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29 March, 2019

रूद्राक्ष की उत्पत्ति एवं रुद्राक्ष धारण के लाभ। Rudraksh ki utpatti aur labh.

रुद्राक्ष Rudraksh:

रुद्राक्ष एक प्रकार का फल है जिसका छिलका निकल लेने के पश्चात गुठली बचती है यह हिमालय और नेपाल के इलाके में अधिक पाया जाता है। रुद्राक्ष के 1 से लेकर 14 धारिया हो सकती है जिन्हें मुख कहा जाता है। जिस रुद्राक्ष में धारिया उभरी न हो, कीड़े ने खाया हो या पूरी तरह गोल न हो उसको धारण नही करना चाहिए। जिस रुद्राक्ष में धागा पिरोने के लिए प्राकृतिक छेद हो वो उत्तम होता है। रुद्राक्ष की उत्पत्ति जगत के पिता परमेश्वर भगवान महादेव के द्वारा हुई थी अतः यह भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। रूद्राक्ष कई प्रकार का होता है और बहुत ही लाभकारी होता है। रुद्राक्ष मंगलकारी, रोगनाशक, पुण्यवर्धक, सिद्धिदायक एवं मोक्षदायिनी होता है। यह स्वेत, लाल, पीले एवं काले वर्ण का होता है।




शिवमहापुराण के अनुसार ब्राह्मण को स्वेत, छत्रिय को लाल, वैश्य को पीले एवं शुद्र को लाल वर्ण का रूद्राक्ष धारण करना उत्तम माना गया है, लेकिन किसी वर्ण का भी रूद्राक्ष लाभकारी होता है। 

रुद्राक्ष के उत्पन्न होने की कथा:

शिवमहापुराण के अनुसार भगवान भोलेनाथ ने ही इसके प्रगट होने की व्याख्या माता पार्वती के सम्मुख कही थी। उस कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव बहुत लंबी तपस्या में लीन थे, भगवान शिव यह साधना जगत कल्याण हेतु कर रहे थे। तभी एक दिन  उनका मन दुःखी हो गया और उनकी आंखों से अश्रु की बूंदें गिरी जिशसे रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई। भगवान की कृपा से उत्पन्न वह रुद्राक्ष का वृक्ष सम्पूर्ण धरा में पहुच गया और उसके फल रूद्राक्ष के रूप में धारण किया जाने लगा।
भगवान शिव और पार्वती को प्रसन्न करने के लिये रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए।



रुद्राक्ष के प्रकार एवं धारण के लाभ:

आकर के अनुसार रुद्राक्ष को तीन श्रेणियों में रखा गया है वो श्रेणिया इस प्रकार है:
१) उत्तम श्रेणी: उत्तम श्रेणी का रुद्राक्ष आँवले के आकार का होता है।
२) मध्यम श्रेणी: इस श्रेणी का रुद्राक्ष बेर के आकार का होता है।
३) निम्न श्रेणी: निम्न श्रेणी का रुद्राक्ष चने के आकार कहोत है।



रुद्राक्ष में धारिया या छिद्र होते है जिनकी संख्या 1 से लेकर 14 तक हो सकती है इसे मुख कहा जाता है। सभी प्रकार के रुद्राक्ष के धारण का फल अलग अलग होता है जिसका वर्णन शिवमहापुराण में किया गया है यह रुद्राक्ष के मुख के अनुसार है। एक रेखा वाला रुद्राक्ष एक मुखी है जो शिवरूप है। वह मुक्ति देता है। दो मुखी शिव पार्वती रूप है, जो इच्छित फल देता है। तीन मुखवाला रुद्राक्ष त्रिदेवरूप है जो विद्या देता है, चार मुखी ब्रह्मरूप है, जो चतुर्विध फल देता है। पंचमुखी रुद्राक्ष पंचमुख शिवरूप है, जो सब पापों को नष्ट करता है। छः मुखी रुद्रज्ञक्ष स्वामिकार्तिक रूप है, जो शत्रुओं का नाश करता है, पापनाशक है। सात मुखी कामदेवरूप है, जो धन प्रदान करता है। नौ मुखी कपिल मुनि रूप तथा नव दुर्गारूप है, जो मनुष्य को सर्वेश्वर बनाता है। दशमुखी विष्णु रूप है, जो कामना पूर्ति करता है। ग्यारह मुखी एकादश रुद्ररूप है, जो विजयी बनाता है। बारह मुखी द्वादश आदित्य रूप है, जो प्रकाशित करता है। तेरह मुखी रुद्राक्ष विश्वरूप है, जो सौभाग्य मंगल देता हैं चौदह मुखी परमशि रूप है, जो धारण्सा करने से शांति देता है। 

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