभूषण और दिव्य वस्त्र दिए जो कभी मैले नही होते और न ही फटते थे।


माता अनुसुइया के समक्ष त्रिदेव बालक रूप में

सती अनुसुइया ने त्रिदेव को छोटे से बालक बना दिया था:


एक कथा के अनुसार एक बार देवऋषि नारद ने बारी बारी माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती से मिलकर माता अनुसुइया की बहुत प्रसंसा की तथा उन्हें संसार का सबसे महान पतिव्रता नारी होने का बखान किये। तीनो देवियों को माता अनुसुइया से बहुत ईर्ष्या हो गयी और उंन्होने अनुसुइया के सतीत्व को भंग करने का निश्चय कर लिया। अतः उन्होंने अपने अपने पतियों अर्थात त्रिदेव व्रह्मा , विष्णु और शिव को माता अनुसुइया के सतीत्व को भंग करने को कहा और जब उन्होंने ऐसा न करने को कहा तो तीनों देवियों ने बहुत हट किया।
जब बहुत समझने पर भी वो नही मानी तो विवश होकर व्राह्मण वेश में महर्षि अत्रि के आश्रम में गए। माता अनुसुइया ने उनका स्वागत किया। व्राह्मण देहधारी त्रिदेव ने उनसे भिक्षा मागा और कहा कि हम भिक्षा तभी लेंगे जब वो निर्वस्त्र होकर भिक्षा देगी।
माता अनुसुइया बहुत चिंतित हो गयी अगर वो ब्राह्मणों की बात माने तो सतीत्व नष्ट होगा और अगर न माने तो व्राह्मण को भिक्षा न दे पाने का पाप होगा। अतः उन्होंने अपने तपोबल से तीनों ब्राह्मणो को नन्हे शिशुओं में बदल दिया और उनको दूध पिलाकर पालने में लिटा दिया।
उधर जब तीनो देवियो को पता चला कि अनुसुइया ने त्रिदेव को छोटे शिशुओं में बदल करके पालने में सुला दिया है तो उन्हें अनुसुइया माता की सतीत्व के बल का आभास हुआ और वो तीनो माता अनुसुइया के आश्रम में जाकर उनसे छमा मांगकर अपने पातियो को पुनः वास्तविक रूप में लाने का अनुरोध किया। 
माता अनुसुइया ने जब उन्हें वास्तविक रूप दिया तो त्रिदेव व्रह्मा, विष्णु और महेश ने उनसे वरदान मांगने को कहा, इसपर माता अनुसुइया बोली मेरी कोई संतान नही है अतः मैं आप तीनो को पुत्र रूप में पाना चाहती हूं। तीनो ने उन्हें पुत्र रूप में आने का वरदान देकर चले गए। 
माता अनुसुइया के इस वरदान स्वरूप व्रह्मा जी चंद्र रूप में , विष्णु जी श्री दत्त रूप में तथा शिवजी दुर्वाशा रूप में माता अनुसुइया के यह जन्म लिए।



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