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07 March, 2019

अहल्या के जीवन और संघर्ष की कथा। The story of Ahaly's life and struggle.

अहल्या या अहिल्या का जीवन Ahalya's Life:




पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार अहल्या(अहिल्या) परम पिता व्रह्मा कि पुत्री थी जिनका विवाह महाऋषि अत्री के पुत्र महाऋषि गौतम के साथ हुआ था। अहिल्या और गौतम के पुत्र थे ऋषि सनातन जो राजा जनक के कुलगुरु थे। देवी अहल्या के जीवन की कथा बेहद करुणामई था। उनका नाम अहल्या और अहिल्या दोनों नामो में वर्णित है। देवी अहल्या महान सतीत्व को धारण करने वाली नारी थी जिनके साथ देवताओं के राजा इंद्र द्वारा छल किया गया परंतु जब उनकी कोई गलती न होने पर भी श्राप दिया गया तो बिना तर्क किये स्वीकार किया और पति की आज्ञा मानकर पत्थर की सिला बनगई। जिनका उद्धार भगवान विष्णु के अवतार श्री राम द्वारा हुआ।
उनकी इस करुण कथा से यह बोध होता है कि नारी के बल का मान रखने के लिए स्वयं भगवान को भी खींचकर आना पड़ता है। देवी अहिल्या मंचकन्या में स्थान रखती है उनकर लिखा यह श्लोक प्रचलित है:


अहल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा। 
पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशिन्याः ॥

अर्थात अहल्या, द्रोपदी, कुंती, तारा और मंदोदरी ये पांच कन्याओं का प्रतिदिन नाम लेने से माहा पाप का भी नाश हो जाता है। अतः स्त्रियों को प्रतिदिन इनका स्मरण करना चाहिए।

अहल्या के जन्म एवं विवाह कि कथा Ahilya's birth and marriage story:

अहल्या भगवान ब्रह्मा की मानसपुत्री थी, जिनकी रचना भगवान ब्रह्मा ने सबसे सुन्दर स्त्री के रूप में किया था । इनके नाम के अर्थ में दो मत है, पहले मत के अनुसार "हल्या" अर्थात कुरूपता अतः "अहल्या" का अर्थ है कुरूपता रहित या जिसमे कुरूपता न हो । दूसरे मतानुसार "अहल्या" का अर्थ है जिसपर हल न चला हो या जोता न गया हो।
अहल्या के रचना के पश्चात वृह्मदेव ने समस्त देवताओं और ऋषियों के सम्मुख अहल्या के सौंदर्य और सुंदरता की विवेचना की थी। जिसके पश्चात समस्त देवताओं और ऋषियों में अहल्या के साथ विवाह का मन बना लिया और वृह्मदेव के सम्मुख प्रस्ताव दिया, जिसमे देवराज इंद्र अधिक लालायित थे। अतः ब्रह्मदेव ने अहल्या के विवाह में एक शर्त रखी कि जो पृथ्वी का चक्कर लगाकर सर्वप्रथम आएगा उसी के साथ अहल्या का विवाह होगा। 
देवताओं के राजा इंद्र ने अपनी समस्त शक्तियों के बल से पृथ्वी का चक्कर लगाकर आये, परंतु देवऋषि नारद ने ब्रह्मदेव को बताया कि महाऋषि अत्री के पुत्र "गौतम" ने सबसे पहले चक्कर लगाया है क्योंकि उन्होंने एक ऐसी गाय का चक्कर लगाए है जो बछड़े को जन्म दे रही थी, इस अवस्था की गाय पृथ्वी तुल्य होती है। अतः ब्रह्माजी ने अहल्या का विवाह महाऋषि गौतम के साथ कर दिया।

अहल्या को श्राप और फिर उद्धार की कथा Curse of Ahaly and then the story of salvation:

देवी अहल्या का विवाह गौतम ऋषि के साथ होने के पश्चात वो पूर्ण आतित्व के साथ तथा पति को ही ईस्वर मानकर जीवन व्यतीत करने लगी। परंतु देवताओं के राजा इंद्र के मन में देवी अहल्या के सौंदर्य को पाने की लालसा का अंत नही हुआ था, वो हमेशा अवसर कि प्रतीक्षा में लगे रहते थे।
एक दिन जब प्रातः काल मे गौतम ऋषि स्नान हेतु अपनी कुटिया से निकल गए तो अवसर देखकर देवराज इंद्र ने माया से गौतम का रुप रखकर उनकी कुटिया में प्रवेश कर गया। और अहल्या से संबंध बनाने का आग्रह किया, देवी अहल्या उसे अपना पति समझकर और उनकी आज्ञा मानकर स्वीकार कर लिया। जब गौतम ऋषि स्नान करके वापस आये तो अपनी कुटिया से अपने ही स्वरूप वाले व्यक्ति को बाहर जाते देखकर विस्मय में पड़ गए। उसके बाद उन्होंने अपने तपोबल से देख लिया कि वो इंद्र है तथा वो अत्यंत क्रोधित हो गए।
देवी अहल्या को भी ज्ञात हो गया कि उनके साथ छल हुआ है अतः उन्होंने अपने पति गौतम से बहुत छमा याचना की परंतु वो क्रोध के आवेश में अहल्या को श्राप दे दिया कि वो पत्थर की सिला हो जाये, क्योंकि उन्होंने अपने पति और पराये पुरुष के स्पर्श के अंतर को नही समझा।
कई वर्षों के उपरांत जब श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और ऋषि विस्वामित्र के साथ जनकपुरी सीताजी के स्वयंवर के लिए जा रहे थे तब वह स्थान पड़ा जहां पर अहल्या सिला रूप में थी। ऋषि विस्वामित्र ने श्रीराम को सारी कथा सुनाई और उनका उद्धार करने को कहा । तब श्रीराम के चरण के स्पर्श से देवी अहल्या मुक्त हुई।



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