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10 February, 2019

भगवान विष्णु के पांचवे अवतार:वामन अवतार की कथा। Story of Vaman Avtar.

वामन अवतार:

भगवान विष्णु के दस अवतारों में से पांचवां अवतार है वामन अवतार। भगवान ने यह अवतार देवताओं और पृथ्वी वाशियों की रक्षा दैत्यों के राजा बलि से करने के लिए लिया था। इस अवतार में वामन अवतार के पिता मह्रिषी कस्यप और माता अदिति थी। भगवान ने यह अवतार भाद्रपक्ष में सुकल्पक्ष की द्वादशी को लिया था।


कौन थे राजा बलि:

राजा बलि दैत्यों के राजा और भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे। जिन्होंने देवताओं के साथ मिलकर समुंद्र मंथन किया था जिसके अंत मे अमृत निकला था, जिसके सेवन के लिए बहुत विवाद के बाद भगवान विष्णु ने मोहनी रूप रखकर देवताओं को अमृत पान करवाया। जिसके बाद देवताओं और असुरो के बीच युद्ध हुआ जिसमें देवताओं ने असुरो को हराया और इंद्र के वज्र प्रहार से बलि की मृत्यु हो गयी थी।
परंतु असुरो के आचार्य शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या से असुरो की सेना और राजा बलि को जीवित कर दिया और पाताल में ले गए। फिर राजा बलि शुक्राचार्य की सेवा में लग गए जिससे प्रसन्न होकर शुक्राचार्य के यज्ञ करवाया जिससे अक्षय त्रोण , अभेद कवच और दिव्य रथ मिला। 
असुर गण फिर से शक्तिशाली होकर स्वर्ग पर चढ़ाई की , अशुरो को शक्तिशाली जानकर देवता स्वर्ग छोड़कर भाग गए।


भगवान विष्णु का वामन स्वरूप में अवतरण:

शुक्राचार्य राजा बलि को इंद्र के समान बनाने और हमेसा के लिए स्वर्ग में अधिपत्य के लिए राजा बलि से सौ अस्वमेध यज्ञ करवाना सुरु किया। देवताओं के इस यज्ञ को रूकवाने और अपनी सहायता के लिए विष्णु भगवान से प्रार्थना की जिनके बाद भगवान विष्णु ने कस्यप ऋषि के पुत्र रूप में अवतरित हुए। 
जब बलि का आखरी अस्वमेध यज्ञ चल रहा था तब भगवान वामन जो बहुत छोटे कद के व्राह्मण रूप में थे बलि के पास गए। स्वरूप और तेज देखकर सब अचंभित रह गए। राजा बलि ने उनके चरण धोये और मांगने के लिए कहा।
भगवान वामन के उनसे तीन गज जमीन मांग लिए। जिसका विरोध करते हुए सुक्रचार्य ने कहा कि ये विष्णु है जो छल करने के लिए यंहा आये है इनकी बात मत मानो। लेकिन बलि ने कहा कि मैं प्रह्लाद का पौत्र हु किसी को लिया हुआ वचन नही तोड़ सकता , तब सुक्रचार्य नाराज हो गए और सर्वनाश का श्राप देते हुए चले गए।
फिर भगवान वामन जब तीन गज जमीन नापने लगे तो अपना विराट स्वरूप बनाया और एक गज में पूरी पृथ्वी, पाताल और दूसरे पग ब्रह्म लोक से पग घुमाकर पूरा स्वर्ग लोक ले लिया। व्रह्मा जी ने उनका पांव धोया और कमंडल में रख लिया जो बाद में गंगा के रूप में धरती पर आई।
तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नही बचा तो राजा बलि ने अपना सर झुककर मस्तक पर रखने का आग्रह किया।

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