क्या आप जानते है कि हनुमान जी का सिंदूर से क्या संबंध है:

हनुमान जी का सिन्दूर से गहरा नाता रहा है, हम हमेशा बजरंगबली को लाल सिंदूर धारण करते है और हनुमान जी की मूर्ति में सिंदूर चढ़ाते हुए देखा होगा। परंतु इसके पीछे क्या कारण है इसकी भी बड़ी रोचक कथा है:

हनुमान जी महान बल के साथ साथ बुद्धि के ज्ञाता है परंतु भगवान राम और माता सीता के साथ उनकी कई ऐसे प्रसंग है जिससे उनके अंदर चंचलता दिखाई देता है ऐसी ही एक कथा है कि
 "एक बार महाबली हनुमानजी ने माता सीता जी को अपने मस्तक पर सिंदूर लगते हुए देखा तो उनके मन मे जिज्ञासा हुई और उन्होंने माता सीता से प्रश्न किया कि माता आप अपने मस्तक ये लाल पदार्थ क्यों लगती है?

तब माता ने उनको बताया कि पुत्र ये सिंदूर है और बताया कि इसको लगाने से प्रभु की उम्र लंबी होती है और प्रभु राम प्रसन्न होते है।
तो हनुमान जी ने सोचा अगर एक चुटकी भर सिन्दूर लगाने से प्रभु राम की उम्र लंबी होती है और उनको प्रसन्ता होती है, तो अगर मैं पूरे सरीर में बहुत सारा सिंदूर लगा लूँगा तो भगवान की उम्र लंबी होगी और उनको बहुत प्रसन्ता होगी।
अतः उन्होंने ऐसा ही किया और पूरे सरीर में सिंदूर लगा कर प्रभु राम के पास गए। श्रीराम के पूछने पर उन्होंने सारी बात बताई तब प्रभु श्रीराम बहुत खुश हुए और अमरत्व का बरदान दिया।

सारांश Conclusion 

अतः मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की मूर्ति में सिंदूर लगाने की प्रथा है। हनुमान जी सिद्धीओ के दाता है और ग्रह दोष , शनि दोष और वास्तु दोष को दूर करते है।


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भगवान श्रीकृष्ण की दुर्लभ कथा:

भगवान श्रीकृष्ण को लीलाधर भी कहा गया है क्योकि वो नित्य लीलाये करते रहते थे। उन्ही मुरलीधर श्रीकृष्ण की एक उत्तम कथा है जो देवी रुक्मडी और सत्यभामा से जुड़ी हुई है।
जैसा कि सभी को पता है हमारे गिरधर की 16108 पटरानियां थी जिनमे से रुक्मणि और सत्यभामा का प्रसंग सबसे ज्यादा वर्णन है। देवी सत्यभामा को हमेशा यह अभिमान रहता था कि वो सबसे ज्यादा सुंदर और बैभवशाली है। अतः उनको ये लगता था कि सभी पटरानियों से ज्यादा गहने और जेवर उनके पास है।
एक दिन सत्यभामा के मन मे आया कि आज वो भगवान श्रीकृष्ण को अपने गहने और जेवरात से तौलेंगी, क्योंकि उनके पास गहने और जेवरातों की कोई कमी नही थी।

तब उन्होंने भगवान स्यामसुंदर को एक तुला में बिठा दिया और दूसरे पलड़े में गहने और जेवरात रखना सुरु कर दिया, परन्तु जब वो जेवरात रखते रखते थक गई परंतु तुला का भार भगवान वासुदेव की तरफ ही रहा तो वो हैरान रह गयी।
और सोचने लगी कि इतने आभूषण और गहने रखने बाद भी तुला झुक क्यों नही रहा है, परंतु वो लीलाधर की लीला को नही समझ पा रही थी।

तब वंहा देवी रुकमणी आयी और उन्होंने सारा कार्यक्रम देखा तो वो समझ गयी कि ये भगवान स्यामसुंदर की लीला है।
फिर क्या था उन्होंने तुरंत पूजा का सामान उठा कर लायी और पहले भगवान की पूजा की उसके उपरांत भगवान का चरणोंदल को उठा कर गहने वाले पालने पर रख दिया और फिर गहने वाला हिस्सा भारी हो गया और झुक गया।

परंतु सत्यभामा समझ नही पा रही थी तभी वंहा भगवान विष्णु के परम भक्त नारद मुनि पहुच गए और उन्होंने देवी सत्यभामा को समझाया कि भगवान पूजा में महत्त्व सोने चांदी या आभुषण नही अपितु भावनाओं का है।

सारांश conclusion

भक्ति और प्रेम से बड़ा कुछ नही होता और भगवान भी भक्त की भक्ति और प्रेम को देखते है, पूजा करने का सही ढंग भक्त को भगवान से मिला देता है।


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कौन थे भीमसेन: 

Image from:pinterest 
महाभारत काल ने पांडु पुत्र थे भीमसेन। परंतु पांडु के श्राप के कारण उनकी पत्नी ने अपने मिले हुए एक वरदान से पवन देव से इस पुत्र को पाया था इसलिए भीम पवन देव के भी औरस पुत्र है। वो बहुत शक्तिशाली थे इसीलिए उनको अपने अपने बल का अहंकार हो गया था, जिसे हनुमानजी के चूर किया था।

भीमसेन के अहंकार को हनुमानजी द्वारा चूर करने की कथा:

महाभारत युद्ध के पहले जब श्रीकृष्ण जी को यह लगा कि महाबली भीम को अपने बल का अहंकार हो गया है तो उन्होंने हनुमान जी को भीम के अहंकार को चूर करने को कहा।
तब हनुमान जी भीम के मार्ग में अपनी पूंछ को बिछा कर लेट गए। जब भीम वंहा आये और अपने मार्ग में वानर की पूछ देखी तो उन्हें क्रोध आ गया। और हनुमानजी को एक बूढ़ा वानर समझ कर कहने लगे कि ये बूढ़े वानर अपनी पूंछ नही सम्हाल पा रहे हो इसे हटा लो नही तो मैं इसे उठा कर फेंक दूँगा। 
तब हनुमानजी ने कहा कि मैं बूढ़ा हो गया हूं और अभी आराम करने बैठा हूँ तुम दूसरे मार्ग से चले जाओ नही तो इसे लांघ कर निकल जाओ। 
भीम ने कहा कि मैं ना ही दूसरे मार्ग से जाऊंगा और न ही लांघ कर , तुम अपनी पूंछ हटा लो नही तो मैं इसे फेक दूँगा।
हनुमान जी बोले फेक दो क्योंकि मै तो आराम करने लेटा हूं।
फिर तो भीम को बहुत क्रोध आ गया और वो पूछ को हटाने लगे, वो समझ रहे थे कि ये कोई सामान्य बूढ़ा वानर है। लेकिन उनके बहुत बल और कोशिस करने के वावजूद भी वो हनुमान जी की पूछ को हटा नही पाए। फिर उन्हें बल का अभिमान कम हुआ और वो समझ गए ये कोई साधारण वानर नही है, तब उन्होंने हनुमानजी से परिचय मांगा और छमा भी मांगे।
तब हनुमानजी ने अपना परिचय दिया और बताया कि बलवान होगा का अभिमान नही होना चाहिए बल्कि इसका इस्तेमाल सही जगह होना चाहिए।

सारांश Conclusion :

कभी भी बल का घमंड नही होना चाहिए बल्कि उसका स्तेमाल लोक हित में करना चाहिए।

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श्रीकृष्ण जी की दुर्लभ कथा:

यह कथा पुराण से है, जब भगवान श्रीकृष्ण की ने अपनी पत्नी सत्यभामा, अपने वाहन गरुण और सुदर्शन चक्र का घमंड भंग किया था।

एक बार रानी सत्यभामा ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु आप त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के रूप में अवतरित हुए थे तब सीता आपकी पत्नी थी तो क्या मैं उनसे ज्यादा खूबसूरत है। तब प्रभु श्रीकृष्ण समझ गए कि इनको अपने रूप का अहंकार हो गया है।
फिर गरुण ने पूछा प्रभु मैं आपका वाहन हु अर्थात मैं दुनिया मे सबसे ज्यादा तेज से उड़ सकता हूं, और सुदर्शन चक्र ने कहा कि प्रभु मैं आपका सबसे प्रिय अस्त्र हु अर्थात मैं सबसे ज्यादा शाक्तिशाली हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण ने इन तीनो का घमंड को भंग करने के लिए सोचा और गरुण को आदेश दिया कि तुम हनुमान के पास जाओ और बोलना की श्रीराम माता सीता के साथ आपकी प्रतीक्षा में है और आपको जल्दी बुलाया है। गरुण वंहा से निकल गए।
तब उन्होंने सुदर्शन चक्र को कहा कि तुम द्वार पर रहो और किसी को अंदर नही आने देना। और खुद राम के रूप में सिंघासन पर बैठ गए और रानी सत्यभामा को बगल के आसन पर बिठा लिया।
उधर जब गरुण हनुमान जी के पास जाकर सारी बात बताई और बोले आप अपने मेरे पीठ पर बैठ जाइए मैं आपको जल्द पहुचा देता हूं। हनुमान जी ने कहा आप जाईये मैं आता हूं, तो गरुण जी ने सोचा ये सबसे बड़े भक्त बनते है और इनको प्रभु की बात का कोई जल्दबाजी ही नही है (क्योंकि हनुमान जी बूढ़े दिख रहे थे तो गरुण को लगा ये पता नही कब पहुचेगे)।

जब गरुण पहुचे तो देखा हनुमान जी पहले ही वंहा पहुच गए है और प्रभु के समीप बैठे है और अब भी उनके तेज है इससे उनका घमंड भंग हो गया।
फिर भगवान ने हनुमानजी से पूंछा आप अंदर आये आपको किसी ने रोक नही तब हनुमानजी ने दांत में दबे सुदर्शन चक्र को निकलते हुए बोले इन्होने रोक था तो मैंने मुह में दबा लिया। (इससे सुदर्शन चक्र का घमंड भंग हुआ)।
हनुमान जी ने सत्यभामा की तरफ इशारा करते हुए बोले प्रभु माता सीता कहा है और ये दासी यंहा क्यों बैठी है।(इससे सत्यभामा का घमंड भंग हुआ)। तब प्रभु श्रीकृष्ण ने सारी बात बताई और सब मुस्कुराने लगे।


सारांश Conclusion:

कभी भी किसी का अभिमान या घमंड नही होना चाहिए चाहे वो सुंदरता हो या बल या कुछ और हो नही होना चाहिए।


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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास स्थित घृष्णेश्वर या धुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से आखरी है। यह देवगिरि नामक पर्वत के पास स्थित है। यह कथा महाशिवपुराण के साथ साथ बहुत से ग्रंथो में है।

घृष्णेश्वर या धुश्मेश्वर की कथा

इस कथा के अनुसार भारत के दक्षिण में देवगिरि पर्वत पे सुधर्मा और उसकी पत्नी सुदेहा नामक ब्राह्मण रहते थे, जो भगवान शिव के भक्त थे । परंतु उनके कोई पुत्र नही था। जिसके कारण वो दुखी थे।
सुदेहा की एक बहन धुष्मा थी जिसका विवाह उसने अपने पति से करवा दिया। धुष्मा भी शिव जी की परम भक्त थी वो हर दिन पार्थिव शिवलिंग की पूजा करती थी और फिर सरोवर में विषर्जित करती थी।
विवाह के बाद उसको एक सुंदर पुत्र हुआ , जो सबका चहीता था और दिनों दिन बड़ा हो रहा था। जिससे धुष्मा का मान बढ़ रहा था , और इस बात से सुदेहा के मन मे जलन होने लगी।
फिर जब वो बड़ा हुआ तो उसका विवाह किया गया और सुदेहा की ईर्ष्या भी बढ़ती गयी।
एक दिन उसने ईर्ष्या के कारण उस बालक के चाकू से टुकड़े कर दिए और उसी सरोवर में डाल दिया जंहा धुष्मा पार्थिव शिवलिंग का विषर्जित करती थी।
सुबह जब उस बालक की पत्नी ने अपने पति को नही देखा और बिस्तर में खून देखा तो रोते हुए धुष्मा के पास गई , धुष्मा उस समय भगवान शिव की पूजा कर रही थी, उसने सब सुना पर पूजा से उठी नही और जब पूजा समाप्त करके सरोवर के पास गई तो उसका पुत्र जीवित होकर खड़ा था साथ मे स्वयं भगवान शिवजी भी थे।
तब सुदेहा को बड़ा पश्चाताप हुआ और उसने भगवान शिवजी से विनती की तो धुष्मा ने भी छमा करने को कहा।
फिर सब की प्रार्थना से भक्तवत्सल भगवान शिव जी वंहा स्थापित हो गए और धुश्मेश्वर नाम से प्रशिद्ध है।

सारांश Conclusion:

इन्सान को कभी भी अपने मन मे ईर्षा नही लानी लानी चाहिए, क्योंकि जब ये बढ़ जाती है तो इंसान को अपने आप से कंट्रोल नही रहता और बाद में पछिताना पड़ता है।


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नागेश्वर ज्योतिर्लिंग:

चार धामो में से एक द्वारिका धाम के निकट भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। यह स्थान समय मे दारुक वन के नाम से जाना जाता था। यंहा पर भगवान शिव ने अपने सुप्रिय नामक भक्त की रक्षा के लिए प्रगट हुए थे।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा:

शिव महापुराण के अनुसार प्राचीन समय मे दारुक और उसकी पत्नी दारुका नाम के राक्षस रहते थे, वो ऋषियो , महात्मयो और आम नागरिकों को परेशान करते थे और पुण्य कर्मों में विघ्न डालते थे।
तब उनको महर्षि और्व ने श्राप दिया कि जब भी यो पुण्य कर्मों में विघ्न डालेंगे तो मृत्यु हो जाएगी। फिर उन लोगो ने समुन्दर में रहने का निश्चय किया।
एक बार जब कुछ लोगो का समूह वंहा से गुजर रहा था तो दारुक में उनको पकड़ लिया और बंदी बना लिया, जिसमे भगवान शिव का परम भक्त सुप्रीय भी था।
दारुक ने उसे कालकोठरी में डाल दिया परन्तु उसकी भक्ति कम नही हुई, और वो काल कोठरी में भी भगवान की भक्ति कर रहा था।
और जब उसने अपनी रक्षा के लिए भोलेनाथ को याद किया भक्तवत्सल भगवान शिव वंहा आये और एक ही प्राहार से दारुक को मार गिराया और अपने भक्त को आज़ाद करवाया।

सारांश Conclusion:

किसी भी परिस्थिति में इंसान को भगवान के प्रति आस्था नही छोड़ना या कम करना चाहिए। क्योंकि भगवान भक्त का साथ नही छोड़ते है और भक्त के बुलावे पर वो श्वम किसी न किसी रूप में आते है।


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रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग:

वैष्णव और शिव परम्परा में आश्था रखने वालों का सामूहिक स्थल है रामेश्वर ज्योतिर्लिंग। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों के साथ साथ भगवान विष्णु के चार धाम में है इसलिए इसका बहुत बड़ा महत्व है। रामेश्वर इस धरना का सूचक है कि हम चाहे जिन देवताओं पे आस्था रखते हो पर सभी देवता एक है।
जब प्रभु श्री राम ने इस शिवलिंग कि स्थापना की थी तब उन्होंने इस नाम का अर्थ बताया था : "राम के जो ईस्वर वो रामेश्वर"। और जब माता पार्वती ने भगवान शिव से इसका अर्थ पूछा तो उन्होंने बताया था: "राम जिनके ईस्वर वो रामेश्वर"। 
तब श्री राम ने कहा था कि जो भगवान शिव की आस्था से विरक्त होकर मेरी शरण में आएगा उसे मेरी भक्ति प्राप्त नही होगी। 
अर्थात सभी ईस्वर एक है रूप अनेक है, हम किसी भी रूप में आश्था और विस्वास रख सकते है।

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा:

इस कथा का वर्णन रामायण से है जो शिव महापुराण में व्याखित है। जब प्रभु श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता की खोज में अपने भाई लक्ष्मण, पवन सुत श्री हनुमान, सुग्रीव और वानर सेना के साथ समुन्द्र तट पे पहुँचे ।
उनके सामने सौ योजन का समुन्द्र सेना सहित पार करने की समश्या आन पड़ी, फिर उन्होंने नल और नील की मदत से शेतु बंधन का कार्य शुरू किया।
प्रभु श्रीराम ने संकल्प किया कि जब तक शेतु बंधन का कार्य चलेगा मैं अपने आराध्य भगवान भोलेनाथ की पूजा करूँगा।
तब श्रीराम ने वंहा बालू के शिवलिंग की स्थापना की और अभिषेक और पूजा की वही शिवलिंग रामेश्वर ज्योतिर्लिंग हुआ।

कुछ मान्यताओं के अनुसार जब श्रीराम रावण वध के बाद वापस रहे थे तब ऋषियो ने परामर्श दिया कि रावण ब्राह्मण था और उसकी हत्या से ब्रह्म हत्या का दोष हुआ है जिसके निवारण हेतु श्रीराम में शिवलिंग स्थापित कर के पूजन किया था। परंतु ये प्रसंग न तो शिवपुराण में है और न ही तुलसीदास जी की रामचरितमानस में है।

सारांश Conclusion:

भगवान अपने आपको भी कभी विभक्त नही करते तो भक्तो को भगवान में अंतर नही करना चाहिए भले ही उनकी किसी भी भगवान में आस्था हो, उन्हें यही समझना चाहिए भगवान एक है बस उनके रूप अलग है।


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बैजनाथ ज्योतिर्लिंग:

पहले के बिहार और अब के झारखंड में स्थित बैजनाथ ज्योतिर्लिंग जो बाबा धाम के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यंहा सावन के महीने में कावर से जल लाने कि प्रथा है। यंहा की कांवर यात्रा बहुत प्रसिद्ध है।

बैजनाथ की कथा:

एक बार शिव जी का परम भक्त रावण ने शिव जी की बड़ी तपश्या की और प्रसन्न कर लिया। जब भगवान भोलेनाथ ने उससे वरदान मांगने को कहा तो उसने शिवलिंग को लंका में स्थापित करने का वर मांगा।
तब शिव जी ने उसकी बात मान ली और शिवलिंग लंका ले जाने को दे दिया परंतु एक शर्त रखी कि इसको कंही जमीन पर न रखे क्योंकि जंहा पर ये शिवलिंग रख दिया जाएगा उसी जगह स्थापित हो जाएगा।
जब रावण उस शिवलिंग को लेकर जाने लगा तो देवताओं ने सोचा अगर ये शिवलिंग लंका ले गया तो अमर हो जाएगा, तो उन्होंने विष्णु जी की मदत मागी। भगवान विष्णु के आदेश से वरुण देव ने रंग दिखाया और रावण को बहुत जोर से लघुशंका हुई। वो व्याकुल हो उठा और एक ग्वाले को ज्योतिर्लिंग देकर लघुशंका करने चला गया।
उधर वो ग्वाला उस ज्योतिर्लिंग को जमीन पर रखकर चला गया। जब रावण वापस आया तो वो ज्योतिर्लिंग जमीन में रखा देखकर बहुत दुखी हुआ और बहुत जोर लगाकर उठाने का प्रयास किया, परंतु वो न उठा पाया।
फिर वो जल से अभिषेख कर के पूजा अर्चना की और चला गया। उसकी पूजा की प्रक्रिया को एक बैजू नामक भील देख रहा था और वो हर रोज उसी तरह पूजा करने लगा।
उसकी पूजा से प्रसन्न होकर शिव जी प्रगट हुए और उसी के नाम पर बैजनाथ ज्योतिर्लिंग से प्रसिद्ध होने का वर दिया।

सारांश Conclusion:

रावण बहुत बड़ा ज्ञानी और ईस्वर का बड़ा भक्त था परंतु उसका कर्म उसे बुरा बना दिया।

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त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग:

महाराष्ट्र के नाशिक जिले में पवित्र गोदावरी नदी के उद्गम स्थल में स्थित त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर और इसकी शिल्प कला बहुत प्राचीन है। गौतम ऋषि की तपश्या से भगवान शिव का आगमन हुआ और माँ गंगा का गोदावरी रूप में प्रागट्य हुआ।

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा:

महाशिव पुराण के अनुसार एक बार बहुत बड़ा अकाल पड़ा था तब गौतम ऋषि ने अपने तप के वेग से एक ऐसे कुंड का निर्माण किया जिसका जल कभी नही सूखता था और जिसके कारण चारो तरफ बनी रहती थी।
हर जगह सूखा था परंतु उस स्थान में जल था जिससे सभी जानवर और इंसान वंहा जल पीते थे, कुछ ऋषि भी उस स्थान में रहने लगे। परंतु कुछ दिन बाद ही वो गौतम ऋषि के मान और कीर्ति से जलने लगे और उनको वंहा से भगाने का उपाय करने लगे।
फिर उनलोगों ने गणेश जी की तपश्या करके प्रसन्न कर लिया और गणेश जी आगमन पर उनसे ऋषि गौतम से छल करके उनको वंहा से भगाने का प्रबंध करने को कहने लगे।
भगवान गणेश के समझाने पर भी वो न समझे तब गणेंश जी ने उनकी बात मान ली और कहा कि इससे ऋषि गौतम की कीर्ति और बढ़ जायेगी।
तब उन्होंने माया की गाय बनकर गौतम ऋषि के खेत ने चरने लगे और बाकी लोग वंहा आसपास छुप गए।
जब गौतम ऋषि उस गाय को भगाने के लिए पत्थर मारा तो गाय मर गयी। उसी समय सारे लोग इकट्ठा हो कर गौतम ऋषि पे गौ हत्या का दोष लगा दिया, और कहा कि वो उस स्थान को त्याग दे और अपना पाप से मुक्त होने के लिए गंगा नदी के आवरण करवाये तभी गौ हत्या का दोष मुक्त होगा।
फिर ऋषि गौतम और उनकी पत्नी अहिल्या ने कई वर्षों तक करोड़ो पार्थिव शिवलिंग बना कर भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया। भगवान शिव पार्वती के साथ वंहा प्रगट हुए। और गौतम को उनपर हुए छल कि कथा भी बताई।
तब गौतम ने उनसे म गंगा के अवतरण होने वरदान मांगा, तव वंहा शिव जी के आदेश पर गंगा प्रगट हुई और कहा कि प्रभु मैं यंहा अकेले नही रहूंगी ।
तब गंगा जी के निवेदन पर भगवान शिव वंहा त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप ने स्थापित हुए।

सारांश Conclusion:

विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान पे आस्था नही छोड़नी चाहिए, और कुछ गलत होने पर भी कुछ सही होने का संकेत होता है।


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काशी विष्वनाथ:

उत्तरप्रदेश में पवित्र गंगा नदी के किनारे स्थित काशी विष्वनाथ मंदिर एवम स्थान का बहुत बड़ा महत्व है भारत के इतिहास में भी। ये मंदिर भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक तो है ही परंतु भगवान शिव का सबसे प्रिय स्थान भी है। ये स्थान कई ऋषियों मुनियो की तपो भूमि और कर्म भूमि रही है। आयुर्वेद से भी इस स्थान का बहुत गहरा नाता है। इस कारण भारतीय इतिहास में ये बहुत खाश है।
मान्यता के अनुसार इस स्थान को श्वम भगवान शिव ने बसाया था, और प्रलय की स्थित में भी ये स्थान में कुछ नही होता क्योंकि इसे भगवान शिव अपने त्रिशूल में धारण कर लेते है।

कहा जाता है जो इंसान यंहा गंगा नदी में स्नान कर ले और विष्वनाथ जी के दर्शन कर ले उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, और इस स्थान में मृत्यु की प्राप्ति होने पर मोक्ष के साथ साथ भगवान शिव का सानिध्य प्राप्त हो जाता है।

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा:

शिवपुराण के अनुसार भगवान विष्णु और व्रह्मा में श्रेष्ठ होने की बहस छिड़ गई थी तब शिव जी मे अग्नि स्तम्ब का रूप लिया और दोनों में छोर खोजने को कहा।
तब ब्रह्मा जी मयूर पर बैठ कर ऊपर तथा विष्णु जी बाराह का रूप लेकर नीचे की तरफ गए।
परंतु किसी को छोर प्राप्त नही हुआ, परंतु व्रह्मा जी गलती कर दी अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बोल दिया कि मैंने छोर खोज लिया।
तब वो अग्निस्तम्भ शिवलिंग रूप को प्राप्त हुआ और स्वम् शिव जी प्रगट हुए और ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि आपको कभी पूजा नही जाएगा।
वही शिवलिंग विष्वनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

सारांश Conclusion:

भगवान भोलेनाथ की महिमा से काशी मोक्षप्राप्ति के लिए सबसे उत्तम स्थान है। शिव जी के स्थान में मृत्यु के पश्चात यंहा दाहसंस्कार का नियम है कहा जाता है यंहा पर दाह संस्कार से इन्सान को मोक्ष मिलता है।


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