भीमशंकर ज्योतिर्लिंग


भीमशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से छठा है जो कि महाराष्ट्र में पुणे के पास स्थित है। यह मंदिर बहुत प्राचीन है और पत्थरों से बना हुआ है। इसके आसपास बहुत से कुंड स्थापित है।

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग की कथा:

इसकी कथा कुम्भकर्ण के पुत्र भीम की है जो बहुत पराक्रमी उर वीर था। भगवान राम के हाथों उसके पिता की मृतु के पश्चात उसने वह्यमः देव के तपश्या करके प्रसन्न कर लिया जिसजे बाद वो बहुत बलशाली हो गया।
उसने परम शिव भक्त राजा कामरूपपेश को बंदी बना लिया था और अपनी पूजा करने को कहता था परंतु वो शिव भक्त राजा कारागृह में ही भगवान शिव के शिवलिंग स्थापित करके पूजा किया करता था।
जब ये समाचार भीम को पता चला तो वो क्रोधित हो गया और शिवलिंग पर प्रहार करने का प्रयाश करने लगा, तब भगवान शिव प्रगट हो गए और भीम को हुंकार मात्र से भस्म कर दिए।
फिर भक्त के विनती पर वंही लोक हित के लिए स्थापित हो गए, भीम के संहार के कारण इसका भीमशंकर नाम पड़ा।

सारांश Conclusion:

भगवान अपने भक्त की हर परिस्थिति में रक्षा करते है, हर इंसान को भगवान पे पूरी आस्था रखनी चाहिये।

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केदारनाथ ज्योतिर्लिंग


उत्तराखंड के हिमाचल स्थित केदारनाथ ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का बहुत ही मन मोहक मंदिर है। ये भगवान शिव केबारह ज्योतिर्लिंग में से एक है।
शिव पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के अवतार "नर" एवम "नारायण" ने भगवान शिव की बहुत घोर तपश्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रगट हुए।
तब नर तथा नारायण ने उनसे वंही पर स्थित होकर भक्तो के कल्याण के लिए सदा कृपा बनाए रखने का आशीर्वाद मागा।

तब भगवान शिव वंही ज्योतिर्लिंग स्वरूप में स्थित हो गए।

केदारनाथ मंदिर का महत्व


केदारनाथ मंदिर बहुत ही रमणीय है, प्रतिवर्ष लगभग पांच महीने के लिए मंदिर भक्तो के लिए बंद कर दिया जाता है क्योंकि बहुत ज्यादा बर्फ बारी होती है।
विगत वर्ष जल प्रलय हुआ जिसमें भी इस मंदिर में कोई नुकसान नही हुआ।

वैज्ञानिको के अनुसार भारत मे एक सूक्ष्म हिमयुग हुआ था जिसके कारण पूरा हिमालय बर्फ में दब गया था, जिसके कारण लगभग चार सौ वर्षों तक मंदिर बर्फ में दबा रहा फिर भी मंदिर को नुकसान नही हुआ।

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा 


एक बार की बात है जब भगवान विष्णु के परम भक्त ऋषि नारद मुनि घूमते हुए पर्वतराज विंध्य पर्वत पर पहुँच गये। विंध्य पर्वत ने बड़े आदर-सम्मान के साथ उनका स्वागत और पूजा की।

बातों में पर्वत राज कहने लगे कि मैं सर्वगुण सम्पन्न हूं, मेरे पास हर प्रकार के सम्पदा है, किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है। इस प्रकार के अहंकारी भाव को मन में लेकर विन्ध्याचल नारद जी के समक्ष खड़े हो गये। तब श्री नारद जी विन्ध्याचल के अहंकार का नाश की सोची।

नारद जी ने विन्ध्याचल को बताया कि तुम्हारे पास सब कुछ है, किन्तु मेरू पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उस पर्वत के शिखर देवताओं के लोकों तक पहुंचे हुए हैं। मुझे लगता है कि तुम्हारे शिखर वहां तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे। इस प्रकार कहकर नारद जी वहां से चले गए।

उनकी बात सुनकर विन्ध्याचल को बहुत दुख हुआ।

उसने उसी समय निर्णय किया कि अब वह भगवान शिव की आराधना और तपस्या करेगा। इस प्रकार विचार करने के बाद वह मिट्टी का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगा।

कई माह की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये। उन्होंने विन्ध्याचल को साक्षात दर्शन दिए और आशीर्वाद दिया। भगवान शिव ने प्रसन्नतापूर्वक विन्ध्याचल से कोई वर मांगने के लिए कहा।

विन्ध्य पर्वत ने कहा कि भगवन यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो हमारे कार्य की सिद्धि करने वाली अभीष्ट बुद्धि हमें प्रदान करें। विन्ध्यपर्वत की याचना को पूरा करते हुए भगवान शिव ने विन्ध्य को वर दे दिया।

उसी समय देवतागण तथा कुछ ऋषिगण भी वहाँ आ गये। देवताओं और ऋषियों के अनुरोध पर वहाँ स्थित ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। एक लिंग ओंकारेश्वर और दूसरा लिंग ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए।

ये भगवान शिव का चौथा ज्योतिर्लिंग है और शास्त्रों में इसे पर्मेश्वर लिंग कहा गया है। यह स्थान मध्य प्रदेश के इंदौर के पास स्थित है जो कि यमुना नदी के किनारे पर स्थापित है।


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महाकाल की अद्भुत कहानी।


उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। शिव पुराण की ‘कोटि-रुद्र संहिता’ में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है।

राजा चंद्रसेन और बालक की कथा


उज्जयिनी नगरी में महान शिवभक्त तथा जितेन्द्रिय चन्द्रसेन नामक एक राजा थे। मणिभद्र जी राजा चन्द्रसेन के मित्र बन गये। मणिभद्र जी ने एक बार राजा पर अतिशय प्रसन्न होकर राजा चन्द्रसेन को चिन्तामणि नामक एक महामणि प्रदान की। वह महामणि कौस्तुभ मणि और सूर्य के समान और मंगल कारी थी।
राजा चनद्रसेन के गले में अमूल्य चिन्तामणि शोभा पा रही है, यह जानकार सभी राजाओं में उस मणि के प्रति लोभ बढ़ गया। चिन्तामणि के लोभ से सभी राजा क्षुभित होने लगे। उन राजाओं ने अपनी चतुरंगिणी सेना तैयार की और उस चिन्तामणि के लोभ में वहाँ आ धमके। चन्द्रसेन के विरुद्ध वे सभी राजा एक साथ मिलकर एकत्रित हुए थे और उनके साथ भारी सैन्यबल भी था। उन सभी राजाओं ने आपस में परामर्श करके रणनीति तैयार की और राजा चन्द्रसेन पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों सहित उन राजाओं ने चारों ओर से उज्जयिनी के चारों द्वारों को घेर लिया। अपनी पुरी को चारों ओर से सैनिकों द्वारा घिरी हुई देखकर राजा चन्द्रसेन महाकालेश्वर भगवान शिव की शरण में पहुँच गये। और भगवान महाकाल की आराधना में जुट गये।
वही उज्जैन में एक ग्वालिन थी। अपने उस पाँच वर्ष के बालक को लेकर महाकालेश्वर का दर्शन करने हेतु गई। उस बालाक ने देखा कि राजा चन्द्रसेन वहाँ बड़ी श्रद्धाभक्ति से महाकाल की पूजा कर रहे हैं। उसे भी भक्ति जगी और घर जाकर एक सुन्दर-सा पत्थर ढूँढ़कर लाया और अपने निवास से कुछ ही दूरी पर किसी अन्य के निवास के पास एकान्त में रख दिया।

उस पत्थर को ही शिवलिंग मान लिया और  उनसे उस शिवलिंग की पूजा की। माता द्वारा बार-बार बुलाने पर भी बालक को भोजन करने की इच्छा नहीं हुई और वह भोजन करने नहीं गया तब उसकी माँ स्वयं उठकर वहाँ आ गयी।
माँ ने देखा कि उसका बालक एक पत्थर के सामने आँखें बन्द करके बैठा है। वह उसका हाथ पकड़कर बार-बार खींचने लगी पर इस पर भी वह बालक वहाँ से नहीं उठा, जिससे उसकी माँ को क्रोध आया और उसने उसे ख़ूब पीटा। इस प्रकार खींचने और मारने-पीटने पर भी जब वह बालक वहाँ से नहीं हटा, तो माँ ने उस पत्थर को उठाकर दूर फेंक दिया। बालक द्वारा उस शिवलिंग पर चढ़ाई गई सामग्री को भी उसने नष्ट कर दिया। शिव जी का अनादर देखकर बालक ‘हाय-हाय’ करके रो पड़ा। क्रोध में आगबबूला हुई वह ग्वालिन अपने बेटे को डाँट-फटकार कर पुनः अपने घर में चली गई। उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। कुछ देर बाद जब उसे चेतना आयी, तो उसने अपनी बन्द आँखें खोल दीं।

उस बालक ने आँखें खोलने के बाद जो दृश्य देखा, उससे वह आश्चर्य में पड़ गया। भगवान शिव की कृपा से उस स्थान पर महाकाल का दिव्य मन्दिर खड़ा हो गया था। उस भव्य शिवालय के भीतर मध्य भाग में (गर्भगृह) करुणावरुणालय, भूतभावन, भोलानाथ भगवान शिव का रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित हुआ था।

ग्वालिन के उस बालक ने शिवलिंग को बड़े ध्यानपूर्वक देखा उसके द्वारा चढ़ाई गई सभी पूजन-सामग्री उस शिवलिंग पर सुसज्जित पड़ी हुई थी।  अपने बेटे से शिव के कृपा प्रसाद का सम्पूर्ण वर्णन सुनकर उस ग्वालिन ने राजा चन्द्रसेन को सूचित किया।
तब सभी राजाओ ने सोचा ऐसे राजा के साथ विरोध करने पर निशचय ही भगवान शिव क्रोधित हो जाएँगे। शिव के क्रोध करने पर तो हम सभी नष्ट ही हो जाएँगे। इसलिए हमें इस नरेश से दुश्मनी न करके मेल-मिलाप ही कर लेना चाहिए, जिससे भगवान महेश्वर की कृपा हमें भी प्राप्त होगी।
युद्ध के लिए उज्जयिनी को घेरे उन राजाओं का मन भगवान शिव के प्रभाव से निर्मल हो गया और शुद्ध हृदय से सभी ने हथियार डाल दिये।  राजा चन्द्रसेन की आज्ञा प्राप्त कर सभी नरेश भी अपनी राजधानियों को वापस हो गये।
कहा जाता है भगवान महाकाल तब ही से उज्जयिनी में स्वयं विराजमान है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाकाल की असीम महिमा का वर्णन मिलता है। महाकाल साक्षात राजाधिराज देवता माने गए हैं।


उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। शिव पुराण की ‘कोटि-रुद्र संहिता’ में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है।

ब्राह्मण और दूषण असुर की कथा


एक वेद पाठी ब्राह्मण रहा करते थे। वे अपने घर में अग्नि की स्थापना कर प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे और वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे रहते थे। भगवान शंकर के परम भक्त वह ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव लिंग का निर्माण कर शास्त्र विधि से उसकी पूजा करते थे। उनके शिव पूजा-परायण ही चार पुत्र हुए।

उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर ‘दूषण’ नाम का एक असुर हुआ करता था। उस असुर की आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलयकाल की आग के समान प्रकट हो गये।
एक दिन सेना सहित दूषण ध्यान मग्न उन ब्राह्मणों के पास पहुँच गया। उन ब्राह्मणों को देखते ही ललकारते हुए बोल उठा कि इन्हें बाँधकर मार डालो। वेदप्रिय के उन ब्राह्मण पुत्रों ने उस दैत्य के द्वारा कही गई बातों पर ध्यान नहीं दिया और भगवान शिव के ध्यान में मग्न रहे। जब उस दुष्ट दैत्य ने यह समझ लिया कि हमारे डाँट-डपट से कुछ भी परिणाम निकलने वाला नहीं है, तब उसने ब्राह्मणों को मार डालने का निश्चय किया।

उसने ज्योंही उन शिव भक्तों के प्राण लेने हेतु शस्त्र उठाया, त्योंही उनके द्वारा पूजित उस पार्थिव लिंग की जगह गम्भीर आवाल के साथ एक गडढा प्रकट हो गया और तत्काल उस गड्ढे से विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हो गये। उन्होंने दैत्यों से कहा- ‘अरे दुष्टों! तुझ जैसे हत्यारों के लिए ही मैं ‘महाकाल’ प्रकट हुआ हूँ।
इस प्रकार धमकाते हुए महाकाल भगवान शिव ने अपने हुँकार मात्र से ही उन दैत्यों को भस्म कर डाला। दूषण की कुछ सेना को भी उन्होंने मार गिराया और कुछ स्वयं ही भाग खड़ी हुई। इस प्रकार परमात्मा शिव ने दूषण नामक दैत्य का वध कर दिया।

उन शिवभक्त ब्राह्मणों पर अति प्रसन्न भगवान शंकर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि ‘मै महाकाल महेश्वर तुम लोगों पर प्रसन्न हूँ, तुम लोग वर मांगो।’

उन ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहा- ‘दुष्टों को दण्ड देने वाले महाकाल! शम्भो! आप हम सबको इस संसार-सागर से मुक्त कर दें। हे भगवान शिव! आप आम जनता के कल्याण तथा उनकी रक्षा करने के लिए यहीं हमेशा के लिए विराजिए। प्रभो! आप अपने दर्शनार्थी मनुष्यों का सदा उद्धार करते रहें।’
भगवान शंकर ने उन ब्राह्माणों को सद्गति प्रदान की और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उस गड्ढे में स्थित हो गये। ऐसे भगवान शिव इस पृथ्वी पर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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मल्लिका अर्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा:

शिव पुराण के अनुसार एक बार शिव जी और पार्वती जी के दोनों पुत्रों श्री कार्तिकेय जी और गणेश जी मे विवाद हो गया ही पहले विवाह किसका होगा जिसके निवारण के लिए वो अपने माता पिता के पास गए।  शिव जी ने सोच विचार करके कहा कि जो इस पृथ्वी के साथ चक्कर लगा कर पहले आएगा उसका विवाह पहले होगा।कार्तिकेय जी खुश हो गए क्योंकि उनका वाहन मयूर है और वो तुरंत माता पिता के आशीर्वाद ले पृथ्वी के चक्कर लगाने चले गए।

परंतु गणेश जी सोचा मेरा वाहन मूसक है और वो इतना जल्दी चक्कर नही लगा पायेगा तो उन्होंने एक उक्ति निकली।
उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती को एक आसन पर बिठाया और उनके ही सात चक्कर लगा लिए, शिव जी के पूछने पर उन्होंने बोला:

मेरा तो सारा संसार मेरे माता पिता है क्योंकि वो ही संसार के पालन करता है तो मुझे संसार के चक्कर लगाने की क्या अव्यसक्ता है।

भगवान शिव प्रसन्न हुए और गणेश जी का विवाह “रिद्धि शिद्धि” के साथ हो गया जिनसे “सुभ लाभ नामक पुत्र हुए।
उधर जब कार्तिकेय जी वापस आये और उनको सभी बाते पता चली तो वो रूठकर दक्षिण दिशा में ‘क्रोंच’ नामक पर्वत में चले गए।

जब माता पार्वती जी से नही रहा गया तो वो उनको मनाने चली और साथ मे भगवान संकर भी चले जो मल्लिका एवं अर्जुन नामक भील के वेश में गए,
परन्तु जब ये बात कार्तिकेय जी को पता चली तो वो 7 कोस दूर दूसरे पर्वत पर चले गए, और भगवान शिव तथा पार्वती जी वंही क्रोंच पर्वत पर ही स्थापित हो गए जो कि मल्लिका अर्जुन नाम से प्रसिद्ध हुआ। कहा जाता है प्रत्येक पूर्णमासी और अमावश्या को शिव जी और पार्वती जी वंहा आते है।

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सोमनाथ: प्रथम ज्योतिर्लिंग 


कथा शिवपुराण से है, यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और प्रथम ज्योतिर्लिंग है। यहाँ पर चंद्र देव ने अपने कष्टो के निवारण के लिए भगवान शिव की उपासना की थी।

दक्ष प्रजापति की सत्ताइस कन्याएं थीं। उन सभी का विवाह चंद्रदेव के साथ हुआ था। किंतु चंद्रमा का प्रेम केवल रोहिणी के प्रति ही रहता था। उनके इस व्यवहार से दक्ष प्रजापति की अन्य कन्याएं बहुत अप्रसन्न रहती थीं।

उन्होंने अपनी यह समश्या अपने पिता को सुनाई, तब दक्ष प्रजापति ने इसके लिए चंद्रदेव को अनेक प्रकार से समझाया।
परंतु रोहिणी के वशीभूत होने के कारण उनके हृदय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

एक दिन दक्ष ने कुद्ध होकर शाप दे दिया। इस शाप के कारण चंद्रदेव तत्काल क्षयग्रस्त हो गए।

चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई, चंद्रमा भी बहुत दुखी थे। तब वो इन्द्रादि देवता के पास गए , उनकी प्रार्थना सुनकर इंद्रादि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण उनके उद्धार के लिए पितामह ब्रह्माजी के पास गए।

सारी बातों को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- 'चंद्रमा अपने शाप-विमोचन के लिए अन्य देवों के साथ पवित्र क्षेत्र में जाकर भगवान्‌ शिव की आराधना करो। उनकी कृपा से अवश्य ही इनका शाप नष्ट हो जाएगा और ये रोगमक्त हो जाएंगे।

उनके कथनानुसार चंद्रदेव ने भगवान्‌ शिव की आराधना का सारा कार्य पूरा किया। उन्होंने घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ बार महामृत्युंजय मंत्र का जप किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वर प्रदान किया।

उन्होंने कहा- 'चंद्रदेव! तुम शोक न करो। मेरे वर से तुम्हारा शाप-मोचन तो होगा ही, साथ ही साथ प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी।

कृष्णपक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, किंतु पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी। इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण रूप को प्राप्त होता रहेगा।' चंद्रमा को मिलने वाले इस वरदान से सारे लोकों के प्राणी प्रसन्न हो उठे।
शाप मुक्त होकर चंद्रदेव ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर भगवान्‌ से प्रार्थना की कि आप माता पार्वतीजी के साथ सदा के लिए सब के उद्धारार्थ यहाँ निवास करें।

भगवान्‌ शिव उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके ज्योतर्लिंग के रूप में माता पार्वतीजी के साथ तभी से यहाँ रहने लगे।

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द्रोणाचार्य के जन्म की विचित्र एवं रोचक कथा: बिना मां के जन्मे थे द्रोणाचार्य



गुरु द्रोणाचार्य महाभारत काल के प्रसिद्ध ऋषि थे जिन्होंने कौरवो और पांडवो को शिक्षा प्रदान की थी, हम सभी इस बात से परिचित है परंतु इनके जन्म के बारे में एक रोचक कथा है। 

ऋषि द्रोणाचार्य मह्रिषी भारद्वाज के पुत्र थे, ऋषि भारद्वाज महान तपस्वी, यसस्वी, एवम वेदों के ज्ञाता थे। एक बार उन्होंने महान जप का अनुष्ठान किया था जिसके लिए वो सुबह गंगा स्नान करके जप एवम यज्ञ के कार्य मे लग जाते थे। 

एक दिन जब वो स्नान करने जा रहे थे तो वंहा एक घृताची नामक अप्सरा स्नान करके जा रही थी , उसको देखकर ऋषि के मन मे काम उत्पन हो गया जिससे वीर्य स्खलित हो गया जिसे ऋषि ने पत्ते के एक दोने(द्रोण पत्र) इकट्ठा करके झाड़ियो के बीच रख दिया।ऋषि भारद्वाज फिर स्नान और यज्ञ के कार्य मे लग गए।

एक दिन वो ध्यान में लीन थे तब उनको उन झाडिओ में एक बच्चे का यहसास हुआ।

उनके वंहा जाने पर उनको एक बच्चा मिला, पत्ते के दोने से पैदा होने के कारण उनका नाम द्रोणाचार्य हुआ। जो प्रतापी ऋषि एवम पांडवो और कौरवो के गुरु हुए।

द्रोणाचार्य का विवाह सरद्वान कि पुत्री कृपि से हुआ था।
अस्वस्थामा नाम का पुत्र हुआ जो जन्म से अश्व के समान आवाज़ निकालता था इसलिए उनका नाम अश्वस्थामा रखा गया।
वह बहुत ही प्रतापी एवम अमृत्व को प्राप्त हुआ , कहा जाता है अश्वस्थामा आज भी जीवित है।

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लक्ष्मण जी कि दुर्लभ कथा:


एक बार की बात है जब अगस्त्य मुनि अयोध्या आये और प्रभु राम से बात कर रहे थे चौदह वर्ष के वनवास के बारे में। तब अगस्त्य मुनि ने कहा लक्ष्मण जी की भक्ति अद्भुत थी, लक्ष्मणजी की कके बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है ।


अगस्त्य मुनि बोले
श्रीराम,  सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था, उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था, ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे, और लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए।

श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे।

अगस्त्य मुनि ने कहा
प्रभु, इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था कि जो चौदह वर्षों तक न सोया हो, जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा
हो और चौदह साल तक भोजन न किया हो।

श्रीराम बोले
परंतु मैं बनवास में चौदह वर्षों तक लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा, मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है।

अगस्त्य मुनि सारी बात मुस्कुराकर समझ गए प्रभु से कुछ छुपा है भला दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो।

अगस्त्य मुनि ने कहा ठीक है क्यों न हम लक्ष्मणजी से पूछ ले?

लक्ष्मणजी आए,

प्रभु ने पूछा

हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?

फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ? और 14 साल तक सोए नहीं ? यह कैसे हुआ ?

लक्ष्मणजी ने बताया

भैया, जब सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा, आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं.

चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए - आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे, मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था, निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था। निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥

अब मैं 14 साल तक अनाहारी कैसे रहा? मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो, आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे? मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया। सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे।


 *जय सियाराम*

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