google.com, pub-8785851238242117, DIRECT, f08c47fec0942fa0 सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा। Satyavadi Raja Harishchandra. - पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

02 April, 2019

सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा। Satyavadi Raja Harishchandra.

राजा हरिश्चन्द्र का परिचय:
राजा हरिश्चन्द्र इक्ष्वाकु कुल के राजा थे, जो रघुकुल नाम से भी जाना जाता है। वे अयोध्या के सूर्यवंशी राजा तथा भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। उनकी पत्नी का नाम तारावती तथा पुत्र का नाम रोहिताश्व था। हरिश्चन्द्र सत्यवादी एवं धर्म पालक थे, वो स्वप्न में भी जो वचन देते थे उसे पूरा करते थे। यही कारण हैं कि उनका नाम हमेशा सत्यवादी के रूप में उदाहरण लिया जाता है। सत्य और धर्म के पालन के लिए उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा परंतु उंन्होने कभी भी सत्य का मार्ग नही छोड़ा। उनके बारे मे एक दोहा प्रचलित है:

" चंद्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार।
पै दृन्हवृत हरिश्चंद्र को, टरे न सत्य विचार।। "


Raja Harishchandr


राजा हरिश्चन्द्र की कथा:

पौराणिक कथायों के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र सत्यवादी थे अतः उनके सत्य और धर्म की परीक्षा लेने के लिए महर्षि विस्वामित्र गए। विश्वामित्र जी ने माया द्वारा राजा हरिश्चन्द्र को स्वप्न दिखाया जिसमे राजा के महल में एक व्राह्मण आये जिनका राजा हरिश्चन्द्र ने बहुत आदर सत्कार किया, तथा भिक्षा में सारा राज्य दान दे दिया।
अगले दिन विस्वामित्र स्वयं आये, हरिश्चन्द्र जी ने महर्षि का स्वागत किया तथा राजसभा में ले गए। विस्वामित्र ने राजा से उनके स्वप्न के बारे में याद दिलाया तथा कहा कि ध्यान करो कि वो व्राह्मण मैं ही था जिसे तुमने अपना सारा राज्य दान में दे दिया है। राजा हरिश्चन्द्र को याद आ गया तथा उंन्होने अपना सारा राज्य महाऋषि विस्वामित्र को देने की घोषणा कर दी।
महाऋषि विस्वामित्र ने कहा कि दान के पश्चात दक्षिणा का प्रावधान है अतः तुम्हे दकक्षिणा देना होगा तभी तुम्हारा दान पूर्ण होगा। हरिश्चन्द्र ने मंत्री को आदेश दिया कि तीन स्वर्ण सीक्के महाऋषि को दकक्षिणा के तौर पर दी जाय। परंतु महाऋषि विश्वामित्र बोले जब तुमने सारा राज्य मुझे दान दे दिया है तो सारा राज कोष मेरा हुआ फिर उनमें से दक्षिणा तुम कैसे दे सकते हो? राजा हरिश्चंद्र ने अपनी गलती मानकर बोले मुझे थोड़ा समय दे मैं आपको दक्षिणा अवस्य दूँगा।
राजा हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी तथा पुत्र के साथ काशी के उस स्थान पर गए जहां पर मनुष्य तथा पसुओं का खरीदी एवं विक्री होती थी। बहुत प्रयास के बाद भी उन्हें किसी ने नही खरीदा। अंत मे उनकी पत्नी तथा पुत्र को एक महाजन ने गृहकार्य के लिए तथा राजा हरिश्चन्द्र को एक समशान घाट के डोम ने खरीदा। इससे जो धन इकट्ठा हुआ उससे उंन्होने महाऋषि की दकक्षिणा चुका दिए।
सत्य और धर्म के पालन हेतु एक महारानी जिसके चारों तरफ दास दासीओ की कतार लगी रहती थी वो दूसरे के घर के जुठे बर्तन धोती थी तथा एक चक्रवर्ती राजा समशान घाट की रखवाली करता था तथा अंतिम क्रिया के लिए आने वालों से कर वसूली करता था।
इतने होने के बाद भी एक दिन जब उनका पुत्र खेल रहा था तो काल सर्प बनकर काट लिया जिशसे इनके पुत्र की मृत्यु हो गयी। महारानी पुत्र सोक में तड़पकर रो रही थी उस समय न तो पति था और न ही धन। बाद में उंन्होने अपने पुत्र के अंतिम संस्कार हेतु अपनी गोद मे लेकर समशान गयी, जंहा का देखरेख हरिश्चंद्र कर रहे थे। वो अपनी पत्नी तथा पुत्र को पहचान गए और बहुत दुखी हुए। 
अंतिम संस्कार हेतु उंन्होने अपनी पत्नी को कहा कि उन्हें कर देना होगा क्योंकि वो अपने मालिक को धोखा नही दे सकते यह धर्म विरुद्ध होगा। हरिश्चंद्र की पत्नी ने कहा कि उनके पास कुछ नही है जिससे कर चुकाया जा सके। 
तब हरिश्चंद्र बोले कि अपनी साड़ी की आधा हिस्सा फाड़कर कर के रूप में दे जिसजे कर चुकाया जा सके। जब वो ऐसा करने लगी तो आकाशवाड़ी हुई और बताया गया कि विश्वामित्र के द्वारा उनकी परीक्षा ली जा रही थी जिसमे वो सफल रहे । अतः उनके पुत्र को जीवित कर दिया गया और उनको अपना राज्य वापस मिला।

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