भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

21 March, 2019

होलिका दहन एवं होली के त्योहार की कथा। Story of Holi festival and holika dahan.

होली एवं होलिका दहन:

भारत का प्राचीन त्योहार है होली। रंगों का यह त्योहार सम्पूर्ण भारत मे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। साथ ही यह त्योहार भारत के विभिन्न भागों में अलग अलग रिवाजो के और मान्यताओं के साथ मनायी जाती है, और यह अनेकता में एकता का प्रतीक है। काशी में जहां चिता की भस्म से होली खेलने का रिवाज है वहीं मथुरा की बृज भूमि में अलग अलग दिनों में फूलों, रंगों के साथ लट्ठमार होली मनाई जाती है।फ़ागुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन और रंगों का यह त्योहार जो बसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है।




होलिका दहन की कथा:

मान्यता है कि हिरण्यकश्यप नाम का दानव था जो भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद जो भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, उसका वध करने के लिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नही सकती, अतः उसे आदेश दिया कि वो प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ जाये।
होलिका, प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ गयी परंतु भगवान विष्णु को स्मरण करते हुए भक्त प्रह्लाद को कुछ नही हुआ, अपितु होलिका जल कर भस्म हो गयी। उसी के प्रतीकात्मक रूप में होलिका दहन का उत्सव किया जाता है।

होली की कथा:

होली की दो कथाये प्रचलित है एक राधा-कृष्ण और दूसरी शिव-पार्वती से जुड़ी हुई। दोनों में बसंत ऋतु के आगमन पर उत्सव को मनाने का वर्णन है।


राधा-कृष्ण की कथा:

मान्यता है कि वृज की पावन भूमि में गोकुल और बरसाने के लोग इकट्ठे होकर कई दिनों तक वसंत ऋतु के आगमन पर यह होली का त्योहार मनाया करते थे। भगवान कृष्ण गोकुल और राधा रानी बरसाने से आते और होली मानते थे।



शिव-पार्वती की कथा:

हिमालय की पुत्री पार्वती भगवान शिव से विवाह हेतु बड़ी कठोर तपस्या करी थी, परंतु भोलेनाथ ध्यानमग्न थे। तभी देवताओं ने कामदेव को भगवान की साधना भंग करने और मनोरथ पूर्ण करवाने के लिए भेजा। कामदेव में काम बांड चलाया जिशसे भगवान की साधना भंग हो गयी परंतु वो अत्यंत क्रोधित हो गए और अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया।
सभी देवताओं और कामदेव की पत्नी रति के निवेदन पर कामदेव को जीवित कर दिया। और कामदेव के कार्य की प्रसंसा की, तभी से बसंत के आगमन पर जब कामदेव का मान अधिक होता है, यह होली का त्योहार मनाया जाता है।


20 March, 2019

माता वैष्णो देवी की कथा। Story of Mata Vaishnon Devi.

वैष्णो देवी तीर्थ स्थल :

माता वैष्णो देवी का मंदिर जम्मू और कश्मीर के कटरा नामक स्थान से 15 किलोमीटर दूर लगभग 5,200 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है। माता वैष्णो देवी का यह स्थान हिन्दू तीर्थो का अतिमहत्वपूर्ण स्थान है, अतः भारत के अलावा विश्व भर से भक्त एवं श्रद्धालु यहाँ पर पूरे साल आते है। रेल , रोड और विमान मार्ग से इस स्थान तक पहुँचा जाता है, तथा चढ़ाई चढ़ने हेतु कई साधन उपलब्ध है। मुख्य मंदिर के अलावा यहां पर बाण गंगा, अर्धकुमारी, तथा भैरव बाबा मंदिर आदि दार्शनिक स्थल है।




माता वैष्णो देवी की प्रशिद्ध कथा:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कटरा के पास एक ग्राम में श्रीधर नामक ब्राह्मण रहता था, जो निःसंतान होने के कारण दुखी रहता था। परंतु वह माता का बहुत बड़ा भक्त था अतः वो हमेशा नवरात्रि का व्रत रहता था और कन्या भोजन करवाता था।
एक बार श्रीधर के घर कन्या भोजन के लिए आई हुई कन्याओं में माता भी बालिका के स्वरूप में श्रीधर के घर पर आई जिनका नाम वैष्णवी था , तथा कन्या भोजन के उपरांत सभी कन्यायें चली गयी पर कन्या रूपी माता नही गयी। और उंन्होने श्रीधर से आग्रह किया कि वो समस्त ग्राम वासियो को भोजन के लिए आमंत्रित करें। श्रीधर उस दिव्य कन्या की बात को मानते हुए समस्त ग्राम वासियो को आमंत्रित किया तथा अपने गुरु गोरखनाथ जी को उनके शिस्यो सहित आमंत्रित किया, उनके शिस्यो में भैरवनाथ भी थे। श्रीधर इस बात से विचलित थे कि इतने लोगो को भोजन कैसे कराऊंगा।
समस्त ग्राम वासियो के साथ गुरु गोरखनाथ अपने शिष्यों के साथ वहां पर आये साथ मे भैरवनाथ भी थे। जब कन्या रूपी माता सबको भोजन परोस रही थी और कोई परेशानी नही आ रही थी, उंन्होने श्रीधर की लाज रख ली थी। उनके दिव्य रूप को देखकर भैरवनाथ को शक हो गया और वो बोलने लगे कि मैं मांस एवं मदिरा का भोजन करूँगा। बहुत प्रयत्न पर भी वो नही माने, और कन्या रूपी माता को पकड़ने के लिए भागे। परंतु माता गायब हो गयी और पर्वत के ऊपर चली गयी, भैरवनाथ भी उनके पीछे भागा। माता की रक्षा के लिए हनुमान जी आये, माता ने उन्हें बाहर रुककर अपना पीछा कर रहे भैरवनाथ को रोककर रखने को कहा तथा वो गुफा में प्रवेश कर गयी, उस स्थान को अर्धकुमारी कहा जाता है जहां पर माता ने 9 महीने तक तपस्या की थी।



माता का पीछा करते हुए भैरवनाथ आया और हनुमानजी के साथ भयानक युद्ध हुआ, जब वह युद्ध विकराल हो गया और हनुमानजी परास्त होने लगे तो माता अपने दिव्य काली के रूप में बाहर आई और भैरवनाथ का अपने त्रिशूल से मस्तक काट दिया।
मस्तक कट जाने के बाद भैरवनाथ को अपने कृत्य का बोध हुआ और उसने छमा मांगी, माता ने बताया कि "तपस्या से प्राप्त सक्तियों के कारण तुम्हे अहंकार हो गया था इसलिए तुम मुझे पहचान नही पाए, परंतु अब मैं प्रसन्न हूँ अतः मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी और दोनों की पूजा के उपरांत ही यात्रा पूर्ण कहलाएगी"।
अतः वैष्णो देवी की यात्रा में माता के मंदिर में स्थित तीन पिंडियों जो महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती का रूप है लोग दर्शन करते है और बाद में भैरवनाथ के दर्शन करते है, जो उस स्थान पर स्थित है जहां पर भैरवनाथ का कटा हुआ सर गिरा था।




19 March, 2019

अमरनाथ धाम से जुड़ी कथा। Story of Amarnath Dham.

अमरनाथ धाम Amarnath Dham

हिमालय में स्थित अमरनाथ धाम भगवान शिव का प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहां पर बने भगवान शिव के प्राकृतिक शिवलिंग का दर्शन एवं पूजन के लिए लाखों की संख्या में भक्तगण उस स्थान की यात्रा पर जाते है। कई पुराणों के साथ शिवमहापुराण में भी इसकी कथा का वर्णन किया गया है।माना जाता है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का गूढ़ रहस्य इसी स्थान पर सुनाया था। उन्होंने इस स्थान का चयन इसीलिखे किया था क्योंकि उस स्थान पर कोई नही रहेगा , तथा उन्होंने अपने साथ रहने वाले गणों और वासुकी नाग एवं गंगा को भी पीछे छोड़कर गए थे।




अमरनाथ की कथा:

एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभु आप तो अजर अमर है किंतु मुझे बार बार जन्म लेना पड़ता है, और बड़ी घोर तपस्या के पश्चात आपकी प्राप्ति होती है अतः आप समक्ष अमरत्व का गूंध रहस्य का वर्णन करे। भगवान शिव ने तो पहले टालने की कोशिश की परंतु माता पार्वती के हट के कारण विवश हो गए और निर्जन स्थान की तलाश में अमरनाथ के स्थान को चुना।
क्योंकि वो माता पार्वती को एकांत में इस रहस्य का वर्णन करना चाहते थे अतः उन्होंने अपने साथ रहने वाले पंचमहाभूत गण जैसे नंदी, नाग, गणेश, चंद्र, और गंगा को त्याग दिया।
नंदी को पहलगाम में, वासुकी नाग को शेषनाग लेख नामक स्थान , गणेश , चंद्रमा तथा माता गंगा को भी अलग अलग स्थान में तयाग कर उस निर्जन गुफा में प्रवेश किये।
भगवान शिव ने माता को अमरत्व की कथा का वर्णन करना सुरु किया और वो कथा को सुनाने में लीन हो गए, माता पार्वती को नींद आ गयी। उसी स्थान पर कबूतरों का एक जोड़ा था जो यह कथा सुन रहा था, तथा माता पार्वती के सोजाने पर हूं हूं कि आवाज कर रहे थे। भगवान भोलेनाथ कथा कहने में इतने लीन हो गए कि उन्हें पता ही नही चला।
कथा की समाप्ति के पश्चात उंन्होने देखा कि पार्वती जी सोगयीं है और कबूतर कथा सुन रहे थे तो उन्हें क्रोध आया और वो उन्हें मारने गए , परंतु कबूतरों का वह जोड़ा भगवान की शरण मे आ गया। भगवान ने उन्हें छमा कर वही सदा के लिए रहने को कहा।

16 March, 2019

महर्षि वाल्मीकि का जीवन और कथाये। Story of Maharishi Valmiki.

महाऋषि वाल्मीकि Maharishi Valmiki:

महाऋषि वाल्मीकि को "आदिकवि" एवं भगवान के तुल्य माना गया है। महाऋषि वाल्मीकि जी ने सर्वप्रथम संस्कृत भाषा मे माह काव्य "रामायण" की रचना की थी। भगवान राम के ऊपर आधारित उनकी यह रचना महाकाव्य रामायण को "वाल्मीकि रामायण" भी कहा जाता है। अपने महाकाव्य "रामायण" में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोलविद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञानी थे। वाल्मीकि जी ने यह "रामायण" की रचना भगवान राम के पृथ्वी पर रहते ही कर दी थी, तथा उन्होंने भविष्य की घटनाओं की भी व्याख्या कर दी थी क्योंकि वो त्रिकालदर्शी थे।

महाऋषि वाल्मीकि जी को रामायण की प्रेरणा:

एक बार वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि बहेलिये ने प्रेम-मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥'

हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।
उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य "रामायण" (जिसे कि "वाल्मीकि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है) की रचना की और "आदिकवि वाल्मीकि" के नाम से अमर हो गये।


महाऋषि वाल्मीकि का अन्य ग्रंथों के अनुसार जीवनपरिचय:

ऐसी प्रचलित कथा है कि महर्षि वाल्मीकि का मूल नाम रत्नाकर था और इनके पिता ब्रह्माजी के मानस पुत्र प्रचेता थे। एक भीलनी ने बचपन में इनका अपहरण कर लिया और भील समाज में इनका लालन पालन हुआ। भील परिवार के लोग जंगल के रास्ते से गुजरने वालों को लूट लिया करते थे। रत्नाकर ने भी परिवार के साथ डकैती और लूटपाट का काम करना शुरू कर दिया।
लेकिन ईश्वर ने इनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। एक दिन संयोगवश नारद मुनि जंगल में उसी रास्ते गुजर रहे थे जहां रत्नाकर रहते थे। डाकू रत्नाकर ने नारद मुनि को पकड़ लिया। इस घटना के बाद डाकू रत्नाकर के जीवन में ऐसा बदलाव आया कि वह डाकू से महर्षि बन गए। दरअसल जब वाल्मीकि ने नारद मुनि को बंदी बनाया तो नारद मुनि ने कहा कि, तुम जो यह पाप कर्म करके परिवार का पालन कर रहे हो क्या उसके भागीदार तुम्हारे परिवार के लोग बनेंगे, जरा उनसे पूछ लो। वाल्मीकि को विश्वास था कि सभी उनके साथ पाप में बराबर के भागीदार बनेंगे, लेकिन जब सभी ने कहा कि नहीं, अपने पाप के भागीदार तो केवल तुम ही बनोगे तो वाल्मीकि का संसार से मोह भंग हो गया। और उनके अंदर महर्षि प्रचेता के गुण और रक्त ने जोर मारना शुरू कर दिया और उन्होंने नारद मुनि से मुक्ति का उपाय पूछा।
नारद मुनि ने रत्नाकर को राम नाम का मंत्र दिया। जीवन भर मारो काटो कहने वाले रत्नाकर के मुंह से राम नाम निकल ही नहीं रहा था। नारद मुनि ने कहा तुम मरा-मरा बोलो इसी से तुम्हें राम मिल जाएंगे। इस मंत्र को बोलते-बोलते रत्नाकर राम में ऐसे रमे कि तपस्या में कब लीन हो गए और उनके शरीर पर कब दीमकों ने बांबी बना ली उन्हें पता ही नहीं चला। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने दर्शन दिए और इनके शरीर पर लगे बांबी को देखा तो रत्नाकर को वाल्मीकि नाम दिया और यह इस नाम से प्रसिद्ध हुए। ब्रह्माजी ने इन्हें रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी।

14 March, 2019

बाली और सुग्रीव के जन्म की रोचक कथा। Intresting Birth story of Bali and Sugriv.

बाली और सुग्रीव का परिचय Introduction of Bali and Sugriv:




बाली और सुग्रीव वानर कुल ने जन्मे परमवीर सगे भाई थे, जिनकी कथा का वर्णन रामायण में मिलता है। बाली और सुग्रीव के लौकिक पिता का नाम वानर राज ऋछराज था परंतु दोनों के औरस पिता अलग अलग थे, जहां बाली के औरस पिता देवराज इंद्र थे वही सुग्रीव के पिता सूर्य देव थे। दोनों भाई परम बलवान थे तथा इनके पराक्रम की कई कथाओ का वर्णन अनेक ग्रंथो एवं पुराणो में मिलता है। बाली की पत्नी का नाम तारा तथा पुत्र का नाम अंगद था। सुग्रीव कि पत्नी का नाम रूमा या रोमा था।
रामायण के अनुसार भगवान राम ने सुग्रीव से मित्रता की तथा बाली का वध करके उसका राज्य एवं पत्नी दिलवाए। और श्रीराम की अगुवाई में सुग्रीव की वानर सेना ने लंका में चढ़ाई कर युद्ध जीत कर माता सीता को मुक्त करवाया।


बाली और सुग्रीव की जन्म की कथा Birth Story of Bali and sugriv:


ऋछराज वानरों का राजा तथा बहुत ही वलवान एवं पराक्रमी था। वह अपने बल के मद में ऋषिमुख पर्वत के आसपास विचरता रहता था। उसी ऋषिमुख पर्वत के पास एक सरोवर था जिसमे स्नान करने से कोई भी व्यक्ति का शरीर सुंदर स्त्री का बन जाता था। यह बात ऋछराज को पता नही थी , अतः उसने एक दिन उत्साह में उस सरोवर में छलांग लगा दी। जब वह बाहर आया तो उसका स्वरूप एक अतिसुन्दर स्त्री का हो गया। उसे इस रूप को देखकर बहुत शर्म आयी परंतु वह कुछ नही कर सकता था।
उसी समय वहां देवराज इंद्र गुजर रहा था जिसकी नजर ऋछराज के स्त्री स्वरूप पर पड़ी और उसके सौंदर्य को देखकर स्खलित हो गये, तथा उसका वीर्य उस स्त्री के बालों पर गिरा जिससे बाली का जन्म हुआ।
वही अगले दिन जब सुर्योदय हुआ तो सूर्य देव भी उस स्त्री के सौंदर्य को देखकर मोहित हो गए और वीर्य स्खलित हो गया जो उस स्त्री में ग्रीवा(गर्दन या गला) में गिरा जिसके कारण सुग्रीव का जन्म हुआ।
उसके बाद ऋछराज ने उसी स्त्री स्वरूप में ही दोनों का पालन किया, जो उन दोनों बाली और सुग्रीव के पिता तथा माता थे परंतु दोनों इंद्र तथा सूर्य के औरस पुत्र थे।

13 March, 2019

रावण कि पत्नी मंदोदरी की कहानी। Story of Raven's wife Mandodri.

मंदोदरी का परिचय Introduction of Mandodri:

रावण कि पत्नी के रूप में मंदोदरी का परिचय दिया जाता है, तथा वर्णन भी रामायण तथा अन्य ग्रंथो में सीमित है। परंतु जानना चाहिये कि मंदोदरी पांच कन्याओं में से है जिन्हें चिर कुमारी होने का वरदान था। मंदोदरी मयासुर(मयदानव) की पुत्री थी तथा रावण के महावीर पुत्रों जैसे मेघनाथ और अचयकुमार आदि की माता थी। उनकी माता का नाम हेमा था। अद्दभुद रामायण के अनुसार उनका विवाह रावण कि मृत्यु के पश्चात विभीषण के साथ हुआ था। कुछ कथायों के अनुसार मंदोदरी पूर्व जन्म में एक अप्सरा थी जिन्हें माता पार्वती ने श्राप दिया था।


मंदोदरी के जन्म तथा विवाह की कथा Birth and marriage Story of Mandodari:


मंदोदरी के जीवन को रामायण सहित पुराणों में सीमित है क्योंकि वहां पर श्रीराम नायक है और कहानी माता सीता और रावण तक रहती है। परंतु मंदोदरी एक दिव्य कन्या थी और उनका योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण था।

उनके जन्म के विषय मे दो कथाये कही गयी है:

पहली कथा: मंदोदरी कि माता जिनका नाम हेमा था वो एक अप्सरा थी और स्वर्ग लोक में इंद्र की अप्सराओं में से थी। उनका रूप सौंदर्य बहुत सुंदर था। हेमा कि सुंदरता को देखकर मयासुर या मयदानव मोहित हो गया और विवाह का प्रस्ताव रखा। हेमा ने उनका प्रस्ताव माना और विवाह के उपरांत उनकी परम तेजस्वी पुत्री का जन्म हुआ जिसका नाम मंदोदरी था। मंदोदरी को चिर कुमारी होने का वरदान भगवान शिवजी से मिला था।


दूसरी कथा: इस कथा के अनुसार मंदोदरी पूर्व जन्म में एक अप्सरा थी जो एक दिन कैलास पर्वत में गयी तब भगवान शिव योग मुद्रा में थे। जहां पर वो भगवान भोलेनाथ को देखकर मोहित हो गयी और उन्हें रिझाने की कोशिश करने लगी परंतु भगवान शिव ध्यानमग्न ही रहे। उसी समय वहां माता पार्वती आ गयी और उन अप्सरा के शरीर मे भगवान की भस्म देखकर नाराज हो गयी और और मेढकी होने का श्राप दे दिया। बहुत छमा मांगने पर तथा शिवजी के आग्रह पर उन्होंने उसे 12वर्ष के लिए मेढकी रहने का समयबद्व कर दिया और पृथ्वी पर एक कुएं में रहने को कहा।
जब मयासुर और हेमा को कोई पुत्री नही थी तो उन्होंने भगवान शिव से पुत्री मांगी, तभी मेढकी का 12 वर्ष भी पूरे हो रहे थे तो शिव जी ने उसे पुत्री के तौर पर मयासुर को दे दिया।

मंदोदरी के विवाह:

विवाह के बारे में कहा जाता है कि जब रावण मयासुर के घर गया और वहां पर मंदोदरी को देख कर वो आकर्षित हो गया, और विवाह का प्रस्ताव रखा। 
मयदानव ने मंदोदरी के जन्म के बारे मे रावण को बताया, और कहा कि वो एक दिव्य कन्या है और उन्हें नीति, न्याय, धर्म का पूर्ण ज्ञान है अतः तुम्हे मंदोदरी को ही अपनी मुख्य पटरानी बनाना होगा। रावण ने उनकी इस शर्त को मंजूर किया और मंदोदरी से विवाह किया।


विभीषण की भी पत्नी हुई थी मंदोदरी:

अद्दभुद रामायण के अनुसार कहा जाता है कि मंदोदरी का दूसरा विवाह रावण की मृत्यु के पश्चात विभीषण के साथ हुआ था। उन्हें यह विवाह करने के लिए भगवान राम ने ही कहा था। भगवान श्रीराम ने उन्हें इसीलिए कहा था क्योंकि उनके पास राजनीति, और धर्मनीति का गुण था और वो दिव्य कन्या थी, अतः लंका के पुनः सृजन और सुचारू रूप से चलाने के लिए यह सुझाव दिया था।

12 March, 2019

महातपस्विनी शबरी कि कहानी। Story of Shabri in hindi.

कौन थी शबरी Who was Shabri?

रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में जब श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ माता सीता की खोज कर रहे थे तब पाम्पा सरोवर के पास मतांगमुनि के आश्रम में श्रीराम की अपने परम भक्त एवं भील जाती कि महातपस्विनी शबरी से मुलाकात हुई। श्री राम ने उन्हें माता कह कर संबोधित किया था, तथा उनके जुंठे बेर भी खाए। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रसंग में माता शबरी और श्रीराम जी के साथ जिस तरह से प्रस्तुत किया वो इस देश के जातिगत कुरीति को खत्म करने का प्रयास था , तथा यह अनूठा उदाहरण दिया कि भगवान अपने भक्तों में भेद नही करते।


माता शबरी के जीवन की कथा Story of Mata Shabri:

भगवान राम के जीवन की कथा सर्वप्रथम महाऋषि बाल्मीकि जी लिखी तथा बाद में लगभग सभी भाषाओं में इसका अनुवाद अनेक महापुरुषों ने अपने अनुसार किया। अवधि में गोस्वामी तुलसीदास जी मे रामचरितमानस की रचना कि जिसमे शबरी प्रसंग का वर्णन किया। 
माता शबरी का जन्म एक भील कुल में हुआ था, जिसे आदिवाशी समुदाय से जोड़ा जाता है। परंतु उनके अंदर धर्मकार्य, तथा ज्ञानार्जन कि रुचि थी। अतः उन्होंने विवाह नही किया और अपना घर को त्याग कर ऋषि मुनियों की सेवा तथा ज्ञान अर्जन के लिये वन में गए। परन्तु उनकी जाति के कारण अनेक ऋषियों और मुनियों ने उनको स्थान नही दिया, तब वो महाऋषि मतांगमुनि के आश्रम में गयी , उनकी भक्ति भाव तथा सेवा का भाव देखकर शबरी को सेवा का मौका दिया। शबरी ने पूरी निष्ठा तथा अनुशासन से गुरु कि सेवा की तथा आशिर्वाद एवं सिद्धि प्राप्त की।


जब मतांगमुनि अपने शिष्यों के साथ धरती छोड़ कर गए तो शबरी को उनकी भक्ति एवं निष्ठा को देखकर उन्हें आश्रम में रहने के लिये कहा , तथा बताया कि भगवान विष्णु जब श्रीराम के रूप में अवतार लेंगे तथा सीता की खोज में आएंगे, तो उन्हें सुग्रीव से मिलने का रास्ता बताए तथा उनसे भक्ति का ज्ञान प्राप्त करे। माता शबरी तभी से वहां पर श्रीराम के आने की राह देखती रही तथा नित्य उनके स्वागत की तैयारी करती रही।


माता शबरी से जुड़ी लोक कथा Folk talk related to Mata Shabri:


एक कथा के अनुसार माता शबरी एक भील कुल कि कन्या थी जिनके उनके अंदर भक्ति भाव तथा सभी जीवों के प्रति समान भाव प्रखर था। उनके कुल में सभी प्रयोजनों में जानवरों की बली प्रथा थी , परन्तु शबरी गलत समझती थी। अतः उनके विवाह में किसी जीव की हत्या न हो इएलिये उंन्होने घर को त्यागकर वन में ऋषयों और मुनियों की सेवा का राह चुना जहां पर उन्हें मतांगमुनि के साथ साथ कई महामुनियों की सेवा का मौका मिला। तथा अंत मे प्रभु श्रीराम के दर्शन पाकर उस परमपद को प्राप्त किया जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।



11 March, 2019

कलयुग के आगमन और राजा परीक्षित की कथा। Story of Arrival of Kalyug and King Parichit

राजा परीक्षित कौन थे?

परीक्षित का जन्म पांडवो के कुल में हुआ था जो बहुत बड़े धर्मनिष्ठ राजा थे, जब पांडवो ने हिमालय की ओर महाप्रयाण किया था तो राज्य का दायित्व परीक्षित को सौप दिया था। परीक्षित प्रजापालक एवं कर्तव्यनिष्ठ राजा थे उंन्होने तीन अश्वमेध यज्ञ किये तथा कई धर्मनिष्ठ कार्य किये।
पुराणो के अनुसार चार युग निर्धारित है जो है सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलयुग। माना जाता है कि द्वापरयुग कि समाप्ति तथा कलयुग का आगमन भगवान श्रीकृष्ण के बैकुण्ठ प्रस्थान के साथ हुआ। कलयुग का आगमन कैसे हुआ और उसका प्रभाव कैसे बढ़ा इसकी राजा परीक्षित से जुड़ी हुई कथा कई पुराणों के साथ श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है।

चित्र साभार: dailyhunt

कलयुग का आगमन और प्रभाव:


जिस समय परीक्षित का राजकाल चल रहा था उन्हीं दिनों धर्म ने बैल का रूप बना कर तथा पृथ्वी गाय का रूप रखकर सरस्वती तट पर गए थे। धर्म ने पृथ्वी से पूछा - "हे देवि! आप क्यों चिंता कर रही है? क्या आप इसलिए दुःख तो नही कर रही है कि मेरा एक ही पैर बचा है?
पृथ्वी बोली- "हे धर्म! तुम सर्वज्ञ होकर भी मुझ से मेरे दुःख का कारण पूछते हो! प्रभु श्रीकृष्ण धरती से गये है यही मेरे दुख का कारण है, क्योंकि उनके निर्मल चरण मुझ पर पड़ते थे। जब धर्म और पृथ्वी ये बातें कर ही रहे थे कि मुकुटधारी शूद्र के रूप में कलियुग वहाँ आया और उन दोनों को मारने लगा।
उसी समय राजा परीक्षित वहीं पर से गुजर रहे थे। उन्होंने मुकुटधारी शूद्र को हाथ में डण्डा लिये एक गाय और एक बैल को बुरी तरह पीटते देखा। वह बैल अत्यन्त सुन्दर था, उसका श्वेत रंग था और केवल एक पैर था। गाय भी कामधेनु के समान सुन्दर थी। दोनों ही भयभीत हो कर काँप रहे थे।
महाराज परीक्षित ने जोर से कहा- दुष्ट! पापी! तू कौन है? इन निरीह गाय तथा बैल क्यों सता रहा है? तू महान अपराधी है। तेरे अपराध का उचित दण्ड तेरा वध ही है।" उनके इन वचनों को सुन कर कलियुग भय से काँपने लगा।
इतना कह कर राजा परीक्षीत ने उस पापी शूद्र राजवेषधारी कलियुग को मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत होकर अपने राजसी वेष को उतार कर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और त्राहि-त्राहि कहने लगा। तथा धर्म तथा पृथ्वी भी अपने रूप में आ गए और अपने दुख का कारण सम्राट परीक्षित को बताया।
सम्राट परीक्षित बोले "हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है इसलिये मैंने तुझे प्राणदान दिया। किन्तु अधर्म, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। अतः तू मेरे राज्य से तुरन्त निकल जा और लौट कर फिर कभी मत आना।"
राजा परीक्षित के इन वचनों को सुन कर कलियुग ने कहा - कि हे राजन यह सारी पृथ्वी तो आपकी ही है और इस समय मेरा पृथ्वी पर होना काल के अनुरूप है, क्योंकि द्वापर समाप्त हो चुका है।
कलियुग इस तरह कहने पर राजा परीक्षित सोच में पड़ गये। फिर विचार कर के उन्होंने कहा - "हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। इन चार स्थानों में निवास करने की मैं तुझे छूट देता हूँ।"
इस पर कलियुग बोला - "हे राजन! ये चार स्थान मेरे निवास के लिये अपर्याप्त हैं। दया करके कोई और भी स्थान मुझे दीजिये।" कलियुग के इस प्रकार माँगने पर राजा परीक्षित ने उसे पाँचवा स्थान 'स्वर्ण' दिया। कलियुग इन स्थानों के मिल जाने से प्रत्यछ रूप से तो वहाँ से चला गया किन्तु कुछ दूर जाने के बाद अदृष्य रूप में वापस आकर राजा परीक्षित के स्वर्ण मुकुट में निवास करने लगा। 
इसके बाद एक दिन परिक्षित शिकार के लिए गए। वहां बहुत भटके और भूख और प्‍यास के मारे उनका बुरा हाल था । शाम के समय थके हारे वह शमिक ऋषि के आश्रम पहुंचे ऋषि उस समय समाघि में लीन थे।
परिक्षित ने कहा कि हमें प्‍यास लगी है हमें पानी चाहिए यहां और कोई भी नही है क्‍या आप सुन रहे है हम राजा परिक्षित बोल रहे है हमें प्‍यास लगी है हमें पानी चाहिए आपको सुनाई नही देता क्‍या ऋषि उस समय समाघि में लीन थे राजा ने दो-तीन बार पानी मांगा परंतु ऋषि की समाघि नही टूटी।
राजमुकुट मैं बैठे कलयुग की प्ररेणा से उनकी सात्‍विक बुद्धि भ्रष्‍ट हो गई और उन्‍होने ऋषि को दंड देने का फैसला किया । परंतु राजा के अच्छे संस्‍कारो के कारण उन्‍होनें अपने-आप को उस पाप से रोक लिया । क्रोध वश उन्‍होने मरा हुआ सांप ऋषि के गले में डाल दिया । उस शमिक ऋषि का पुत्र शृंगी बडा ही तेजस्‍वी था उस समय वह नदी में नहा रहा था। दूसरे ऋषि कुमारों ने जाकर सारा वृत्तांत सुनाया कि किस प्रकार एक राजा ने उसके पिता का तिरस्‍कार किया है । उनकी बात सुनकर वह क्रोध से पागल हो गया और उसी क्षण नदी का जल अंजुली में भरकर राजा को श्राप दिया जिस अभिमानी और मूर्ख राजा ने मेरे महान पिता का घोर अपमान किया है वह महापापी आज से सांतवे दिन तक्षक नाग की प्रचंड विषाग्नी में जलकर भस्‍म हो जायेगा।
महल में वापस लौट कर आने पर जब राजा ने अपना मुकुट उतारा तो उनको अपनी गलती का बोध हुआ, लेकिन वहुत छमा प्रार्थना के बाद भी उन्हें श्राप से मुक्ति नही मिली , लेकिन सात दिन में पुण्यकर्म के लिए श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण करने को ऋषि द्वारा बताया गया।

10 March, 2019

कुंती के जीवन कि कथा। Story of Kunti in hindi

कुंती का जन्म एवं परिचय 


महाभारत में वर्णित कुंती हस्तिनापुर के राजा पाण्डु की पहली पत्नी तथा पांडवो में से प्रथम तीन की माता थी। कुंती भगवान श्रीकृष्ण के पितामह यदुवंश के राजा सूरसेन की कन्या थी। पहले उनका नाम पृथा था, वो अतयंत रूपवान थी जिसके कारण उनकी कीर्ति सभी ओर फैली हुयी थी। राजा सूरसेन के फूफा के भाई कुन्तिभोज को कोई संतान न होने कारण राजा सूरसेन ने पृथा को कुन्तिभोज को पुत्री रूप में गोद दे दिया था , जिसके कारण कुंती का नाम पृथा से कुंती को गया था। भगवान श्री कृष्णा उन्हें बुआ कहकर सम्बोधित करते थे। कुंती को राजनीती तथा धर्म निति का सम्पूर्ण ज्ञान था। अतः उन्हें पांच कन्याओं में स्थान प्राप्त है। उन्हें चिरकुमारी होने का वरदान दुर्वाशा ऋषि से प्राप्त था।

कुंती को वरदान प्राप्ति की कहानी


कुंती के विवाह के पहले जब वो अपने पिता महाराज कुन्तिभोज के यहाँ रहती थी, एक दिन महा तपस्वी ऋषि दुर्वाशा का आगमन हुआ, जिनका स्वागत कुंतीभोज के महल में बड़े ही भाभ्या तरीके से हुआ इस अवसर पर कुंती ने एक वर्ष तक उनकी बहुत ही लगन के साथ और पूरी निष्ठां के साथ मन लगाकर सेवा की जिससे महर्षि दुर्वासा बहुत प्रसन्न हुए। महर्षि दुर्वासा त्रिकाल दर्शी थे अतः उन्होंने कुंती के भविष्य को देख लिया और कुंती को वरदान स्वरुप एक मंत्र दिया, और कहा कि वो जिस भी देवता का इस मंत्र के पश्चात स्मरण करेगी वो प्रगट होगा और तुम्हे पुत्र देकर जायेगा।
महर्षि दुर्वाशा के चले जाने के बाद कुंती को संदेह हुआ कि क्या सच में यह मन्त्र फलीभूत होता है, एक दिन संध्या के समय कुंती में सूर्य भगवान को देखा तो उसे अपने मंत्र के सिद्धि को जानने कि इक्छा हुयी , उसने मंत्र पढ़कर सूर्य देव का स्मरण किया तो सूर्य देवता प्रगट हो गए और बोले मई तुम्हे पुत्र देने आया हूँ। कुंती डर गयी और बोली भगवान मैं तो केवल अपने मंत्र को जाँच रही थी और मेरा अभी विवाह नहीं हुआ है तो मैं मां नहीं बन सकती हूँ । सूर्य देवता ने कहा कि यह मंत्र अमोख अतः पुत्र तो मैं देकर जाऊंगा परन्तु तुम पुत्र जन्म के उप्रान्त भी कुवारी रहोगी। अतः सूर्य देव के आशीर्वाद से कुंती को एक परम तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ जो अभेद्य कवच और कुण्डल धारण किये हुए था। 
कुंती ने लोग लाज के भय से उस पुत्र को गंगा में बहा दिया जो हस्तिनापुर के राजशरथी अधिरथ को मिला , अधिरथ को कोई संतान नहीं थी अतः उसने उसे पाला और बड़ा होकर वह "कर्ण" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कुंती का विवाह एवं पुत्रों के जन्म कि कहानी 


कुंती के विवाह हेतु रहा कुन्तिभोज ने एक स्वम्वर का आयोजन किया जंहा पर समस्त देशों के राजा और राजकुमार उपस्थित हुए। वंही पर हस्तिनापुर के नरेश महाराज पाण्डु भी आये थे , कुंती को उनका रूप सौंदर्य पसंद आया और उनको ही अपने पति के रूप में चुन लिया। कुंती के विवाह के उपरांत पाण्डु का एक और विवाह हुआ जिन्हे नाम माद्री था। 
पाण्डु को एक ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कारण पुत्र पैदा करने में असमर्थ हो गए तब कुंती ने ऋषि दुर्वाशा के दिए हुए मंत्र का इस्तेमाल करके तीन पुत्र उत्पन किये पहला धर्मराज से "युधिष्ठिर" , दूसरा पवन देव से "भीम" तीसरा इन्द्र से "अर्जुन" । उसके बाद उन्होंने अपने मंत्र से पाण्डु कि दूसरी पत्नी माद्री से "नकुल" एवं "सहदेव" पैदा हुए।




09 March, 2019

ध्रुव कि तारा बनने की कथा। Story of Dhruv to becoming Star in hindi.

ध्रुव के तारा बनने की कथा: 


ध्रुव कि कथा का वर्णन कई पुराणो में है उनकी श्रीमद्भागवत में वर्णित कथा के अनुसार, मनु और शतरुपा के पुत्र थे उत्तानपाद। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियां थीं। राजा उत्तानपाद को सुनीति से ध्रुव और सुरुचि से उत्तम नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। पहली पत्नी सुनीति के पुत्र न होने की वजह से राजा उत्तानपाद ने दूसरी शादी की थी जिनका नाम सुरुचि था। उत्तानपाद के दूसरे विवाह के पश्चात सुनीति को वन भेज दिया गया था क्योंकि यही उनकी दूसरी पत्नी सुनीति की शर्त थी।

चित्र साभार: riligiuskart

एक बार उत्तानपाद वन में शिकार पर गए और घायल हो गए, यह बात सुनीति को पता चली तो उसने उत्तानपाद को अपनी कुटिया पर ले गयी और उत्तानपाद की सेवा करके ठीक कर लिया, इन्ही कुछ दिनों तक साथ रहने के कारण सुनीति गर्भवती हो गयी और ध्रुव नामक पुत्र को जन्म दिया।
कुछ समय पश्चात उत्तानपाद ध्रुव को अपने महल में ले आये, और साथ मे रखने लगे। ध्रुव को उनकी माँ ने बताया था कि अगर उनको महल में प्यार न मिले तो भगवान की भक्ति करे जिनसे उनको प्यार मिलेगा।
एक दिन उत्तानपाद की गोद में खेलते देख उत्तानपाद की दूसरी पत्नी सुरुचि का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। सौतन के पुत्र को अपने पति की गोद में वह बर्दाश्त न कर सकी। उसका मन ईष्र्या से जल उठा। उसने झपट कर बालक ध्रुव को राजा की गोद से खींच लिया और अपने पुत्र उत्तम को उसकी गोद में बिठा दिया तथा बालक ध्रुव से बोली, अरे मूर्ख! राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है जो मेरी कोख से उत्पन्न हुआ हो। सुरूचि ने कहा कि तू मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हुआ है। इसलिए तुझे इनकी गोद में या राजसिंहासन पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है।
पांच वर्ष के ध्रुव को अपनी सौतेली मां के व्यवहार पर क्रोध आया, और वह भागते हुए अपनी मां सुनीति के पास आए तथा सारी बात बताई। सुनीति बोली, बेटा! तेरी सौतेली माता सुरुचि से अधिक प्रेम के कारण तुम्हारे पिता हम लोगों से दूर हो गए हैं। अतः तुम भगवान श्रीहरि की भक्ति करो वो तुम्हे अपनी गोद मे बैठा लेगे।
उसके बाद यमुना के तट पर ध्रुव में भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की और उसकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान भक्तवत्सल प्रगट हुए और वरदान मांगने को कहा। तब ध्रुव ने कहा कि मुझे अपने पिता से प्यार नही मिला है और मेरी माता कहती है कि आप संसार के पिता है तो आप मुझे अपनी गोद मे बिठा लीजिए। अतः भगवान विष्णु में उनको तारा बनने का आशीर्वाद दिया जिसके बाद उन्हें सप्तर्षियों से भी उच्च स्थान प्राप्त हुआ।



07 March, 2019

अहल्या के जीवन और संघर्ष की कथा। The story of Ahaly's life and struggle.

अहल्या या अहिल्या का जीवन Ahalya's Life:




पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार अहल्या(अहिल्या) परम पिता व्रह्मा कि पुत्री थी जिनका विवाह महाऋषि अत्री के पुत्र महाऋषि गौतम के साथ हुआ था। अहिल्या और गौतम के पुत्र थे ऋषि सनातन जो राजा जनक के कुलगुरु थे। देवी अहल्या के जीवन की कथा बेहद करुणामई था। उनका नाम अहल्या और अहिल्या दोनों नामो में वर्णित है। देवी अहल्या महान सतीत्व को धारण करने वाली नारी थी जिनके साथ देवताओं के राजा इंद्र द्वारा छल किया गया परंतु जब उनकी कोई गलती न होने पर भी श्राप दिया गया तो बिना तर्क किये स्वीकार किया और पति की आज्ञा मानकर पत्थर की सिला बनगई। जिनका उद्धार भगवान विष्णु के अवतार श्री राम द्वारा हुआ।
उनकी इस करुण कथा से यह बोध होता है कि नारी के बल का मान रखने के लिए स्वयं भगवान को भी खींचकर आना पड़ता है। देवी अहिल्या मंचकन्या में स्थान रखती है उनकर लिखा यह श्लोक प्रचलित है:


अहल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा। 
पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशिन्याः ॥

अर्थात अहल्या, द्रोपदी, कुंती, तारा और मंदोदरी ये पांच कन्याओं का प्रतिदिन नाम लेने से माहा पाप का भी नाश हो जाता है। अतः स्त्रियों को प्रतिदिन इनका स्मरण करना चाहिए।

अहल्या के जन्म एवं विवाह कि कथा Ahilya's birth and marriage story:

अहल्या भगवान ब्रह्मा की मानसपुत्री थी, जिनकी रचना भगवान ब्रह्मा ने सबसे सुन्दर स्त्री के रूप में किया था । इनके नाम के अर्थ में दो मत है, पहले मत के अनुसार "हल्या" अर्थात कुरूपता अतः "अहल्या" का अर्थ है कुरूपता रहित या जिसमे कुरूपता न हो । दूसरे मतानुसार "अहल्या" का अर्थ है जिसपर हल न चला हो या जोता न गया हो।
अहल्या के रचना के पश्चात वृह्मदेव ने समस्त देवताओं और ऋषियों के सम्मुख अहल्या के सौंदर्य और सुंदरता की विवेचना की थी। जिसके पश्चात समस्त देवताओं और ऋषियों में अहल्या के साथ विवाह का मन बना लिया और वृह्मदेव के सम्मुख प्रस्ताव दिया, जिसमे देवराज इंद्र अधिक लालायित थे। अतः ब्रह्मदेव ने अहल्या के विवाह में एक शर्त रखी कि जो पृथ्वी का चक्कर लगाकर सर्वप्रथम आएगा उसी के साथ अहल्या का विवाह होगा। 
देवताओं के राजा इंद्र ने अपनी समस्त शक्तियों के बल से पृथ्वी का चक्कर लगाकर आये, परंतु देवऋषि नारद ने ब्रह्मदेव को बताया कि महाऋषि अत्री के पुत्र "गौतम" ने सबसे पहले चक्कर लगाया है क्योंकि उन्होंने एक ऐसी गाय का चक्कर लगाए है जो बछड़े को जन्म दे रही थी, इस अवस्था की गाय पृथ्वी तुल्य होती है। अतः ब्रह्माजी ने अहल्या का विवाह महाऋषि गौतम के साथ कर दिया।

अहल्या को श्राप और फिर उद्धार की कथा Curse of Ahaly and then the story of salvation:

देवी अहल्या का विवाह गौतम ऋषि के साथ होने के पश्चात वो पूर्ण आतित्व के साथ तथा पति को ही ईस्वर मानकर जीवन व्यतीत करने लगी। परंतु देवताओं के राजा इंद्र के मन में देवी अहल्या के सौंदर्य को पाने की लालसा का अंत नही हुआ था, वो हमेशा अवसर कि प्रतीक्षा में लगे रहते थे।
एक दिन जब प्रातः काल मे गौतम ऋषि स्नान हेतु अपनी कुटिया से निकल गए तो अवसर देखकर देवराज इंद्र ने माया से गौतम का रुप रखकर उनकी कुटिया में प्रवेश कर गया। और अहल्या से संबंध बनाने का आग्रह किया, देवी अहल्या उसे अपना पति समझकर और उनकी आज्ञा मानकर स्वीकार कर लिया। जब गौतम ऋषि स्नान करके वापस आये तो अपनी कुटिया से अपने ही स्वरूप वाले व्यक्ति को बाहर जाते देखकर विस्मय में पड़ गए। उसके बाद उन्होंने अपने तपोबल से देख लिया कि वो इंद्र है तथा वो अत्यंत क्रोधित हो गए।
देवी अहल्या को भी ज्ञात हो गया कि उनके साथ छल हुआ है अतः उन्होंने अपने पति गौतम से बहुत छमा याचना की परंतु वो क्रोध के आवेश में अहल्या को श्राप दे दिया कि वो पत्थर की सिला हो जाये, क्योंकि उन्होंने अपने पति और पराये पुरुष के स्पर्श के अंतर को नही समझा।
कई वर्षों के उपरांत जब श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और ऋषि विस्वामित्र के साथ जनकपुरी सीताजी के स्वयंवर के लिए जा रहे थे तब वह स्थान पड़ा जहां पर अहल्या सिला रूप में थी। ऋषि विस्वामित्र ने श्रीराम को सारी कथा सुनाई और उनका उद्धार करने को कहा । तब श्रीराम के चरण के स्पर्श से देवी अहल्या मुक्त हुई।



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05 March, 2019

वेदव्यासजी के जीवन एवं जन्म की कथा। Birth and Life Story of Vedvyasji in hindi.

वेदव्यास VedVyas:

चित्र साभार: Pinterest

वेद व्यास भारतीय साहित्य में सर्वोत्तम स्थान को प्राप्त हुए है, महान साहित्य के रचयिता वेद व्यास जी का जन्म लगभग 3000ई पूर्व हुआ था, इनके पिता महर्षि "परासर" और माता का नाम "मत्स्यगंधा" था जो बाद में "सत्यवती" के नाम से जानी गयी। परासर के पुत्र होने के कारण इन्हें "पारासर" नाम से भी जाना जाता है। तथा घोर तपस्या के कारण इनका वर्ण काला होने के कारण 'कृष्णवर्ण' नाम भी दिया गया। माना जाता है कि प्रत्येक द्वापर युग मे भगवान व्यास के रूप में अवतरित होते है तथा वेदों का विभाजन करते है अतः अब तक कुल अठ्ठाईस व्यास हो चुके है।
महाऋषि व्यास जी ने त्रिकालदर्शी थे और भविष्य को भी देख सकते थे, अतः उन्होंने देख लिया था कि कलयुग में मनुष्य कम बुद्धि और अल्प आयु वाला होगा जो वेदों का सम्पूर्ण अध्ययन नही कर पायेगा अतः उन्होंने वेदों को विभाजित करके चार वेद की रचना की।  जो इस प्रकार हैं: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, और अथर्ववेद । वेदों के विभाजन के कारण इनका नाम वेद व्यास हुआ। साथ ही इन्होंने अठारह पुराणों की रचना की जिसमे रोचक कहानियों के माध्यम से वेदों के ज्ञान को सरल तरीके से प्रस्तुत किया। प्रसिद्ध हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत के रचयिता वेदव्यास जी है जो उनके जीवन के समय ही घटित हुई तथा वो खुद उसके पात्र है। इसकी रचना के समय लिखने का कार्य भगवान गणेश जी ने किया था। श्रीमद्भागवत गीता जो संसार का सबसे ज्यादा पड़े जाने वाला पुराण है वो भी महाभारत का अंश है।
वेदव्यासजी के एक पुत्र थे जिनका नाम शुकदेव था जिन्हें जन्म से ही वेद,पुराण और उपनिषदों का ज्ञान था। तथा उन्होंने ही राजा परीछित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनाया था। तथा इन्होंने ही पिता से सुने हुए महाभारत की कथा को देवताओं को सुनाया था।

वेदव्यासजी के जन्म की कथा Birth Story of Vedavyas:

पौराणिक कथाओं के अनुसार सुधन्वा नाम के एक राजा थे। वे एक दिन बाकी राजाओं की तरह आखेट के लिये वन गये। उनके वन जाने के बाद ही उनकी पत्नी का गर्भ धारण का समय हो गया। उसने इस समाचार को अपने एक पक्षी के माध्यम से राजा के पास भिजवाया। समाचार पाकर महाराज सुधन्वा ने एक दोने में अपना वीर्य निकाल कर पक्षी को दे दिया जिसे लेकर वह पक्षी राजा की पत्नी के पास पहुँचाने आकाश में उड़ चला। मार्ग में उस पक्षी को एक दूसरा शिकारी पक्षी मिल गया, दोनों पक्षियों में युद्ध होने लगा। युद्ध के दौरान वह दोना पक्षी के पंजे से छूट कर यमुना में जा गिरा। यमुना में ब्रह्मा के श्राप से मछली बनी एक अप्सरा रहती थी। मछली रूपी अप्सरा दोने में बहते हुये वीर्य को निगल गई तथा उसके प्रभाव से वह गर्भवती हो गई। 
गर्भ पूर्ण होने पर एक निषाद ने उस मछली को अपने जाल में फँसा लिया, निषाद ने जब मछली को चीरा तो उसके पेट से एक बालक तथा एक बालिका निकली। निषाद उन शिशुओं को लेकर महाराज सुधन्वा के पास गया। महाराज सुधन्वा के पुत्र न होने के कारण उन्होंने बालक को अपने पास रख लिया जिसका नाम मत्स्यराज हुआ। बालिका निषाद के पास ही रह गई और उसका नाम मत्स्यगंधा रखा गया क्योंकि उसके अंगों से मछली की गंध निकलती थी। बड़ी होकर वह नाव खेने का कार्य करने लगी।
एक बार पराशर मुनि को उसकी नाव पर बैठ कर यमुना पार करना पड़ा। पराशर मुनि मत्स्यगंधा के सौन्दर्य पर आसक्त हो गये और बोले, "देवि! मैं तुम्हारे साथ सम्बंध बनाना चाहता हूँ।" मत्स्यगंधा ने कहा कि यह संभव नही है।
तब पराशर मुनि बोले, "बालिके! तुम चिन्ता मत करो। प्रसूति होने पर भी तुम कुमारी ही रहोगी।" इतना कह कर उन्होंने अपने योगबल से चारों ओर घने कुहरे का जाल रच दिया और मत्स्यगंधा के साथ भोग किया। तत्पश्चात् उसे आशीर्वाद देते हुये कहा, तुम्हारे शरीर से जो मछली की गंध निकलती है वह सुगन्ध में परिवर्तित हो जायेगी। 
ऋषि के कथन अनुसार वो गर्भवती हुई और एक बुद्धिमान और परम तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया जिनका नाम व्यास था । जन्म लेते ही वो बड़े हो गए और तपस्या हेतु वन में चले गए। जाते समय अपनी माता को वचन दिया कि विपत्ति या अव्यसक्ता के समय जब वो उनको बुलाएगी तो वो आजायेंगे।

उसके बाद उनकी माता मत्स्यगंधा से सत्यवती के नाम से जानी जाने लगी, जिनका विवाह शान्तनू के साथ हुआ जो गंगा पुत्र देवव्रत(भीष्म) के पिता थे।




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04 March, 2019

महाशिवरात्रि की कथा। Story of Mahashivratri in hindi.

महाशिवरात्रि Mahashivratri:


महाशिवरात्रि का पावन पर्व भारत के साथ साथ सम्पूर्ण विश्व मे मनाया जाता है क्योंकि यह हिन्दू धर्म का प्रमुख पर्व है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा विशेष विधि विधान से की जाती है। भगवान शिव समस्त देवो द्वारा पूजित है। भगवान शिव को भोलेनाथ कहा गया है क्योंकि इनकी पूजा बहुत सहज एवं तुरंत फलित है। अतः समस्त मनुष्य , ऋषियों के साथ साथ अशुरो द्वारा भी इनकी उपासना की जाती थी। महाशिवरात्रि के विषय में भिन्न - भिन्न मत हैं, कुछ विद्वानों का मत है कि आज के ही दिन शिवजी और माता पार्वती विवाह-सूत्र में बंधे थे जबकि अन्य कुछ विद्वान् ऐसा मानते हैं कि आज के ही दिन शिवजी ने ‘कालकूट’ नाम का विष पिया था जो सागरमंथन के समय समुद्र से निकला था ,  यह समुद्रमंथन देवताओं और असुरों ने अमृत-प्राप्ति के लिए किया था। एक शिकारी की कथा भी इस त्यौहार के साथ जुड़ी हुई है कि कैसे उसके अनजाने में की गई पूजा से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उस पर अपनी असीम कृपा की थी,यह कथा पौराणिक “शिव पुराण” में कही गयी है।

महाशिवरात्रि की कथा शिवमहापुराण के अनुसार Story of Mahashivratri according to Shiv mahapuran:


प्राचीन काल में, किसी जंगल में एक गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी रहता था जो जंगली जानवरों का शिकार करता तथा अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था। एक बार शिव-रात्रि के दिन जब वह शिकार के लिए निकला , पर संयोगवश पूरे दिन खोजने के बाद भी उसे कोई शिकार न मिला, उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पड़ेगा इस बात से वह चिंतित हो गया , सूर्यास्त होने पर वह एक जलाशय के समीप गया और वहां एक घाट के किनारे एक पेड़ पर थोड़ा सा जल पीने के लिए लेकर, चढ़ गया क्योंकि उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहाँ ज़रूर आयेगा। वह पेड़ ‘बेल-पत्र’ का था और उसी पेड़ के नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढके होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था। 
रात का पहला प्रहर बीतने से पहले एक हिरणी वहां पर पानी पीने के लिए आई |उसे देखते ही शिकारी ने अपने धनुष पर बाण साधा। ऐसा करने में, उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूंदे नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की पहले प्रहर की पूजा हो गयी ।हिरणी ने जब पत्तों की खड़खड़ाहट सुनी, तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा और भयभीत हो कर, शिकारी से , कांपते हुए स्वर में बोली- ‘मुझे मत मारो' , शिकारी ने कहा कि वह और उसका परिवार भूखा है इसलिए वह उसे नहीं छोड़ सकता ।हिरणी ने वादा किया कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आयेगी तब वह उसका शिकार कर ले , शिकारी को उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है; समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएँ गिरा करती हैं वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है , क्रूर होने के बावजूद भी, शिकारी को उस पर दया आ गयी और उसने ‘जल्दी लौटना’ कहकर , उस हिरनी को जाने दिया।
थोड़ी ही देर बाद एक और हिरनी वहां पानी पीने आई, शिकारी सावधान हो गया, तीर सांधने लगा और ऐसा करते हुए, उसके हाथ के धक्के से फिर पहले की ही तरह थोडा जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे और अनायास ही शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गयी। इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर ,हिरनी ने उसे लौट आने का वचन, यह कहते हुए दिया कि उसे ज्ञात है कि जो वचन दे कर पलट जाता है, उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है। उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया।
अब तो वह इसी चिंता से व्याकुल हो रहा था कि उन में से शायद ही कोई हिरनी लौट के आये और अब उसके परिवार का क्या होगा। इतने में ही उसने जल की ओर आते हुए एक हिरण को देखा, उसे देखकर शिकारी बड़ा प्रसन्न हुआ ,अब फिर धनुष पर बाण चढाने से उसकी तीसरे प्रहर की पूजा भी स्वतः ही संपन्न हो गयी लेकिन पत्तों के गिरने की आवाज़ से वह हिरन सावधान हो गया। उसने शिकारी को देखा और पूछा “ तुम क्या करना चाहते हो ?” वह बोला-“अपने कुटुंब को भोजन देने के लिए तुम्हारा वध करूंगा” वह मृग प्रसन्न हो कर कहने लगा “मैं धन्य हूँ कि मेरा यह शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जायेगा पर कृपया कर अभी मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बंधा कर यहाँ लौट आऊं ” शिकारी का ह्रदय, उसके पापपुंज नष्ट हो जाने से अब तक शुद्ध हो गया था इसलिए वह विनयपूर्वक बोला जो-जो यहाँ आये ,सभी बातें बनाकर चले गये और अभी तक नहीं लौटे ,यदि तुम भी झूठ बोलकर चले जाओगे ,तो मेरे परिजनों का क्या होगा ?” अब हिरन ने यह कहते हुए उसे अपने सत्य बोलने का भरोसा दिलवाया कि यदि वह लौटकर न आये; तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता। शिकारी ने उसे भी यह कहकर जाने दिया कि ‘शीघ्र लौट आना।
रात्रि का अंतिम प्रहर शुरू होते ही उस शिकारी के हर्ष की सीमा न थी क्योंकि उसने उन सब हिरन-हिरनियों को अपने बच्चों सहित एकसाथ आते देख लिया था। उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी चौथे प्रहर की भी शिव-पूजा संपन्न हो गयी। अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा-‘ओह, ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने परिवार का पालन करता रहा’ अब उसने अपना बाण रोक लिया तथा मृगों से कहा की वे सब धन्य है तथा उन्हें वापिस जाने दिया। उसके ऐसा करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्न हो कर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया और सुख समृद्धि प्रदान की।


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02 March, 2019

भारतीय कैलेंडर: विक्रम संवत और शक संवत। Shak Samvat and Vikram Samvat in hindi

भारतीय कैलेंडर Indian Calendar:


समस्त विश्व में अनेक धर्मो और सभ्यताओं के अनुसार अलग अलग कैलेंडर का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह भारत मे भी अनेक प्रकार के कैलेंडर का उपयोग होता है। इन सभी कैलेंडर की अपनी मान्यता और काल चक्र की गड़ना है। परंतु इन सभी मे दो शक संवत और विक्रम संवत की मान्यता सबसे अधिक है ये हिन्दू कैलेंडर है। इनमें साल में बारह महीनों और सप्ताह में सात दिन की पद्यति है। और इन दोनों में काल गड़ना चंद्र चक्र के अनुसार है। दुनियाभर भर में सभी कैलेंडर की काल गड़ना दो पद्यतियों से होती है एक सौर चक्र और दूसरी चंद्र चक्र।
भारत में औपचारिक रूप से सन् 1957 में ग्रेगोरियन कैलेंडर को लागू किया गया क्योंकि सारे विश्व मे इसी कैलेंडर का स्तेमाल किया जाता था, अतः सारे देश मे दिन और तारीख के साथ साथ छुट्टियां भी इसी ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार तय की जाती है। 
भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर शक संवत है, जिसकी रचना 78ई वर्ष पूर्व हुआ था अतः यह कैलेंडर ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 वर्ष अधिक है। इसी प्रकार ग्रेगोरियन कैलेंडर से विक्रम संवत की 57 वर्ष पूर्ण रचना मानी जाती है जब विक्रमादित्य ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाये और उसके बाद इस कलेंडर को मान्यता दी इसी लिए इसे विक्रम संवत कहा जाता है। और यह कैलेंडर शक संवत से ज्यादा प्रचलित है जबकि शक संवत को राष्ट्रीय पंचांग घोसित किया गया है।

शक संवत और विक्रम संवत में अंतर Difference between Shak samvat and Vikram samvat:

शक संवत और विक्रम संवत दोनों ही प्राचीन हिन्दू कैलेंडर है। जिनकी रचना प्राचीन समय मे चन्द्र चक्र के अनुसार है। इन दोनों ही कैलेंडर में महीनों और नाम एवं गिनती समान है साथ ही दोनों में नियम भी समान है।
परंतु दोनों में एक ही अंतर सबसे प्रमुख माना जाता है। विक्रम संवत में महीने की सुरुआत की गड़ना पूर्णिमा से और शक संवत में अमावस्या से की जाती है। शक संवत राष्ट्रीय कैलेंडर या पंचांग होते हुए भी विक्रम संवत अधिक प्रचलित है।

भारतीय पंचांग अनुसार नव वर्ष, माह, और दिवस के नाम New year, Month and Days name according to Hindu or Indain calendar:

भारतीय पंचांग के अनुसार नव वर्ष की सुरुआत चैत्र मास से होती है, इस दिन दे साल के तीनों मौसम का की समाप्ति बाद नए साल के नए मौशम की सुरुआत होती है।  देश भर के अलग अलग प्रदेशों में प्रचलित कई पर्व भी इसदिन मनाए जाते है जैसे गुड़ी पड़वा और चैत्र नवरात्रि आदि।
भारतीय पंचांग के अनुआर माह/ मास के नाम इस प्रकार है 
१) चैत्र
२) बैशाख
३) जेष्ठ
४) आषाढ़
५) सावन
६) भाद्रपक्ष
७) अश्विन/कूमार
८) कार्तिक
९) अगहन/मार्गशीर्ष
१०) पौष
११) माघ
१२) फाल्गुन

ग्रेगोरियन कैलेंडर में सप्ताह की सुरुआत Mondey से तथा हिन्दू या भारतीय पंचांग में सप्ताह की सुरुआत रवीवार से होती है। दिवस के नाम इस प्रकार है:
१) रविवार
२) शोमवार
३) मंगलवार
४) बुधवार
५) गुरुवार
६) शुक्रवार
७) शनिवार


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01 March, 2019

कार्तिकेय के जन्म की कथा। Birth Story of Kartikey in hindi.

भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय:

भगवान शिव के जेष्ठ पुत्र के रूप में कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिनको भगवान स्कन्द के नाम से भी जाना जाता है। भगवान कार्तिकेय जन्म से परम शक्तिशाली और वीर योद्धा थे क्योंकि तारकासुर नामक दैत्य का वध उन्ही के हांथो निश्चित हुआ था व्रह्मा जी के कथन के कारण। भगवान कार्तिकेय को तमिल का जनक माना जाता है अतः उनकी पूजा भी दक्षिण प्रदेशों में ज्यादा होती है। भगवान स्कन्द या कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति भी कहा गया है। इनके कई नामो में से एक नाम मुरुगन भी है तथा इनका वाहन मयूर है।

भगवान कार्तिकेय के जन्म की कथा:

मलेशिया स्थित कार्तिकेय जी की प्रतिमा
जब पृथ्वी पर तारकासुर नामक दैत्य का आतंक बहुत बढ़ गया और उसने देवताओं को भी परास्त कर दिया तो व्रह्मा जी ने उसका मृत्यु भगवान शिव के पुत्र के हांथो निश्चित किया।
परंतु माता सती के अपने पिता दक्ष प्रजापति के अग्निकुंड में दाह के उपरांत भगवान शिव वैराग्य होकर तप में लीन रहते थे। तब सभी देवताओं और ऋषियों के अथक प्रयास से भगवान शिव का विवाह हिमालय राज की पुत्री, माता पार्वती से हुआ। 
भगवान शंकर और पार्वती के मांगलिक मिलन के बाद भी जब कोई संतान नहीं हुई तो सब विचलित  हो गए। सर्वाधिक परेशान तो इंद्र थे। जो तारकासुर से पीड़ित थे। कथा आती है कि शंकर जी के शुक्र से कार्तिकेय का जन्म हुआ। लेकिन पार्वती जी उनकी धर्ममाता थीं। सबने मिलकर बालक का नाम कार्तिकेय रखा। कार्तिकेय अतुलित बलशाली थे। उन्होंने छह मुखों से स्तनपान किया। देवता बार-बार शंकरजी से आराधना कर रहे थे कि तारकासुर के वध के लिए कार्तिकेय जी को कहिए। आखिरकार समय आया और कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया। तारकासुर के वध के साथ ही दो बातें पूरी हुईं। यह सही है कि कार्तिकेय भगवान शंकर जी के शुक्र से उत्पन्न हुए लेकिन शंकर जी ने अपना तपस्वी रूप नहीं त्यागा। वह निर्विकार, निर्लिप्त और काम से दूर रहे। दूसरे, तारकासुर के वध से यह बात सिद्ध हुई कि कोई कितना ही प्रयास क्यों न करे, मौत अपना रास्ता बना ही लेती है। तारकासुर को क्या पता था कि शंकर जी के पुत्र होगा? यह पुत्र ही उनका वध करेगा। उसने तो बहुत सोच विचारकर ब्रह्मा जी से वरदान मांगा था। चतुर था। शैतान था। शैतान का दिमाग ज्यादा तेज चलता है। अंततोगत्वा, भगवान शंकर के पुत्र हुआ। कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध करके देवताओं को भयमुक्त कर दिया।

27 February, 2019

मां गंगा के अवतरण की पौराधिक कथा। Pauranik story of ganga river.

मां गंगा कि पवित्रता और महिमा:

गंगा नदी भारत मे बहने वाली सबसे पवित्र नदी है, जिसे पुराणों में मोक्ष दायनी नदी कहा गया है। पौराधिक कथायों के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया था और असुरों के राजा बलि से तीन गज जमीन मांगी थी, उस समय उंन्होने अपने दूसरे गज में अपना पैर व्रह्मा लोग में ले गए वहां पर व्रह्मा देव ने उनका पैर धोये और उस पवित्र जल को अपने कमंडल में एकत्रित कर लिया। उसी पवित्र जल को माँ गंगा कहा गया। जिसको धरती पर इक्ष्वाकु वंश के रघु कुल में जन्मे राजा भगीरथ ने अपने पित्तरों को मोक्ष प्रदान करने के लिए तपस्या करने व्रह्मा लोक से धरती पर लाये। ये राजा भगीरथ भगवान राम के पूर्वज थे। भगीरथ के प्रयास से माँ गंगाजी का धरती पर अवतरण हुआ इसलिए गंगा जी को उनके नाम पर भागीरथी भी कहा जाता है।

माँ गंगा के धरती पर अवतरण की कथा:

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम के कुल जिसे रघुकुल या इक्षवाकु वंशज कहा जाता है साथ ही इन्हें सूर्यवंशी भी कहा जाता है। इनके कुल में एक परम प्रतापी राजा सगर हुए जिनका योगदान सागर को खुदवाने में किया था।
राजा सगर की दो रानियां थी परंतु उनको कोई पुत्र नही था अतः उन्होंने पुत्र की प्राप्ति के लिए तपस्या की जिसके फलस्वरूप उनकी पहली रानी को एक पुत्र तथा दूसरी रानी के गर्भ के एक तुम्बा निकला जिसे तोड़ने पर 60हजार पुत्र उत्पन्न हुए। राजा सगर के पहले पुत्र का नाम असमंजस था और उन्हीने वंश को आगे बढ़ाया।
राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया जिसमें नियम अनुसार घोड़ा छोड़ा जाता है। उस घोड़े को इंद्र देव ने चुराकर कपिलमुनि के आश्रम में बांध दिया। कपिलमुनि बहुत दिनों से तपस्या कर रहे थे अतः इंद्र को डर था कि तपस्या के बाद वो इंद्र का आसान न मांग ले। जब सगर पुत्र जिनकी संख्या 60 हजार थी घोड़ा ढूढ़ते हुए कपिलमुनि के आश्रम में गए और घोड़ा देखकर अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार कपिलमुनि का बहुत अपमान किया। जिसके कारण कपिलमुनि ने क्रोध में आंखे खोली और सभी को भस्म कर दिया। फिर बाद में उन्होंने यह उपाय बताया कि जब माँ गंगा का पवित्र जल इस स्थान पर आएगा तभी इनको मोक्ष प्राप्त होगा।
तब से सभी मे मां गंगा को धरती पर लाने की कोशिश की परंतु सफल नही हुए, तब उन्ही के कुल में राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ ने संकल्प लिया जिसके बाद उन्होंने व्रह्मा देव की बहुत बड़ी घनघोर तपश्या की। जिसके फलस्वरूप वृह्मदेव प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा, तब भगीरथ ने मां गंगा को धरती पर लाने का वर मांगा। वृह्मदेव मान गए परंतु उंन्होने कहा कि जब गंगाजी धरती पर अत्यंत वेग से आएगी तो उनका वेग धरती सहन नही कर पायेगी, अतः तुम शिवजी से इसका उपाय मांगों। उसके बाद भगीरथ ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की और उनको प्रसन्न कर लिया।
उसके बाद भगवान व्रह्मा ने अपने कमंडल से गंगाजी को धरती पर जाने की आज्ञा दी जिसजे वो अत्यंत वेग से धरती की तरफ आयी जिसे बीच मे भगवान भोलेनाथ ने अपनी जटाओं में समेट लिया और एक धार धरती पर छोड़ दी, जिसके बाद मां गंगा भारत की घरती पर अविरल बहने लगी। जिशसे सगर पुत्रों को मोक्ष प्रदान हुआ।
मां गंगा भारत मे जिस जिस स्थान से होकर बहती है शुख, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करती है।

गंगा जी के मुख्य स्थल:

गंगा नदी का उद्गम भारत के उत्तराखंड से गंगोत्री नामक स्थान से होता है। जिसके बाद वो भारत के प्रमुख स्थानों जैसे हरिद्वार, काशी, प्रयागराज होकर गंगासागर नामक स्थान में सागर में विलय हो जाती है।
हरिद्वार की महिमा भगवान विष्णु के चार धाम में है, काशी भगवान शिव की नगरी है तथा प्रयागराज में तीन पवित्र नदियों गंगा , यमुना और शरस्वती का संगम है। अतः यह तीनों स्थान हिन्दू परंपरा से बहुत महत्वपूर्ण है। प्रयागराज तथा हरिद्वार में गंगा तट पर कुम्भ का आयोजन होता जिसमे स्नान से समस्त पापों का नाश एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है




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25 February, 2019

तुलसी की पैराणिक कथा एवं महत्व। Pauranik Story of Tulsi and importance.

पुराणों में तुलसी का महत्त्व:

तुलसी का भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में मान्यता है। अतः वो माता लक्ष्मी का स्वरूप है। कार्तिक मास की एकादसी को जिसे देवउठनी एकादसी कहते है उस दिन माता तुलसी का भगवान विष्णु के सलिक्ग्राम स्वरूप से विवाह की प्रथा है। तुलसी के पत्तिओ का भगवान के भोग में डाला जाता है कहा जाता है बिना तुलसी की पत्तिओ के भगवान का भोग अधूरा माना जाता है। माँ तुलसी को घर के आंगन में स्थापित किया जाता है जिससे सुख और शांति आती है तथा घर के वातावरण में स्वक्षता और सीतलता बनी रहती है।

तुलसी की पौराणिक कथा:


कई पुराणों में इस कथा का विस्तृत रूप से व्याख्या की गई है अतः इस कथा के अनुसार एक वृंदा नाम की स्त्री थी जिसका जन्म राक्षस कुल में हुआ था। परंतु वो भगवान विष्णु कि परम भक्त थी। वो पतिव्रता और महान आतित्व का पालन करने वाली थी। उसके पति का नाम जलंधर था।
जलंधर बहुत शक्तिशाली असुर था उसने भगवान व्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल शिवजी के द्वारा ही होगा। इसलिए उसने सम्पूर्ण लोको को भयभीत कर रखा था।
जब उस जलंधर का  वध करने हेतु असुरों और देवताओं में युद्ध हुआ तो वृंदा पूजा करने में बैठ गयी जिसके सतीत्व के कारण जलंधर का वध नही हो पा रहा था।
तब देवता भगवान विष्णु की शरण मे गए और जलंधर के वध हेतु वृंदा की पूजा को स्थगित करने का उपाय करने को कहने लगे। परंतु विष्णु जी ने कहा कि वृंदा मेरी परम भक्त है अतः मैं उसके पूजा कार्य मे विघ्न कैसे कर सकता हूँ। परंतु जब देवताओं ने जलंधर के अत्याचार से पृथ्वी की रक्षा हेतु जलंधर का वध जरूरी बताया तो विष्णु जी मान गए और जलंधर के रूप में वृंदा के मंदिर के वहार गए।
वृंदा को लगा कि उसका पति विजयी होकर आ गया, और वो पूजा छोड़कर बाहर गयी। उधर युद्ध मे जलंधर का वध उसका गला काटकर किया गया, उसका मस्तक उसी समय वृंदा के पास गिरा। वृंदा को समझ आ गया कि छल हुआ है, अतः उसने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वो पत्थर के बन जाये। वृंदा के श्राप से विष्णु जी पत्थर के हो गए। तभी वहां शिवजी सहित अन्य देवता आ गए और वृंदा को बताया कि वो भगवान विष्णु है और सारा वृतांत सुनाया। और बताया कि जलंधर अत्याचारी था अतः उसका वध जरूरी था।
वृंदा ने भगवान को श्राप मुक्त कर दिया और पति जलंधर के साथ सती हो गयी।
उसकी राख से एक पौधा तुलसी रूप में उगा जिसे भगवान विष्णु ने ग्रहण कर लिया साथ ही बोले कि इसके पत्ते उक्त भोग को ही स्वीकार करेंगे। तब से तुलसी का सलिक्ग्राम से विवाह की प्रथा सुरु हुई।


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23 February, 2019

भगवान राम के कुल एवं वंश का वर्णन। Descendants of Lord Ram in hindi.

भगवान राम का कुल एवं वंश:


भगवान विष्णु ने अपना सातवां अवतार श्रीराम के रूप में दसरथ पुत्र के रूप में लिया था। उनका यह कुल उनके पूर्वज रघु के नाम पर रघुकुल कहा जाता था, तथा उनका वंश उनके पूर्वज इक्षवाकु के नाम पर था। भगवान राम का वंश उनके पूर्वज मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह इक्षवाकु से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी। रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है:
ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।
इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए। 
भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे, उन्होंने सातों समुंद्र को खुदवाया था , सगर की दो रानिया थी एक से 60 हजार पुत्र थे जिनको कपिल मुनि ने भस्म कर दिया था। जिनके मोक्ष के लिए गंगा के अवतरण का उपाय करना था।
सगर के दूसरी पत्नी का पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था। और अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलवाया था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।

रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं।
लव और कुश, भगवान राम और माता सीता के जुड़वां बच्चे थे। कुश, लव से बड़े थे। नगरवासियों की बातों को सुनकर राम ने सीता को राज्य से निकाल दिया था। तब माता सीता ने महर्षि वाल्मीकि की कुटिया में अपने सुपुत्रों को जन्म दिया था।
महर्षि वाल्मीकि ने ही लव और कुश को सभी शिक्षा दी थी। फिर जब ये कुछ बड़े हुए तो राम ने महल में अश्वमेध यज्ञ करवाया था। इसी यज्ञ के दौरान राम को ज्ञात हुआ कि लव और कुश उन्हीं के पुत्र हैं। लव-कुश के बाद कुश के पुत्र अतिथि राजा बने। मुनि वशिष्ठ के सानिध्य में अतिथि एक कुशल राजा बने। वो बड़े दिल वाले और महान योद्धा थे। अतिथि के बाद उनके पुत्र निषध राजा बने। पुण्डरीक के बाद उनके बेटे क्षेमधन्वा इस वंश के राजा बने। क्षेमधन्वा के बेटे देवताओं की सेना के लीडर थे, इसलिए उनका नाम देवानीक पड़ाराजा देवानीक के बेटे अहीनगु उनके बाद राजा बने। उन्होंने पूरी धरती पर राज किया था। वो इतने अच्छे राजा थे कि उनके दुश्मन भी उन्हें पसंद करते थे। राजा अहीनागु के बाद उनके पुत्र पारियात्र और उनके बाद उनके बेटे आदि राजा बने। रघुवंश के वंशज तो आज भी मौजूद हैं मगर अयोध्या के आखिरी नरेश राजा सुमित्रा माने जाते हैं। 

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22 February, 2019

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के जन्म की कथा। Birth story of hiranyakashipu and hiranyaksh.

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म:



चित्र साभार : www.spiritualawareness.co.in


विष्णुपुराण में इनके जन्म और मृत्यु का सम्पूर्ण वर्णन मिलता है जिसमे एक कथा के अनुसार ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए जिनका नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। जिनका जन्म की विचित्र कथा है।
एक दिन कश्यप जी की पत्नी दिति को संध्या के समय कामातुर हो गयी और कश्यप जी को संबंध बनाने के लिए प्रेरीर करने लगी, कश्यप जी ने समझाया कि प्रेत्यक क्रिया का समय का विधान किया गया है इसलिए संध्या का समय साधना और संध्यावंदन का होता है। परंतु जब देवी दिति ने हट किया तो ऋषि कश्यप ने इसे देव विधान मानकर किया।
उसके उपरांत उन्होंने दिति को बताया कि यह समय भगवान शिव के विचरण का होता है जिनके साथ भूतों की सेना होती है अतः इस संबंध से तुम्हे महावीर परंतु आसुरी प्रवित्ति के पुत्र होंगे। दिति बहुत दुखी हुई और उन्होंने वर मांगा की मेरे पुत्रों का वध नारायण के हाँथ से हो ताकि मृत्यु के पाश्चात सतगति प्राप्त हो जाये।

एक और कथा के अनुसार सनकादिक ऋषि वैकुंठ लोक भगवान विष्णु से मिलने गए, जहाँ पर भगवान विष्णु के दो पार्षद द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें मिलने से रोक क्योंकि वह भगवान विष्णु के सयन का समय था। जिसजे क्रोधित होकर सनकादिक ऋषियों ने उन्हें धरतीपर असुर रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया था। बाद में भगवान विष्णु के के समझाने पर उन्होंने कहा कि आपके द्वारा ही वे मृत्यु को प्राप्त होंगे और उनका उद्धार होगा।

हिरण्याक्ष का वध भगवान विष्णु के वराह अवतार से हुआ।
हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में मारा जा सकेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और उसकी रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया।



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20 February, 2019

भगवान विष्णु का दसवां अवतार :कल्कि अवतार। Story of Kalki avtar in hindi.

कल्कि अवतार Kalki Avtar:

उत्तर प्रदेश के संभल मंदिर कि प्रतिमा
भगवान विष्णु दसवे अवतार के रूप में अवतरित होंगे तब उनका नाम कल्कि होगा, भगवान विष्णु का यह कल्कि अवतार कलगुग के अंत मे होगा जिसमें वो पापियों और दुष्ट प्राणियों का संघार करेंगे। भगवत पुराण के साथ साथ बहुत से अन्य पुराणों में भी भगवान विष्णु के इस अवतार के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह बताया गया है कि इनके अवतार के बात युग का परिवर्तन होगा , अर्थात कलयुग की समाप्ति हो जाएगी और सतयुग पुनः आएगा। इनके अवतार का मुख्य उद्देश्य विश्वकल्याण होगा।
भागवत पुराण के अनुसार भगवान विष्नु का यह कल्कि अवतार चंदौली ग्राम में एक ब्राह्मण के पांचवे पुत्र के रूप में होगा तथा वे स्वेत देवदत्त नामक घोड़े पर अरुण होकर अपनी तलवार से दुस्टों का संहार करेंगे।
भागवत पुराण और विष्णु पुराण में कल्कि अवतार का विस्तार में वर्णन किया गया है, और कल्कि पुराण तो इसी अवतार पर केंद्रित है जिसमे जन्म, गुरु , माता पिता, पत्नियों और बच्चों का विस्तार में वर्णन किया गया है।

कल्कि अवतार में मतभेद:

कई विद्ववानों और जानकारों ने भगवान विष्णु पे इस अवतार पर बड़े मतभेद व्यक्त किये है। क्योंकि अभी कलयुग का प्रथम चरण चल रहा है फिर अभी से उनके मंदिर और पूजा के बारे में यक्तव्य। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कलयुग की समय अवधि 4 लाख 32 हजार साल की बताई जाती है और कलयुग को लगभग 5 हजार साल हुए है।
कुछ इतिहासकारो का मानना है कि कल्कि अवतार हो चुका है, क्योंकि उनके स्वरूप की जिस तरह व्याख्या की गई है वह अतीत में ही संभव था। कुछ का कहना है कि पुराणों के अनुसार महाऋषि व्यास भगवान विष्णु के अवतार थे और गौतम बुद्ध का उन पुराणों में विवरण नही है , तो हो सकता है ऋषि व्यास नवमें और गौतम बुद्ध दसवे अवतार हो।

भगवान कल्कि में मंदिर

सर्व प्रथम जयपुर में सवाई जयसिंह ने 1739 में पुराणों की व्याख्या के अनुसार बनवाया था। इसके अलावा भारत के कई स्थानों में कल्कि स्वरूप के मंदिर है। उत्त्तर प्रदेश के संभल में कल्कि अवतार का बहुत बड़ा और प्रसिध्द मंदिर है।
ऐसे तो आजकल उनपर बहुत से भक्ति गीत, मंत्र पुस्तक आदि बन और छप रही है। उनके नाम पर कई संगठन भी बन रहे है जो प्रचार प्रसार कर रहे है।



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18 February, 2019

भगवान विष्णु के सातवे अवतार: गौतम बुद्ध। Gautam Buddha avatar of lord Vishnu.

गौतम बुद्ध:

भगवान बुद्ध संसार को ज्ञान का मार्ग प्रदान किया और उनकी शिक्षाओं से बौद्ध धर्म की स्थापना और प्रचलन हुआ। गौतम बुद्ध को भगवान विष्णु के दशावतारों के से नौवा अवतार कहा गया है। कई पौराधिक और हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में इसका वर्णन है। भगवान बुद्ध ने लोगो को अहिंसा के मार्ग में चलने का उपदेश दिया। उनके उपदेश में लोगो को दुःख और उसके कारण और निवारण के लिए अष्ठांगिक मार्ग सुझाया था। तथा उन्होंने लोगो को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया था।
भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईशा पूर्व लुम्बनी, नेपाल में इक्षवाकु क्षत्रिय कुल में हुआ था। उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था। उनके पिता सुद्धोधन और माता महामाया था। माता की मृत्यु के उपरांत महामाया की बहन ने किया था। उनकी पत्नी का नाम यशोधरा था तथा उनका एक पुत्र था जिनका नाम राहुल था। उनके गुरु विश्वामित्र थे।
एक रात अचानक उन्होंने अपना परिवार और राजपाठ छोड़कर वन की तरफ दिव्य ज्ञान की खोज में चले गए। और कठिन परिश्रम और साधना से उनके बाद उन्हें बोधी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हो गयी , वह स्थान विहार के बोध गया के नाम से विख्यात है। तब उनका नाम सिद्धार्थ से बुद्ध हो गया , गौतम गोत्र के कारण उनको गौतम बुद्ध कहा गया।

विरक्ति का कारण:

भगवान बुद्ध जिनका नाम सिद्धार्थ था, उनका राज्य बहुत सम्पन्न और सभी तरह से खुशहाल था। उनके आनंद और विलाश का सारा प्रबंध उनके पिता और राजा सुद्धोधन ने किया था। परंतु उनको धन, वैभव और विलासिता रोक नही पाई। 
एक दिन जब वे सैर पर निकले तो उनको एक बूढ़ा आदमी मिला जिसकी अवस्था बहुत जर्जर थी। दूसरे दिन उनको उन्हें एक बहुत बूढा और रोगी व्यक्ति मिला जो बहुत से रोगों से ग्रसित था और बहुत दुखी था। तीसरे दिन दिन जब वे सैर पर निकले तो उन्हें एक मृतक को चार लोग ले जाते हुए दिखे साथ मे बहुत लोग थे जिनमें से कुछ लोग रो रहे थे।
तब उनके अंदर विरक्ति का भाव हुआ उनको लगा कि जवानी, और सरीर नाशवान है, फिर जब वे चौथे दिन सैर पर निकले तो उनके एक वैरागी व्यक्ति दिखा जो संसार से विरक्त था। तब वे भी संसारिक भावनाओं और इक्षाओ से मुक्त हो सन्यास के मार्ग में चल दिये।

भगवान बुद्ध के ज्ञान की प्राप्ति:

भगवान बुद्ध को बिहार के बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे हुआ, जिसका उपदेश उन्होंने अपने चार शिष्यों को दिया। उन्होंने शांति हेतु मध्यम मार्ग का उपदेश दिया जिसमें उन्होंने वीणा के तारों का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वीणा के तारो को ढीला रखा जाए तो स्वर नही निकलते और अगर अधिक कड़े कर दिए जाय तो टूट जाते है अतः मध्यम मार्ग ही सबसे उत्तम है। उन्होंने ध्यान, चार आर्य सत्य, और साष्टांग मार्ग आदि का उपदेश दिया।

बुद्ध का निधन परिनिर्वाण:

भगवान बुद्ध का निधन या परिनिर्वाण 483 ईशा पूर्व भारत के कुशीनगर में हुआ तब उनकी आयु 80 वर्ष जे आसपास थी। उनके शिष्यों के संख्या भी बहुत बड़ी,जिसके कारण बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। कई राजा महाराजा भी बौद्ध धर्म से जुड़े और प्रचार किया जिसमें सम्राट अशोक का भी बहुत बड़ा योगदान था।



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