google.com, pub-8785851238242117, DIRECT, f08c47fec0942fa0 तुलसी की पैराणिक कथा एवं महत्व। Pauranik Story of Tulsi and importance. - पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

25 February, 2019

तुलसी की पैराणिक कथा एवं महत्व। Pauranik Story of Tulsi and importance.

पुराणों में तुलसी का महत्त्व:

तुलसी का भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में मान्यता है। अतः वो माता लक्ष्मी का स्वरूप है। कार्तिक मास की एकादसी को जिसे देवउठनी एकादसी कहते है उस दिन माता तुलसी का भगवान विष्णु के सलिक्ग्राम स्वरूप से विवाह की प्रथा है। तुलसी के पत्तिओ का भगवान के भोग में डाला जाता है कहा जाता है बिना तुलसी की पत्तिओ के भगवान का भोग अधूरा माना जाता है। माँ तुलसी को घर के आंगन में स्थापित किया जाता है जिससे सुख और शांति आती है तथा घर के वातावरण में स्वक्षता और सीतलता बनी रहती है।

तुलसी की पौराणिक कथा:


कई पुराणों में इस कथा का विस्तृत रूप से व्याख्या की गई है अतः इस कथा के अनुसार एक वृंदा नाम की स्त्री थी जिसका जन्म राक्षस कुल में हुआ था। परंतु वो भगवान विष्णु कि परम भक्त थी। वो पतिव्रता और महान आतित्व का पालन करने वाली थी। उसके पति का नाम जलंधर था।
जलंधर बहुत शक्तिशाली असुर था उसने भगवान व्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल शिवजी के द्वारा ही होगा। इसलिए उसने सम्पूर्ण लोको को भयभीत कर रखा था।
जब उस जलंधर का  वध करने हेतु असुरों और देवताओं में युद्ध हुआ तो वृंदा पूजा करने में बैठ गयी जिसके सतीत्व के कारण जलंधर का वध नही हो पा रहा था।
तब देवता भगवान विष्णु की शरण मे गए और जलंधर के वध हेतु वृंदा की पूजा को स्थगित करने का उपाय करने को कहने लगे। परंतु विष्णु जी ने कहा कि वृंदा मेरी परम भक्त है अतः मैं उसके पूजा कार्य मे विघ्न कैसे कर सकता हूँ। परंतु जब देवताओं ने जलंधर के अत्याचार से पृथ्वी की रक्षा हेतु जलंधर का वध जरूरी बताया तो विष्णु जी मान गए और जलंधर के रूप में वृंदा के मंदिर के वहार गए।
वृंदा को लगा कि उसका पति विजयी होकर आ गया, और वो पूजा छोड़कर बाहर गयी। उधर युद्ध मे जलंधर का वध उसका गला काटकर किया गया, उसका मस्तक उसी समय वृंदा के पास गिरा। वृंदा को समझ आ गया कि छल हुआ है, अतः उसने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वो पत्थर के बन जाये। वृंदा के श्राप से विष्णु जी पत्थर के हो गए। तभी वहां शिवजी सहित अन्य देवता आ गए और वृंदा को बताया कि वो भगवान विष्णु है और सारा वृतांत सुनाया। और बताया कि जलंधर अत्याचारी था अतः उसका वध जरूरी था।
वृंदा ने भगवान को श्राप मुक्त कर दिया और पति जलंधर के साथ सती हो गयी।
उसकी राख से एक पौधा तुलसी रूप में उगा जिसे भगवान विष्णु ने ग्रहण कर लिया साथ ही बोले कि इसके पत्ते उक्त भोग को ही स्वीकार करेंगे। तब से तुलसी का सलिक्ग्राम से विवाह की प्रथा सुरु हुई।


तो दोस्तो आपको यह कथा कैसे लगी अपने सुझाव दे और कथा लो शेयर करे।

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