रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा। Rare story of Rameshwaram.

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग:

वैष्णव और शिव परम्परा में आश्था रखने वालों का सामूहिक स्थल है रामेश्वर ज्योतिर्लिंग। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों के साथ साथ भगवान विष्णु के चार धाम में है इसलिए इसका बहुत बड़ा महत्व है। रामेश्वर इस धरना का सूचक है कि हम चाहे जिन देवताओं पे आस्था रखते हो पर सभी देवता एक है।
जब प्रभु श्री राम ने इस शिवलिंग कि स्थापना की थी तब उन्होंने इस नाम का अर्थ बताया था : "राम के जो ईस्वर वो रामेश्वर"। और जब माता पार्वती ने भगवान शिव से इसका अर्थ पूछा तो उन्होंने बताया था: "राम जिनके ईस्वर वो रामेश्वर"। 
तब श्री राम ने कहा था कि जो भगवान शिव की आस्था से विरक्त होकर मेरी शरण में आएगा उसे मेरी भक्ति प्राप्त नही होगी। 
अर्थात सभी ईस्वर एक है रूप अनेक है, हम किसी भी रूप में आश्था और विस्वास रख सकते है।

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा:

इस कथा का वर्णन रामायण से है जो शिव महापुराण में व्याखित है। जब प्रभु श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता की खोज में अपने भाई लक्ष्मण, पवन सुत श्री हनुमान, सुग्रीव और वानर सेना के साथ समुन्द्र तट पे पहुँचे ।
उनके सामने सौ योजन का समुन्द्र सेना सहित पार करने की समश्या आन पड़ी, फिर उन्होंने नल और नील की मदत से शेतु बंधन का कार्य शुरू किया।
प्रभु श्रीराम ने संकल्प किया कि जब तक शेतु बंधन का कार्य चलेगा मैं अपने आराध्य भगवान भोलेनाथ की पूजा करूँगा।
तब श्रीराम ने वंहा बालू के शिवलिंग की स्थापना की और अभिषेक और पूजा की वही शिवलिंग रामेश्वर ज्योतिर्लिंग हुआ।

कुछ मान्यताओं के अनुसार जब श्रीराम रावण वध के बाद वापस रहे थे तब ऋषियो ने परामर्श दिया कि रावण ब्राह्मण था और उसकी हत्या से ब्रह्म हत्या का दोष हुआ है जिसके निवारण हेतु श्रीराम में शिवलिंग स्थापित कर के पूजन किया था। परंतु ये प्रसंग न तो शिवपुराण में है और न ही तुलसीदास जी की रामचरितमानस में है।

सारांश Conclusion:

भगवान अपने आपको भी कभी विभक्त नही करते तो भक्तो को भगवान में अंतर नही करना चाहिए भले ही उनकी किसी भी भगवान में आस्था हो, उन्हें यही समझना चाहिए भगवान एक है बस उनके रूप अलग है।


तो दोस्तो आपको ये कथा कैसी लगी आप अपने सुझाव दे और शेयर करे।


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