google.com, pub-8785851238242117, DIRECT, f08c47fec0942fa0 पौराणिक दुर्लभ कथाएं

पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

27 September, 2020

श्री हनुमान चालीसा चौपाई-17 हिंदी अनुवाद। Shrihanuman chalisa chupayi-17 hindi translation.

 


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:


 ॥चौपाई 17॥
                                                           

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ।। 17

अर्थ

हे भगवान आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।




श्री हनुमान चालीसा चौपाई-16 हिंदी अनुवाद। Shrihanuman chalisa chupayi-16 hindi translation.

 

श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:

श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:


॥चौपाई 16॥

   तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ।। 16 ।।


अर्थ

 तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा‘ हनुमान जी ने सुग्रीव को भगवान राम से मिलाकर बहुत उपकार किया और सुग्रीव को राजपाट दिलवाया। 




श्री हनुमान चालीसा चौपाई-15 हिंदी अनुवाद। Hanuman chalisa chaupayi 15 hindi translation.

 


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



 ॥चौपाई 15॥
                                                           जम कुबेर दिगपाल जहां ते । कबि कोबिद कहि सके कहां ते ।। 15 ।।

अर्थ

धर्मराज यम भगवान सूर्य के पूत्र हैं, इनकी माता का नाम संज्ञा है। यमी (यमुना) इनकी बहन हैं। भगवान सूर्य का एक नाम विवस्वान भी है, अत: विवस्वान (सुर्य) के पुत्र होने के कारण ये वैवस्वत भी कहलाते हैं। ये धर्मरुप होने के कारण और धर्म का ठीक-ठीक निर्णय करने के कारण धर्म या धर्मराज भी कहलाते हैं। यम देवता जगत् के सभी प्राणीयोंके शुभ और अशुभ सभी कार्यों को जानते हैं, इनसे कुछ भी छिपा नहीं है। ये प्राणियों के भूत-भविष्य, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष में किए गये सभी शुभाशुभ कर्मों के प्रत्यक्ष साक्षी हैं, ये परिपूर्ण ज्ञानी हैं। नियामक होने के कारण इनका नाम यम है। महाराज यम दक्षिण दिशा के स्वामी हैं। दस दिक्पालो में इनकी गणना है। ये शनिग्रह के अधिदेवता हैं। शनि की अनिष्टकारक स्थिति में इनकी आराधना की जाती है। इसीप्रकार दीपावली के दूसरे दिन यम द्वितीया को यम दीप देकर तथा अन्य दूसरे पर्वोंपर इनकी आराधना करके मनुष्य इनकी कृपा प्राप्त करता है। प्रत्येक प्राणियों के शास्ता एवं नियामक साक्षात्् धर्म ही यम हैं। वे ही धर्मराज अथवा यमराज भी कहलाते हैं।





श्रीहनुमान चालीसा चौपाई 14 का हिंदी अनुवाद। Hanuman chalisa chaupayi 14 hindi translation.

 


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



 ॥चौपाई 14॥
                                                           सनकादिक ब्रम्हादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ।। 14 ।।

अर्थ

तुलसीदासजी यहाँपर यह कहना चाहते हैं कि श्री हनुमानजी की प्रशंसा केवल भगवान रामने ही नहीं की अपितु सृष्टि के सर्जक ब्रम्हाजी तथा ब्रम्हाजी द्वारा उत्पन्न मानसपुत्र सनकादिक मुनि (श्रीसनक, श्रीसनातन,श्रीसनन्दन, एवं श्री सनत्कुमार), भगवान के मन के अवतार श्री नारदजी तथा आदिशक्ति माता सरस्वतीजी इत्यादि सभी हनुमानजी के गुणोंका गुणगान करते हैं । वे कहते हैं कि हम भी श्री हनुमानजी के गुणोंका तथा यश का वर्णन पूरी तरह से नहीं कर सकते, भक्ति की ऐसी परमोच्च स्थिति हनुमानजीने अपने कतृ‍र्त्व से प्राप्त की।




हनुमान चालीसा चौपाई 13 का हिंदी अनुवाद। Hanuman chalisa chaupayi 13 hindi translation

 


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



 ॥चौपाई 13॥
                                                          सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ।। 13 ।।

अर्थ

जिसने जगत में आकर कृतकृत्यता का अनुभव किया, जिसने जगत की कीमत बढायी, वह श्रेष्ठ भक्त है । कृष्ण और राम, इन दोनों अवतारों ने इस सृष्टि में आकर इसकी महत्ता बढायी। उसी प्रकार श्री हनुमानजी ने भक्ति की महत्ता बढाई, इसीलिए ऐसे भगवान के परम भक्त के यश की सारा संसार प्रशंसा करता है । इतना ही नहीं स्वयं परमात्मा उन्हे अपने ह्रदय से लगाते हैं यह भक्ति का अंतिम फल है ।




हनुमान चालीसा चौपाई12 का हिंदी अनुवाद। Hanuman chalisa chaupayi 12 hindi translation.

 


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



रघुपति कीन्ही बहुत बडाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ।।12।।

अर्थ

तुलसीदासजी लिखते हैं कि हनुमानजी की प्रशंसा करते हुए भगवान कहते हैं कि ‘तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो’ यानी तुम मेरे हो यह भगवान अपने मुख से भक्त के लिये कहना यह भक्ति का अन्तिम फल है ।




26 June, 2020

चक्रवती सम्राट राजा मांधाता Story of Mandhata.

चक्रवती सम्राट राजा मांधाता Story of Mandhata:

हाल ही में कुछ ऐसे वैज्ञानिक शोध पत्र देखे गये हैं जो यह इशारा करते है कि तकनीक के विकास से पुरुषों द्वारा भी गर्भधारण करके अपनी संतान को जन्म देना संभव है | लेकिन क्या आप जानते है कि ये तकनीक तो हमारे पूर्वजों ने हज़ारों साल पहले ही विकसित कर ली थी | आज मैं आपको भगवान श्री राम के पूर्वज राजा युवनाश्व की कहानी सुनाऊंगा, जिन्होंने स्वयं गर्भधारण करके अपने पुत्र को जन्म दिया था जो बाद में “चक्रवती सम्राट राजा मांधाता” के नाम से प्रसिद्ध हुआ | साथ ही ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में भी जानेंगे ।





हमभी जानते है कि त्रेता युग में भगवान राम का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ जोकि भगवान राम के जन्म से कई पीढ़ियों पहले महराजा इक्ष्वाकु द्वारा प्रारम्भ किया गया था इन्ही महाराजा इक्ष्वाकु के पुत्र राजा युवनाश्व थे | राजा युवनाश्व का कोई पुत्र नहीं था इसलिए वंश वृद्धि और पुत्र प्राप्ति की कामना लिए उन्होंने अपना सारा राज-पाट त्याग कर वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय किया । वन में अपने निवास के दौरान उनकी मुलाकात महर्षि भृगु के वंशज च्यवन ऋषि से हुई। च्यवन ऋषि ने राजा युवनाश्व के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करना आरंभ किया ताकि राजा की संतान जन्म ले। यज्ञ के बाद च्यवन ऋषि ने एक मटके में अभिमंत्रित जल रखा जिसका सेवन राजा की पत्नी गौरी को करना था ताकि वह गर्भधारण कर पाए।
राजा युवनाश्व की संतानोत्पत्ति के उद्देश्य से हुए यज्ञ में कई ऋषि-मुनियों ने भाग लिया और यज्ञ के बाद सभी लोग थकान की वजह से गहरी नींद में सो गए। रात्रि के समय जब राजा युवनाश्व की नींद खुली तो उन्हे भयंकर प्यास लगी । युवनाश्व ने पानी के लिए बहुत आवाज लगाई लेकिन थकान की वजह से गहरी नींद में सोने की वजह से किसी ने राजा की आवाज नहीं सुनी। ऐसे में राजा स्वयं उठे और पानी की तलाश करने लगे। राजा युवनाश्व को वह कलश दिखाई दिया जिसमें अभिमंत्रित जल था । वह इस बात से बेखबर थे कि ये जल किस उद्देश्य के लिए रखा है, राजा ने प्यास की वजह से सारा पानी पी लिया। जब इस बात की खबर ऋषि च्यवन को लगी तो उन्होंने राजा से कहा कि ये आपने क्या किया? ये मंत्रो से निरुद्ध किया गया खास जल था जिसमें ब्रह्मतेज स्थापित था और इसको पीने से आपकी पत्नी को महाबली, महापराक्रमी पुत्र उत्पन्न होता | चूंकि मैंने आपकी पत्नी की नाड़ी व अन्य जांच से यह जान लिया था कि आपकी पत्नी का गर्भाशय पूर्ण विकसित नहीं हैं अतः मैंने वैज्ञानिक तरीके से ऐसा रसायन बनाया था जो शरीर में जाकर गर्भाशय बना सकता था या अविकसित गर्भाशय को सन्तानोत्पत्ति के योग्य बना सकता है | चूंकि आप पुरुष है इसलिए ये अभिमंत्रित जल आपके शरीर से अभिक्रिया करके पेट के बायीं ओर एक गर्भाशय बना देगा और उसके अन्दर अण्डाणु भी स्त्रवित करेगा तत्पश्चात और स्वयं आपके शरीर में से शुक्राणु लेकर निषेचन कर देगा | यानी आज की भाषा में समझें तो जैसे कि मोबाइल में एप डाउनलोड करते समय एप का पासवर्ड जब एसएमएस पर आता है तो एप अपना पासवर्ड स्वयं उठा लेती है | अतः आपकी संतान अब आपके गर्भ से ही जन्म लेगी मैं एक अन्य औसधि दूंगा जिससे आपको गर्भधारण जनित कष्ट का अनुभव नहीं होगा |
जब संतान के जन्म लेने का सही समय आया तब देवों के चिकित्सक अश्विन कुमारों ने राजा युवनाश्व की बायीं कोख को काटकर बच्चे को बाहर निकाला और जन्म दिया | संभवतः विश्व में पहली बार ही पिता ने गर्भधारण करके सन्तान को जन्म दिया था साथ ही पेट काटकर ऑपरेशन से बच्चे का जन्म लेने की विश्व की यह प्रथम घटना है | दुनिया समझती है कि जूलियर सीजर ऐसा प्रथम व्यक्ति था जबकि वह घटना तब से कई हज़ार साल पहले ही पृथ्वीलोक पर मान्धाता के जन्म के रूप में घटी जा चुकी थी ।
बच्चे के जन्म के बाद यह समस्या उत्पन्न हुई कि बच्चा अपनी भूख कैसे मिटाएगा | चूकिं बच्चे ने पिता के गर्भ से जन्म लिया तो माता के स्तनों में दूध नहीं उतरा और पिता के स्तन ही नहीं थे | सभी देवतागण वहां उपस्थित थे, इतने में इंद्र देव ने उनसे कहा कि वह उस बच्चे के लिए मां की कमी पूरी करेंगे । इन्द्र ने अपनी अंगुली शिशु के मुंह में डाली जिसमें से दूध निकल रहा था और कहा “मम धाता” अर्थात मैं इसकी मां हूं । इसी वजह से उस शिशु का नाम ममधाता या मांधाता पड़ा। जैसे ही इंद्र देव ने शिशु को अपनी अंगुली से दूध पिलाना शुरू किया वह शिशु 13 बित्ता बढ़ गया । बालक ने चिंतनमात्र से धनुर्वेद सहित समस्त वेदों का ऐसे ही ज्ञान प्राप्त कर लिया था मानो कंप्यूटर में हार्ड डिस्क लगाकर डाटा डाउनलोड कर दिया हो और शीघ्र ही इंद्र की कृपा से उनके पास परम शक्तिशाली धनुष बाण और कवच इत्यादि आ गये | इसके बाद राजा युवनाश्व ने अपना राज पाट मांधाता को देकर उसे राजा बना दिया | इंद्र ने उसका राज्याभिषेक किया। मांधाता ने धर्म से तीनों लोकों को नाप लिया। बारह वर्ष की अनावृष्टि के समय इंद्र के देखते-देखते मांधाता ने स्वयं पानी की वर्षा की थी।
मान्धाता की राजधानी उस समय अयोध्या थी | मान्धाता भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे | उन्होंने नर्मदा नदी के तट पर खण्डवा के पास एक पहाड़ी पर शिवलिंग की स्थापना कर तपस्था की और नदी का रुख इस तरीके से घुमाया कि वहां ॐ बन गया | जो कि आज ओमकारेश्वर ज्योतिलिंग के नाम से प्रसिद्ध है | और वह स्थान मान्धाता पहाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुआ | बाद में मान्धाता अपनी राजधानी यहीं ले गये | यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं, जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और पचास कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं | मांधाता ने युद्ध में उस समय के लगभग सभी राजाओं जैसे कि अंगार, मरूत, असित, गय तथा बृहद्रथ आदि को पराजित कर पूरे पृथ्वीलोक पर अधिकार कर लिया था। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक का समस्त प्रदेश मांधाता का ही कहलाता था। उन्होंने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे और एक योजन ऊंचे रोहित नामक सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिये थे। दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करने के उपरांत मांधाता ने विष्णु के दर्शनों के निमित्त तपस्या की और भगवान विष्णु के वाराह अवतार का ध्यान करते हुये एकादशी का व्रत रखा जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने दर्शन दिये तथा क्षत्रियोचित कर्म का निर्वाह करने का उपदेश देकर अंतर्धान हो गये और तब से उस एकादशी का नाम बरुथिनी एकादशी रखा गया जो सर्वाधिक फल देने वाली एकादशी मानी जाती हैं |
जब मांधाता ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार कर लिया तो उनमे घमंड आ गया और अपनी शक्ति का गुमान हो गया था और अब वह स्वर्ग को जीतना चाहते थे । इससे इंद्र सहित अन्य देवता बहुत घबरा गये । उन्होंने मांधाता को आधा देवराज्य देना चाहा, पर वे नहीं माने। वे संपूर्ण देवलोक के इच्छुक थे | इस पर इंद्र ने ताना मारते हुये कहा कि कहा अभी तो सारी पृथ्वी ही तुम्हारे अधीन नहीं है, लवणासुर तुम्हारा कहा नहीं मानता।” मांधाता लज्जित होकर मृत्युलोक में लौट आये। उन्होंने लवणासुर के पास दूत भजा, जिसे उसने खा लिया। फिर दोनों ओर की सेनाओं का युद्ध हुआ | लवणासुर ने भगवान शंकर की तपस्या करके एक खास त्रिशूल प्राप्त किया था जिसका वार रोकना असंभव था | लवणासुर ने अपने त्रिशूल से राजा मांधाता और उसकी सेना को भस्म कर दिया । मांधाता की मृत्यु के बाद मुचकुन्द राजा बने |
ज्ञात रहे मान्धाता को अब तक का सम्पूर्ण विश्व के चारों युगों का सबसे महान, शक्तिशाली और प्रतापी राजा समझा जाता हैं | मान्धाता के चित्र बने सिक्के व मूर्तियां मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हुई है जिनसे यह जाना जा सकता है कि मान्धाता के राज्य का विस्तार कहां तक था | आज भी भारत का कोली (कोरी) समाज जोकि मुख्यतः महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश आदि में निवास करता है वह महाराज मान्धाता को ही अपना इष्टदेव मानता है | यह बात इस बात को भी सिद्ध करती है कि कोली समाज पहले क्षत्रिय कर्म भी करता था और हमारी वर्ण व्यवस्था जाति आधारित न होकर कर्म आधरित थी |
नमस्कार दोस्तों, जैसा कि मैंने पहले कई बार लिखा है कि हमारे प्राचीन भारत का विज्ञान हमारे आज के विज्ञान के मुकाबले में ज्यादा शानदार व तकनीकी दृष्टि से अच्छा था | इस बात के कई प्रमाण लगातार मिलते चले आए हैं जिन असामान्य घटनाओं का जिक्र हमारे वेदों पुराणों, महाभारत या रामायण में है और आज से 100-150 साल पहले हमें उनकी सत्यता पर विश्वास नहीं होता था पर आज हमें उनकी सच्चाई पर यकीन होने लगा है क्योंकि विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है और उन मूल घटनाओं से मिलती जुलती वैज्ञानिक घटनाओं को साकार कर दिया है तो हमें भी यह लगने लगा है कि हमारे पुरातन ग्रंथो में लिखी गयी बातें तार्किक रूप से ठीक थीं | बस जनसामान्य के पास कोई वैज्ञानिक आधार न होने से उनको लक्षणा व्यंजना समझा जाता रहा जबकि सत्य वही था और आज हमें उन घटनाओं की सत्यता को स्वीकारने में आसानी हो रही है |
पहले जब रामायण में सीता को उठा ले जाने के लिए रावण ने पुष्पक विमान का इस्तेमाल किया तो हिंदुओं के मन में शंका ही रही होगी कि क्या वास्तव में ऐसा भी कोई यंत्र होगा जिससे आदमी हवा में उड़ सकता हूं और उसके बाद हवाई जहाज के अविष्कार के बाद ये बात को समझना और स्वीकारना आसान हो गया था कि रामायण काल में हवाई जहाज का होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी |
दोस्तों पुराणों की इतिहास से जोड़ने की यह साधना चलती रहेगी | शीघ्र ही फिर आपसे मिलूंगा एक नई कहानी के साथ | आपके सुझावों व आलोचनाओं का इन्तजार रहेगा |

10 June, 2020

हनुमान चालीसा चौपाई 11 का हिंदी अनुवाद। Hanuman chalisa chaupayi 11 hindi translation


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



 ॥चौपाई 11॥
                                                           ॥लाये सजीवन लखन जिआए , 
                                                                 श्रीरघुबीर हरसि उर लाये॥11॥

अर्थ

अतुलित बलधामा हनुमान जी अपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों को बचाया तथा भगवान श्रीराम प्रसन्न होकर आपको अपने ह्रदय से लगा लिया।





हनुमान चालीसा चौपाई10 का हिंदी अनुवाद। Hanuman chalisa chaupayi 10 hindi translation.


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:




 ॥चौपाई 10॥
                                                  भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज सवारे ||

अर्थ

तुलसीदासजी लिखते हैं कि आपने विकराल रूप धारण करके राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उद्‍देश्यों को सफल कराया।




09 June, 2020

हनुमान चालीसा चौपाई 9 का हिंदी अनुवाद। Hanuman chalisa chaupayi 9 hindi translation.


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



 ॥चौपाई 9॥
                                                           ॥सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा, 
                                                                 विकट रूप धरि लंक जरावा॥9॥

अर्थ

हे महाबली हनुमानजी आप बुद्धि के सागर है आप स्थिति के अनुसार अपने रूप को धारण कर लेते है अतः जब आपने माता सीता से भेट कि तो लघु रूप धारण किया, तथा विकराल स्वरूप अपने धारण किया जब लंका दहन करने लगे।