भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

30 January, 2019

रावण के युद्ध मे पराजय की कथाएँ। Stories of defeats of Ravan in Hindi.

रावण के पराजय की कथाएँ:

रावण परम वीर और दिग्विजयी था, उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके कई वरदान प्राप्त कर रखा था। जिसके कारण उसको युद्ध मे पराजित करना कठिन था, उसने देवताओं, अशुरो, किन्नरों, यक्ष, गंधर्व किसी के भी हांथो मृत्यु न होने का वरदान प्राप्त किया था। परंतु नर और वानर को तुक्ष्य मानकर इनका नाम नही लिया था। जिस कारण भगवान राम का अवतार हुआ और रावण का वध हुआ।
परंतु वह केवल भगवान राम से ही पराजित नही हुआ था अपितु चार और युद्ध वो हारा था, उनकी कथा इस प्रकार है:

रावण का राजा बलि से युद्ध: 

रावण को अपने बल पर बहुत अभिमान था अतः उसने युद्ध की लालसा से पाताल लोक के राजा बलि से युद्ध करने पहुँच गया था। जब उसने बलि को युद्ध के लिए ललकारा तो बलि ने उसे युद्ध मे पराजित करके बंदी बना लिया और घोड़ो के अस्तबल ने बांध दिया। बाद में उसे छोड़ दिया।

रावण का सहस्त्रबाहु से युद्ध:

रावण का सहस्त्रबाहु से युद्ध हुआ, सहस्त्रबाहु की एक हजार भुजाएं थी जिस कारण उसका नाम सहस्त्रबाहु था। रावण युद्ध के विचार से सेना सहित आक्रमण किया, परंतु सहस्त्रबाहु ने अपनी भुजाओं से नदी का पानी रोक लिया और इकट्ठा करके छोड़ दिया जिस कारण रावण की पूरी सेना पानी मे बह गई। उसके बाद रावण की सहस्त्रबाहु से पराजय हुई।

रावण का वानर राज बाली से युद्ध:

वानर राज बाली परम वीर था और उसको ब्रह्मा से मंत्र प्राप्त यह जिसकारण यह कभी पराजय नही होता था और प्रतिद्वंदी का आधा बल उसको मिल जाता था। वानर राज बाली ने रावण को पराजित किया था और कई महीनों तक अपनी कांख में दबाकर सूर्य की पूजा करता था।


रावण का भगवान शिव से सामना:

रावण अपने बल के मद में भगवान शिव से युद्ध करने पहुच गया, परंतु जब उसके बहुत ललकारने पर शिवजी का ध्यान भंग नही हुआ और वो ध्यान में लीन रहे तो वो कैलाश पर्वत को उठाने लगा। 
तब शिवजी ने अपने पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को दबा दिया जिसके कारण उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया और बहुत प्रयत्न करने पर भी नही निकल सका।
उसे शिवजी के शक्ति का ज्ञान हो गया और उसने शिव स्त्रोत की रचना की जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे छोड़ दिया।

श्रीराम से युद्ध:

रावण ने माता सीता का अपहरण किया जिसके कारण श्रीराम ने वानर सेना के साथ युद्ध कर माता सीता को मुक्त करवाया और रावण का कुल समेत सर्वनाश हुआ। श्रीराम ने अपने भक्त और रावण के भाई विभीषण को लंका का राजा नियुक्त कर अयोध्या वापस आये।

सारांश Conclusion

कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो पराजय का सामना सभी को करना पड़ता है, अतः शक्ति का अभिमान नही होना चाहिए अपितु जान कल्याण में उसका स्तेमाल करना चाहिए।


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28 January, 2019

कुंभ के आयोजन और स्नान की कथा। Story of Kumbh Mela in Hindi.

कुंभ का आयोजन और पौराणिक कथा:

कुंभ का आयोजन जिन स्थानों पर होता है वह है प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नाशिक। यह आयोजन हर तीसरे वर्ष होता है इसलिए पुनः उसी स्थान पर कुंभ लगने में 12 वर्ष लगते है। यह ग्रहों के ऊपर निर्भर करता है, गुरु के राशि मे जिस स्थान पर होता है उसी के अनुसार कुंभ का आयोजन होता है।


कुंभ से जुड़ी हुई पौराणिक कथा:


एक कथा के अनुसार जब देवराज इंद्र भ्रमण करते हुए महर्षि दुर्वासा से मिले और उनको प्रणाम किया तो दुर्वासा ने उनको एक माला दी, जिसका अनादर करते हुए देवराज के उसे अपने हांथी को पहना दी, जिसके कारण महर्षि दुर्वासा क्रोधित हो गए और देवताओं को सक्ति विहीन होने का श्राप दे दिया।

उस श्राप के कारण देवगण शक्ति और तेज हीन हो गए, और उन्होंने इसके निवारण के लिए भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने बताया कि आपलोग असुरो के साथ मैत्री करके समुंद्र मंथन करो जिससे आपलोग पुनः शक्तिशाली हो जाओगे और समुद्र मंथन से निकले अमृत के कारण अमर हो जाओगे।

तब देवताओं और असुरो ने मिलकर समुन्द्र मंथन किया जिसके उपरांत अमृत निकाला, उस अमृतपान के लिए देवताओं और असुरो के विवाद हो गया। और उसको छिनने में अमृत की बूंदे कई लोको में गिरी।
उसमे से चार स्थान पृथ्वी पर है जंहा पर कुम्भ का आयोजन होता है।




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23 January, 2019

उज्जैन : मंदिरो का शहर Ujjain : City Of Mahakaal and Mandirs

उज्जैन के मुख्य दार्शनिक मंदिर

बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल जो मध्यप्रदेश के उज्जैन (उज्जयिनी) में स्थित है, और महाकाल को यंहा का राजा कहा जाता है। उज्जैन में महाकाल मंदिर के अलावा कई दार्शनिक मंदिर है यह कई महापुरुषों की तपो भूमि रही है। उज्जैन में अनेक मंदिर स्थित है जिनके कई लोक कथाये भी है, हम बात करते है उज्जैन में स्थित मुख्य दार्शनिक मंदिर:

१) महाकालेश्वर मंदिर Mahakaleshwar Mahadev Mandir:

महाकाल की पौराणिक कथा वर्णन पिछले ब्लॉग में किया था जिसका लिंक यह है:
https://www.kahi-suni.com/2018/12/blog-post_27.html

मौजूद मंदिर का निर्माण राणोजी सिंधिया ने 1734 में करवाया था जिसके बाद मैनेजमेंट और सिंधिया राज घराने के देख रेख में हुआ। अब महाकालेश्वर ट्रस्ट इसे सुचारू रूप से चलता है। परिसर का रखरखाव , सफाई पर बहुत ध्यान दिया जाता है। इससे इसकी भभ्यता बहुत अच्छी है।

२) काल भैरव मंदिर:


काल भैरव को भगवान शिव का सेनापति कहा गया है, अगर आप महाकाल दर्शन करते है परन्तु भैरव मंदिर नही जाते तो दर्शन अधूरा माना जाता है।
काल भैरव का वाहन या दूत कुत्ता (ब्लैक डॉग) है। यंहा पर प्रसाद के तौर पर शराब(वाइन या व्हीस्की) दिया जाता है।



३) मंगलनाथ मंदिर:

पुराणों के अनुसार भगवान शिव के पसीने की बूंद यंहा पर गिरा था वंही शिवलिंग रूप में पूजा की जाती है। इस मंदिर के दो प्रमुख तथ्य है
       (१) जितने शिव मंदिर है वंहा शिवजी के वाहन नन्दी की प्रतिमा होती है, परंतु यह एक ऐसा मंदिर है जंहा पर शिवजी के वाहन के रूप में गधा(Donkey) है।
       (२) जो लोग कुंडली के अनुसार मांगलिक होते है उनके निवारण के लिए केवल यही स्थान है जंहा विशेष पूजा करवाई जाती है। लोगो द्वारा बताया जाता है कि बच्चन परिवार यंहा पर एस्वरिया राय के मंगल दोष निवारण के लिए यहाँ पर पूजा करवाई थी।
     

४) सांदीपनि आश्रम:



कंश के वध के बाद श्रीकृष्ण यंहा पर विद्या अध्यन के लिए आये थे और 64 दिन में 64 विद्याएं और 16 कलाये सीखी थी। तथा यही पर श्रीकृष्ण की सुदामा के साथ मित्रता हुई थी।




५) राम घाट:



शिप्रा नदी के तट पर बना राम घाट बहुत सुंदर एवं प्रसिद्ध है , यही पर कुम्भ का स्नान होता है।
प्रत्येक शाम यंहा पर संध्या आरती होती है।






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20 January, 2019

शिव-पार्वती पुत्र अंधक की कथा। Andhkasur ki katha in Hindi.

कौन था अंधक या अंधकासुर:

भगवान शिव और पार्वती का पुत्र था अंधक जिसे भगवान शिव ने हिरण्याक्ष की तपश्या से प्रसन्न होकर उसे प्रदान किया था। बाद में वही अंधक बडा होकर अंधकासुर बना जो ब्रह्मा जी का भक्त था और दिग्विजयी हुआ, और उसका अंत भी भगवान शिव के हांथो हुआ।

शिव पार्वती के पुत्र अंधक की कथा:

एक बार माता पार्वती और भगवान शिव काशी नगरी में भ्रमण कर रहे थे तभी भगवान शिव एक स्थान पर विराजमान हो गए और कुछ ध्यान में थे, तभी माता ने अपने हांथो से भगवान की आंखों को बंद कर दिया जिसके कारण संसार मे अंधेरा छा गया। जिसके लिए शिव जी ने अपने तीसरे नेत्र को खोल दिया और संसार प्रकाशवान हो गया।
परंतु उसकी गर्मी से माता को पसीना आ गया और नीचे गिरने से एक पुत्र का जन्म हुआ जो बहुत भयंकर दिखाई पड़ रहा था। माता के पूछने पर भगवान ने बताया कि ये आपका ही पुत्र है।

जब हिरण्याक्ष ने भगवान से पुत्र का वरदान मांगा तो भगवान ने उस बालक को हिरण्याक्ष को दे दिया , वह बालक असुरो के पास बडा हुआ और अंधकासुर बना। उसने ब्रह्मा जी की तपस्या की और वरदान मांगा की जब मैं अपनी माता से विवाह का प्रस्ताव रखु तभी मेरी मृत्यु हो। उसको लगता था कि उसकी कोई माता नही है।
उसके बाद उसने तीनो लोको में विजय प्राप्त की और फिर विवाह के बारे में सोचा, तब सभी ने हिमालय की पुत्री पार्वती जी के बारे में बताया कि वह बहुत सुंदर है और कैलाश में शिव जी की पत्नी है।
तब वो माता के पास विवाह प्रस्ताव लेकर गया जंहा पर भगवान शिव के द्वारा उसका विनाश हुआ।


सारांश Conclusion

इस कथा का वर्णन कई पुराणों में है जंहा अंधक की उत्पत्ति के अलग अलग कारण बताए गए है। यह कथा शिवमहापुराण से है।


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18 January, 2019

सती सावित्री और वट सावित्री की कथा। Sati Savitri and Vat Savitri story in hindi.

सती सावित्री और वट सावित्री व्रत Sati Savitri and Vat Savitri Vrat:

सती सावित्री नारी शक्ति की मिसाल है जिन्होंने अपने त्याग, समर्पण और सतीत्व के दम पर यमराज से अपने पति का जीवन वापस लेकर आई थी। भारतीय इतिहास में बहुत नारियो का प्रसंग का वर्णन किया गया है परंतु सावित्री के सतीत्व का उदाहरण हमेशा पति परायण नारियो में सर्वोत्तम समझा गया है। भारत मे महिलाये वट सावित्री का व्रत करती है जिसमे सती सावित्री की कथा का वर्णन है।

कौन थी सती सावित्री Who was sati savitri in hindi.

पुराणों के अनुसार मग्रदेश मे राजा अश्वपति नामक राजा राज करते थे जिनकी सावित्री नामक पुत्री हुई जो परम तेजस्वी थी और इनका रूप सौंदर्य बहुत ही सुंदर था। जब उन्होंने युवा अवस्था को प्राप्त किया तब पिता की आज्ञा से उन्होंने सत्यवान को अपने पति के रूप में वरण किया था।


सती सावित्री की कथा Savitri Vrat katha in Hindi:

महिलाओं के द्वारा रखा जाने वाला व्रत है वट सावित्री जिसमे सती सावित्री की कथा कही जाती है, इस व्रत की पूजा वट के वृक्ष के नीचे की जाती है क्योंकि वट वृक्ष में भगवान शिव का वास होता है।
इस कथा के अनुसार राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने सत्यवान को अपने पति के रूप में वरण किया था। तभी एक दिन उनके भवन में भगवान विष्णु के परम भक्त नारद का आगमन हुआ। राजा अश्वपति ने उनका आदर सत्कार किया, उसके बाद सावित्री ने भी नारद मुनि का आशिर्वाद लिया। फिर राजा अश्वपति ने सावित्री और सत्यवान के विवाह की बात बताई ।
तो नारद जी ने बताया कि सत्यवान के पिता को राज विहीन कर दिया गया है और सत्यवान की आयु सीमा भी बहुत कम है, उसकी मृत्यु एक वर्ष पश्चात निश्चित है।
परंतु सावित्री नही मानी और कहा कि मैंने सत्यवान को ही पति के रूप में वरण किया है तो मेरा विवाह भी उन्ही से होगा। राजा अश्वपति भी मान गए और सत्यवती का विवाह सत्यवान के साथ हो गया।
एक वर्ष उपरांत जब दोनों जंगल मे लकड़ी और फल लेने गए तो सत्यवान बहुत दर्द हुआ और वो वट के वृक्ष के नीचे लेट गया , और उसकी मृतु हो गयी।
तभी वंहा यमराज आये और उसकी आत्मा को लेकर दक्षिण की ओर जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे चलने लगी तो यमराज ने पूछा तुम कहा जा रही हो तो सावित्री ने कहा कि मैं अपने पति के साथ जाऊँगी।
तो यमराज भी उसको अपने  पति के प्रति प्रेम देखकर पिघल गए और बोले कि मैं तुम्हारे पतिपरायणता से प्रसन्न हूँ तुम इसके जीवन दान के अलावा कोई और वरदान मांग लो क्योंकि इसकी आयु सीमा समाप्त हो चुकी है।
तो उसने अपने ससुर के राजपाठ की वापसी का वर मांगा, यमराज तथास्तु कहकर आगे चल दिये तब भी सावित्री पीछे चल रही देखकर यमराज ने एक और वरदान मांगने को कहा।
तो सावित्री ने पुत्रवान होने का वरदान मांगा, यमराज फिर तथास्तु कहकर चल दिये, पर सावित्री फिर भी पीछे चल रही थी। तो यमराज ने कारण पूछा तो सावित्री ने कहा कि अपने मुझे पुत्रवान होने का वरदान दिया है इसलिए आपको मेरे पति को जीवित करना होगा। तब यमराज उसके आतित्व से पिघल गए और उसके पति को जीवित कर दिया।


सारांश conclusion

सावित्री ने यह सिद्ध किया कि अगर स्त्री चाहे तो वो मरे हुए पति के प्राण यमराज तक से वापस ला सकती है, इसलिए नारी को लक्ष्मी का रूप और भगवान का आशिर्वाद समझना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए। जिस घर मे स्त्री का सम्मान होता है वंहा हमेशा सम्पनता बनी रहती है।

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16 January, 2019

हनुमानजी को सिन्दूर क्यों लगते है। Hanuman-Sindoor Story.

क्या आप जानते है कि हनुमान जी का सिंदूर से क्या संबंध है:

हनुमान जी का सिन्दूर से गहरा नाता रहा है, हम हमेशा बजरंगबली को लाल सिंदूर धारण करते है और हनुमान जी की मूर्ति में सिंदूर चढ़ाते हुए देखा होगा। परंतु इसके पीछे क्या कारण है इसकी भी बड़ी रोचक कथा है:

हनुमान जी महान बल के साथ साथ बुद्धि के ज्ञाता है परंतु भगवान राम और माता सीता के साथ उनकी कई ऐसे प्रसंग है जिससे उनके अंदर चंचलता दिखाई देता है ऐसी ही एक कथा है कि
 "एक बार महाबली हनुमानजी ने माता सीता जी को अपने मस्तक पर सिंदूर लगते हुए देखा तो उनके मन मे जिज्ञासा हुई और उन्होंने माता सीता से प्रश्न किया कि माता आप अपने मस्तक ये लाल पदार्थ क्यों लगती है?

तब माता ने उनको बताया कि पुत्र ये सिंदूर है और बताया कि इसको लगाने से प्रभु की उम्र लंबी होती है और प्रभु राम प्रसन्न होते है।
तो हनुमान जी ने सोचा अगर एक चुटकी भर सिन्दूर लगाने से प्रभु राम की उम्र लंबी होती है और उनको प्रसन्ता होती है, तो अगर मैं पूरे सरीर में बहुत सारा सिंदूर लगा लूँगा तो भगवान की उम्र लंबी होगी और उनको बहुत प्रसन्ता होगी।
अतः उन्होंने ऐसा ही किया और पूरे सरीर में सिंदूर लगा कर प्रभु राम के पास गए। श्रीराम के पूछने पर उन्होंने सारी बात बताई तब प्रभु श्रीराम बहुत खुश हुए और अमरत्व का बरदान दिया।

सारांश Conclusion 

अतः मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की मूर्ति में सिंदूर लगाने की प्रथा है। हनुमान जी सिद्धीओ के दाता है और ग्रह दोष , शनि दोष और वास्तु दोष को दूर करते है।


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14 January, 2019

श्रीकृष्ण की दुर्लभ कथा। Rare story of Lord Krishna.

भगवान श्रीकृष्ण की दुर्लभ कथा:

भगवान श्रीकृष्ण को लीलाधर भी कहा गया है क्योकि वो नित्य लीलाये करते रहते थे। उन्ही मुरलीधर श्रीकृष्ण की एक उत्तम कथा है जो देवी रुक्मडी और सत्यभामा से जुड़ी हुई है।
जैसा कि सभी को पता है हमारे गिरधर की 16108 पटरानियां थी जिनमे से रुक्मणि और सत्यभामा का प्रसंग सबसे ज्यादा वर्णन है। देवी सत्यभामा को हमेशा यह अभिमान रहता था कि वो सबसे ज्यादा सुंदर और बैभवशाली है। अतः उनको ये लगता था कि सभी पटरानियों से ज्यादा गहने और जेवर उनके पास है।
एक दिन सत्यभामा के मन मे आया कि आज वो भगवान श्रीकृष्ण को अपने गहने और जेवरात से तौलेंगी, क्योंकि उनके पास गहने और जेवरातों की कोई कमी नही थी।

तब उन्होंने भगवान स्यामसुंदर को एक तुला में बिठा दिया और दूसरे पलड़े में गहने और जेवरात रखना सुरु कर दिया, परन्तु जब वो जेवरात रखते रखते थक गई परंतु तुला का भार भगवान वासुदेव की तरफ ही रहा तो वो हैरान रह गयी।
और सोचने लगी कि इतने आभूषण और गहने रखने बाद भी तुला झुक क्यों नही रहा है, परंतु वो लीलाधर की लीला को नही समझ पा रही थी।

तब वंहा देवी रुकमणी आयी और उन्होंने सारा कार्यक्रम देखा तो वो समझ गयी कि ये भगवान स्यामसुंदर की लीला है।
फिर क्या था उन्होंने तुरंत पूजा का सामान उठा कर लायी और पहले भगवान की पूजा की उसके उपरांत भगवान का चरणोंदल को उठा कर गहने वाले पालने पर रख दिया और फिर गहने वाला हिस्सा भारी हो गया और झुक गया।

परंतु सत्यभामा समझ नही पा रही थी तभी वंहा भगवान विष्णु के परम भक्त नारद मुनि पहुच गए और उन्होंने देवी सत्यभामा को समझाया कि भगवान पूजा में महत्त्व सोने चांदी या आभुषण नही अपितु भावनाओं का है।

सारांश conclusion

भक्ति और प्रेम से बड़ा कुछ नही होता और भगवान भी भक्त की भक्ति और प्रेम को देखते है, पूजा करने का सही ढंग भक्त को भगवान से मिला देता है।


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10 January, 2019

भीम की कथा महाभारत से। Story of Bhim from mahabharat.

कौन थे भीमसेन: 

Image from:pinterest 
महाभारत काल ने पांडु पुत्र थे भीमसेन। परंतु पांडु के श्राप के कारण उनकी पत्नी ने अपने मिले हुए एक वरदान से पवन देव से इस पुत्र को पाया था इसलिए भीम पवन देव के भी औरस पुत्र है। वो बहुत शक्तिशाली थे इसीलिए उनको अपने अपने बल का अहंकार हो गया था, जिसे हनुमानजी के चूर किया था।

भीमसेन के अहंकार को हनुमानजी द्वारा चूर करने की कथा:

महाभारत युद्ध के पहले जब श्रीकृष्ण जी को यह लगा कि महाबली भीम को अपने बल का अहंकार हो गया है तो उन्होंने हनुमान जी को भीम के अहंकार को चूर करने को कहा।
तब हनुमान जी भीम के मार्ग में अपनी पूंछ को बिछा कर लेट गए। जब भीम वंहा आये और अपने मार्ग में वानर की पूछ देखी तो उन्हें क्रोध आ गया। और हनुमानजी को एक बूढ़ा वानर समझ कर कहने लगे कि ये बूढ़े वानर अपनी पूंछ नही सम्हाल पा रहे हो इसे हटा लो नही तो मैं इसे उठा कर फेंक दूँगा। 
तब हनुमानजी ने कहा कि मैं बूढ़ा हो गया हूं और अभी आराम करने बैठा हूँ तुम दूसरे मार्ग से चले जाओ नही तो इसे लांघ कर निकल जाओ। 
भीम ने कहा कि मैं ना ही दूसरे मार्ग से जाऊंगा और न ही लांघ कर , तुम अपनी पूंछ हटा लो नही तो मैं इसे फेक दूँगा।
हनुमान जी बोले फेक दो क्योंकि मै तो आराम करने लेटा हूं।
फिर तो भीम को बहुत क्रोध आ गया और वो पूछ को हटाने लगे, वो समझ रहे थे कि ये कोई सामान्य बूढ़ा वानर है। लेकिन उनके बहुत बल और कोशिस करने के वावजूद भी वो हनुमान जी की पूछ को हटा नही पाए। फिर उन्हें बल का अभिमान कम हुआ और वो समझ गए ये कोई साधारण वानर नही है, तब उन्होंने हनुमानजी से परिचय मांगा और छमा भी मांगे।
तब हनुमानजी ने अपना परिचय दिया और बताया कि बलवान होगा का अभिमान नही होना चाहिए बल्कि इसका इस्तेमाल सही जगह होना चाहिए।

सारांश Conclusion :

कभी भी बल का घमंड नही होना चाहिए बल्कि उसका स्तेमाल लोक हित में करना चाहिए।

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08 January, 2019

जब श्रीकृष्ण ने सत्यभामा, गरुण और सुदर्शन का घमंड भंग किया। Pauranik katha of Shri krishna.

श्रीकृष्ण जी की दुर्लभ कथा:

यह कथा पुराण से है, जब भगवान श्रीकृष्ण की ने अपनी पत्नी सत्यभामा, अपने वाहन गरुण और सुदर्शन चक्र का घमंड भंग किया था।

एक बार रानी सत्यभामा ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु आप त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के रूप में अवतरित हुए थे तब सीता आपकी पत्नी थी तो क्या मैं उनसे ज्यादा खूबसूरत है। तब प्रभु श्रीकृष्ण समझ गए कि इनको अपने रूप का अहंकार हो गया है।
फिर गरुण ने पूछा प्रभु मैं आपका वाहन हु अर्थात मैं दुनिया मे सबसे ज्यादा तेज से उड़ सकता हूं, और सुदर्शन चक्र ने कहा कि प्रभु मैं आपका सबसे प्रिय अस्त्र हु अर्थात मैं सबसे ज्यादा शाक्तिशाली हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण ने इन तीनो का घमंड को भंग करने के लिए सोचा और गरुण को आदेश दिया कि तुम हनुमान के पास जाओ और बोलना की श्रीराम माता सीता के साथ आपकी प्रतीक्षा में है और आपको जल्दी बुलाया है। गरुण वंहा से निकल गए।
तब उन्होंने सुदर्शन चक्र को कहा कि तुम द्वार पर रहो और किसी को अंदर नही आने देना। और खुद राम के रूप में सिंघासन पर बैठ गए और रानी सत्यभामा को बगल के आसन पर बिठा लिया।
उधर जब गरुण हनुमान जी के पास जाकर सारी बात बताई और बोले आप अपने मेरे पीठ पर बैठ जाइए मैं आपको जल्द पहुचा देता हूं। हनुमान जी ने कहा आप जाईये मैं आता हूं, तो गरुण जी ने सोचा ये सबसे बड़े भक्त बनते है और इनको प्रभु की बात का कोई जल्दबाजी ही नही है (क्योंकि हनुमान जी बूढ़े दिख रहे थे तो गरुण को लगा ये पता नही कब पहुचेगे)।

जब गरुण पहुचे तो देखा हनुमान जी पहले ही वंहा पहुच गए है और प्रभु के समीप बैठे है और अब भी उनके तेज है इससे उनका घमंड भंग हो गया।
फिर भगवान ने हनुमानजी से पूंछा आप अंदर आये आपको किसी ने रोक नही तब हनुमानजी ने दांत में दबे सुदर्शन चक्र को निकलते हुए बोले इन्होने रोक था तो मैंने मुह में दबा लिया। (इससे सुदर्शन चक्र का घमंड भंग हुआ)।
हनुमान जी ने सत्यभामा की तरफ इशारा करते हुए बोले प्रभु माता सीता कहा है और ये दासी यंहा क्यों बैठी है।(इससे सत्यभामा का घमंड भंग हुआ)। तब प्रभु श्रीकृष्ण ने सारी बात बताई और सब मुस्कुराने लगे।


सारांश Conclusion:

कभी भी किसी का अभिमान या घमंड नही होना चाहिए चाहे वो सुंदरता हो या बल या कुछ और हो नही होना चाहिए।


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07 January, 2019

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा। Pauranik story of Ghrisneshwar jyotirlinga

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास स्थित घृष्णेश्वर या धुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से आखरी है। यह देवगिरि नामक पर्वत के पास स्थित है। यह कथा महाशिवपुराण के साथ साथ बहुत से ग्रंथो में है।

घृष्णेश्वर या धुश्मेश्वर की कथा

इस कथा के अनुसार भारत के दक्षिण में देवगिरि पर्वत पे सुधर्मा और उसकी पत्नी सुदेहा नामक ब्राह्मण रहते थे, जो भगवान शिव के भक्त थे । परंतु उनके कोई पुत्र नही था। जिसके कारण वो दुखी थे।
सुदेहा की एक बहन धुष्मा थी जिसका विवाह उसने अपने पति से करवा दिया। धुष्मा भी शिव जी की परम भक्त थी वो हर दिन पार्थिव शिवलिंग की पूजा करती थी और फिर सरोवर में विषर्जित करती थी।
विवाह के बाद उसको एक सुंदर पुत्र हुआ , जो सबका चहीता था और दिनों दिन बड़ा हो रहा था। जिससे धुष्मा का मान बढ़ रहा था , और इस बात से सुदेहा के मन मे जलन होने लगी।
फिर जब वो बड़ा हुआ तो उसका विवाह किया गया और सुदेहा की ईर्ष्या भी बढ़ती गयी।
एक दिन उसने ईर्ष्या के कारण उस बालक के चाकू से टुकड़े कर दिए और उसी सरोवर में डाल दिया जंहा धुष्मा पार्थिव शिवलिंग का विषर्जित करती थी।
सुबह जब उस बालक की पत्नी ने अपने पति को नही देखा और बिस्तर में खून देखा तो रोते हुए धुष्मा के पास गई , धुष्मा उस समय भगवान शिव की पूजा कर रही थी, उसने सब सुना पर पूजा से उठी नही और जब पूजा समाप्त करके सरोवर के पास गई तो उसका पुत्र जीवित होकर खड़ा था साथ मे स्वयं भगवान शिवजी भी थे।
तब सुदेहा को बड़ा पश्चाताप हुआ और उसने भगवान शिवजी से विनती की तो धुष्मा ने भी छमा करने को कहा।
फिर सब की प्रार्थना से भक्तवत्सल भगवान शिव जी वंहा स्थापित हो गए और धुश्मेश्वर नाम से प्रशिद्ध है।

सारांश Conclusion:

इन्सान को कभी भी अपने मन मे ईर्षा नही लानी लानी चाहिए, क्योंकि जब ये बढ़ जाती है तो इंसान को अपने आप से कंट्रोल नही रहता और बाद में पछिताना पड़ता है।


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06 January, 2019

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा। Rare Story of Nageshwar Jyotirlinga.

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग:

चार धामो में से एक द्वारिका धाम के निकट भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। यह स्थान समय मे दारुक वन के नाम से जाना जाता था। यंहा पर भगवान शिव ने अपने सुप्रिय नामक भक्त की रक्षा के लिए प्रगट हुए थे।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा:

शिव महापुराण के अनुसार प्राचीन समय मे दारुक और उसकी पत्नी दारुका नाम के राक्षस रहते थे, वो ऋषियो , महात्मयो और आम नागरिकों को परेशान करते थे और पुण्य कर्मों में विघ्न डालते थे।
तब उनको महर्षि और्व ने श्राप दिया कि जब भी यो पुण्य कर्मों में विघ्न डालेंगे तो मृत्यु हो जाएगी। फिर उन लोगो ने समुन्दर में रहने का निश्चय किया।
एक बार जब कुछ लोगो का समूह वंहा से गुजर रहा था तो दारुक में उनको पकड़ लिया और बंदी बना लिया, जिसमे भगवान शिव का परम भक्त सुप्रीय भी था।
दारुक ने उसे कालकोठरी में डाल दिया परन्तु उसकी भक्ति कम नही हुई, और वो काल कोठरी में भी भगवान की भक्ति कर रहा था।
और जब उसने अपनी रक्षा के लिए भोलेनाथ को याद किया भक्तवत्सल भगवान शिव वंहा आये और एक ही प्राहार से दारुक को मार गिराया और अपने भक्त को आज़ाद करवाया।

सारांश Conclusion:

किसी भी परिस्थिति में इंसान को भगवान के प्रति आस्था नही छोड़ना या कम करना चाहिए। क्योंकि भगवान भक्त का साथ नही छोड़ते है और भक्त के बुलावे पर वो श्वम किसी न किसी रूप में आते है।


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04 January, 2019

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा। Rare story of Rameshwaram.

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग:

वैष्णव और शिव परम्परा में आश्था रखने वालों का सामूहिक स्थल है रामेश्वर ज्योतिर्लिंग। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों के साथ साथ भगवान विष्णु के चार धाम में है इसलिए इसका बहुत बड़ा महत्व है। रामेश्वर इस धरना का सूचक है कि हम चाहे जिन देवताओं पे आस्था रखते हो पर सभी देवता एक है।
जब प्रभु श्री राम ने इस शिवलिंग कि स्थापना की थी तब उन्होंने इस नाम का अर्थ बताया था : "राम के जो ईस्वर वो रामेश्वर"। और जब माता पार्वती ने भगवान शिव से इसका अर्थ पूछा तो उन्होंने बताया था: "राम जिनके ईस्वर वो रामेश्वर"। 
तब श्री राम ने कहा था कि जो भगवान शिव की आस्था से विरक्त होकर मेरी शरण में आएगा उसे मेरी भक्ति प्राप्त नही होगी। 
अर्थात सभी ईस्वर एक है रूप अनेक है, हम किसी भी रूप में आश्था और विस्वास रख सकते है।

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा:

इस कथा का वर्णन रामायण से है जो शिव महापुराण में व्याखित है। जब प्रभु श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता की खोज में अपने भाई लक्ष्मण, पवन सुत श्री हनुमान, सुग्रीव और वानर सेना के साथ समुन्द्र तट पे पहुँचे ।
उनके सामने सौ योजन का समुन्द्र सेना सहित पार करने की समश्या आन पड़ी, फिर उन्होंने नल और नील की मदत से शेतु बंधन का कार्य शुरू किया।
प्रभु श्रीराम ने संकल्प किया कि जब तक शेतु बंधन का कार्य चलेगा मैं अपने आराध्य भगवान भोलेनाथ की पूजा करूँगा।
तब श्रीराम ने वंहा बालू के शिवलिंग की स्थापना की और अभिषेक और पूजा की वही शिवलिंग रामेश्वर ज्योतिर्लिंग हुआ।

कुछ मान्यताओं के अनुसार जब श्रीराम रावण वध के बाद वापस रहे थे तब ऋषियो ने परामर्श दिया कि रावण ब्राह्मण था और उसकी हत्या से ब्रह्म हत्या का दोष हुआ है जिसके निवारण हेतु श्रीराम में शिवलिंग स्थापित कर के पूजन किया था। परंतु ये प्रसंग न तो शिवपुराण में है और न ही तुलसीदास जी की रामचरितमानस में है।

सारांश Conclusion:

भगवान अपने आपको भी कभी विभक्त नही करते तो भक्तो को भगवान में अंतर नही करना चाहिए भले ही उनकी किसी भी भगवान में आस्था हो, उन्हें यही समझना चाहिए भगवान एक है बस उनके रूप अलग है।


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03 January, 2019

बैजनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा। Story of Baijnath Jyotirlinga.

बैजनाथ ज्योतिर्लिंग:

पहले के बिहार और अब के झारखंड में स्थित बैजनाथ ज्योतिर्लिंग जो बाबा धाम के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यंहा सावन के महीने में कावर से जल लाने कि प्रथा है। यंहा की कांवर यात्रा बहुत प्रसिद्ध है।

बैजनाथ की कथा:

एक बार शिव जी का परम भक्त रावण ने शिव जी की बड़ी तपश्या की और प्रसन्न कर लिया। जब भगवान भोलेनाथ ने उससे वरदान मांगने को कहा तो उसने शिवलिंग को लंका में स्थापित करने का वर मांगा।
तब शिव जी ने उसकी बात मान ली और शिवलिंग लंका ले जाने को दे दिया परंतु एक शर्त रखी कि इसको कंही जमीन पर न रखे क्योंकि जंहा पर ये शिवलिंग रख दिया जाएगा उसी जगह स्थापित हो जाएगा।
जब रावण उस शिवलिंग को लेकर जाने लगा तो देवताओं ने सोचा अगर ये शिवलिंग लंका ले गया तो अमर हो जाएगा, तो उन्होंने विष्णु जी की मदत मागी। भगवान विष्णु के आदेश से वरुण देव ने रंग दिखाया और रावण को बहुत जोर से लघुशंका हुई। वो व्याकुल हो उठा और एक ग्वाले को ज्योतिर्लिंग देकर लघुशंका करने चला गया।
उधर वो ग्वाला उस ज्योतिर्लिंग को जमीन पर रखकर चला गया। जब रावण वापस आया तो वो ज्योतिर्लिंग जमीन में रखा देखकर बहुत दुखी हुआ और बहुत जोर लगाकर उठाने का प्रयास किया, परंतु वो न उठा पाया।
फिर वो जल से अभिषेख कर के पूजा अर्चना की और चला गया। उसकी पूजा की प्रक्रिया को एक बैजू नामक भील देख रहा था और वो हर रोज उसी तरह पूजा करने लगा।
उसकी पूजा से प्रसन्न होकर शिव जी प्रगट हुए और उसी के नाम पर बैजनाथ ज्योतिर्लिंग से प्रसिद्ध होने का वर दिया।

सारांश Conclusion:

रावण बहुत बड़ा ज्ञानी और ईस्वर का बड़ा भक्त था परंतु उसका कर्म उसे बुरा बना दिया।

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02 January, 2019

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा । Rare Story Of trimbakeshwar jyotirlinga.

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग:

महाराष्ट्र के नाशिक जिले में पवित्र गोदावरी नदी के उद्गम स्थल में स्थित त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर और इसकी शिल्प कला बहुत प्राचीन है। गौतम ऋषि की तपश्या से भगवान शिव का आगमन हुआ और माँ गंगा का गोदावरी रूप में प्रागट्य हुआ।

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा:

महाशिव पुराण के अनुसार एक बार बहुत बड़ा अकाल पड़ा था तब गौतम ऋषि ने अपने तप के वेग से एक ऐसे कुंड का निर्माण किया जिसका जल कभी नही सूखता था और जिसके कारण चारो तरफ बनी रहती थी।
हर जगह सूखा था परंतु उस स्थान में जल था जिससे सभी जानवर और इंसान वंहा जल पीते थे, कुछ ऋषि भी उस स्थान में रहने लगे। परंतु कुछ दिन बाद ही वो गौतम ऋषि के मान और कीर्ति से जलने लगे और उनको वंहा से भगाने का उपाय करने लगे।
फिर उनलोगों ने गणेश जी की तपश्या करके प्रसन्न कर लिया और गणेश जी आगमन पर उनसे ऋषि गौतम से छल करके उनको वंहा से भगाने का प्रबंध करने को कहने लगे।
भगवान गणेश के समझाने पर भी वो न समझे तब गणेंश जी ने उनकी बात मान ली और कहा कि इससे ऋषि गौतम की कीर्ति और बढ़ जायेगी।
तब उन्होंने माया की गाय बनकर गौतम ऋषि के खेत ने चरने लगे और बाकी लोग वंहा आसपास छुप गए।
जब गौतम ऋषि उस गाय को भगाने के लिए पत्थर मारा तो गाय मर गयी। उसी समय सारे लोग इकट्ठा हो कर गौतम ऋषि पे गौ हत्या का दोष लगा दिया, और कहा कि वो उस स्थान को त्याग दे और अपना पाप से मुक्त होने के लिए गंगा नदी के आवरण करवाये तभी गौ हत्या का दोष मुक्त होगा।
फिर ऋषि गौतम और उनकी पत्नी अहिल्या ने कई वर्षों तक करोड़ो पार्थिव शिवलिंग बना कर भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया। भगवान शिव पार्वती के साथ वंहा प्रगट हुए। और गौतम को उनपर हुए छल कि कथा भी बताई।
तब गौतम ने उनसे म गंगा के अवतरण होने वरदान मांगा, तव वंहा शिव जी के आदेश पर गंगा प्रगट हुई और कहा कि प्रभु मैं यंहा अकेले नही रहूंगी ।
तब गंगा जी के निवेदन पर भगवान शिव वंहा त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप ने स्थापित हुए।

सारांश Conclusion:

विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान पे आस्था नही छोड़नी चाहिए, और कुछ गलत होने पर भी कुछ सही होने का संकेत होता है।


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01 January, 2019

काशी विष्वनाथ की कथा vishwanath jyotirling story.

काशी विष्वनाथ:

उत्तरप्रदेश में पवित्र गंगा नदी के किनारे स्थित काशी विष्वनाथ मंदिर एवम स्थान का बहुत बड़ा महत्व है भारत के इतिहास में भी। ये मंदिर भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक तो है ही परंतु भगवान शिव का सबसे प्रिय स्थान भी है। ये स्थान कई ऋषियों मुनियो की तपो भूमि और कर्म भूमि रही है। आयुर्वेद से भी इस स्थान का बहुत गहरा नाता है। इस कारण भारतीय इतिहास में ये बहुत खाश है।
मान्यता के अनुसार इस स्थान को श्वम भगवान शिव ने बसाया था, और प्रलय की स्थित में भी ये स्थान में कुछ नही होता क्योंकि इसे भगवान शिव अपने त्रिशूल में धारण कर लेते है।

कहा जाता है जो इंसान यंहा गंगा नदी में स्नान कर ले और विष्वनाथ जी के दर्शन कर ले उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, और इस स्थान में मृत्यु की प्राप्ति होने पर मोक्ष के साथ साथ भगवान शिव का सानिध्य प्राप्त हो जाता है।

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा:

शिवपुराण के अनुसार भगवान विष्णु और व्रह्मा में श्रेष्ठ होने की बहस छिड़ गई थी तब शिव जी मे अग्नि स्तम्ब का रूप लिया और दोनों में छोर खोजने को कहा।
तब ब्रह्मा जी मयूर पर बैठ कर ऊपर तथा विष्णु जी बाराह का रूप लेकर नीचे की तरफ गए।
परंतु किसी को छोर प्राप्त नही हुआ, परंतु व्रह्मा जी गलती कर दी अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बोल दिया कि मैंने छोर खोज लिया।
तब वो अग्निस्तम्भ शिवलिंग रूप को प्राप्त हुआ और स्वम् शिव जी प्रगट हुए और ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि आपको कभी पूजा नही जाएगा।
वही शिवलिंग विष्वनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

सारांश Conclusion:

भगवान भोलेनाथ की महिमा से काशी मोक्षप्राप्ति के लिए सबसे उत्तम स्थान है। शिव जी के स्थान में मृत्यु के पश्चात यंहा दाहसंस्कार का नियम है कहा जाता है यंहा पर दाह संस्कार से इन्सान को मोक्ष मिलता है।


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