सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की रोचक कथा । Rare Story of somnath jyotirlinga.


सोमनाथ: प्रथम ज्योतिर्लिंग 


कथा शिवपुराण से है, यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और प्रथम ज्योतिर्लिंग है। यहाँ पर चंद्र देव ने अपने कष्टो के निवारण के लिए भगवान शिव की उपासना की थी।

दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएं थीं। उन सभी का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था। किंतु चंद्रमा का प्रेम केवल रोहिणी के प्रति ही रहता था। उनके इस व्यवहार से दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याएं बहुत अप्रसन्न रहती थीं।

उन्होंने अपनी यह समश्या अपने पिता को सुनाई, तब दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्रदेव को अनेक प्रकार से समझाया।
परंतु रोहिणी के वशीभूत होने के कारण उनके हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

एक दिन दक्ष ने कुद्ध होकर शाप दे दिया। इस शाप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गए।

चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई, चंद्रमा भी बहुत दुखी थे। तब वो इन्द्रादि देवता के पास गए , उनकी प्रार्थना सुनकर इंद्रादि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण उनके उद्धार के लिए पितामह ब्रह्माजी के पास गए।

सारी बातों को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- 'चंद्रमा अपने शाप-विमोचन के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र क्षेत्र में जाकर भगवान्‌ शिव की आराधना करो। उनकी कृपा से अवश्य ही इनका शाप नष्ट हो जाएगा और ये रोगमक्त हो जाएंगे।

उनके कथनानुसार चंद्रदेव ने भगवान्‌ शिव की आराधना का सारा कार्य पूरा किया। उन्होंने घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ बार महामृत्युंजय मंत्र का जप किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वर प्रदान किया।

उन्होंने कहा- 'चंद्रदेव! तुम शोक न करो। मेरे वर से तुम्हारा शाप-मोचन तो होगा ही, साथ ही साथ प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी।

कृष्णपक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, किंतु पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी। इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण रूप को प्राप्त होता रहेगा।' चंद्रमा को मिलने वाले इस वरदान से सारे लोकों के प्राणी प्रसन्न हो उठे।
शाप मुक्त होकर चंद्रदेव ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर भगवान्‌ से प्रार्थना की कि आप माता पार्वतीजी के साथ सदा के लिए सब के उद्धारार्थ यहाँ निवास करें।

भगवान्‌ शिव उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके ज्योतर्लिंग के रूप में माता पार्वतीजी के साथ तभी से यहाँ रहने लगे।

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