भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

19 August, 2019

नटराज कि प्रतिमा में भगवान शिव के पैरों में पड़े "अपस्मार" की कथा। Story of Apasmaar and Lord Shiv.

अपस्मार की कथा जो भगवान शिव से जुड़ी है:

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अपस्मार एक बौना था जो अज्ञानता और मिर्गी का प्रतिनिधित्व करता था। उन्हें मुयालका या मुल्याकन के रूप में भी जाना जाता है। दुनिया में ज्ञान को संरक्षित करने के लिए, अपस्मार को नहीं मारा जा सकता था। अगर ऐसा करने के लिए ज्ञान और अज्ञान के संतुलन को बाहर कर दिया जाएगा - जैसा कि अपस्मार को मारने का मतलब होगा प्रयास, समर्पण और कड़ी मेहनत के बिना ज्ञान प्राप्त करना। नतीजतन, यह सभी रूपों में ज्ञान के अवमूल्यन के लिए प्रेरित करेगा। 

आपस्मरा को वश में करने के लिए, भगवान शिव ने नटराज - नृत्य के भगवान के रूप को अपनाया और एक अलौकिक नृत्य का प्रदर्शन किया। इस नृत्य के दौरान, नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपसमार दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।




अपस्मार और भगवान शिव और माता आदिशक्ति की कथा:


कुछ पौराणिक कथाओ के अनुसार एक बार अपस्मार जो कि एक बौना राक्षस था और उसके पास कई शक्तियां थी, उसने अपनी शक्तियों के मद में माता आदिशक्ति पे एक ऐसे मंत्र का प्रयोग किया जिससे माता आदिशक्ति की समस्त शक्तियां चिह्रीं हो गयी। 
हालांकि यह बहुत कम समय के लिए हुआ था परंतु महादेव उसके इस कृत्य से बहुत क्रोधित हुए। और उन्होंने नटराज का रूप रखकर अलौकिक नृत्य करने लगे ।



महादेव के प्रचंड तांडव और डमरू कर ध्वनि से अपस्मार के मस्तिस्क की नसें फटने लगी और वो महादेव के चरणों मे आकर गिर गया। नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपस्मार का दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।

17 August, 2019

माता सती की कथा और दक्ष प्रजापति जो शिवजी के ससुर थे। Story of Daksh prajapati and mata sati .

दक्ष प्रजापति और माता सती की कथा:

स्वायम्भुव मनु की तीन पुत्रियाँ थीं – अकुति, देवहूति और प्रसूति। इनमें से प्रसूति का विवाह दक्ष नाम के प्रजापति से हुआ। दक्ष को 16 कन्याओं की प्राप्ति हुई। इनमें से एक थी ‘सती’ जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था, उनको किसी संतान की प्राप्ति नहीं हुई, क्योंकि उन्होंने युवावस्था में ही अपने पिताजी के यहाँ देह का परित्याग कर दिया था।
यह कथा शिवमहापुराण के साथ साथ कई पुराणों में वर्णित है। इसमें दक्ष प्रजापति का भगवान महादेव के प्रति उत्पन्न हुई गलत भावनाओं के कारण हुआ था।



दक्ष प्रजापति का भगवान शिव पर क्रोधित होना और श्राप देना:

एक दिन दक्ष प्रजापति त्रिदेव से मिलने गए जहाँ पर उनके जाने पर कोई भी उठकर खड़ा नही हुआ, दक्ष ने सोचा- मेरे आने पर ये खड़ा नहीं हुआ, ये कितना उद्दंड है। मैंने तो अपनी मृगनयनी बेटी का विवाह इस मरकट-लोचन के साथ कर दिया इसको तो कोई सभ्यता, शिष्टाचार ही नहीं। इस तरह से दक्ष ने भगवान शिव को बहुत अपशब्द बोले और खूब गाली-गलोच किया। जब दक्ष ने देखा की उसकी गाली देने के बाद भी शिवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है, तब उसने हाथ में जल लेकर शाप दे दिया- ‘आज के बाद किसी यज्ञ में तुम्हारा हिस्सा नहीं होगा।’ भगवान शिव तब भी कुछ नहीं बोले। दक्ष ऐसा शाप देकर सभा से चला गया।

दक्ष प्रजापति से नही रहा गया और उन्होंने शिवजी को और अपमानित करने की एक योजना बनाई , और एक बहुत विशाल यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने समस्त देवताओं और संसार के समस्त ऋषि मुनियों को बुलाया परंतु भगवान भोलेनाथ को नही बुलाया।

हरिद्वार में कनखल नामक स्थान पर यज्ञ का आयोजन है। सारे देवता कैलाश पर्वत से होकर आ रहे हैं तो सती और भगवान शंकर को प्रणाम करके जा रहे हैं।
सती ने पूछा- कहाँ जा रहे हो?
उन्होंने कहा- तुम्हारे पिता के घर यज्ञ है और तुम हमसे पूछ रही हो, कहाँ जा रहे हो?
देवता चले गये, इधर सती ने भगवान शंकर से प्रार्थना की। बोलने में तो चतुर हैं, कहती हैं- प्रभो ! “आपके ससुर के यहाँ” जिससे आपका संबध ज्यादा जुड़ जाये तो शायद चल पड़े। बोलने की चतुराई है।
भगवान शिव मौन हैं। वे जानते हैं क्या घटना हुई है। बताने से सती को सिर्फ दुःख ही होगा। सती कहती हैं- निमंत्रण नहीं मिला, इसलिए शायद आप जाना नहीं चाहते हैं। शास्त्रों में विधान है- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के भी जा सकते हैं। जब सती भगवान शिव को शास्त्र का विधान बताने लग गई तो भगवान शंकर को हँसी आ गई। भगवान शंकर सोचने लग गये- सारे संसार को उपदेश मैं करता हूँ। आज ये सती मुझे शास्त्र का विधान बता रही है।
शिवजी ने सती को समझाया- देवी ! तुम ठीक कहती हो- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के जा सकते हैं। पर यदि जानबूझकर निमंत्रण नहीं दिया गया हो तो बिल्कुल नहीं जाना चाहिये, क्योंकि उसके अन्दर कोई न कोई द्वेष है। वहाँ जाने से भलाई नहीं होगी। अत: मेरी सलाह है- तुमको अपने पिता के यहाँ इस समय नहीं जाना चाहिये।
इतना कहकर भगवान शंकर मौन हो गये। क्योंकि पता है- दक्ष पुत्री है- अपनी बुद्धि बहुत चलाती है,पता नहीं मानेगी या नहीं।
सती के अन्दर द्वन्द्व चल रहा था। पति की याद आये तो अन्दर, पिता की याद आये तो बाहर। समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ? ऐसे अन्दर बाहर कर रहीं थी। फिर उनको गुस्सा आ गया। भगवान शंकर की और लाल-लाल नेत्रों से देखते हुए, बिना बताये चल पड़ीं।
भगवान शंकर ने गणों को आदेश दिया- तुम्हारी मालकिन जा रही है, तुम भी साथ में जाओ। नंदी को ले जाओ और सामान भी ले जाओ, क्योंकि ये अब लौटने वाली नहीं है।

जब माता सती अपने पिता का घर पहुची तो उनका बहुत किया गया और भगवान शिव के लिए अनुचित कथन कहे गए जिसको सुनकर माता को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना देह त्याग दिया।

ये समाचार जब नारद जी को मिला, नारद जी ने भगवान शिव को बताया- प्रभु ! सती की ये दशा हुई है।
अब भगवान शिव को रोष आया। शिव जी को अपने अपमान पर क्रोध नहीं आया पर आज सती का अपमान हुआ तो भयंकर क्रोध आया। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और जमीन पर पटक दी उससे एक विलक्षण पुरुष प्रकट हुआ जिसके तीन नेत्र थे, भयंकर विशाल शरीर वाला था, हाथ में त्रिशूल लिये-‘ये वीरभद्र भगवान थे।’
वीरभद्र ने शिव जी को प्रणाम किया और बोला- क्या आदेश है?
शिवजी ने कहा- एक ही आदेश है। दक्ष को मार डालो, यज्ञ को विध्वंस कर दो।
वीरभद्र जी उत्तराखंड होते हुये हरिद्वार की तरफ पहुँचे। अपरान्ह का समय था। दोपहर के तीन बज रहे थे, यजमान लोग विश्रामशाला में थे। पंडित और देवता लोग यज्ञशाला में थे। वहाँ जाकर वीरभद्र ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया। यज्ञशाला के डंडे उखाड़ दिये, बाँसों से यजमानों की, देवताओं की, पंडितो की पिटाई की। यज्ञ में भगदड़ मच गयी। वीरभद्र ने चार लोगों को पकड़ लिया। एक तो यजमान दक्ष को, एक आचार्य भृगु जी को (जो यज्ञ करा रहे थे) और दो देवता जो शिव के विरोधी थे, ‘पूषा’ और ‘भग’ ।
सबसे पहले दक्षिणा आचार्य को मिली। शास्त्रों में कहा है- आचार्य को डबल दक्षिणा दी जाती है। उनके दाड़ी और मूंछ एक साथ उखाड़ दिए क्योंकि वो अपनी बड़ी-बड़ी दाड़ी फटकार करके शिव जी को सजा देने के लिए इशारा कर रहे थे।
अब पूषा के दांत निकाल दिये, क्योंकि जब दक्ष शिव जी को गाली दे रहा था, पूषा अपने बड़े-बड़े दांत निकाल कर हँस रहा था। इसका अर्थ है यदि हम अपने शरीर की किसी भी इन्द्रिय का उपयोग दूसरों के अहित के लिये करेंगे तो वो अंग बेकार हो जायेगा।पूषा ने दांतों का दुरुपयोग किया।
भग देवता की आँखे निकाल ली क्योंकि वो दक्ष को आँखों से इशारा कर रहा था- और गाली दो, और गाली दो।
अब वीरभद्र ने दक्ष के गले पर तलवार मारी पर वो मरा नहीं। वीरभद्र ने भगवान शिव का ध्यान किया और दक्ष की गर्दन मरोड़कर तोड़ डाली। फिर उसके सिर को हवनकुण्ड में भस्म कर दिया।
इस तरह से दक्ष का यज्ञ विध्वंस हो गया। विध्वंस इसलिए हुआ क्योंकि ये यज्ञ धर्म की दृष्टी से नहीं था, ये तो शिव जी के अपमान के लिये था।
यहाँ सिखने की बात है यदि किसी कार्य का आरम्भ गलत भाव रखकर किया जाये तो वह कार्य सफल नहीं होता है। ऐसे बहुत से काम होते हैं- बाहर से दिखाई देगा जैसे ये धर्म का काम हो रहा है, पर उनका उद्देश्य गलत होने से वो अधर्म का काम होता है। यज्ञ विध्वंस होने के बाद ब्रह्मा जी सभी देवताओं को लेकर शिव जी के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना करने लगे।

पुनः दक्ष प्रजापति को जीवित करना:


भगवान शंकर के पिता हैं ब्रह्मा जी। शिव जी बोले – पिता जी! आप प्रार्थना मत करिये। आप आज्ञा करिये, क्या करना है?
ब्रह्माजी ने कहा- देखो यजमान को जीवित कर दो। दक्ष, यज्ञ पूरा किये बिना मर गया है। भृगु जी की दाड़ी-मूंछ अभी तक नहीं आयी है, उनको दाड़ी-मूंछे आ जाएं, ऐसी व्यवस्था कर दो। पूषा को दांत मिल जाये। भग देवता को आँखे मिल जाये। बस हम इतना ही मांगते हैं।
भगवान शिव हमेशा अपनी मस्ती में रहते हैं। बोले- अभी कर देता हूँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है। अपने एक गण को बोला- किसी बकरे का सिर काट कर ले आओ। बकरे का सिर ही क्यों मँगाया? हाथी का, शेर का किसी का भी मँगा लेते। भगवान शिव ने सुना था कि नन्दीश्वर ने दक्ष को शाप दिया है की अगले जन्म में ये बकरा बनेगा। भगवान शिव ने सोचा- अगले जन्म में क्यों, इसी जन्म में बना देता हूँ। बकरे का सिर मंगाया और दक्ष के शरीर में जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। दक्ष जीवित हो गया, उसने भगवान की स्तुति की और क्षमायाचना की।


25 July, 2019

मुचुकुन्द कि कथा। Story of Muchukund.

मुचुकुंद की कथा:

महाराज मुचुकुन्द राजा मान्धाता के पुत्र थे। ये पृथ्वी के एक छत्र सम्राट थे। बल और पराक्रम इतना कि देवराज इन्द्र भी इनकी सहायता के इच्छुक रहते थे। उनके पराक्रम का लोहा सभी मानते थे।

एक बार असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। दुखी होकर देवताओं ने महाराज मुचुकुन्द से सहायता की प्रार्थना की। देवराज की प्रार्थना स्वीकार करके वे बहुत समय तक असुरों से युद्ध करते रहे। बहुत समय पश्चात देवताओं को शिव जी की कृपा से स्वामी कार्तिकेय के रूप में योग्य सेनापति मिल गये।

देवराज इन्द्र ने महाराज से कहा –राजन् ! आपने हमारी बड़ी सेवा की। आप हजारों वर्षों से यहाँ हैं। अतः अब आपकी राजधानी का कहीं पता नहीं है। आपके परिवार वाले सब काल के गाल में चले गये। हम आप पर प्रसन्न हैं। मोक्ष को छोड़ आप कुछ भी वर माँग लें, क्योंकि मोक्ष देना हमारी शक्ति से बाहर है।

उन्होंने कहा – देवराज ! मैं यह वरदान माँगता हूँ कि मैं जी भर सो लूँ, कोई विघ्न न डाले।जो मेरी निद्रा भंग करे, वह तुरंत भस्म हो जाय।




देवराज ने कहा –ऐसा ही होगा, आप पृथ्वी पर जाकर शयन कीजिए। जो आपको जगायेगा, वह तुरंत भस्म हो जायगा। महाराज मुचुकुन्द भारतवर्ष में आकर एक गुफा में सो गये। सोते सोते उन्हें कई युग बीत गये। द्वापर आ गया, भगवान ने श्रीकृष्ण के रूप में यदुवंश में अवतार लिया। 

जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा में थे उसी समय कालयवन ने मथुरा को घेर लिया। उसे मरवाने की नियत से और महाराज मुचुकुन्द पर कृपा करने की इच्छा से भगवान श्री कृष्ण कालयवन के सामने से छिपकर भागे। भागते भागते भगवान उस गुफा में घुसकर छिप गये, जहाँ महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। भगवान ने अपना पीताम्बर धीरे से उन्हें ओढ़ा दिया और आप छिपकर तमाशा देखने लगे।

कालयवन गुफा में आया और महाराज को ही भगवान कृष्ण समझकर दुपट्टा खींच कर जगाने लगा। महाराज जल्दी से उठे। सामने कालयवन खड़ा था, दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया ।

अब तो महाराज इधर उधर देखने लगे। भगवान के तेज से गुफा जगमगा रही थी। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को मंद मंद मुस्कराते हुए देखा। देखते ही वे समझ गये कि ये साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, वे भगवान के चरणों में लोट पोट हो गये।
भगवान ने उन्हें उठाकर छाती से लगाया, भाँति भाँति के वरों का प्रलोभन दिया; परंतु उन्होंने यही कहा -प्रभो ! मुझे देना है तो अपनी भक्ति दीजिए। भगवान ने कहा –अब अगले जन्म में तुम सब जीवों में समान दृष्टि बाले ब्राह्मण होओगे, तब तुम मेरी जी खोलकर उपासना करना। वरदान देकर भगवान अन्तर्धान हो गये



22 July, 2019

दधीचि के दान और त्याग कि कथा। Story of Dadhichi.

महर्षि दधीचि की कथा:


प्राचीन काल में एक परम तपस्वी हुए, जिनका नाम महर्षि दधीचि था। उनके पिता एक महान ऋषि अथर्वा जी थे और माता का नाम शांति था। महिर्षि दधीचि बालब्रह्मचारी तथा जितेन्द्रिय थे। लोभ, भय उन्हें छू तक नहीं गया था। वे त्याग के साथ-साथ अन्याय का प्रतिकार करना भी जानते थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शिव की भक्ति में व्यतीत किया था।

वे एक ख्यातिप्राप्त महर्षि थे तथा वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, परोपकारी और बहुत दयालु थे। उनके जीवन में अहंकार के लिए कोई जगह नहीं थी। वे सदा दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहते थे। जहां वे रहते थे, उस वन के पशु-पक्षी तक उनके व्यवहार से संतुष्ट थे। वे इतने परोपकारी थे कि उन्होंने असुरों का संहार के लिए अपनी अस्थियां तक दान में दे दी थी। आइए पढ़ें परोपकारी महर्षि दधीचि की लोक कल्याण के लिए किए गए परोपकार की कथा:



एक बार लोकहित के लिए कठोर तपस्या कर रहे महर्षि दधीचि के तप के तेज से तीनों लोक आलोकित हो उठे, लेकिन इन्द्र के चेहरे का तेज जाता रहा, क्योंकि उसे लगा कि महर्षि उससे इंद्रासन छीनना चाहते हैं। इसलिए उसने तपस्या भंग करने के लिए कामदेव और एक अप्सरा को भेजा, लेकिन वे विफल रहे।

तब इन्द्र उनकी हत्या के इरादे से सेना सहित वहां पहुंचा। लेकिन उसके अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तप के अभेद्य कवच को भेद न सके और वे शांत भाव से समाधिस्थ बैठे रहे। हारकर इन्द्र लौट गया। इस घटना के बहुत समय बाद वृत्रासुर ने देवलोक पर कब्जा कर लिया।

पराजित इन्द्र और देवता मारे-मारे फिरने लगे। तब प्रजापिता ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वृत्रासुर का अंत महर्षि दधीचि की आस्थियों से बने अस्त्र से ही संभव है। इसलिए उनके पास जाकर उनकी अस्थियां मांगो। इससे इन्द्र पसोपेश में पड़ गया।

वह सोचने लगा कि जिनकी हत्या का प्रयास कर चुका था, वह उसकी सहायता क्यों करेंगे। लेकिन कोई उपाय न होने पर वह महर्षि के पास पहुंचा और झिझकते हुए बोला- महात्मन्‌, तीनों लोकों के मंगल हेतु हमें आपकी आस्थियां चाहिए।

महर्षि विनम्रता से बोले- देवेंद्र, लोकहित के लिए मैं तुम्हें अपना शरीर देता हूं। इन्द्र आश्चर्य से उनकी ओर देख ही रहे थे कि महर्षि ने योग विद्या से अपना शरीर त्याग दिया। बाद में उनकी अस्थियों से बने वज्र से इन्द्र ने वृत्रासुर को मारकर तीनों लोकों को सुखी किया।

लोकहित के लिए महर्षि दधीचि ने तो अपनी अस्थियां तक दान कर दी थीं, क्योंकि वे जानते थे कि शरीर नश्वर है और एक दिन इसे मिट्टी में मिल जाना है।

तत्पश्चात अपने शरीर पर मिष्ठान का लेपन करके महर्षि समाधिस्थ होकर बैठ गए। कामधेनु ने उनके शरीर को चाटना आरम्भ कर दिया। कुछ ही देर में महर्षि के शरीर की त्वचा, मांस और मज्जा उनके शरीर से विलग हो गए। मानव देह के स्थान पर सिर्फ उनकी अस्थियां ही शेष रह गई।

इंद्र ने उन अस्थियों को श्रद्धापुर्वक नमन किया और उन्हें ले जाकर उन हड्डियों से ‘तेजवान’ नामक वज्र बनाया। तत्पश्चात उस वज्र के बल पर उसने वृत्रासुर को ललकारा। दोनों के मध्य भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन वृत्रासुर ‘तेजवान’ वज्र के आगे देर तक टिका न रह सका। इंद्र ने वज्र प्रहार करके उसका वध कर डाला। देवता उसके भय से मुक्त हो गए।



20 July, 2019

कैसे आया भीम में दस हजार हाथियों का बल। How Bheem get 1000 Elephants Power.

भीम का परिचय:

महाभारत की कथा में पांच पांडव में से एक थे भीमसेन, वे महाराज पांडु के पुत्र थे। भीम एक बहुत बलशाली योद्धा था। महाभारत में भीम के बारे में बताया गया है कि भीम में दस हजार हाथियों के समान बल था। एक बार भीम ने अकेले ही अपने बल से नर्मदा नदी का प्रवाह रोक दिया था। भीम में इतना बल आने के पीछे एक रोचक गाथा है।



कैसे आया भीम में दस हजार हाथियो का बल?


पांडव और कौरव एक साथ बड़े हुए , कौरवों के बड़े भाई दुर्योधन के मन में भीम के प्रति दुर्भावना पैदा हो गई। तब उसने उचित अवसर मिलते ही भीम को मारने का विचार किया।

दुर्योधन ने एक बार खेलने के लिए गंगा तट पर शिविर लगवाया। उस स्थान का नाम रखा उदकक्रीडन। वहां खाने-पीने इत्यादि सभी सुविधाएं भी थीं। दुर्योधन ने पाण्डवों को भी वहां बुलाया। एक दिन मौका पाकर दुर्योधन ने भीम के भोजन में विष मिला दिया। विष के असर से जब भीम अचेत हो गए तो दुर्योधन ने दु:शासन के साथ मिलकर उसे गंगा में डाल दिया। भीम इसी अवस्था में नागलोक पहुंच गए। वहां सांपों ने भीम को खूब डंसा जिसके प्रभाव से विष का असर कम हो गया। जब भीम को होश आया तो वे सर्पों को मारने लगे। सभी सर्प डरकर नागराज वासुकि के पास गए और पूरी बात बताई।




तब वासुकि स्वयं भीमसेन के पास गए। उनके साथ आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया। आर्यक नाग भीम के नाना का नाना था। वह भीम से बड़े प्रेम से मिले। तब आर्यक ने वासुकि से कहा कि भीम को उन कुण्डों का रस पीने की आज्ञा दी जाए जिनमें हजारों हाथियों का बल है। वासुकि ने इसकी स्वीकृति दे दी। तब भीम आठ कुण्ड पीकर एक दिव्य शय्या पर सो गए।

जब दुर्योधन ने भीम को विष देकर गंगा में फेंक दिया तो उसे बड़ा हर्ष हुआ। शिविर के समाप्त होने पर सभी कौरव व पाण्डव भीम के बिना ही हस्तिनापुर के लिए रवाना हो गए। पाण्डवों ने सोचा कि भीम आगे चले गए होंगे। जब सभी हस्तिनापुर पहुंचे तो युधिष्ठिर ने माता कुंती से भीम के बारे में पूछा। तब कुंती ने भीम के न लौटने की बात कही। सारी बात जानकर कुंती व्याकुल हो गई तब उन्होंने विदुर को बुलाया और भीम को ढूंढने के लिए कहा। तब विदुर ने उन्हें सांत्वना दी और सैनिकों को भीम को ढूंढने के लिए भेजा।

उधर नागलोक में भीम आठवें दिन रस पच जाने पर जागे। तब नागों ने भीम को गंगा के बाहर छोड़ दिया। जब भीम सही-सलामत हस्तिनापुर पहुंचे तो सभी को बड़ा संतोष हुआ। तब भीम ने माता कुंती व अपने भाइयों के सामने दुर्योधन द्वारा विष देकर गंगा में फेंकने तथा नागलोक में क्या-क्या हुआ, यह सब बताया। युधिष्ठिर ने भीम से यह बात किसी और को नहीं बताने के लिए कहा।

25 June, 2019

जब भगवान राम धरती से गए तब हनुमान कहाँ थे। Story of Hanuman When Ram leave earth.

भगवान राम के अंत समय मे हनुमान कहाँ थे?

हम सब जानते है हनुमानजी भगवान राम के सबसे बड़े भक्त थे, अतः उन्हें भक्त शिरोमणि कहा जाता है। हनुमान जी जब से भगवान राम से मिले कभी उनसे दूर नही हुए। वो सुग्रीव के मंत्रिमंडल में जरूर रहते थे परंतु नित भगवान श्रीराम की सेवा में भी उपस्थित रहते थे। लेकिन जब भगवान राम का धरती में समय खत्म हो गया और वो सरयू में समाधि लेकर वैकुंठ चले गए तब उनके प्रिय भक्त हनुमान उपस्थित नही थे। तो जानते है कहाँ थे हनुमान:





कथा के अनुसार जब भगवान राम से मिलने काल आया और उसने यह सूचना दी कि आपने धरती पर रहने का जितना समय सुनिश्चित किया था वह पूर्ण होने वाला है, तो भगवान को एक चिंता हो गयी कि वो हनुमान को कैसे समझाएंगे क्योंकि हनुमान जी तो मानने वाले नही है और न ही भगवान से दूर रह सकेंगे, साथ ही हनुमानजी चिरंजीवी है अतः धरती पर उनका रहना भी जरूरी है।

अतः भगवान ने एक दिन अपनी एक अंगूठी जिसमे राम नाम अंकित था उसे धरती की एक दरार में गिरा देते है। जिसको खोजने के लिए हनुमान जी अति लघुरूप रख कर कूद जाते है। अंगूठी को खोजते खोजते वो पाताल लोक पहुंच जाते है, जहाँ उन्हें एक साधू मिलता है जो भोजन पका रहा था। हनुमान जी प्रतीक्षा करने लगते है कि साधु बाबा का भोजन हो जाय और फिर वो उनसे अंगूठी के बारे में पूछें।

परंतु वो साधु पहले एक रोटी बनाता फिर उसको खाता फिर दूसरी रोटी बनाता फिर उसको खाता । बार बार उसको ऐसा करते देख हनुमानजी से रह नही गया और उन्होंने उससे इस तरह भोजन का रहस्य पूछा।  महात्मा बोले कि अगर मैं सारी रोटियां बनाता हूँ और मृत्यु आजाए तो ब्यर्थ हो जाएगा, अतः मैं ऐसा कर रहा हूँ। 

हनुमानजी ने जब अंगूठी के बारे में पूंछा तो महात्मा एक स्थान की तरफ इशारा करते हुए बोले कि वहां देख लो अपनी अंगूठी। हनुमानजी ने देखा कि वहां तो अंगूठियों का ढेर लगा हुआ है जिसमे सब एक जैसी अंगूठी है और सब मे राम नाम अंकित है। जब हनुमानजी ने महात्मा से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि हर बार युग की समाप्ति पर एक अंगूठी ऊपर से गिरती है और उसे खोजने एक वानर आता है। जब वो वापस जाता है तो श्री राम धरती पर से जा चुके होते है। 

महात्मा ने हनुमानजी बताया कि समय चक्र की तरह घूमता रहता है, एक के बाद दूसरा और हर बार एक के बाद दूसरा युग के आता है वो सभी पात्र और समय। यही हर बार भगवान धरती पर अवतार लेते है और अपनी लीला करते है और अब तुमको भी उनके वचनों का पालन करना चाहिए।



24 June, 2019

गणेश जी और तुलसी की कथा। Story Of Ganesh and Tulsi in hindi.

श्री गणेश और तुलसी को एक साथ नही रखा जाता साथ ही गणेश पूजन में तुलसी के पत्तों का प्रयोग नही होता:


गणेश पूजन में कभी तुलसी नहीं रखी जाती, इसका कारण है तुलसी का गणेश जी के लिए एकतरफा प्रेम। आइए जानें ये कथा:-



एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था।

इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। तुलसी श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई और उनके मन में गणेश से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हुई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया।


श्री गणेश द्वारा अपने विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने से देवी तुलसी बहुत दुखी हुई और आवेश में आकर उन्होंने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दे दिया। इस पर श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा। एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण राक्षस से होगा। उन्‍होंने भी तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर के साथ होगा, इसके बाद तुलसी को अपनी गलती का आभास हुआ। 

उन्‍होंने गणेश जी से माफी मांगी। गणेश जी ने उन्‍हें माफ करते हुआ कहा कि वे एक पूजनीय पौधा बनेंगी। पर उनकी पूजा में तुलसी का कभी प्रयोग नहीं किया जाएगा। बाद में तुलसी का विवाह शंखचूड़ नामक असुर से हुआ, जिसे जालंधर के नाम से भी जाना जाता है।
किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।




19 June, 2019

तिरूपति बालाजी कि कथा, तथा क्यों चढ़ावा देने कि प्रथा है इस मंदिर में। Story of Tirupati Balaji.

तिरुपति बालाजी मंदिर कि मान्यताये:

भगवान वेंकटेश्वर का दक्षिण भारत में तिरुपति स्थित अति विशिष्ट एवं हिन्दू धर्म मे आस्था रखने वालों का महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान वेंकटेश्वर बालाजी भगवान विष्णु के अवतार है जिन्होंने महालक्ष्मी रूपी माता पद्दमावती से विवाह किया था। 
यह मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है क्योंकि यहां पर चढ़ावा चढ़ाने की विशेष मान्यता है। मान्यता है कि भगवान ने कुबेर से बहुत बड़ा कर्ज लिया था जिसे उन्होंने कलयुग के अंत तक चुकाने को कहा था अतः भक्तों के द्वारा चढ़ावा दिया जाता है ताकि भगवान का कर्ज जल्द पूरा हो जाय।




भक्तों का एवं जगत के पालक भगवान पर ऐसा कर्ज कैसे है जो उन्हें कलयुग के अंत तक चुकाना है और इसकी कथा क्या है ये जाने।

तिरुपति बालाजी की कथा:


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान एक समय भगवान विष्णु अपने धाम में छिरसागर पर शेषनाग की सय्या पर ध्यान मग्न थे और माता लक्ष्मी उनकी सेवा में थी। तभी महान तपस्वी महाऋषि भृगु वहां आये और भगवान विष्णु द्वारा उनका स्वागत न करने पर वो क्रोधित हो गए और भगवान विष्णु के छाती पर लात मारी और बोले मैं  तेरे घर आया और तू सो रहा है।

भगवान विष्णु तुरंत महर्षि भृगु के चरण पकड़ लिए और कहने लगे हे महर्षि मेरी छाती अति कठोर है, आपको कही चोट तो नही आई। 





महर्षि भृगु तो परीक्षा ले रहे थे, अतः उन्होंने अपना उद्देश्य बताया कि वो भगवान विष्णु के साहस और सहनशीलता की परीक्षा ले रहे थे और उन्हें ये पता चल गया कि विष्णु जी ही श्रेष्ठ है और अग्रपूज्य है। फिर वो वहां से चले गए।

भगवान विष्णु के ऊपर भृगु के इसतरह के वर्ताव से माता को कस्ट हुआ और विष्णु जी द्वारा ऋषि को दंड न दिए जाने का क्रोध हुआ। अतः माता लक्ष्मी क्रोधित होकर वैकुण्ठ छोड़ कर पृथ्वी पर चली गयी।

भगवान भी उनको खोजते पृथ्वी पर आए तो पता चला कि वो एक राजा की यहा पुत्री पद्दमावती रूप में अवतार ले चुकी है, अतः भगवान ने भी वेंकटेश्वर रूप में अवतार लिए। और बड़े होने पर पद्दमावती से शादी का प्रस्ताव रखा।

शादी के खर्च के लिए वेंकटेश्वर रूपी भगवान के पर धन नही था, अतः उन्होंने भगवान व्रह्मा एवं महेश को साक्षी बनाकर कुबेर से धन कर्ज के रूप में लिया और कहा कि वो ये कर्ज कलयुग के अंत तक कर देंगे और उसका सूत भी देगे।

इसी लिए इस मंदिर में धन का दान देने की मान्यता है, भक्तों का मानना है कि ताकि भगवान का कर्ज जल्द खत्म हो जाय। लेकिन सत्य ये है कि इतना धन होने पर भी भगवान कर्ज में है। क्योंकि उनके वो कर्ज कलयुग के अंत तक देना है।






16 June, 2019

पांडवो के द्वारा स्वर्ग कि यात्रा। Pandavon ki Swarg Yatra.

क्यों की थी पांडवो ने स्वर्ग कि यात्रा:

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के अनुसार जब यादवों का अमूच विनास हो गया था, तथा भगवान श्री कृष्ण का भी पृथ्वी से अपने धाम जा चुके थे और उनकी नगरी द्वारिका समुंदर में डूब चुकी थी, तब वहां के नगर निवासी स्त्रियों, बूढो और बच्चों के लेने अर्जुन गए ताकि इनको सकुशल इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर में रह सके। जब अर्जुन लौट रहे थे तो कुछ लुटेरों ने उनपर हमला कर दिया, अर्जुन ने उनसे अकेले युद्ध किये परंतु उनका दिव्य ज्ञान लुप्त हो चुका था तथा उनका अक्षय तरकस भी खाली हो गया था। इस कारण वो लुटेरों से जीत नही पाए और लुटेरे कई स्त्रियों को उठा ले गए।
जैसे तैसे अर्जुन बाकियों को लेकर हस्तिनापुर आये, और महाऋषि व्यास से मिलने अपने भाईयों के साथ गए। वेदव्यासजी ने पांडवों को बताया कि आपलोगो का तथा भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य एवं समय खत्म हो चुका है। अतः आपका दिव्य ज्ञान और दिव्यअस्त्र लुप्त हो गया है और अब आपलोगो को भी स्वर्ग की यात्रा करनी चाहिए। युधिष्ठिर ने परीक्षित को राजा बनाकर, द्रोपदी और बाकी भाईओं के साथ स्वर्ग की यात्रा सुरु की।



पांडवो की स्वर्ग यात्रा:

पांडव अपनी यात्रा में कई पर्वतों , नदियों, सागरो और सारी पृथ्वी का भ्रमण करके हिमालय के तल पर पहुचे उनके साथ एक कुत्ता भी चल रहा था। तभी अग्नि देव आये और बोले कि अस्त्रों के साथ आप नही जा सकते अतः सभी ने अपने अस्त्र उनको दे दिया।
अपने स्वर्ग के चढ़ान में सबसे पहले द्रोपती मूर्छित होकर गिरी, भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो युधिष्ठिर बोले वो हम पांचों में से अर्जुन को अधिक प्रेम करती थी इसलिए ऐसा हुआ।
आगे चलकर सहदेव गिरा , भीम के द्वारा कारण पूछने पर युधिष्ठिर बोले इसे अपने ज्ञान और विवेक सिलता का अहंकार था अतः ये गिरा। उसे भी वही छोड़ कर आगे बढ़े तो नकुल गिरा, फिर युधिष्ठिर बोले इसे अपने रूप सौंदर्य का अभिमान था अतः ये गिरा।




आगे चलकर अर्जुन गिरा, उसका कारण युधिष्ठिर ने उसका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का अहंकार बताया। फिर भीम गिरे उनका कारण उनका सर्वसक्तिशाली होने का अहंकार बताया।
अंत मे युधिष्ठिर और उनके साथ चलने वाला कुत्ता बचा, तभी इंद्र अपना रथ लेकर पहुचे और युधिष्ठिर को साथ मे चलने को बोले, युधिष्ठिर ने कहा कि मार्ग में मेरे भाई और पत्नी गिर गए थे उन्हें भी साथ लीजिए। इंद्र ने कहा कि वे सब देह त्यागकर अपने लोक तक पहुच चुके है। फिर युधिष्ठिर ने साथ चल रहे कुत्ते को भी साथ ले जाने को कहा तो इंद्र ने इनकार कर दिया, परंतु युधिष्ठिर नही माने और कहा कि ये हमारे साथ सारी यात्रा में था अतः इसके बिना मैं नही जायूँगा। युधिष्ठिर कि बात सुनकर कुत्ता अपने वास्तविक रूप में आ गया वो वास्तव में काल था।



युधिष्ठिर रथ में बैठे और स्वर्ग पहुचे जहाँ पर दुर्योधन सहित सभी कौरव थे परन्तु पांडव नही थे, युधिष्ठिर ने कहा कि जहाँ मेरे भाई है मुझे वहा ले चलो। दूत युधिष्ठिर को नरक के रास्ते से लेकर गए जहाँ घोर अंधेरा था, भयंकर दुर्गंध थी और कंकाल एवं चीख पुकार का सोर था। युधिष्ठिर को वह स्थान बहुत खराब लगा और बार बार बोल रहे थे कि मुझे मेरे भाईओं के पास ले चलो।
कुछ देर बाद वहां इंद्र आदि देवता आ गए उनके आते ही वहा का वातावरण अच्छा हो गया , उजाला फैल गया और वातावरण खुसबूदार हो गया। उनके भाई भी आसान में मुस्कुराते हुए बैठे दिखाई दिए। इंद्र ने बताया की महाभारत युद्ध के दौरान अश्वस्थामा के विषय मे जो झूठ तुमने बोला था उसी के लिए तुम्हे कुछ देर के लिए नरक कि तकलीफ देखनी पड़ी।
अंत मे युधिष्ठिर देवनदी गंगा में स्नान करके अपना देह त्याग किया और परमधाम को प्राप्त किया। महाभारत की कथा भी यही तक है और यही पर समाप्त हुई है।





29 May, 2019

देवऋषी नारद कि कथा: जब उनका मुख वानर का हो गया था। Story of Devrishi Narad.

देवऋषी नारद को जब अहंकार हो गया था:

अहंकार और घमंड हो जाने पर बुद्धि कुटिल हो जाती है, फिर अच्छे बुरे और धर्म-अधर्म का ज्ञान भंग हो जाता है। इससे मनुष्य तो क्या देवता भी नही बच पाते है। ऐसी ही कथा है देवऋषी नारद कि है जब उनको अपने ज्ञान तथा तपोबल का अहंकार हो गया था, और भगवान शिव कि कृपा से भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त का अहंकार दूर किया था। 
देवऋषी नारद कि इस कथा में उनका मुख वानर का हो गया था। तथा उन्होंने भगवान विष्णु सहित शिवजी के दो पार्षदों को भी श्राप दे दिया था। यह कथा शिवमहापुराण के अलावा और भी जगह वर्णित है।


देवऋषी नारद को अहंकार ग्रसित होना और चूर होने की कथा:


देवऋषी नारद भगवान विष्णु के परम भक्त होने के साथ साथ ज्ञानी, योगी एवं उन्हें तपोवल से शिध्दिया प्राप्त थी। देवऋषी नारद वृहमचारी थे, उन्होंने विवाह नही करने कि प्रतीज्ञा ले रखी थी। वे कभी एक जगह में स्थिर नही रहते थे सदा तीनो लोको में भ्रमण किया करते थे। 

एक दिन वो हिमालय के पास से गुजर रहे थे, जहां से गंगा नदी का उद्गम स्थल है। वहां का मनोरम दृश्य नारद जी को बहुत भा गया और उनके मन मे उसी स्थान पर अपने आराध्य के लिए तप करने कि प्रेरणा हुई। अतः नारद जी उसी स्थान पर तप में लीन हो गए।

जब यह बात देवराज इंद्र को पता चली की देवऋषी नारद तपस्या में लीन है तो इंद्र को संदेश हुआ कि कही नारद भगवान विष्णु को प्रसन्न करके उनके इंद्र लोक का सिंहासन न मांग ले। इंद्र देव ने नारद कि तपस्या को तोडने के लिये कामदेव को भेजा। कामदेव ने बहुत कोशिश की नारद जी के तपस्या को भंग करने के लिए, लेकिन वो असफल हो गए। कामदेव के द्वारा कई बार प्रयत्न करने पर भी जब सफलता नही मिली तो कामदेव डर गए कि असफल होकर वो देवराज के पास कैसे जायेगे। अतः वो देवऋषी नारद से तपस्या रोकने की प्राथना करने लगे।

देवऋषी नारद ने कामदेव की प्राथना मान ली और तप को रोक दिया। लेकिन उनको इस बात का बहुत अभिमान हो गया कि उनपर कामदेव का कोई प्रभाव नही हुआ और उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली।
वो अहंकार बस अपना गुणगान करने कैलाश पर्वत पर भगवान भोलेनाथ के पास गए। भगवान शिवजी को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुए अहंकार दिख गया अतः उन्होंने देवऋषी को भगवान विष्णु के पास जाने को कहा। देवऋषी अपना गुणगान करने छिरसागर में गए भगवान विष्णु को सारी बात बताई तो भगवान को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुआ घमंड दिख गया। 

लेकिन वो अपने भक्त को ऐसे नही छोड़ सकते थे अतः उन्होंने देवऋषी के मार्ग में माया के द्वारा एक मनोरम नगर बना दिया। जहाँ पर उत्सव का माहौल था । नगर के राजा अपनी पुत्री के स्वमन्वर की तैयारी कर रहे थे। देवऋषी भी वहां पहुच गए। नगर के राजा में उनका स्वागत किया और अपनी पुत्री का भविष्य जानने के लिए उसका हाथ दिखाया।
राजा की कन्या इतनी सुंदर थी कि वो विश्व मोहिनी लग रही थी, उसका रूप यौवन देखकर देवऋषी नारद भवचक्के रह गए। और उसी कन्या से विवाह करने की कामना करने लगे।




इस कामना को लेकर वो अपने आराध्य देव भगवान विष्णु के पास गए और अपने मन की व्यथा बताई और कहा कि आप अपना स्वरूप दे दीजिए। भगवान विष्णु ने अपना शरीर तो दे दिया पर चेहरा वानर का दे दिया।

देवऋषी नारद अपना शरीर देखकर खुश हो गए और जा कर स्वयंवर सभा में बैठ गए। उनको लगा कि यह रूप देखकर विश्व मोहनी कन्या उनपर ही वरमाला डालेगी। लेकिन ऐसा नही हुआ और उसने उनकी तरफ देखा तक नही और वरमाला वही पर आए हुए राजा का वेष रखे भगवान विष्णु पर डाल दी।

देवऋषी नारद अपना वानर का चेहरा देखकर अति क्रोधित हो गए। और भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि "धरती पर मनुष्य रूप में जाना पड़ेगा और जिस तरह मेरी पत्नी नही बनने दिया उसी तरह उनको भी पत्नी वियोग का दुख भोगना पड़ेगा और जिस वानर का रूप देकर उपहास बनाया उन्ही वानरों की मदत लेनी पड़ेगी।"

बाद में जब भगवान की माया से बाहर आये और अपने दिए हुए श्राप पर दुख हुआ परन्तु भगवान विष्णु ने उनका श्राप स्वीकार किया और राम रूप में धरती पर अवतार लिया।





27 May, 2019

श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा कि कथा, और सुदामा दरिद्रता को प्राप्त क्यों हुए। Story of Sudama friend of Shrikrishna.

सुदामा का परिचय एवं चरित्र का संछिप्त वर्णन:

सुदामा ब्राह्मण कुल में जन्मे तथा भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र के साथ साथ भक्त थे। सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता उनके बाल्य काल मे उज्जैन स्थित संदीपनी ऋषि के आश्रम में विद्या अध्ययन के साथ हुई थी। सुदामा वेदों एवं पुराणो के ज्ञाता और विद्धवान थे, जो अपना जीवन बालको को विद्या देकर तथा भिक्षा मांगकर जीवन यापन करते थे। सुदामा को अपनी गरीबी और दरिद्रता पे जरा भी दुख नही था, बल्कि वो प्रसन्नता के साथ भगवान भजन और पूजन के साथ अपना जीवन यापन करते थे।





"सुदामा चरित्र" नामक काव्य-ग्रंथ है जो कवि नरोत्तमदास जी द्वारा अवधि भाषा मे रचित है। कवि नरोत्तमदास जी ने सुदामा के जीवन एवं चरित्र का उत्तम वर्णन किया है। साथ ही श्रीमद्भागवत कथा में भी सुदामा चरित्र का वर्णन किया गया है। सुदामा को निर्धनता का कोई दुख नही था लेकिन उनकी पत्नी द्वारा बार बार प्रेरित किये जाने पर वो अपने मित्र द्वारिकाधीश के पास गए, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने मित्र का स्वागत और बिना मांगे उनकी दरिद्रता को दूर किये जाने का मनोरम कथा है।

सुदामा की गरीबी या दरिद्रता का कारण:

सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के मित्र थे उन्होंने भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ सारी शिक्षा मुनि आश्रम में ग्रहण की थी। फिर वो इतने गरीब कैसे हो गए? इसकी कथा इस प्रकार है:

सुदामा और श्रीकृष्ण उज्जैन स्थित संदीपनी के आश्रम में ग्रहण कर रहे थे। उसी के पास नगर में एक गरीब ब्राह्मणी निवास करती थी। जो अपना जीवन भिक्षा मांगकर चलाती थी। एक ऐसा समय आया जब बहुत दिनों तक उसे भिक्षा नही मिली और वो केबल जलपान करके दिन बिताती थी। उसके बाद एक दिन उसे दो मुट्ठी चने मिले जिसे उसने एक पोटली में बांधकर सुबह भगवान को भोग लगाकर फिर खाने को रख दिये।
रात में उसकी झोपड़ी में चोर घुस गए और उसकी पोटली यह सोचकर कि इसमें धन होगा, चुराकर ले गए। तभी नगर में चोरी खबर फैल गयी और लोग चोरों के पीछे भागने लगे। चोर भागकर मुनिआश्रम में छुप गए। और सुबह होने से पहले भाग गए। लेकिन चने की पोटली वही गिर गयी।



उधर जब ब्राह्मणी ने सुबह देखा कि चने की पोटली चोरी हो गयी तो उसने श्राप दे दिया कि "जो भी मेरे चने खाये वो दरिद्रता को प्राप्त हो जाय"।
गुरु आश्रम में वह पोटली गुरुमाता को मिल गयी और उन्होंने वो चने सुदामा को दे दिये जब वो रोज की तरह लकड़ी काटने जा रहे थे। भिन्न भिन्न मतों का मानना है कि वो चने जानकर या अनजाने में सुदामा खा गए और दरिद्रता को प्राप्त हो गए।




25 May, 2019

द्रोपदी के जन्म कि कथा। Draupadi Birth Story.

द्रौपदी का परिचय:

महाभारत में पांडवों कि पत्नी और राजा ध्रुपद कि पुत्री थी "द्रौपदी", जन्म से उनका नाम "कृष्णा" रखा गया है। द्रौपदी के भाई का नाम दृष्टद्युम्न था साथ ही भगवान श्रीकृष्ण को भी वो अपना भाई मानती थी। द्रौपदी का स्थान पंचकन्याओं में भी है। यह एक आम धारणा है कि महाभारत युद्ध का सबसे बड़ा कारण द्रौपदी है, जो कि सर्बदा गलत है। क्योंकि जब अधर्म कि ताकत बढ़ जाती है तो उसका अंत करने के लिए धर्म को आगे आना पड़ता है, उसी अधर्म पे धर्म का विजय के लिए महाभारत युद्ध हुआ।




द्रौपदी के जन्म की कथा:

राजा द्रुपद और पांडवों के गुरु आचार्य द्रोण मित्र थे। एक बार द्रोणाचार्य को कुछ गायों कि जरूरत थी क्योंकि उन्हें अपने पुत्र को दूध पिलाना था। परंतु ध्रुपद नरेश ने न तो गाय दी अपितु उनका बहुत अनादर किया। जब द्रोणाचार्य द्वारा कौरवों और पांडवों की शिक्षा पूर्ण हुई तो, सभी ने गुरु दक्षिणा मांगने के लिए कहा। तो द्रोणाचार्य ने बताया कि कैसे ध्रुपद ने उनका अनादर किया था अतः उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाए जाने का गुरुदक्षिणा मांगा। 

सबसे पहले दुर्योधन अपनी अगुवाई में कौरव सेना लेकर ध्रुपद के राज्य में चढ़ाई की परंतु विजय प्राप्त नही हुई। उसके बाद पांडव बिना किसी सेना के रण में गए और ध्रुपद को हराकर बंदी बनाकर गुरु के पास ले आये। द्रोणाचार्य ने ध्रुपद का आधा राज्य लेकर छोड़ दिया।

ध्रुपद को इस हार से बहुत दुख हुआ और उन्होने एक शक्तिशाली पुत्र कि कामना से एक यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिसके द्वारा द्रोणाचार्य का वध हो सके। 
यज्ञ के अंत मे यज्ञ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम दृष्टद्युम्न रखा गया और साथ मे एक दिव्य कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम "कृष्णा" रखा गया जो बाद में "द्रोपदी" और "पांचाली" नाम से जानी गयी।

द्रोपदी के पूर्व जन्म का वरदान:

पूर्व जन्म में द्रोपदी एक ऋषि कन्या थी जो तेजस्वी थी। परंतु उनको कोई अपनी पत्नी नही बना रहा था। तो उन्होंने भगवान शिवजी की तपस्या करने लगी। तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी प्रगट हुए और द्रोपदी से वरदान मांगने को कहा।
द्रोपदी ने शिवजी से पाँच अलग अलग गुण वाले पुरुष से पति के रूप में मिलने का वरदान मांगा। शिवजी बोले तुमने जिन पांच गुण वाले पुरुष कि कामना कि है वो एक पुरुष में होना संभव नही है, पर तुमने वरदान मांगा है तो तुम्हारा विवाह पांच पुरुषो से होगा जिनके जो सर्व गुनी होंगे। शिवजी ने द्रोपदी को चीर कुमारी होने का वरदान दिया था।

द्रोपदी ने जो पति के गुण मागे थे वो थे कि उनका पति सत्यवादी हो, सर्वशक्तिमान हो, सबसे बड़ा धनुर्धर हो, सबसे अधिक सुंदर हो, तथा सबसे अधिक गभीर रणनीतिकर हो। 

द्रोपदी का विवाह:

द्रोपदी एक दिव्य कन्या थी अतः उनके विवाह के लिए ध्रुपद नरेश ने एक स्वयंवर रखा जिसमे एक दिव्य धनुष में प्रत्यंचा चढ़ाकर, मछली कि आंख में तीर मारना था वो भी नीचे तेल में देखकर।
आर्यावर्त के सभी वीर उस स्वयंवर में आये पर धनुष नही उठा सके, केवल कर्ण ने ऐसा किया पर द्रोपदी ने कर्ण का सूद्र पुत्र होने की वजह से विवाह से इनकार कर दिया था। अर्जुन जो एक मुनिवेश मे आये थे उन्होने स्वयंवर जीतकर द्रोपदी से विवाह किया। बाद में कुंती के वचन को मानकर द्रोपदी पांचों पांडवो की पत्नी बनी।

द्रोपदी और भगवान श्रीकृष्ण का रिश्ता:

द्रोपदी भगवान श्रीकृष्ण को अपना भाई, मित्र और आदर्श मानती थी। तथा जब शिशुपाल का वध करने के लिए सुदर्शन चक्र भगवान कृष्ण के छोड़ा तो उनकी उंगली कट गयी, तब द्रोपदी ने अपना पल्लू फाड़कर उनकी उंगली में बंधा था। भगवान श्रीकृष्ण ने भी जब द्रोपदी का चिर हरण हो रहा था तो अपनी माया से द्रोपदी कि लाज बचाई थी।




20 May, 2019

कालिदास के जीवनकाल कि कथा एवं मुख्य रचनायें। Story of Kalidas and top Compositions.

कालिदास का जीवन परिचय:

भारतीय साहित्य के महानतम कवि एवं नाटककारों में संस्कृत भाषा के एक महान साहित्यकार थे "कालिदास"। महाकवि कालिदास जी ने राष्ट्र को चेतना और स्वर देने का कार्य किया था। कालिदास जी ने भारतीय पौराणिक कथाओं को प्रेरणा एवं जीवन और दर्शन को आधार बनाते हुए अनेक रचनाएँ की थी। कालिदास की रचनाओं में प्रेम एवं श्रृंगार रस की प्रधानता पाई जाती है, उन्होने सरल भाषा मे अलंकृत रचनाये की थी। जन्म के स्थान तथा काल को लेकर कई मत भेद है, लेकिन उज्जैन से लेकर उनकी साहित्य में अधिक जुड़ाव है। साथ ही कालिदास जी विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे।
कालिदास जी कि अनेक साहित्यिक नाटकों में से उनकी रचना "अभिज्ञानशाकुन्तलम" को सर्वश्रेष्ठ रचना एवं कवि के रूप में "मेघदूतम" शर्वश्रेष्ट रचना मानी जाती है।


कालिदास के जीवनकाल से जुड़ी कहानी:

कालिदास कि एक चर्चित कथा है जिसमे उनके विवाह तथा ज्ञान प्राप्ति के बारे में बताया जाता है। कालिदास जी कि पत्नी का नाम विद्योत्तमा था। विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दिया तो हार को अपमान समझकर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। 
चलते चलते उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जहां पर एक व्यक्ति जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। उन्होंने सोचा कि इससे बड़ा मूर्ख तो कोई मिलेगा ही नहीं। उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा और कहा- "मौन धारण कर लो और जो हम कहेंगे बस वही करना"। उन लोगों ने स्वांग भेष दिलाकर विद्योत्तमा के सामने प्रस्तुत किया कि हमारे गुरु आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए ये हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर हम वाणी में उसका उत्तर आपको देंगे। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे। 
प्रथम प्रश्न विद्योत्तमा ने किया संकेत में एक उंगली दिखा कर कि ईस्वर एक है। परन्तु कालिदास ने समझा कि ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है। क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत किया इस भाव से कि तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों फोड़ दूंगा। तभी विद्वानों ने तर्क दिया कि आप कहना चाहती ईस्वर एक है लेकिन गुरुदेव कह रहे है "ईस्वर एक है पर उसके दो रूप है आत्मा और परमात्मा"।
राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया कि तत्व पांच है। तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया कि तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी, मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। विद्वानों ने समझाया कि गुरु कहना चाह रहे हैं कि भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी जल आकाश वायु अग्नि। परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते। परन्तु आपस में मिलकर एक होकर उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। 
इसके पश्चात राजकुमारी अपनी हर मान जाती है और विवाह हो जाता है। परंतु विवाह के पश्चात राजकुमारी को पता चल जाता है कि यह कोई ज्ञानी नही और छल से मेरा विवाह हुआ है। लेकिन वो सोचती है ज्ञानी न सही पर ये किस जाति का है पता करना चाहिए, और वो एक ऐसे कमरे में ले जाती है जहाँ सभी जातिओं से जुड़ी तस्बीरे लगी होति है, कालिदास सभी को गौर से देखते है पर एक चरवाहे की तस्बीर को उत्सुकता से देखने लगते है। राजकुमारी को क्रोध आता है और वो खिड़की से धक्का देती है, कालिदास नीचे गिरते है और उनकी जिव्हा कटकर पास में काली की प्रतिमा कर गिरती है। माता काली प्रसन्न होकर वरदान देने लगती है, कालिदास अपनी पत्नी का नाम रट रहे होते है जो देवी को विद्या सुनाई पड़ा और विद्या का वरदान दे दिया।
ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा - कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी)। विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा -- अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है)।
कालिदास जी ने अपनी पत्नी को ही अपना गुरु माना और इन्ही वाक्यो से अपनी रचनाएँ की।


कालिदास की प्रमुख रचनाओं का वर्णन:

कालिदास जी की अनेक रचनाएँ है परन्तु मुख्य रूप से उनकी सात रचनाओं को श्रेय दिया जाता है। जिसमे तीन नाटक , दो महाकाव्य, दो खण्डकाव्य है।


कालिदास के प्रमुख तीन नाटक

१) मालविकाग्निमित्रम्

कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र से प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।

२) अभिज्ञान शाकुन्तलम् 

कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। 
इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है।

३) विक्रमोर्वशीयम् 

एक रहस्यों भरा नाटक है। इसमें पुरूरवा इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम करने लगते हैं। पुरूरवा के प्रेम को देखकर उर्वशी भी उनसे प्रेम करने लगती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने जाती है तो पुरूरवा से प्रेम के कारण वह वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है। इससे इंद्र गुस्से में उसे शापित कर धरती पर भेज देते हैं। हालांकि, उसका प्रेमी अगर उससे होने वाले पुत्र को देख ले तो वह फिर स्वर्ग लौट सकेगी। विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौंदर्य और शिल्प से भरपूर है।

कालिदास रचित महाकाव्य:

१) कुमारसंभवम्  

कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।

२) रघुवंशम् 

कालिदास ने रघुकुल के राजाओं का वर्णन किया है।

कालिदास रचित खण्डकाव्य:



१) मेघदूतम् 

मेघदूत एक गीतिकाव्य है जिसमें यक्ष द्वारा मेघ से सन्देश ले जाने की प्रार्थना और उसे दूत बना कर अपनी प्रिय के पास भेजने का वर्णन है। मेघदूत के दो भाग हैं - पूर्वमेघ एवं उत्तरमेघ। नागार्जुना ने इसका हिंदी अनुवाद किया था।

२) ऋतुसंहारम् 

इसमें सभी ऋतुओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है।






19 May, 2019

पृथ्वी के आठ चिरंजीवी पुरुष जो आज भी जीवित है। Aath chirnjivi purush.

कौन है आठ चिरंजीवी महापुरुष:

अलग अलग पुराणो, कथाओं और मान्यताओं में कहा जाता है कि इस पृथ्वी पर आठ ऐसे महापुरुष है जो चिरंजीवी है अर्थात सदा के लिए जीवित है। इनसे कुछ पृथ्वी पर रक्षा के लिए जीवित है तो कुछ अपने किये के कारण श्राप वस जीवित है। ये महापुरुष है:

१) अश्वथामा
२) राजाबलि 
३) वेदव्यास 
४) हनुमान
५) विभीषण
६) कृपाचार्य
७) परशुराम 
८) मार्कण्डेय ऋषि

 


१) अश्वथामा:

अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचर्य के पुत्र हैं, तथा उनके मस्‍तक में अमरमणि विद्यमान है।  अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडवो के पुत्रो की हत्या की थी, तथा अभिमन्यु के पुत्र को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र छोड़ा था। जिस कारण भगवान कृष्ण ने उन्हें कालांतर तक अपने पापों के प्रायश्चित के लिए इस धरती में ही भटकने का श्राप दिया था। तथा मस्तक से मणि निकाल कर उस घाव को कभी न भरने और रक्त रिसाव करते रहे ऐसा श्राप दिया था।

२) राजा बलि:

राजा बलि प्रह्लाद के वंशज हैं। राजा बलि को महादानी के रूप में जाना जाता है। उन्होंने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया, अतः भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बनाया और अमरता का वरदान दिया। 

३) वेद व्यास:

ऋषि व्यास ने महाभारत जैसे प्रसिद्ध काव्य की रचना की है। उनके द्वारा समस्त वेदों एवं पुराणो की रचना हुई। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र हैं। ऋषि वेदव्यास भी अष्टचिरंजीवियो में शामिल हैं।

४) हनुमानजी:

सीता माता ने हनुमान को अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनाने पर वरदान दिया था की, वे सदेव अजर-अमर रहेंगे। हनुमान जी श्रीराम के दूत है तथा वो सदा इस पृथ्वी पर विचरण करते है और भक्तों की रक्षा करते है।

५) विभीषण:

श्री राम ने विभीषण को अजर-अमर रहने का वरदान दिया था। विभीषण ने भगवान राम की महिमा जान कर युद्ध में अपने भाई रावण का साथ छोड़ प्रभु राम का साथ दिया।

६) कृपाचार्य:

कृपाचार्य शरद्वान गौतम के पुत्र हैं। वन में शिकार खेलते हुए शांतु को दो शिशु मिले जिनका नाम उन्होंने कृपि और कृप रखा तथा उनका पालन पोषण किया। कृपाचार्य कौरवो के कुलगुरु तथा अश्वत्थामा के मामा हैं। उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवो को साथ दिया।

७) परशुराम:

परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था। परशुराम का पहले नाम राम था, लेकिन इस शिव के परम भक्त थे। उनकी कठोर तपश्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक फरसा दिया, जिस कारण उनका नाम परशुराम पड़ा।

८) मार्कण्डेय ऋषि

ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त हैं। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपश्या द्वारा महामृत्युंजय तप को शिद्ध कर मृत्यु पर विजयी पा ली और चिरंजीवी हो गए।




14 May, 2019

भगवान ब्रह्मा कि पूजा क्यों नही होती तथा उनका एक ही मंदिर क्यों है। Why only one temple of lord brahma.

भगवान ब्रह्मा की पूजा और मंदिर को लेकर विवाद क्यों:

वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अनेक ग्रंथों से यही निष्कर्ष निकलता है कि त्रिदेव ही श्रेष्ठ है जी है परम पिता तथा जगत की रचना करने वाले भगवान व्रह्मा, संसार के पालन कर्ता भगवान विष्णु तथा संहारक भगवान शिव शंकर। परंतु भगवान विष्णु और भगवान शिव के अनेक मंदिर स्थित है तथा घर घर मे इनकी पूजा-अर्चना की जाती है, साथ ही समस्त देवी-देवताओं की पूजा-आराधना की जाती है। लेकिन संसार के रचयिता भगवान व्रह्मा की पूजा क्यों नही होती तथा राजस्थान के पुष्कर में स्थिर एक मात्र विशेष मंदिर क्यों है, यह जानने की उत्सुकता होती है।




इसके अलग-अलग कारण तथा कथाये अलग अलग पुराणो में मिलती है जो इस प्रकार है:

१) शिव पुराण की कथा:

शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार परमात्मा शिव है जिनकी प्रेरणा से भगवान विष्णु का अवतरण हुआ तथा विष्णु जी के नाभि से एक कमल निकला जिशसे व्रह्मा जी का जन्म हुआ। अतः एक बार ब्रह्मा और विष्णु जी मे श्रेष्ठता का विवाद हो गया, तभी वहां एक अग्नि स्तंभ उत्पन्न हो गया तथा आकाशवाणी हुई कि जो इस स्तंभ के छोर को खोज लेगा वही श्रेष्ठ होगा। फिर दोनों देवता स्तंभ का छोर खोजने चल दिये, ब्रह्मा ऊपर तथा विष्णु नीचे की ओर गए।
बहुत समय बीतने के बाद भी जब छोर नही मिला तो दोनों लौट आये , तथा व्रह्मा जी मे झूठ बोला कि छोर मिल गया। तभी वह स्तंभ शिव रूप में परिर्वतित हो गया औऱ व्रह्मा जी का झूठ पकड़ा गया। इसी कारण उनकी पूजा नही होती।



२) पद्मपुराण की कथा:

कथा के अनुसार ब्रह्मा जी एक यज्ञ करना चाहते थे जिसमें उनकी पत्नी का रहना जरूरी था। उनकी पत्नी जिनका नाम "सावित्री" है जो किसी कारण वहां नही पहुच पाई और यज्ञ का समय बीत रहा था। अतः वृह्मजी ने एक ग्वाल की पुत्री "गायत्री" से विवाह कर लिए और यज्ञ करने लगे, तभी वहां सावित्री आ गयी।
अपने स्थान पर किसी अन्य स्त्री को देखकर वो क्रोधित हो गयी औऱ उन्होंने वृह्मजी को श्राप दे दिया कि उनकी इस संसार मे कई पूजा नही होगी और जो भी करेगा उसका विनाश हो जाएगा।
सभी देवता भयभीत हो गए और माता को शांत करने का प्रयत्न करने लगे, तब वो शांत होकर बोली मेरा कथन असत्य नही होगा परंतु इसी स्थान में इनकी पूजा हो सकती है। वही स्थान राजस्थान का पुष्कर मंदिर है।

३) तीसरी कथा:

यह कथा भी अनेक पुराणो में मिलती जी एक बार स्वर्ग की अप्सरा जिसका नाम "मोहिनी" था, वृह्मजी पर आसक्त हो गयी। और उन्हें रिझाने के लिए प्रयत्न करने लगी। 
वह उन्हें रिझाने के लिए नृत्य कर रही थी और जाकर उनके निकट बैठ गयी, तभी वहां शप्तऋषी आ गए। उन्होंने वृह्मजी से पूछा यह स्त्री कौन है तो वृह्मजी ने कहा कि यह एक अप्सरा है जो नृत्य कर रही थी और थक कर बैठ गयी है, ये मेरी पुत्री के समान है। शप्तऋषी तो अंतर्यामी थे उन्होंने घटना देख ली और चले गए।
परंतु अप्सरा मोहिनी क्रोधित हो गयी कि वृह्मजी ने उसका अपमान किया है, वो उनके सामने प्रेम प्रस्ताव लेकर आई थी और ब्रह्मा जी ने उसे पुत्री कह दिया। अतः उसने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया कि उनकी कोई पूजा नही करेगा।



11 May, 2019

एकलव्य की कथा जिसकी मृत्यु भगवान श्रीकृष्ण के हांथो हुआ। Story of Eklavya in hindi.

एकलव्य का जीवन परिचय:

महाभारत काल मे जन्मे अतिपराक्रमि धनुर्धर जो मात्र अपनी धनुर्विद्या से नही अपितु अपने गुरु को दिए गए गुरुदक्षिणा के कारण जाना जाता है वो है "एकलव्य"।




एकलव्य का जन्म प्रयाग के निकट श्रृंगवेरपुर नामक भील राज्य के राजा निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र रूप में हुआ, उनकी माता का नाम शुलेखा था। बचपन मे उनका नाम "अभय" था जो कि बढ़े होने पर वीरता के कारण एकलव्य हो गया। निषादराज का यह राज्य विशाल था जिसकी सीमाएं मथुरा, मगध , हस्तिनापुर आदि राज्यो को छूती थी।
एकलव्य के जीवन की दो घटनाये अधिक प्रचलित है, पहली उनकी विद्या अध्ययन एवं गुरु दकक्षिणा की तथा दूसरी श्रीकृष्ण के द्वारा हुई उनकी मृत्यु की।

एकलव्य की धनुर्विद्या एवं गुरुदक्षिणा:

जब एकलव्य युवा हुए तो उनके अंदर धनुर्विद्या को सीखने की लालसा भी बढ़ी और वो एक ऐसे गुरु की तलाश करने लगे जो उन्हें सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना दे। अतः उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य का चयन किया और निश्चय किया कि उन्ही से धनुर्विद्या सीखेंगे। 




परंतु एक बाधा थी कि गुरु द्रोणाचार्य केवल छत्रिय और व्राह्मण के बालको को ही विद्या देते थे। जब द्रोणाचार्य से विद्या लेने एकलव्य उनके आश्रम गए तो उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि तुम एक भील जाती के हो और मैं केवल छत्रिय और व्राह्मण के पुत्रों को विद्या देने का संकल्प कर चुका हूं। केलिन एकलव्य नही माना क्योंकि उसने द्रोणाचार्य को ही अपना गुरु मान लिया था। अतः उसने एक निर्जन स्थान पर गुरु द्रोण की प्रतिमा बनाकर उसी प्रतिमा से प्रेरणा लेकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा।

कुछ वर्षों बाद एक दिन जब गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन आदि अपने शिस्यों के साथ उस स्थान के नजदीक से गुजर रहे थे तो उनके साथ चलने वाला एक कुत्ता जोर जोर से भोक रहा था। अचानक किसी ओर से कुछ सब्द भेदी बान आये और कुत्ते के मुख में भर गए और कुत्ते का मुख बन्द हो गया। द्रोणाचार्य को बहुत अचंम्बा हुआ कि ये कौन है जो शब्द भेदी बाण चला रहा है। 

एकलव्य को खोजते वो लोग उस स्थान तक पहुच गए जहाँ पर एकलव्य अभ्यास कर रहा था। द्रोणाचार्य को आया देख एकलव्य ने उन्हें प्रणाम किया , तब एकलव्य से परिचय पूछते हुए आचार्य ने कुत्ते के मुख में बाण मारने का कारण पूछा। 

एकलव्य बोला इस कुत्ते की अबाज से उसके धनुर्विद्या के अभ्यास में विघ्न हो रहा था अतः उसने बाण चलाये, तथा अपना परिचय गुरु द्रोणाचार्य का शिष्य एकलव्य बताया। द्रोणाचार्य बोले मैने तो तुम्हे विद्या नही दी फिर तुम मेरे शिष्य कैसे हुए? तब एकलव्य ने सारी बात बताई की कैसे उसने धनुर्विद्या सीखी।

द्रोणाचार्य समझ गए कि एकलव्य मेहनती है और उसमें धनुर्विद्या की लालसा है और वो संसार का सबसे महान धनुर्धर बन सकता है। और क्योंकि उन्होंने अर्जुन को यह वचन दिया था कि उसे संसार का सबसे बड़ा धनुर्धर बनायेगे, अतः उन्होंने एकलव्य से छल किया और गुरुदक्षिणा देने को कहा।

एकलव्य तुरंत राजी हो गए गुरुदक्षिणा देने को क्योंकि उसके बिना गुरु विद्या सफल नही होती, ऐसे गुरु द्रोणाचार्य ने कहा।
उसके बाद द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया।

यह सुनते ही एकलव्य की आँखे छलक गयी पर वो बिना संदेह के अपने कमर में लटक रही कटार निकाल कर अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काट दिया और गुरु के चरणों मे समर्पित कर दिया।

एकलव्य की मृत्यु श्रीकृष्ण के हाथों क्यों हुई:

अंगूठे के बिना भी एकलव्य के धनुष चलना सीख लिए और धनुर्विद्या में पारंगत हो गया। पिता की मृत्यु के पश्चात वो राजा बना और मगध के राजा जरासंध से मित्रता कर ली, तथा उसी के लिए युद्ध करने लगा।

जब जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया तो एकलव्य भी साथ था, उसका युद्ध कौशक अद्भुद था, वो अकेला ही कई महारथियों पर भारी था। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि एक धनुर्धर जो केवल चार उंगलियों से बाण चला रहा है और सब पर भारी पड़ रहा है, तो ये आगे चल कर अर्जुन के लिए प्रतिद्वंद्वी हो सकता है। अतः उन्होंने अर्जुन प्रेम के कारण उसका युद्ध मे वध कर दिया।





10 May, 2019

नचिकेता की कथा। Story of Nachiketa.

नचिकेता का परिचय:

नचिकेता एक परम तेजस्वी ऋषिकुमार थे जिनके पिता का नाम वाजश्रव था। अपने तपोवल और हठ से यमराज को विवश करने वाले वो इतिहास के दूसरे व्यक्ति थे, इनके अलावा सती सावित्री ने किया था। वाजश्रवस पुत्र नचिकेता यमराज को विवश कर व्रह्माज्ञान एवं मृत्यु के रहस्यों का ज्ञान प्राप्त किया था। नचिकेता कि कथा का वर्णन कई ग्रंथों एवं पुराणो में मिलता है, कुछ जगह उनके पिता का नाम उद्दालक कहा गया है।





नचिकेता की कथा:

एक बार नचिकेता के पिता ने विश्वजीत नामक यज्ञ किया था जिसमे उंन्होने अपनी सारी संपत्ति दान देने का संकल्प किया था, अतः यज्ञ की समाप्ति के दिन चारो ओर से अनेक ऋषिमुनि पधारे हुए थे। परंतु यज्ञ की समाप्ति पर इनके पिता जब दान देना शुरू किए तो उन्होंने ऐसी गायों का दान देना शुरू किया जो बीमार , बूढ़ी और दूध देना बंद कर दी थी।

नचिकेता ने जब अपने पिता को ऐसा करते हुए देखा तो उन्हें दुख हुआ तथा उंन्होने अपने पिता के पास जाकर जिद की उन्हें भी किसी को दान दे, तथा बार बार अपने पिता को हठ करके पूछने लगे कि वो उनको किसे दान देंगे। बार बार पूछने पर उनके पिता परेशान होकर बोल दिए कि जा तुझे मृत्यु अर्थात यमराज को दान देता हूं।

पिता की इस बात को सुनकर नचिकेता तनिक भी दुःखी नही हुए और तुरंत यमपुरी की ओर प्रस्थान कर गए। बहुत परिश्रम के उपरांत वो यमपुरी पहुच गए वहां पर यमदूतों के द्वारा पूछे जाने पर नचिकेता ने बताया कि उनके पिता ने उनका दान यमराज को कर दिया है अतः वो उनसे मिलने आये है। दूतों ने बताया कि यमदेवता अभी यहां नही है तो नचिकेता ने यमदेव की प्रतीक्षा में बैठ गए।

प्रतीक्षा करते करते तीन दिन बीत गए औऱ जब तीन दिन बाद जब यमराज आये तो दूतों ने नचिकेता के बारे में बताया। यमराज नचिकेता के बारे में जानकर बहुत प्रसन्न हुए, और उन्होंने नचिकेता से तीन वरदान मांगने को कहा।

नचिकेता ने पहला वरदान मांगा की "उसके पिता का उसके प्रति क्रोध शांत हो जाय और वो पहले जैसे प्यार करने लगे"

यमराज ने तथास्तु कहा और मान गए।

नचिकेता ने दूसरा वरदान मांगा की "स्वर्ग कैसे प्राप्त हो उसका उपदेश दे"

यमदेव थोड़ा सकुचाये परंतु वो मान गए।

नचिकेता ने तीसरा वरदान मांगा "मृत्यु तथा आत्मा के रहस्य का उपदेश दे"

यमदेवता तो यह वरदान देने से मना किया बोले यह संसार का परम गोपनीय रहस्य है जिसका वर्णन किसी के सम्मुख करने की मनाही है, अतः उन्होंने ने नचिकेता को कहा कि वो कोई दूसरा वरदान मांग ले।

लेकिन नचिकेता इसी वरदान को पाने का हठ करने लगे, बाद मव उनके इस हठ से यमदेव हार गए और संसार का परम गोपनीय रहस्य का वर्णन नचिकेता के सम्मुख किया।




07 May, 2019

मनुस्मृति की विवेचना एवं मनुस्मृति पर आधुनिक विवादो के कारण। Description of Manusmriti.


क्या है "मनुस्मृति"? :


हिन्दू धर्म का प्राचीन धर्मशास्त्र है मनुस्मृति, यह उपदेश रूप में है जो मनु द्वारा ऋषियों को दिया गया था। इसे हिन्दू धर्म शास्त्र या मनुशंहता के नामों से भी जाना जाता है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव है। यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। मनु महाराज के जीवन और उनके रचनाकाल के विषय में इतिहास-पुराण स्पष्ट नहीं हैं। तथापि सभी एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि मनु आदिपुरुष थे और उनका यह शास्त्र आदिशास्त्र है।






मनुशंहता या मनुस्मृति स्वयंभुव मनु के द्वारा ही रचित है,  मनुस्मृति से यह भी पता चलता है कि स्वायंभुव मनु के मूलशास्त्र का आश्रय कर भृगु ने उस स्मृति का उपवृहण किया था, जो प्रचलित मनुस्मृति के नाम से प्रसिद्ध है। इस 'भार्गवीया मनुस्मृति' की तरह 'नारदीया मनुस्मृति' भी प्रचलित है।

मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हजार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है।

मनुस्मृति को लेकर विरोधाभास क्यों? :


भारत शुरू से ही बौद्धिक और अध्यात्मिक संघर्षों और समन्वयों की स्थली रहा है, मनुस्मृति एक ऐसा ग्रंथ है जो पहले स्वार्थी लोगों की मिलावट का शिकार हुआ और फिर हमारी राजनीति का।

मनुशंहता या मनुस्मृति नाम से अनेक रचनाये प्रचलित है, जिनमे श्लोकों और अध्याय की संख्या भिन्न है। अतः सिद्ध है कि अलग अलग समय मे इसकी रचना और संस्करण में श्लोकों का मिलावट और गवन किया गया है। यह मिलावट इतना हास्यास्पद है कि एक ही समय के दो श्लोकों के अर्थ  भावना एकदम भिन्न है।

आधुनिक राजनीतिक विवादों में मनुस्मृति को जिस तरह से अपमानित किया गया है वो निंदनीय है। यह स्पष्ट है कि अलग अलग समय में धर्माचार्यों ने अनेको धर्मग्रंथों की विवेचना और अनुवाद में अस्पस्टता और अलस्यता दिखाई है जिससे विवाद बढ़े है।






विरोधी जिन मुद्दों को लेकर विवाद रखते भी वो मुख्यतः है स्त्रियों और तथाकथित जातियों को लेकर कही गयी अन्याय पूर्ण बाते है। इन मुद्दों को गांधी जी ने भी माना था और इनको लेकर अम्बेडकर जी ने मनुस्मृति की एक प्रति को जलाया था, जिशसे राजनीतिक विवाद बढ़ा।

मनुस्मृति की रचना का काल भी पूर्ण रूप से सिद्ध नही है क्योंकि रामायण में भी मनुस्मृति की और श्लोक के अंश है परंतु मनुस्मृति में रामायण का कोई अंश नही है। अतः मूलतः मनुस्मृति कितना प्राचीन है शिद्ध नही है, तो फिर उसकी मूलप्रति तो असंभव है यानी मिलावट और तथ्यों से छेड़छाड़ संभव है।

अब अगर मूल विवादों की बात करे तो भारतीय संस्कृति में हर युग मे स्त्रियों को आदर दिया गया है हम देवताओं के साथ साथ देवियों की भी समान रूप से पूजा अर्चना करते है, तो हमारा धर्मग्रंथ उनके प्रति अपमानित और अन्याय पूर्ण बातों की कोई संभावना नही दिखाई देती।

दूसरा मुद्दा जो यह कहा जाता है कि मनुस्मृति द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था , जातीयता का कारण है। जबकि ऐसा बिलकुल नही है। वर्ण व्यवस्था मनुष्य के कर्म, छमता, बल और बुद्धि के आधार पर की गई थी। जिसपर जातीय ढांचा लोगो ने अपने अनुसार बनाया ।
जिस तरह ग्रंथो के अनुवाद में उनका भाव बदल दिया गया उसी तरह वर्ण व्यवस्था को जातीय व्यवस्था में बदला गया।


क्या निवारण है इन विवादों का?


ज्ञात है कि बाइबल और महाभारत जैसे धर्म ग्रंथो में भी मिलावट और व्याख्या में त्रुटि की गई है। तथा तुलसीदास जी जैसे महात्मा अगर रामायण प्रासंगिक अनुवाद नही करते तो उन्हें भी समझने में त्रुटि की जाती और गलत मतलब निकाले जाते।

जरूरत है कि इनका गहन अध्ययन और शोध हो, जब तक इनका ठीक से अनुवाद नही होगा विरोधाभास बढ़ता रहेगा। उसके बाद जो भी इसमे बुराईया हो उनको हटाया जाय, जिसमे किसी को भी आपत्ति न हो। क्योंकि ज्ञानी लोगो को अच्छाईयों को ग्रहण करके बुराइयों को अलग कर देना चाहिए।
ऐसे धर्म ग्रंथो को जलाना, उनपर गलत टिप्पणी करना या इनपर जूता या पैर रखकर अपमानित करना शर्मनाक है और जो लोग इन ग्रंथों पर किसी विशेष के ऊपर अन्याय की बात करते है वो इन ग्रंथों पर इस तरह का आचरण करे वह कौन सा न्याय है।

सदियों से कुछ कुरीतियों को मुद्दा बनाकर धर्म को बांटने का कार्य समाज मे होता आ रहा है, उसमे ऐसा करने वाले लोगो का निजी स्वार्थ होता है। जरूरत है कुरीतियों को हटाने का और एक जुट रहने का न कि आपस मे जातियों में विभाजित होने का।







02 May, 2019

भस्मासुर की कथा। Story of Bhasmasur and lord Shiva

भस्मासुर का परिचय:

भस्मासुर नामक असुर जिसने भगवान शिव की भक्ति करके वरदान प्राप्त किया था, उसकी विचित्र कथा प्रचलित है। भस्मासुर अन्य असुरों की तरह आततयी असुर था जो तीनो लोको में राज करना चाहता था। भस्मासुर का वध खुद उसके द्वारा ही हुआ था, जो भगवान विष्णु के मोहनी रूप के कारण हुआ था।



भगवान शिव और भस्मासुर की कथा:

पूर्व काल में भस्मासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था। उसको समस्त विश्व पर राज करना था। अपने इसी प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु वह शिव की कठोर तपस्या करता है। अंत में भोलेनाथ उसकी बरसों की गहन तपस्या से प्रसन्न हो कर उस के सामने प्रकट होते हैं।
शिव उसे वरदान मांगने के लिए कहते हैं। तब भस्मासुर अमरत्व का वरदान मांगता है। अमर होने का वरदान सृष्टि विरुद्ध विधान होने के कारण शंकर भगवान उसकी यह मांग नकार देते हैं। तब भस्मासुर अपनी मांग बदल कर यह वरदान मांगता है की वह जिसके भी सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाए।



शिवजी उसे यह वरदान दे देते हैं। तब भस्मासुर शिवजी को ही भस्म करने उसके पीछे दौड़ पड़ता है। जैसे तैसे अपनी जान बचा कर शंकर भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और उन्हे पूरी बात बताते हैं। भगवान विष्णु फिर भस्मासुर का अंत करने के लिए मोहिनी रूप रचते हैं।
भस्मासुर जब भटक भटक कर शिवजी को भस्म करने के लिए ढूंढ रहा होता है तब मोहीनी उसके समीप प्रकट हो आती है। उसकी सुंदरता से मुग्ध हो कर भस्मासुर वहीं रुक जाता है, और मोहिनी से विवाह का प्रस्ताव रख देता है। मोहिनी जवाब में कहती है कि वह नृत्य करके दिखाए तभी वो उसके साथ विवाह करेगी।




अब भस्मासुर को नृत्य आता नहीं था तो उसने इस कार्य में मोहिनी से मदद मांगी। मोहिनी तुरंत तैयार हो गयी। नृत्य सिखाते-सिखाते मोहिनी ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा और उसकी देखा-देखी भस्मासुर भी शिव का वरदान भूल कर अपना ही हाथ अपने सिर पर रख बैठा और खुद ही भस्म हो गया। इस तरह विष्णु भगवान की सहायता से भोलेनाथ की विकट समस्या का हल हो जाता है।

28 April, 2019

मोक्ष नगरी "गया" कि कथा। Moksha Tirth Gaya.

मोक्ष तीर्थ "गया" :

भारत के बिहार राज्य में स्थित स्थान "गया" हिन्दू परंपरा में मोक्ष का स्थान माना जाता है, इस स्थान पर अपने पूर्वजों, पितरों का तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य अपने पितृऋण से मुक्त हो जाता है और पूर्वजो को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष का अर्थ है कि मृत्यु को प्राप्त हुए पूर्वजों को भटकना न पड़े और नर्क की यातनाएं से मुक्ति पाकर सतगति को प्राप्त हो और भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ की प्राप्ति हो।



यही कारण है कि गया नामक इस स्थान पर सम्पूर्ण भारत और विश्व के अनेक स्थानों से लोग यहाँ पर आते है, और अपने पूर्वजों, पितरो, संबंधियों के लिये यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण आदि कार्य करते है।

क्यों है गया मोक्षदायिनी स्थान:

इसी स्थान में क्यों किया जाता है इसकी एक पैराणिक कथा है, जो 'गय' नामक असुर से जुड़ी हुई है। यह असुर भगवान विष्णु का परम भक्त था। गय असुर या गयासुर ने भगवान विष्णु की तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था कि उसका स्पर्श और दर्शन मात्र से मनुष्यों को मोक्ष और वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति हो जाएगी।



इस वरदान से पापी मनुष्य भी नरक और यमलोक की यातनाएं से मुक्त होकर सीधा वैकुण्ठ की प्राप्ति होने लगी। यमदेवता इस प्रकार से हो रहे कार्य के निवारण हेतु भगवान व्रह्मा के पास गए। व्रह्मा जी ने कहा कि यह वरदान भगवान विष्णु ने दिया है अतः उन्ही से इसके निवारण के मार्ग पुछना चाहिए। अतः सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने देवताओं की प्रार्थना से गयासुर से कहा कि समस्त देवता तुम्हारी पीठ पर यज्ञ आदि पुण्य कर्म करना चाहते है, वो मान गया। सभी देवताओं ने यज्ञ के लिए गए और एक बहुत विशाल सिला उसके ऊपर रख दिये जिसपर देवता अपना आसान बनाया। यज्ञ सुरु होते ही गयासुर का सर धड़ से अलग हो गया और शरीर हिलने लगा। तब भगवान विष्णु स्वयं उस शिला में प्रवेश कर गए।
भगवान विष्णु कार्य के अंत मे पसन्न होकर बोले इस सिला में हमेशा उनका वाश रहेगा और जो भी यह पर पुण्य कर्म करेगा वो उनको प्राप्त होगा। अतः वहां पर पितरो के लिए मोक्ष कार्य की परंपरा बनी। यह भी मान्यता है मनुष्य अपने जीवित रहते हुए भी भी अपना मोक्ष का तर्पण कर सकता है।