भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

20 February, 2019

भगवान विष्णु का दसवां अवतार :कल्कि अवतार। Story of Kalki avtar in hindi.

कल्कि अवतार Kalki Avtar:

उत्तर प्रदेश के संभल मंदिर कि प्रतिमा
भगवान विष्णु दसवे अवतार के रूप में अवतरित होंगे तब उनका नाम कल्कि होगा, भगवान विष्णु का यह कल्कि अवतार कलगुग के अंत मे होगा जिसमें वो पापियों और दुष्ट प्राणियों का संघार करेंगे। भगवत पुराण के साथ साथ बहुत से अन्य पुराणों में भी भगवान विष्णु के इस अवतार के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह बताया गया है कि इनके अवतार के बात युग का परिवर्तन होगा , अर्थात कलयुग की समाप्ति हो जाएगी और सतयुग पुनः आएगा। इनके अवतार का मुख्य उद्देश्य विश्वकल्याण होगा।
भागवत पुराण के अनुसार भगवान विष्नु का यह कल्कि अवतार चंदौली ग्राम में एक ब्राह्मण के पांचवे पुत्र के रूप में होगा तथा वे स्वेत देवदत्त नामक घोड़े पर अरुण होकर अपनी तलवार से दुस्टों का संहार करेंगे।
भागवत पुराण और विष्णु पुराण में कल्कि अवतार का विस्तार में वर्णन किया गया है, और कल्कि पुराण तो इसी अवतार पर केंद्रित है जिसमे जन्म, गुरु , माता पिता, पत्नियों और बच्चों का विस्तार में वर्णन किया गया है।

कल्कि अवतार में मतभेद:

कई विद्ववानों और जानकारों ने भगवान विष्णु पे इस अवतार पर बड़े मतभेद व्यक्त किये है। क्योंकि अभी कलयुग का प्रथम चरण चल रहा है फिर अभी से उनके मंदिर और पूजा के बारे में यक्तव्य। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कलयुग की समय अवधि 4 लाख 32 हजार साल की बताई जाती है और कलयुग को लगभग 5 हजार साल हुए है।
कुछ इतिहासकारो का मानना है कि कल्कि अवतार हो चुका है, क्योंकि उनके स्वरूप की जिस तरह व्याख्या की गई है वह अतीत में ही संभव था। कुछ का कहना है कि पुराणों के अनुसार महाऋषि व्यास भगवान विष्णु के अवतार थे और गौतम बुद्ध का उन पुराणों में विवरण नही है , तो हो सकता है ऋषि व्यास नवमें और गौतम बुद्ध दसवे अवतार हो।

भगवान कल्कि में मंदिर

सर्व प्रथम जयपुर में सवाई जयसिंह ने 1739 में पुराणों की व्याख्या के अनुसार बनवाया था। इसके अलावा भारत के कई स्थानों में कल्कि स्वरूप के मंदिर है। उत्त्तर प्रदेश के संभल में कल्कि अवतार का बहुत बड़ा और प्रसिध्द मंदिर है।
ऐसे तो आजकल उनपर बहुत से भक्ति गीत, मंत्र पुस्तक आदि बन और छप रही है। उनके नाम पर कई संगठन भी बन रहे है जो प्रचार प्रसार कर रहे है।



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18 February, 2019

भगवान विष्णु के सातवे अवतार: गौतम बुद्ध। Gautam Buddha avatar of lord Vishnu.

गौतम बुद्ध:

भगवान बुद्ध संसार को ज्ञान का मार्ग प्रदान किया और उनकी शिक्षाओं से बौद्ध धर्म की स्थापना और प्रचलन हुआ। गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु के दशावतारों के से नौवा अवतार कहा गया है। कई पौराधिक और हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में इसका वर्णन है। भगवान बुद्ध ने लोगो को अहिंसा के मार्ग में चलने का उपदेश दिया। उनके उपदेश में लोगो को दुःख और उसके कारण और निवारण के लिए अष्ठांगिक मार्ग सुझाया था। तथा उन्होंने लोगो को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया था।
भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईशा पूर्व लुम्बनी, नेपाल में इक्षवाकु क्षत्रिय कुल में हुआ था। उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था। उनके पिता सुद्धोधन और माता महामाया था। माता की मृत्यु के उपरांत महामाया की बहन ने किया था। उनकी पत्नी का नाम यशोधरा था तथा उनका एक पुत्र था जिनका नाम राहुल था। उनके गुरु विश्वामित्र थे।
एक रात अचानक उन्होंने अपना परिवार और राजपाठ छोड़कर वन की तरफ दिव्य ज्ञान की खोज में चले गए। और कठिन परिश्रम और साधना से उनके बाद उन्हें बोधी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हो गयी , वह स्थान विहार के बोध गया के नाम से विख्यात है। तब उनका नाम सिद्धार्थ से बुद्ध हो गया , गौतम गोत्र के कारण उनको गौतम बुद्ध कहा गया।

विरक्ति का कारण:

भगवान बुद्ध जिनका नाम सिद्धार्थ था, उनका राज्य बहुत सम्पन्न और सभी तरह से खुशहाल था। उनके आनंद और विलाश का सारा प्रबंध उनके पिता और राजा सुद्धोधन ने किया था। परंतु उनको धन, वैभव और विलासिता रोक नही पाई। 
एक दिन जब वे सैर पर निकले तो उनको एक बूढ़ा आदमी मिला जिसकी अवस्था बहुत जर्जर थी। दूसरे दिन उनको उन्हें एक बहुत बूढा और रोगी व्यक्ति मिला जो बहुत से रोगों से ग्रसित था और बहुत दुखी था। तीसरे दिन दिन जब वे सैर पर निकले तो उन्हें एक मृतक को चार लोग ले जाते हुए दिखे साथ मे बहुत लोग थे जिनमें से कुछ लोग रो रहे थे।
तब उनके अंदर विरक्ति का भाव हुआ उनको लगा कि जवानी, और सरीर नाशवान है, फिर जब वे चौथे दिन सैर पर निकले तो उनके एक वैरागी व्यक्ति दिखा जो संसार से विरक्त था। तब वे भी संसारिक भावनाओं और इक्षाओ से मुक्त हो सन्यास के मार्ग में चल दिये।

भगवान बुद्ध के ज्ञान की प्राप्ति:

भगवान बुद्ध को बिहार के बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे हुआ, जिसका उपदेश उन्होंने अपने चार शिष्यों को दिया। उन्होंने शांति हेतु मध्यम मार्ग का उपदेश दिया जिसमें उन्होंने वीणा के तारों का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वीणा के तारो को ढीला रखा जाए तो स्वर नही निकलते और अगर अधिक कड़े कर दिए जाय तो टूट जाते है अतः मध्यम मार्ग ही सबसे उत्तम है। उन्होंने ध्यान, चार आर्य सत्य, और साष्टांग मार्ग आदि का उपदेश दिया।

बुद्ध का निधन परिनिर्वाण:

भगवान बुद्ध का निधन या परिनिर्वाण 483 ईशा पूर्व भारत के कुशीनगर में हुआ तब उनकी आयु 80 वर्ष जे आसपास थी। उनके शिष्यों के संख्या भी बहुत बड़ी,जिसके कारण बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। कई राजा महाराजा भी बौद्ध धर्म से जुड़े और प्रचार किया जिसमें सम्राट अशोक का भी बहुत बड़ा योगदान था।



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16 February, 2019

भगवान विष्णु के आठवें अवतार : श्रीकृष्ण की कथा। Story of Shrikrishna in hindi.

श्रीकृष्ण Shrikrishna:

भगवान विष्णु के दसावतार में आठवां अवतार है श्रीकृष्ण। भगवान विष्णु ने यह अवतार आसुरी सक्तियो के विनास और कंस के वध हेतु लिया था। भगवान के श्रीकृष्ण अवतार में यदुवंश में मथुरा में लिया था। तथा उनके पिता वासुदेव और माता देवकी थी। परंतु देवकी और वासुदेव, कंस के करावास में होने के कारण श्रीकृष्ण का लालन पालन गोकुल में यसोदा माता और नंदबाबा के यंहा हुआ था। भगवान के इस जन्म में बड़े भाई बलदेव(बलभद्र) और बहन सुभद्रा थी।
भगवान श्रीकृष्ण जगत कल्याणयक और प्रेम की पराकाष्ठा के रूप में अवतरित हुए थे। राधा-कृष्ण का अमर प्रेम और इनकी कथा हमेशा संसार के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।
भगवान में इन अवतार में बहुविवाह हुए उनकी रुकमणी और सत्यभामा सहित 8 मुख्य पटरानियां थी और कुल 16108 रानियां थी।

श्रीकृष्ण के जन्म की कथा:

जब मथुरा में कंस का आतंक बहुत ज्यादा बढ़ गया और बल पूर्वक अपने पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर कारागृह में डाल दिया और खुद मथुरा का राजा बन गया। उसने अपनी बहन देवकी और अपने मित्र तथा देवकी के पति वासुदेव को भी काराग्रह में डाल दिया, क्योंकि देवकी विवाह के समय आकाशवाणी हुई थी कि "देवकी का आठवां पुत्र ही तेरा काल होगा और तेरा वध करेगा"।
कंस ने देवकी-वासुदेव के पहले छह पुत्रों को जन्म लेते ही मार डाला, सातवे पुत्र को माया के द्वारा वासुदेव की दूसरी पत्नी माता रोहिणी के गर्भ में डाल दिया गया, जिनसे बलदाउ जी (सेसनाग अवतार कहा गया है) का जन्म हुआ।
देवकी  के आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपक्ष की अष्ठमी को मध्यरात्रि में हुआ, जन्म लेते ही बेड़ियां खुल गयी, काराग्रह के द्वारपाल गहरी निंद्रा में चले गए , सारे दरवाजे खुल गए । श्रीकृष्ण के पिता बसुदेव उनको बांस की टोकरी में लेकर मथुरा से गोकुल में नंदबाबा के यंहा माता यशोदा के पास छोड़ आये।

श्रीकृष्ण जी की बाल लीलाओं:

भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल में बहुत सी बाल लीलाये की वे गोप ग्वाले के साथ गायो को चराया, माखन खाये, घर घर जाकर माखन चुराए, गोपियों की मटकी तोड़ी इत्यादी।
साथ ही कंस के द्वारा उनको मारने हेतु भेजे गए कई राक्षसों का वध किया, तथा जमुना जी मे रहने वाले अति विसेले नाग को भगाया और नाग के ऊपर नृत्य किये।
इंद्रा आदि देवताओं की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाई और गोवर्धन पर्वत को पानी उंगली में उठाकर गोकुल वासियो की रक्षा की और देवताओं के अभिमान का मर्दन किया।
रास लीलाये की तथा राधा-कृष्णा का प्रेम समूची मानव जाति के लिए प्रेरणा बनी। भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन के सब दीवाने थे, मनुष्य तो क्या पशु पक्षी भी ठहरकर आनंद उठाते थे।

कंस का वध तथा माता पिता की कंस के बन्दीग्रह से मुक्ति:

जब कंस का कोई भी असुर और राक्षस भगवान श्रीकृष्ण का कुछ नही कर पाए तो कंस ने उनको मथुरा बुलाया और मलयुद्ध का आमंत्रण दिया जंहा पर श्रीकृष्ण के हांथो कंस का वध हुआ। बाद में देवकी और पिता बसुदेव को को छुड़ाया, साथ कि कंस के पिता और अपने नाना उग्रसेन को छुड़ाया।

कंस वध के बाद का श्रीकृष्ण का जीवन:

कंस वध में उपरांत श्रीकृष्ण का ब्रतबंध हुआ और उज्जैन विद्या अध्ययन के लिए गए जंहा पर उनकी मित्रता सुदामा के साथ हुई थी। कंस के वध का प्रतिशोध लेने के लिए जरासंध बार बार मथुरा में आक्रमण करता था, तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी राजधानी द्वारिका बनाई और सभी मथुरा वासियो को वंहा पर ले गए।
महाभारत में भी भगवान श्री कृष्ण का बहुत बडा योगदान था, महाभारत उन्होने पांडवो का साथ दिया और अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया।




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14 February, 2019

भगवान विष्णु के सातवें अवतार: श्रीराम। Story of ShriRam in hindi.

भगवान विष्णु के अवतार श्री राम:



भगवान विष्णु के दसावतार में से सातवे अवतार है श्रीराम। भगवान विष्णु का रामावतार दैत्य और दानवों के अत्याचार से रसातल में जाति हुई पृथ्वी की रक्षा के लिए लिया था। भगवान ने यह अवतार लेकर पृथ्वी पर दानवो और दैत्यराज रावण का वध कर पृथ्वी के ऋषियों, मुनियों और आम जनमानस को संकट से मुक्त किया था।
भगवान राम ने केवल दानवो का दलन नही किया अपितु संसार के लिये अपने जीवन से बहुत कुछ सीखने के लिए दे गए। भगवान राम ने उच्च आदर्श, न्याय, नीति, सिद्ध्यान्त के नए आयाम कायम किये। उन्होंने पूरा जीवन मर्यादित रहकर जिया भले ही परिस्थिति अनुकूल रही हो या प्रतिकूल इसलिए भगवान राम को मर्यादापुरुषोत्तम कहा जाता है।
भगवान विष्णु ने श्रीराम का अवतार त्रेतायुग युग मे सूर्यवंशी अयोद्धया के राजा श्री दसरथ के पुत्र के रूप में लिया, उनकी माता कौसिल्या थी। उनके तीन भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे, जो उनके पिता दसरथ जी की दो और पत्नियो माता कैकेयी और सुमित्रा के पुत्र थे। श्री राम जी का विवाह राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ था।


श्रीराम कथा का वर्णन कंहा मिलता है?

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श्रीराम के कथा का वर्णन "रामायण" महाकाव्य में मिलता है जिसे महाऋषि बाल्मीक जी ने लिखा था यह संस्कृत भाषा मे है। बाल्मीक जी के द्वारा लिखे जाने की वजह से इसे "बाल्मीकि" भी कहते है।
जब संस्कृत भाषा का कम हो गया तो अलग अलग महापुरुषों और संतों ने रामायण का अलग अलग भाषा मे अनुवाद अपने अपने तरीके से किया। ईनके अलावा विश्व भर में इनके अनुवाद किये गए है।
अवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास जी ने 15वी सताब्दी में "रामचरितमानस" की रचना की जो सबसे ज्यादा प्रशिद्ध है। तुलशी कृत रामचरितमानस वाल्मीकि रामायण से सबसे ज्यादा समानता रखती है। इसमे श्रीराम को महानायक के रूप में मर्यादापुरुषोत्तम बताया गया है। तुलसीदास जी ने इस रामायण को साथ काण्डों में विभक्त किया है ये है 
१) बाल काण्ड २) अयोध्या काण्ड ३) अरण्या काण्ड ४) किष्किंधा काण्ड ५) सुंदर काण्ड ६) लंका काण्ड ७) उत्तर काण्ड।
तुलसीदास जी ने यह रचना छंदों और अलंकारों का इस्तेमाल करके किया है। अतः छंदों की संख्या के अनुसार बालकाण्ड सबसे बड़ा और अरण्याकाण्ड सबसे छोटा है।

तुलसीकृत रामायण के अनुसार श्रीराम कथा का संछिप्त वर्णन:

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जब दैत्वों के राजा रावण का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया और वो ऋषियों महात्मयो को धर्म कार्य ठीक से नही करने दे रहे थे तो सभी देवता, ऋषि मिलाकर और ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु के पास गए। जिनकी बात सुनकर विष्णु जी ने कहा कि वो रावण के साथ अधर्म का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए श्रीराम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेंगे।

बालकाण्ड: 

राजा दशरथ की तीन रानियां थी परंतु पुत्र नही थे इसलिए उन्होंने पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया जिसके बाद उनके यंहा चार पुत्र हुए जिनमे सबसे बड़े श्रीराम माता कौशिल्या के गर्भ से, फिर भरत माता कैकेयी और लक्ष्मण और सत्रुहन माता सुमित्रा के गर्भ से हुए। बाल्य अवस्था मे ही उन सभी को विद्या अध्ययन के लिए गुरु वसिष्ठ के आश्रम में भेज दिया गया। फिर विद्या अध्ययन के पाश्चात वे सब किशोरावस्था में राजभवन में वापस आये।

अयोद्धयाकाण्ड:

एक दिन महाऋषि विश्वामित्र राजभवन आये तथा श्रीराम और लक्ष्मण को  राक्षसी ताडूका और उसके पुत्र सुबाहु और मारीच के आतंक को दूर करने हेतु सहायता के लिए ले गये। जंहा श्रीराम ने ताडका और सुबाहू का वध किया और मारीच को बिना फर(नोक) का तीर मारा तो वो हजारो योजन दूर लंका में जा गिरा। 
पथ्थर की सिला बनी अहिल्या को तारकर , जनक पुत्री सीता के स्वम्बर में गए जंहा शिवजी के धनुष का भंजन किया और सीता जी के साथ विवाह किया।
भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला और वो चित्रकूट में चले गए , जंहा भरत मनाकर वापस लाने गए परंतु श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार उनके साथ उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण भी गए।

अरण्यकाण्ड:

कई असुरों का विनाश किया और विभिन्न ऋषि मुनियों से भेंट की। जिसके बाद अगस्त मुनि ने उन्हें पंचवटी में रहने को कहा। पंचवटी में सूर्पनखा की लक्ष्मण जी द्वारा नाक काटी और खर-दूषण का सेना सहित विनास हुआ।
रावण के मारीच की मदत से माता सीता का हरण किया। श्रीराम और लक्ष्मण सीता की खोज करते हुए सबरी के आश्रम गए , और फिर सुग्रीव से मित्रता के लिए किष्किंधा पर्वत पर गए।

किष्किंधा काण्ड:

श्रीराम की अपने परम भक्त हनुमानजी से मुलाकात हुई और उन्होंने श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता करवाई। जिसके पश्चात सुग्रीव के बड़े भाई बाली का वध करके सुग्रीव को उसका राज्य और पत्नी को श्रीराम ने वापस दिलवाया।
सुग्रीव के वानर सेना की मदत से माता सीता की खोज सुरु हुई सभी चारो दिशाओ में गए और हनुमानजी अंगद सहित दक्षिण दिशा में माता सीता की खोज में गए।

सुंदर काण्ड:

हनुमान जी 100 योजन का समुद्र लांघकर लंका गए, विभीषण की मदत से माता सीता से मिले। माता सीता को श्रीराम की मुद्रिका दी।
अशोक वाटिका उजाड़कर प्रहरियों को मारा, उनको बचाने आये रावण के पुत्र अकछय का वध किया। मेघनाद के हांथो बंदी बनकर रावण के राज्यसभा में गए। उसके बाद लंका दहन करके हनुमानजी वापस श्रीराम को सीता जी का संदेश और हाल बताया।
फिर श्रीराम सुग्रीव और वानर सेना की मदत से लंका पर चढ़ाई की, समुद्र तट पर विभीषण से मित्रता हुई और उनको लंका का राजा बनाने का वचन दिया।

लंकाकाण्ड:

नल-नील और वानर सेना ने रामसेतू का निर्माण किया जिसके साथ श्रीराम और वानर सेना लंका पहुची। राम-रावण युद्ध हुआ जिसमें रावण की अपने पुत्रों और भाई कुम्भकर्ण के साथ मृतु हुई।
माता सीता बंधन से मुक्त हुई, विभीषण को लंका का राजा बनाकर श्रीराम लक्ष्मण और सीता अयोध्या वापस आये। फिर श्रीराम का राज्याभिषेक कर अयोध्या का राजा बनाया गया।

उत्तरकाण्ड:

इस काण्ड में श्रीराम का माता सीता को त्यागना और माता सीता का बाल्मीकि जी के आश्रम में जाकर श्रीराम-सीता के पुत्रों लव,कुश को जन्म देना और पालन करने का प्रसंग है।
बाद में लव कुश का श्रीराम से मिलना और माता सीता का धरती में चले जाने का वर्णन है।
अंत मे श्रीराम का पृथ्वी पर समय खत्म होने के पश्चात वैकुंठ को चले जाते है।


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12 February, 2019

भगवान विष्णु का छठा अवतार: परशुराम। Story Of Parshuram in hindi.

परशुराम: भगवान विष्णु के छठा अवतार

Picture From: Jai Parsuram facebook page
भगवान विष्णु के दस अवतार में से छठा अवतार है परशुराम। यह अवतार भगवान विष्णु ने त्रेता युग मे ब्राह्मण कुल में लिया था, इनके पिता जमदग्नि और माता रेणुका थी। भगवान परशुराम परम तपस्वी थे उन्होंने अपने तपोबल से कई शक्ति अर्जित की थी। उनको भगवान शिवजी के द्वारा परशु को धारण करने की वजह से "परशुराम" कहा जाता था, लेकिन पितामह भृगु ने उनका नाम "राम" रखा था। भगवान परशुराम का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण में मिलता है। 
भगवान परशुराम बाल्यकाल काल मे ही बहुत सी विद्याएं अर्जित कर ली थी, उन्हें पशु-पक्षियों की भाषा का ज्ञान था, वे खतरनाक और विषेले जानवरों को भी वश में कर लेते थे। मन की गति से कही भी आने-जाने की कला जानते थे परशुराम।

भगवान परशुराम का परिचय:

पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को अहंकारी हैहय वंश के क्षत्रियों से विहीन कर दिया था। उन्होंने अपने एक बाढ़ चलाकर समुंद्र को पीछे ढकेल दिया था जिसके बाद कोंकण, गोवा से लेकर केरल तक कि जमीन में कई गांव वसाए थे। भगवान पशुराम के कई गुरु थे जैसे विस्वामित्र, कस्यप और भगवान शिव। उनके कुछ शिष्य भी थे जिन्हें उन्होंने शस्त्र विद्या दी थी जैसे भीष्म, कर्ण, और द्रोण।

रामायण और महाभारत में परशुराम का प्रसंग:

रामायण में श्रीराम के द्वारा सीता स्वयम्वर में शिवजी के धनुष को भंजन के उपरांत परशुराम अत्यंत क्रोध में पहुचे और लक्ष्मण जी के साथ बात विवाद हुआ, बाद में उन्होंने श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु के अवतार का आभास हुआ और वे वंहा से चले गए।
महाभारत में भीष्म और द्रोण के गुरु थे , साथ ही वे कर्ण के भी गुरु थे। बाद में कर्ण के साहस से उनको आभास हुआ कि ये क्षत्रिय है तो उन्होंने उसे श्राप दिया कि जब उसे उनसे प्राप्त विद्या की सबसे ज्यादा जरूरत होगी तो वो भूल जाएगा।

पिता भक्त परशुराम: 

एक कथा के अनुसार एक बार परशुराम की माता रेणुका गंगा तट पर पानी लेने गयी थी जंहा पर एक गन्धर्व अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे। उनको देखकर रेणुका कुछ देर रुक गयी और जल लेकर आने में समय लग गया। उधर परशुराम के पिता जमदग्नि को हवन कार्य का मुहूर्त निकल गया जिसकी वजह से वो क्रोधित हो गए।
और उन्होंने अपने सभी पुत्रो को आदेश दिया कि माता की हत्या कर दे। पिता की इस आज्ञा का पालन किसी ने नही किया परंतु परशुराम ने पिता की आज्ञानुसार माता का सिर काट दिया और विरोध करने आये भाईयो का भी वध कर दिया। पिता प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने सब के जीवित होने का वरदान मांगा, और सब जीवित हो गए।

सहस्त्रबाहु के वध और क्षत्रीय विहीन की कथा:

Picture From: Jai Parsuram facebook page
सहस्त्रबाहु हैहय वंश का एक क्षत्रिय राजा था , सहस्त्रबाहु ने भगवान दत्तात्रेय की आराधना करके एक हजार भुजाओं का वरदान मांग लिया था जिसके कारण उसका नाम सहस्त्रबाहु था। उसने रावण को भी सेना सहित हराया था। 
एक बार सहस्त्रबाहु परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में आया जिसका स्वागत किया गया , लेकिन उसको आश्रम की एक कपिला गाय पसन्द आयी और वो उसको चुरा ले गया। उस गाय को लेने गए भगवान परशुराम ने युद्ध किया और सहस्त्रबाहु की सभी भुजाओं को काट दिया और सर काट कर वध कर दिया। 
अपने पिता का बदला लेने के लिए सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने जमदग्नि की हत्या कर दी जिनके शोक में माता रेणुका सती हो गयी। इस आवेश में आकर भगवान परशुराम बे 21 बार हैहय वंश के क्षत्रियो को पृथ्वी से विहीन कर दिया।
उन्होंने क्षत्रीयो का इतना रक्त बहाया की रक्त से पांच शारोवर भर दिए। बाद में उन्होंने पश्चात्ताप में यज्ञ किया जिसमें पूरी पृथ्वी अपने गुरु कस्यप ऋषि को दान में दे दी। 
कस्यप ऋषि ने उनको डरती में न रहने की आज्ञा दी, जिसके कारण वो समुन्दर में बने महेंद्र पर्वत में रहने लगे।





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10 February, 2019

भगवान विष्णु के पांचवे अवतार:वामन अवतार की कथा। Story of Vaman Avtar.

वामन अवतार:

भगवान विष्णु के दस अवतारों में से पांचवां अवतार है वामन अवतार। भगवान ने यह अवतार देवताओं और पृथ्वी वाशियों की रक्षा दैत्यों के राजा बलि से करने के लिए लिया था। इस अवतार में वामन अवतार के पिता मह्रिषी कस्यप और माता अदिति थी। भगवान ने यह अवतार भाद्रपक्ष में सुकल्पक्ष की द्वादशी को लिया था।


कौन थे राजा बलि:

राजा बलि दैत्यों के राजा और भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे। जिन्होंने देवताओं के साथ मिलकर समुंद्र मंथन किया था जिसके अंत मे अमृत निकला था, जिसके सेवन के लिए बहुत विवाद के बाद भगवान विष्णु ने मोहनी रूप रखकर देवताओं को अमृत पान करवाया। जिसके बाद देवताओं और असुरो के बीच युद्ध हुआ जिसमें देवताओं ने असुरो को हराया और इंद्र के वज्र प्रहार से बलि की मृत्यु हो गयी थी।
परंतु असुरो के आचार्य शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या से असुरो की सेना और राजा बलि को जीवित कर दिया और पाताल में ले गए। फिर राजा बलि शुक्राचार्य की सेवा में लग गए जिससे प्रसन्न होकर शुक्राचार्य के यज्ञ करवाया जिससे अक्षय त्रोण , अभेद कवच और दिव्य रथ मिला। 
असुर गण फिर से शक्तिशाली होकर स्वर्ग पर चढ़ाई की , अशुरो को शक्तिशाली जानकर देवता स्वर्ग छोड़कर भाग गए।


भगवान विष्णु का वामन स्वरूप में अवतरण:

शुक्राचार्य राजा बलि को इंद्र के समान बनाने और हमेसा के लिए स्वर्ग में अधिपत्य के लिए राजा बलि से सौ अस्वमेध यज्ञ करवाना सुरु किया। देवताओं के इस यज्ञ को रूकवाने और अपनी सहायता के लिए विष्णु भगवान से प्रार्थना की जिनके बाद भगवान विष्णु ने कस्यप ऋषि के पुत्र रूप में अवतरित हुए। 
जब बलि का आखरी अस्वमेध यज्ञ चल रहा था तब भगवान वामन जो बहुत छोटे कद के व्राह्मण रूप में थे बलि के पास गए। स्वरूप और तेज देखकर सब अचंभित रह गए। राजा बलि ने उनके चरण धोये और मांगने के लिए कहा।
भगवान वामन के उनसे तीन गज जमीन मांग लिए। जिसका विरोध करते हुए सुक्रचार्य ने कहा कि ये विष्णु है जो छल करने के लिए यंहा आये है इनकी बात मत मानो। लेकिन बलि ने कहा कि मैं प्रह्लाद का पौत्र हु किसी को लिया हुआ वचन नही तोड़ सकता , तब सुक्रचार्य नाराज हो गए और सर्वनाश का श्राप देते हुए चले गए।
फिर भगवान वामन जब तीन गज जमीन नापने लगे तो अपना विराट स्वरूप बनाया और एक गज में पूरी पृथ्वी, पाताल और दूसरे पग ब्रह्म लोक से पग घुमाकर पूरा स्वर्ग लोक ले लिया। व्रह्मा जी ने उनका पांव धोया और कमंडल में रख लिया जो बाद में गंगा के रूप में धरती पर आई।
तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नही बचा तो राजा बलि ने अपना सर झुककर मस्तक पर रखने का आग्रह किया।

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07 February, 2019

भगवान विष्णु के चौथे अवतार: नरसिंह अवतार की कथा। Story of Narsingh Avtar.

नरसिंह अवतार:

भगवान विष्णु ने चौथे अवतार के रूप में नरसिंह अवतार है। भगवान विष्णु ने यह अवतार दानव असुर हिरण्यकश्यप के वध और भक्त प्रह्लाद के भक्ति से प्रसन्न होकर लिया था। नरसिंह अवतार का स्वरूप मानव और शेर को मिलाकर बना था, इसलिए इस अवतार को नरसिंह अवतार कहते है। भगवान नरसिंह का धड़ नर का और सर सिंह यानी शेर का था, साथ ही उनके नाखून सिंह की तरह थे। यह अवतार भगवान ने हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी के द्वारा मिले हुए वरदान के कारण लिया था, क्योंकि ब्रह्मा जी से हिरण्यकश्यप को न मनुष्य और न जानवर के द्वारा मृत्यु हो ऐसा वरदान प्राप्त था।


कौन था हिरण्यकश्यप?

हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष दोनों कस्यप ऋषि के पुत्र थे, जो महान वीर परंतु अशुरी प्रवित्ति के थे। हिरण्यकश्यप ने भगवान व्रह्मा की तपस्या करके उनसे वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध न मनुष्य से हो, न जानवर से, न देवता से, न दिन में और न रात में, न घर के भीतर न घर के बाहर, न अस्त्र से न सस्त्र से, न जमीन में न आकाश में हो।
जब उसने भगवान व्रह्मा से अमृत्व का वरदान मांगा तो उन्होंने नही दिया क्योंकि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है , तब उसने यह विचित्र वरदान मांगा था। उसने यह सोच लिया था कि वो लगभग अमर हो गया है और उसने सारे संसार मे आतंक मचा दिया था।

हिरण्यकश्यप के वध की कथा:

हिरण्यकश्यप के छोटा भाई था हिरण्याक्ष जिसका वध भगवान विष्णु के वराह अवतार के द्वारा हुआ था। जिसकी कथा हमारे पिछले कथा में है:

हिरण्याक्ष के मृत्यु के उपरांत हिरण्यकश्यप को बहुत आघात हुआ और वो देवताओं को और ख़ासकर भगवान विष्णु को दुश्मन समझने लगा। उसने सारे संसार मे आतंकित करके स्वर्ग में भी आधिपत्य जमा लिया और अपने आप को ही भगवान कहलवाने लगा।
भगवान विष्णु को हिरण्यकश्यप अपना परम शत्रु समझता था परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था और दिन रात भगवान हरि की भक्ति किया करता था। जब यह बात हिरण्यकश्यप को पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद से भगवान विष्णु की जगह अपनी भक्ति करने को कहने लगा।
परंतु जब प्रह्लाद नही माने तो उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का निश्चय किया, उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि प्रह्लाद को ले जाकर पर्वत शिखर से फेक दे। जब सैनिको ने प्रह्लाद जी को फेका तो वे भयभीत नही हुए और हरी नाम जपते रहे क्योंकि उनको अपनी भक्ति और भगवान पर पूर्ण विस्वास था। जब वे पर्वत से नीचे गिरे तो उनको कुछ नही हुआ जैसे वो पुष्पों पर गिरे हो ।
जब पर्वत से फेकने पर कुछ नही हुआ तो उसने आदेश दिया कि खौलते हुए तेल में डाल दे, जब उन्होंने ऐसा किया तब भी कुछ नही हुआ।
जब किसी भी युक्ति से काम नही हुआ तो उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया उसको वरदान था कि उसको अग्नि जला नही पाएगी, हिरण्यकश्यप ने होलिका को आदेश दिया कि प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ जाये और अग्नि लगाकर जलाया जाएगा । हिरण्यकश्यप को लगता था कि होलिका वरदान की वजह से जलेगी नही।
परंतु जब वो बैठी प्रह्लाद को गोद मे लेकर और आग लगाई गई तो होलिका जल गई परंतु प्रह्लाद को कुछ नही हुआ। (होलिका को ब्रह्मा ने कहा था कि तुम अगर गलत कार्य के लिए इस्तेमाल करोगी तो वरदान का फल नही मिलेगा परंतु होलिका भूल गयी थी क्योंकि उसको शक्ति का मद था।)

नरसिंह भगवान का प्रागट्य और हिरण्यकश्यप का वध:

होलिका के जल जाने के बाद हिरण्यकश्यप अपना आपा खो दिया और भगवान को शत्रु मानकर प्रह्लाद को धमकाते हुए बोलने लगा कि अपने अपने भगवान को बुला। तब प्रह्लाद जी ने कहा कि भगवान तो कण कण में है।
हिरण्यकश्यप एक स्तंभ की तरफ इशारा करके बोला क्या इसमे भी तेरा भगवान है, जब प्रह्लाद ने हां कहा।
हिरण्यकश्यप उस स्तंभ को तोड़ने लगा तो भगवान विष्णु नरसिंह के रूप में प्रगट हुए जो अत्यंत क्रोध में थे, वो सिंह की तरह हुंकार करते हुए हिरण्यकश्यप पर वार करने लगे।

भगवान नरसिंह जो न नर थे न जानवर, हिरण्यकश्यप को उठाकर घर के दरवाजे पर ले गए जो न घर के अंदर था न बाहर था। उस समय शाम थी अर्थात न दिन थी न रात। हिरण्यकश्यप को उठाकर जंघा पर बिठा लिया जो न धरती पर था न आकाश पर। फिर उन्होंने अपने नाखूनों(जो न अस्त्र थे न सस्त्र) से हिरण्यकश्यप का पेट फाड़कर वध कर दिया।



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06 February, 2019

भगवान विष्नु के तीसरे अवतार: वराह अवतार की कथा। Varah Avtar of lord Vishnu.

वराह अवतार:

यह भगवान विष्णु के तीसरे अवतार है, जब भी पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है और पाप कर्म बढ़ जाते है तो मनुष्यो और धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु अवतार लेते है।
भगवान विष्णु ने वराहावतार रसातल में फसी हुई पृथ्वी को निकालने औऱ हिरण्याक्ष नामक असुर का वध करने के लिए लिया था।


कौन था हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप:

हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप महाऋषि कस्यप और दिति के पुत्र थे। महाऋषि कस्यप मरीचि के पुत्र थे और दिति दक्ष प्रजापति की पुत्री थी।
भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय को सनकादिक ऋषियों ने श्राप दिया था जिसके कारण उनका जन्म दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में हुआ था।
ये दोनों असुर प्रवित्ति के थे और पहाड़ की तरह शाक्तिशाली थे । हिरण्यकश्यप ने भगवान व्रह्मा को प्रसन्न करके कई वरदान प्राप्त किये थे।


वराह अवतार की कथा:

भगवान विष्णु ने रसातल में पड़ी हुई पृथ्वी को बाहर निकलने के लिए वराह अवतार लिया था जिसमे उनका सारा सरीर भगवान नारायण का चरुर्भुज रूप था परंतु सर जंगली सुअर का था जिसकी बड़ी बड़ी दाढ़ थी। उन्होंने हांथो में शंख , चक्र, गदा और कमल पुष्प धारण किया था।
जब हिरण्याक्ष सारे संसार को आतंकित करके युद्ध की लालसा से वरुण देव के पास गया और वरुण देव को युद्ध के लिए ललकारा तो उन्होंने कहा कि तू मुझसे क्या युद्ध करेगा अगर तू अपने आप को शक्तिशाली मानता है तो विष्णु भगवान से युद्ध करके दिखा।


तब हिरण्याक्ष भगवान विष्णु से युद्ध करने के लिए देवऋषि नारद से विष्णु भगवान का पता पूछने गया, तो देवऋषि ने कहा कि वो रसातल में पड़ी पृथ्वी को निकालने गए है तुम वंही चले जाओ।
जब हिरण्याक्ष ने वराह रूपी भगवान विष्णु को युद्ध के लिए ललकारा तो उन्होंने पहने पृथ्वी को अपने दाढ़ में उठाकर बाहर लाये और उसके उपरांत हिरण्याक्ष से युद्ध करके उसका वध किया।

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04 February, 2019

भगवान विष्णु के दूसरे अवतार: कुर्म अवतार की कथा। Story Of Kitna Avtar by Lord Vishnu.

भगवान विष्णु के कुर्मा अवतार की कथा:

भगवान विष्णु जगत के पालन करता है, अतः जब भी संकट की स्थिति होती है भगवान विष्णु जगत के पालन हेतु अवतरित होते है। इसी तरह उन्होंने दूसरे अवतार में कुर्म के रूप में देवताओ के संकट को दूर करने और उनकी मदत करने के लिए लिया था। कुर्म का अर्थ होता है कछुआ। भगवान विष्णु के इस अवतार की कथा समुंद्र मंथन से जुड़ी है जब देवताओं में असुरो के साथ मिलकर अपनी खोई हुई सक्तियो को प्राप्त करने के लिए समुंद्र मंथन किया था। इस कथा का वर्णन कई पुराणों में मिलता है।


इस कथा के अनुसार एक बार महाऋषि दुर्वाशा के श्राप के कारण देवता शक्ति विहीन हो गए थे, तब मौका देखकर असुरो में आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित कर स्वर्ग में अधिपत्य जमा लिया। 
देवताओं में अपनी शक्ति के प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु के शरण में गए, तो भक्तवत्सल भगवान ने उनके कष्टों के निवारण हेतु समुद्र मंथन का उपाय बताया। और कहा कि आप लोग असुरो से संधि कर ले क्योंकि समुंद्र मंथन में उनके सहयोग की अव्यसक्ता होगी। तब देवताओं ने असुरो के राजा बलि से संधि कर ली, असुर भी मंथन के सहयोग के लिए राजी हो गए क्योंकि उनको अमृत पान की लालसा थी।

फिर मंदरांचल पर्वत को मथनी और वाशुकी नाग को रस्सी बनाकर मंथन कार्य आरंभ हुआ, परंतु जब मंदरांचल पर्वत डूबने लगा क्योंकि कोई आधार नही था तो भगवान विष्णु के कुर्मा अवतार धारण करके पर्वत को अपनी पीठ पर उठा लिया। इसतरह भगवान विष्णु के कुर्मा अवतार ने देवताओं के कष्टो का निवारण किया।
समुंद्र मंथन से विष, हलाहल, ऐरावत हांथी, उचस्राव घोड़ा, चंद्रमा, मेनका, पारिजात वृक्ष, माता लक्ष्मी, वारुणी(मदिरा) इत्यादि तथा अंत मे भगवान धन्वंतरि हाँथ में अमृत कलश के साथ प्रगट हुए।


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01 February, 2019

भगवान विष्णु के प्रथम अवतार: मत्स्य अवतार की कथा। story of matsya avtar in hindi.

प्रथम अवतार: मत्स्य अवतार First Incarnation of Lord Vishnu

भगवान विष्णु संसार के रक्षा का दायित्व रखते है अतः जब भी पृथ्वी पर संकट होता है वो अवतरित होते है। अतः उन्होंने पृथ्वी के रक्षा हेतु प्रथम अवतार लिए जो मत्स्य अवतार था। यह अवतार उन्होंने सतयुग में अंत मे दानव हयग्रीव के अंत करने और वेदों की रक्षा के लिए लिया था।
Picture Source:Page of Padmanabhaswami temple

मत्स्य अवतरण की कथा:

एक बार ब्रह्मा के मुख से प्रतिपादित हुए वेदों को हयग्रीव नामक दैत्य ने चुरा कर समुंद्र में छुपा लिया जिसके कारण पृथ्वी पर ज्ञान का अभाव हो गया और चारो ओर अत्याचार बढ़ गया , तब पृथ्वी की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अवतार लिया।
एक बार जब राजा मनु सरोवर में अपने हाँथ से सूर्य को अर्घ दे रहे थे तो उनके हाँथ में एक मछली आ गयी, और जब वो उसे जल में छोड़ने लगे तो उसने अपनी करुण ब्यथा सुनाई।
मछली ने कहा : राजन इस सरोवर में कई बड़े जीव रहते है जो हम जैसे छोटे जीवो को खा जाते है, अतः आप मेरी रक्षा करो।
मनु बहुत दयावान और भगवान विष्णु के परम भक्त थे, अतः उन्होंने अस्वाशन देते हुए कहा कि मेरा महल बहुत बड़ा है मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। और फिर उन्होंने अपने कमंडल में उसे रख लिया।
घर जाते जाते उस मछली का आकार बडा हो गया, मनु यह समझ ही नही पा रहे थे तो उन्होंने उस मछली को एक पात्र में जल के साथ रख दिया। परन्तु वह उस मछली को जिस भी बड़े पात्र में डालते उस मछली का आकार बड़ा हो जाता।
 जब मनु के बड़े से बड़ा पात्र कम पड़ने लगा क्योंकि मछली का आकार बढ़ता ही जा रहा था, तो उन्होंने उसे नदी में छोड़ दिया परंतु वो मछली उस नदी से भी बड़ी हो गयी, तो उन्होंने उसे समुन्दर में डाला।
फिर जब समुन्दर भी कम पड़ता दिखाई दिया तो मनु समझ गए कि ये भगवान की कोई माया है, और वो उसके शरण मे गए। 
तब भगवान ने उनको अपने चतुर्भुज रूप का दर्शन दिए और बताया कि सात दिनों के उपरांत महा प्रलय होने वाला है अतः तुम एक नौका बनाकर सभी जीव को उसमे रखो, सभी वनस्पति के बीज और सप्तऋषियों को भी लेकर चढ़ जाओ।

फिर भगवान ने मत्स्य रूप में उस दानव यहग्रीव से युद्ध कर उसका वध किया और वेदों को छुड़वाया।


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