पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

21 March, 2019

होलिका दहन एवं होली के त्योहार की कथा। Story of Holi festival and holika dahan.

होली एवं होलिका दहन:

भारत का प्राचीन त्योहार है होली। रंगों का यह त्योहार सम्पूर्ण भारत मे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। साथ ही यह त्योहार भारत के विभिन्न भागों में अलग अलग रिवाजो के और मान्यताओं के साथ मनायी जाती है, और यह अनेकता में एकता का प्रतीक है। काशी में जहां चिता की भस्म से होली खेलने का रिवाज है वहीं मथुरा की बृज भूमि में अलग अलग दिनों में फूलों, रंगों के साथ लट्ठमार होली मनाई जाती है।फ़ागुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन और रंगों का यह त्योहार जो बसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है।




होलिका दहन की कथा:

मान्यता है कि हिरण्यकश्यप नाम का दानव था जो भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद जो भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, उसका वध करने के लिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नही सकती, अतः उसे आदेश दिया कि वो प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ जाये।
होलिका, प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ गयी परंतु भगवान विष्णु को स्मरण करते हुए भक्त प्रह्लाद को कुछ नही हुआ, अपितु होलिका जल कर भस्म हो गयी। उसी के प्रतीकात्मक रूप में होलिका दहन का उत्सव किया जाता है।

होली की कथा:

होली की दो कथाये प्रचलित है एक राधा-कृष्ण और दूसरी शिव-पार्वती से जुड़ी हुई। दोनों में बसंत ऋतु के आगमन पर उत्सव को मनाने का वर्णन है।


राधा-कृष्ण की कथा:

मान्यता है कि वृज की पावन भूमि में गोकुल और बरसाने के लोग इकट्ठे होकर कई दिनों तक वसंत ऋतु के आगमन पर यह होली का त्योहार मनाया करते थे। भगवान कृष्ण गोकुल और राधा रानी बरसाने से आते और होली मानते थे।



शिव-पार्वती की कथा:

हिमालय की पुत्री पार्वती भगवान शिव से विवाह हेतु बड़ी कठोर तपस्या करी थी, परंतु भोलेनाथ ध्यानमग्न थे। तभी देवताओं ने कामदेव को भगवान की साधना भंग करने और मनोरथ पूर्ण करवाने के लिए भेजा। कामदेव में काम बांड चलाया जिशसे भगवान की साधना भंग हो गयी परंतु वो अत्यंत क्रोधित हो गए और अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया।
सभी देवताओं और कामदेव की पत्नी रति के निवेदन पर कामदेव को जीवित कर दिया। और कामदेव के कार्य की प्रसंसा की, तभी से बसंत के आगमन पर जब कामदेव का मान अधिक होता है, यह होली का त्योहार मनाया जाता है।


20 March, 2019

माता वैष्णो देवी की कथा। Story of Mata Vaishnon Devi.

वैष्णो देवी तीर्थ स्थल :

माता वैष्णो देवी का मंदिर जम्मू और कश्मीर के कटरा नामक स्थान से 15 किलोमीटर दूर लगभग 5,200 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है। माता वैष्णो देवी का यह स्थान हिन्दू तीर्थो का अतिमहत्वपूर्ण स्थान है, अतः भारत के अलावा विश्व भर से भक्त एवं श्रद्धालु यहाँ पर पूरे साल आते है। रेल , रोड और विमान मार्ग से इस स्थान तक पहुँचा जाता है, तथा चढ़ाई चढ़ने हेतु कई साधन उपलब्ध है। मुख्य मंदिर के अलावा यहां पर बाण गंगा, अर्धकुमारी, तथा भैरव बाबा मंदिर आदि दार्शनिक स्थल है।




माता वैष्णो देवी की प्रशिद्ध कथा:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कटरा के पास एक ग्राम में श्रीधर नामक ब्राह्मण रहता था, जो निःसंतान होने के कारण दुखी रहता था। परंतु वह माता का बहुत बड़ा भक्त था अतः वो हमेशा नवरात्रि का व्रत रहता था और कन्या भोजन करवाता था।
एक बार श्रीधर के घर कन्या भोजन के लिए आई हुई कन्याओं में माता भी बालिका के स्वरूप में श्रीधर के घर पर आई जिनका नाम वैष्णवी था , तथा कन्या भोजन के उपरांत सभी कन्यायें चली गयी पर कन्या रूपी माता नही गयी। और उंन्होने श्रीधर से आग्रह किया कि वो समस्त ग्राम वासियो को भोजन के लिए आमंत्रित करें। श्रीधर उस दिव्य कन्या की बात को मानते हुए समस्त ग्राम वासियो को आमंत्रित किया तथा अपने गुरु गोरखनाथ जी को उनके शिस्यो सहित आमंत्रित किया, उनके शिस्यो में भैरवनाथ भी थे। श्रीधर इस बात से विचलित थे कि इतने लोगो को भोजन कैसे कराऊंगा।
समस्त ग्राम वासियो के साथ गुरु गोरखनाथ अपने शिष्यों के साथ वहां पर आये साथ मे भैरवनाथ भी थे। जब कन्या रूपी माता सबको भोजन परोस रही थी और कोई परेशानी नही आ रही थी, उंन्होने श्रीधर की लाज रख ली थी। उनके दिव्य रूप को देखकर भैरवनाथ को शक हो गया और वो बोलने लगे कि मैं मांस एवं मदिरा का भोजन करूँगा। बहुत प्रयत्न पर भी वो नही माने, और कन्या रूपी माता को पकड़ने के लिए भागे। परंतु माता गायब हो गयी और पर्वत के ऊपर चली गयी, भैरवनाथ भी उनके पीछे भागा। माता की रक्षा के लिए हनुमान जी आये, माता ने उन्हें बाहर रुककर अपना पीछा कर रहे भैरवनाथ को रोककर रखने को कहा तथा वो गुफा में प्रवेश कर गयी, उस स्थान को अर्धकुमारी कहा जाता है जहां पर माता ने 9 महीने तक तपस्या की थी।



माता का पीछा करते हुए भैरवनाथ आया और हनुमानजी के साथ भयानक युद्ध हुआ, जब वह युद्ध विकराल हो गया और हनुमानजी परास्त होने लगे तो माता अपने दिव्य काली के रूप में बाहर आई और भैरवनाथ का अपने त्रिशूल से मस्तक काट दिया।
मस्तक कट जाने के बाद भैरवनाथ को अपने कृत्य का बोध हुआ और उसने छमा मांगी, माता ने बताया कि "तपस्या से प्राप्त सक्तियों के कारण तुम्हे अहंकार हो गया था इसलिए तुम मुझे पहचान नही पाए, परंतु अब मैं प्रसन्न हूँ अतः मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी और दोनों की पूजा के उपरांत ही यात्रा पूर्ण कहलाएगी"।
अतः वैष्णो देवी की यात्रा में माता के मंदिर में स्थित तीन पिंडियों जो महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती का रूप है लोग दर्शन करते है और बाद में भैरवनाथ के दर्शन करते है, जो उस स्थान पर स्थित है जहां पर भैरवनाथ का कटा हुआ सर गिरा था।




19 March, 2019

अमरनाथ धाम से जुड़ी कथा। Story of Amarnath Dham.

अमरनाथ धाम Amarnath Dham

हिमालय में स्थित अमरनाथ धाम भगवान शिव का प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहां पर बने भगवान शिव के प्राकृतिक शिवलिंग का दर्शन एवं पूजन के लिए लाखों की संख्या में भक्तगण उस स्थान की यात्रा पर जाते है। कई पुराणों के साथ शिवमहापुराण में भी इसकी कथा का वर्णन किया गया है।माना जाता है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का गूढ़ रहस्य इसी स्थान पर सुनाया था। उन्होंने इस स्थान का चयन इसीलिखे किया था क्योंकि उस स्थान पर कोई नही रहेगा , तथा उन्होंने अपने साथ रहने वाले गणों और वासुकी नाग एवं गंगा को भी पीछे छोड़कर गए थे।




अमरनाथ की कथा:

एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभु आप तो अजर अमर है किंतु मुझे बार बार जन्म लेना पड़ता है, और बड़ी घोर तपस्या के पश्चात आपकी प्राप्ति होती है अतः आप समक्ष अमरत्व का गूंध रहस्य का वर्णन करे। भगवान शिव ने तो पहले टालने की कोशिश की परंतु माता पार्वती के हट के कारण विवश हो गए और निर्जन स्थान की तलाश में अमरनाथ के स्थान को चुना।
क्योंकि वो माता पार्वती को एकांत में इस रहस्य का वर्णन करना चाहते थे अतः उन्होंने अपने साथ रहने वाले पंचमहाभूत गण जैसे नंदी, नाग, गणेश, चंद्र, और गंगा को त्याग दिया।
नंदी को पहलगाम में, वासुकी नाग को शेषनाग लेख नामक स्थान , गणेश , चंद्रमा तथा माता गंगा को भी अलग अलग स्थान में तयाग कर उस निर्जन गुफा में प्रवेश किये।
भगवान शिव ने माता को अमरत्व की कथा का वर्णन करना सुरु किया और वो कथा को सुनाने में लीन हो गए, माता पार्वती को नींद आ गयी। उसी स्थान पर कबूतरों का एक जोड़ा था जो यह कथा सुन रहा था, तथा माता पार्वती के सोजाने पर हूं हूं कि आवाज कर रहे थे। भगवान भोलेनाथ कथा कहने में इतने लीन हो गए कि उन्हें पता ही नही चला।
कथा की समाप्ति के पश्चात उंन्होने देखा कि पार्वती जी सोगयीं है और कबूतर कथा सुन रहे थे तो उन्हें क्रोध आया और वो उन्हें मारने गए , परंतु कबूतरों का वह जोड़ा भगवान की शरण मे आ गया। भगवान ने उन्हें छमा कर वही सदा के लिए रहने को कहा।

16 March, 2019

महर्षि वाल्मीकि का जीवन और कथाये। Story of Maharishi Valmiki.

महाऋषि वाल्मीकि Maharishi Valmiki:

महाऋषि वाल्मीकि को "आदिकवि" एवं भगवान के तुल्य माना गया है। महाऋषि वाल्मीकि जी ने सर्वप्रथम संस्कृत भाषा मे माह काव्य "रामायण" की रचना की थी। भगवान राम के ऊपर आधारित उनकी यह रचना महाकाव्य रामायण को "वाल्मीकि रामायण" भी कहा जाता है। अपने महाकाव्य "रामायण" में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोलविद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञानी थे। वाल्मीकि जी ने यह "रामायण" की रचना भगवान राम के पृथ्वी पर रहते ही कर दी थी, तथा उन्होंने भविष्य की घटनाओं की भी व्याख्या कर दी थी क्योंकि वो त्रिकालदर्शी थे।

महाऋषि वाल्मीकि जी को रामायण की प्रेरणा:

एक बार वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि बहेलिये ने प्रेम-मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥'

हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।
उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य "रामायण" (जिसे कि "वाल्मीकि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है) की रचना की और "आदिकवि वाल्मीकि" के नाम से अमर हो गये।


महाऋषि वाल्मीकि का अन्य ग्रंथों के अनुसार जीवनपरिचय:

ऐसी प्रचलित कथा है कि महर्षि वाल्मीकि का मूल नाम रत्नाकर था और इनके पिता ब्रह्माजी के मानस पुत्र प्रचेता थे। एक भीलनी ने बचपन में इनका अपहरण कर लिया और भील समाज में इनका लालन पालन हुआ। भील परिवार के लोग जंगल के रास्ते से गुजरने वालों को लूट लिया करते थे। रत्नाकर ने भी परिवार के साथ डकैती और लूटपाट का काम करना शुरू कर दिया।
लेकिन ईश्वर ने इनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। एक दिन संयोगवश नारद मुनि जंगल में उसी रास्ते गुजर रहे थे जहां रत्नाकर रहते थे। डाकू रत्नाकर ने नारद मुनि को पकड़ लिया। इस घटना के बाद डाकू रत्नाकर के जीवन में ऐसा बदलाव आया कि वह डाकू से महर्षि बन गए। दरअसल जब वाल्मीकि ने नारद मुनि को बंदी बनाया तो नारद मुनि ने कहा कि, तुम जो यह पाप कर्म करके परिवार का पालन कर रहे हो क्या उसके भागीदार तुम्हारे परिवार के लोग बनेंगे, जरा उनसे पूछ लो। वाल्मीकि को विश्वास था कि सभी उनके साथ पाप में बराबर के भागीदार बनेंगे, लेकिन जब सभी ने कहा कि नहीं, अपने पाप के भागीदार तो केवल तुम ही बनोगे तो वाल्मीकि का संसार से मोह भंग हो गया। और उनके अंदर महर्षि प्रचेता के गुण और रक्त ने जोर मारना शुरू कर दिया और उन्होंने नारद मुनि से मुक्ति का उपाय पूछा।
नारद मुनि ने रत्नाकर को राम नाम का मंत्र दिया। जीवन भर मारो काटो कहने वाले रत्नाकर के मुंह से राम नाम निकल ही नहीं रहा था। नारद मुनि ने कहा तुम मरा-मरा बोलो इसी से तुम्हें राम मिल जाएंगे। इस मंत्र को बोलते-बोलते रत्नाकर राम में ऐसे रमे कि तपस्या में कब लीन हो गए और उनके शरीर पर कब दीमकों ने बांबी बना ली उन्हें पता ही नहीं चला। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने दर्शन दिए और इनके शरीर पर लगे बांबी को देखा तो रत्नाकर को वाल्मीकि नाम दिया और यह इस नाम से प्रसिद्ध हुए। ब्रह्माजी ने इन्हें रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी।

14 March, 2019

बाली और सुग्रीव के जन्म की रोचक कथा। Intresting Birth story of Bali and Sugriv.

बाली और सुग्रीव का परिचय Introduction of Bali and Sugriv:




बाली और सुग्रीव वानर कुल ने जन्मे परमवीर सगे भाई थे, जिनकी कथा का वर्णन रामायण में मिलता है। बाली और सुग्रीव के लौकिक पिता का नाम वानर राज ऋछराज था परंतु दोनों के औरस पिता अलग अलग थे, जहां बाली के औरस पिता देवराज इंद्र थे वही सुग्रीव के पिता सूर्य देव थे। दोनों भाई परम बलवान थे तथा इनके पराक्रम की कई कथाओ का वर्णन अनेक ग्रंथो एवं पुराणो में मिलता है। बाली की पत्नी का नाम तारा तथा पुत्र का नाम अंगद था। सुग्रीव कि पत्नी का नाम रूमा या रोमा था।
रामायण के अनुसार भगवान राम ने सुग्रीव से मित्रता की तथा बाली का वध करके उसका राज्य एवं पत्नी दिलवाए। और श्रीराम की अगुवाई में सुग्रीव की वानर सेना ने लंका में चढ़ाई कर युद्ध जीत कर माता सीता को मुक्त करवाया।


बाली और सुग्रीव की जन्म की कथा Birth Story of Bali and sugriv:


ऋछराज वानरों का राजा तथा बहुत ही वलवान एवं पराक्रमी था। वह अपने बल के मद में ऋषिमुख पर्वत के आसपास विचरता रहता था। उसी ऋषिमुख पर्वत के पास एक सरोवर था जिसमे स्नान करने से कोई भी व्यक्ति का शरीर सुंदर स्त्री का बन जाता था। यह बात ऋछराज को पता नही थी , अतः उसने एक दिन उत्साह में उस सरोवर में छलांग लगा दी। जब वह बाहर आया तो उसका स्वरूप एक अतिसुन्दर स्त्री का हो गया। उसे इस रूप को देखकर बहुत शर्म आयी परंतु वह कुछ नही कर सकता था।
उसी समय वहां देवराज इंद्र गुजर रहा था जिसकी नजर ऋछराज के स्त्री स्वरूप पर पड़ी और उसके सौंदर्य को देखकर स्खलित हो गये, तथा उसका वीर्य उस स्त्री के बालों पर गिरा जिससे बाली का जन्म हुआ।
वही अगले दिन जब सुर्योदय हुआ तो सूर्य देव भी उस स्त्री के सौंदर्य को देखकर मोहित हो गए और वीर्य स्खलित हो गया जो उस स्त्री में ग्रीवा(गर्दन या गला) में गिरा जिसके कारण सुग्रीव का जन्म हुआ।
उसके बाद ऋछराज ने उसी स्त्री स्वरूप में ही दोनों का पालन किया, जो उन दोनों बाली और सुग्रीव के पिता तथा माता थे परंतु दोनों इंद्र तथा सूर्य के औरस पुत्र थे।

13 March, 2019

रावण कि पत्नी मंदोदरी की कहानी। Story of Raven's wife Mandodri.

मंदोदरी का परिचय Introduction of Mandodri:

रावण कि पत्नी के रूप में मंदोदरी का परिचय दिया जाता है, तथा वर्णन भी रामायण तथा अन्य ग्रंथो में सीमित है। परंतु जानना चाहिये कि मंदोदरी पांच कन्याओं में से है जिन्हें चिर कुमारी होने का वरदान था। मंदोदरी मयासुर(मयदानव) की पुत्री थी तथा रावण के महावीर पुत्रों जैसे मेघनाथ और अचयकुमार आदि की माता थी। उनकी माता का नाम हेमा था। अद्दभुद रामायण के अनुसार उनका विवाह रावण कि मृत्यु के पश्चात विभीषण के साथ हुआ था। कुछ कथायों के अनुसार मंदोदरी पूर्व जन्म में एक अप्सरा थी जिन्हें माता पार्वती ने श्राप दिया था।


मंदोदरी के जन्म तथा विवाह की कथा Birth and marriage Story of Mandodari:


मंदोदरी के जीवन को रामायण सहित पुराणों में सीमित है क्योंकि वहां पर श्रीराम नायक है और कहानी माता सीता और रावण तक रहती है। परंतु मंदोदरी एक दिव्य कन्या थी और उनका योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण था।

उनके जन्म के विषय मे दो कथाये कही गयी है:

पहली कथा: मंदोदरी कि माता जिनका नाम हेमा था वो एक अप्सरा थी और स्वर्ग लोक में इंद्र की अप्सराओं में से थी। उनका रूप सौंदर्य बहुत सुंदर था। हेमा कि सुंदरता को देखकर मयासुर या मयदानव मोहित हो गया और विवाह का प्रस्ताव रखा। हेमा ने उनका प्रस्ताव माना और विवाह के उपरांत उनकी परम तेजस्वी पुत्री का जन्म हुआ जिसका नाम मंदोदरी था। मंदोदरी को चिर कुमारी होने का वरदान भगवान शिवजी से मिला था।


दूसरी कथा: इस कथा के अनुसार मंदोदरी पूर्व जन्म में एक अप्सरा थी जो एक दिन कैलास पर्वत में गयी तब भगवान शिव योग मुद्रा में थे। जहां पर वो भगवान भोलेनाथ को देखकर मोहित हो गयी और उन्हें रिझाने की कोशिश करने लगी परंतु भगवान शिव ध्यानमग्न ही रहे। उसी समय वहां माता पार्वती आ गयी और उन अप्सरा के शरीर मे भगवान की भस्म देखकर नाराज हो गयी और और मेढकी होने का श्राप दे दिया। बहुत छमा मांगने पर तथा शिवजी के आग्रह पर उन्होंने उसे 12वर्ष के लिए मेढकी रहने का समयबद्व कर दिया और पृथ्वी पर एक कुएं में रहने को कहा।
जब मयासुर और हेमा को कोई पुत्री नही थी तो उन्होंने भगवान शिव से पुत्री मांगी, तभी मेढकी का 12 वर्ष भी पूरे हो रहे थे तो शिव जी ने उसे पुत्री के तौर पर मयासुर को दे दिया।

मंदोदरी के विवाह:

विवाह के बारे में कहा जाता है कि जब रावण मयासुर के घर गया और वहां पर मंदोदरी को देख कर वो आकर्षित हो गया, और विवाह का प्रस्ताव रखा। 
मयदानव ने मंदोदरी के जन्म के बारे मे रावण को बताया, और कहा कि वो एक दिव्य कन्या है और उन्हें नीति, न्याय, धर्म का पूर्ण ज्ञान है अतः तुम्हे मंदोदरी को ही अपनी मुख्य पटरानी बनाना होगा। रावण ने उनकी इस शर्त को मंजूर किया और मंदोदरी से विवाह किया।


विभीषण की भी पत्नी हुई थी मंदोदरी:

अद्दभुद रामायण के अनुसार कहा जाता है कि मंदोदरी का दूसरा विवाह रावण की मृत्यु के पश्चात विभीषण के साथ हुआ था। उन्हें यह विवाह करने के लिए भगवान राम ने ही कहा था। भगवान श्रीराम ने उन्हें इसीलिए कहा था क्योंकि उनके पास राजनीति, और धर्मनीति का गुण था और वो दिव्य कन्या थी, अतः लंका के पुनः सृजन और सुचारू रूप से चलाने के लिए यह सुझाव दिया था।

12 March, 2019

महातपस्विनी शबरी कि कहानी। Story of Shabri in hindi.

कौन थी शबरी Who was Shabri?

रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में जब श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ माता सीता की खोज कर रहे थे तब पाम्पा सरोवर के पास मतांगमुनि के आश्रम में श्रीराम की अपने परम भक्त एवं भील जाती कि महातपस्विनी शबरी से मुलाकात हुई। श्री राम ने उन्हें माता कह कर संबोधित किया था, तथा उनके जुंठे बेर भी खाए। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रसंग में माता शबरी और श्रीराम जी के साथ जिस तरह से प्रस्तुत किया वो इस देश के जातिगत कुरीति को खत्म करने का प्रयास था , तथा यह अनूठा उदाहरण दिया कि भगवान अपने भक्तों में भेद नही करते।


माता शबरी के जीवन की कथा Story of Mata Shabri:

भगवान राम के जीवन की कथा सर्वप्रथम महाऋषि बाल्मीकि जी लिखी तथा बाद में लगभग सभी भाषाओं में इसका अनुवाद अनेक महापुरुषों ने अपने अनुसार किया। अवधि में गोस्वामी तुलसीदास जी मे रामचरितमानस की रचना कि जिसमे शबरी प्रसंग का वर्णन किया। 
माता शबरी का जन्म एक भील कुल में हुआ था, जिसे आदिवाशी समुदाय से जोड़ा जाता है। परंतु उनके अंदर धर्मकार्य, तथा ज्ञानार्जन कि रुचि थी। अतः उन्होंने विवाह नही किया और अपना घर को त्याग कर ऋषि मुनियों की सेवा तथा ज्ञान अर्जन के लिये वन में गए। परन्तु उनकी जाति के कारण अनेक ऋषियों और मुनियों ने उनको स्थान नही दिया, तब वो महाऋषि मतांगमुनि के आश्रम में गयी , उनकी भक्ति भाव तथा सेवा का भाव देखकर शबरी को सेवा का मौका दिया। शबरी ने पूरी निष्ठा तथा अनुशासन से गुरु कि सेवा की तथा आशिर्वाद एवं सिद्धि प्राप्त की।


जब मतांगमुनि अपने शिष्यों के साथ धरती छोड़ कर गए तो शबरी को उनकी भक्ति एवं निष्ठा को देखकर उन्हें आश्रम में रहने के लिये कहा , तथा बताया कि भगवान विष्णु जब श्रीराम के रूप में अवतार लेंगे तथा सीता की खोज में आएंगे, तो उन्हें सुग्रीव से मिलने का रास्ता बताए तथा उनसे भक्ति का ज्ञान प्राप्त करे। माता शबरी तभी से वहां पर श्रीराम के आने की राह देखती रही तथा नित्य उनके स्वागत की तैयारी करती रही।


माता शबरी से जुड़ी लोक कथा Folk talk related to Mata Shabri:


एक कथा के अनुसार माता शबरी एक भील कुल कि कन्या थी जिनके उनके अंदर भक्ति भाव तथा सभी जीवों के प्रति समान भाव प्रखर था। उनके कुल में सभी प्रयोजनों में जानवरों की बली प्रथा थी , परन्तु शबरी गलत समझती थी। अतः उनके विवाह में किसी जीव की हत्या न हो इएलिये उंन्होने घर को त्यागकर वन में ऋषयों और मुनियों की सेवा का राह चुना जहां पर उन्हें मतांगमुनि के साथ साथ कई महामुनियों की सेवा का मौका मिला। तथा अंत मे प्रभु श्रीराम के दर्शन पाकर उस परमपद को प्राप्त किया जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।



11 March, 2019

कलयुग के आगमन और राजा परीक्षित की कथा। Story of Arrival of Kalyug and King Parichit

राजा परीक्षित कौन थे?

परीक्षित का जन्म पांडवो के कुल में हुआ था जो बहुत बड़े धर्मनिष्ठ राजा थे, जब पांडवो ने हिमालय की ओर महाप्रयाण किया था तो राज्य का दायित्व परीक्षित को सौप दिया था। परीक्षित प्रजापालक एवं कर्तव्यनिष्ठ राजा थे उंन्होने तीन अश्वमेध यज्ञ किये तथा कई धर्मनिष्ठ कार्य किये।
पुराणो के अनुसार चार युग निर्धारित है जो है सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलयुग। माना जाता है कि द्वापरयुग कि समाप्ति तथा कलयुग का आगमन भगवान श्रीकृष्ण के बैकुण्ठ प्रस्थान के साथ हुआ। कलयुग का आगमन कैसे हुआ और उसका प्रभाव कैसे बढ़ा इसकी राजा परीक्षित से जुड़ी हुई कथा कई पुराणों के साथ श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है।

चित्र साभार: dailyhunt

कलयुग का आगमन और प्रभाव:


जिस समय परीक्षित का राजकाल चल रहा था उन्हीं दिनों धर्म ने बैल का रूप बना कर तथा पृथ्वी गाय का रूप रखकर सरस्वती तट पर गए थे। धर्म ने पृथ्वी से पूछा - "हे देवि! आप क्यों चिंता कर रही है? क्या आप इसलिए दुःख तो नही कर रही है कि मेरा एक ही पैर बचा है?
पृथ्वी बोली- "हे धर्म! तुम सर्वज्ञ होकर भी मुझ से मेरे दुःख का कारण पूछते हो! प्रभु श्रीकृष्ण धरती से गये है यही मेरे दुख का कारण है, क्योंकि उनके निर्मल चरण मुझ पर पड़ते थे। जब धर्म और पृथ्वी ये बातें कर ही रहे थे कि मुकुटधारी शूद्र के रूप में कलियुग वहाँ आया और उन दोनों को मारने लगा।
उसी समय राजा परीक्षित वहीं पर से गुजर रहे थे। उन्होंने मुकुटधारी शूद्र को हाथ में डण्डा लिये एक गाय और एक बैल को बुरी तरह पीटते देखा। वह बैल अत्यन्त सुन्दर था, उसका श्वेत रंग था और केवल एक पैर था। गाय भी कामधेनु के समान सुन्दर थी। दोनों ही भयभीत हो कर काँप रहे थे।
महाराज परीक्षित ने जोर से कहा- दुष्ट! पापी! तू कौन है? इन निरीह गाय तथा बैल क्यों सता रहा है? तू महान अपराधी है। तेरे अपराध का उचित दण्ड तेरा वध ही है।" उनके इन वचनों को सुन कर कलियुग भय से काँपने लगा।
इतना कह कर राजा परीक्षीत ने उस पापी शूद्र राजवेषधारी कलियुग को मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत होकर अपने राजसी वेष को उतार कर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और त्राहि-त्राहि कहने लगा। तथा धर्म तथा पृथ्वी भी अपने रूप में आ गए और अपने दुख का कारण सम्राट परीक्षित को बताया।
सम्राट परीक्षित बोले "हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है इसलिये मैंने तुझे प्राणदान दिया। किन्तु अधर्म, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। अतः तू मेरे राज्य से तुरन्त निकल जा और लौट कर फिर कभी मत आना।"
राजा परीक्षित के इन वचनों को सुन कर कलियुग ने कहा - कि हे राजन यह सारी पृथ्वी तो आपकी ही है और इस समय मेरा पृथ्वी पर होना काल के अनुरूप है, क्योंकि द्वापर समाप्त हो चुका है।
कलियुग इस तरह कहने पर राजा परीक्षित सोच में पड़ गये। फिर विचार कर के उन्होंने कहा - "हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। इन चार स्थानों में निवास करने की मैं तुझे छूट देता हूँ।"
इस पर कलियुग बोला - "हे राजन! ये चार स्थान मेरे निवास के लिये अपर्याप्त हैं। दया करके कोई और भी स्थान मुझे दीजिये।" कलियुग के इस प्रकार माँगने पर राजा परीक्षित ने उसे पाँचवा स्थान 'स्वर्ण' दिया। कलियुग इन स्थानों के मिल जाने से प्रत्यछ रूप से तो वहाँ से चला गया किन्तु कुछ दूर जाने के बाद अदृष्य रूप में वापस आकर राजा परीक्षित के स्वर्ण मुकुट में निवास करने लगा। 
इसके बाद एक दिन परिक्षित शिकार के लिए गए। वहां बहुत भटके और भूख और प्‍यास के मारे उनका बुरा हाल था । शाम के समय थके हारे वह शमिक ऋषि के आश्रम पहुंचे ऋषि उस समय समाघि में लीन थे।
परिक्षित ने कहा कि हमें प्‍यास लगी है हमें पानी चाहिए यहां और कोई भी नही है क्‍या आप सुन रहे है हम राजा परिक्षित बोल रहे है हमें प्‍यास लगी है हमें पानी चाहिए आपको सुनाई नही देता क्‍या ऋषि उस समय समाघि में लीन थे राजा ने दो-तीन बार पानी मांगा परंतु ऋषि की समाघि नही टूटी।
राजमुकुट मैं बैठे कलयुग की प्ररेणा से उनकी सात्‍विक बुद्धि भ्रष्‍ट हो गई और उन्‍होने ऋषि को दंड देने का फैसला किया । परंतु राजा के अच्छे संस्‍कारो के कारण उन्‍होनें अपने-आप को उस पाप से रोक लिया । क्रोध वश उन्‍होने मरा हुआ सांप ऋषि के गले में डाल दिया । उस शमिक ऋषि का पुत्र शृंगी बडा ही तेजस्‍वी था उस समय वह नदी में नहा रहा था। दूसरे ऋषि कुमारों ने जाकर सारा वृत्तांत सुनाया कि किस प्रकार एक राजा ने उसके पिता का तिरस्‍कार किया है । उनकी बात सुनकर वह क्रोध से पागल हो गया और उसी क्षण नदी का जल अंजुली में भरकर राजा को श्राप दिया जिस अभिमानी और मूर्ख राजा ने मेरे महान पिता का घोर अपमान किया है वह महापापी आज से सांतवे दिन तक्षक नाग की प्रचंड विषाग्नी में जलकर भस्‍म हो जायेगा।
महल में वापस लौट कर आने पर जब राजा ने अपना मुकुट उतारा तो उनको अपनी गलती का बोध हुआ, लेकिन वहुत छमा प्रार्थना के बाद भी उन्हें श्राप से मुक्ति नही मिली , लेकिन सात दिन में पुण्यकर्म के लिए श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण करने को ऋषि द्वारा बताया गया।

10 March, 2019

कुंती के जीवन कि कथा। Story of Kunti in hindi

कुंती का जन्म एवं परिचय 


महाभारत में वर्णित कुंती हस्तिनापुर के राजा पाण्डु की पहली पत्नी तथा पांडवो में से प्रथम तीन की माता थी। कुंती भगवान श्रीकृष्ण के पितामह यदुवंश के राजा सूरसेन की कन्या थी। पहले उनका नाम पृथा था, वो अतयंत रूपवान थी जिसके कारण उनकी कीर्ति सभी ओर फैली हुयी थी। राजा सूरसेन के फूफा के भाई कुन्तिभोज को कोई संतान न होने कारण राजा सूरसेन ने पृथा को कुन्तिभोज को पुत्री रूप में गोद दे दिया था , जिसके कारण कुंती का नाम पृथा से कुंती को गया था। भगवान श्री कृष्णा उन्हें बुआ कहकर सम्बोधित करते थे। कुंती को राजनीती तथा धर्म निति का सम्पूर्ण ज्ञान था। अतः उन्हें पांच कन्याओं में स्थान प्राप्त है। उन्हें चिरकुमारी होने का वरदान दुर्वाशा ऋषि से प्राप्त था।

कुंती को वरदान प्राप्ति की कहानी


कुंती के विवाह के पहले जब वो अपने पिता महाराज कुन्तिभोज के यहाँ रहती थी, एक दिन महा तपस्वी ऋषि दुर्वाशा का आगमन हुआ, जिनका स्वागत कुंतीभोज के महल में बड़े ही भाभ्या तरीके से हुआ इस अवसर पर कुंती ने एक वर्ष तक उनकी बहुत ही लगन के साथ और पूरी निष्ठां के साथ मन लगाकर सेवा की जिससे महर्षि दुर्वासा बहुत प्रसन्न हुए। महर्षि दुर्वासा त्रिकाल दर्शी थे अतः उन्होंने कुंती के भविष्य को देख लिया और कुंती को वरदान स्वरुप एक मंत्र दिया, और कहा कि वो जिस भी देवता का इस मंत्र के पश्चात स्मरण करेगी वो प्रगट होगा और तुम्हे पुत्र देकर जायेगा।
महर्षि दुर्वाशा के चले जाने के बाद कुंती को संदेह हुआ कि क्या सच में यह मन्त्र फलीभूत होता है, एक दिन संध्या के समय कुंती में सूर्य भगवान को देखा तो उसे अपने मंत्र के सिद्धि को जानने कि इक्छा हुयी , उसने मंत्र पढ़कर सूर्य देव का स्मरण किया तो सूर्य देवता प्रगट हो गए और बोले मई तुम्हे पुत्र देने आया हूँ। कुंती डर गयी और बोली भगवान मैं तो केवल अपने मंत्र को जाँच रही थी और मेरा अभी विवाह नहीं हुआ है तो मैं मां नहीं बन सकती हूँ । सूर्य देवता ने कहा कि यह मंत्र अमोख अतः पुत्र तो मैं देकर जाऊंगा परन्तु तुम पुत्र जन्म के उप्रान्त भी कुवारी रहोगी। अतः सूर्य देव के आशीर्वाद से कुंती को एक परम तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ जो अभेद्य कवच और कुण्डल धारण किये हुए था। 
कुंती ने लोग लाज के भय से उस पुत्र को गंगा में बहा दिया जो हस्तिनापुर के राजशरथी अधिरथ को मिला , अधिरथ को कोई संतान नहीं थी अतः उसने उसे पाला और बड़ा होकर वह "कर्ण" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कुंती का विवाह एवं पुत्रों के जन्म कि कहानी 


कुंती के विवाह हेतु रहा कुन्तिभोज ने एक स्वम्वर का आयोजन किया जंहा पर समस्त देशों के राजा और राजकुमार उपस्थित हुए। वंही पर हस्तिनापुर के नरेश महाराज पाण्डु भी आये थे , कुंती को उनका रूप सौंदर्य पसंद आया और उनको ही अपने पति के रूप में चुन लिया। कुंती के विवाह के उपरांत पाण्डु का एक और विवाह हुआ जिन्हे नाम माद्री था। 
पाण्डु को एक ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कारण पुत्र पैदा करने में असमर्थ हो गए तब कुंती ने ऋषि दुर्वाशा के दिए हुए मंत्र का इस्तेमाल करके तीन पुत्र उत्पन किये पहला धर्मराज से "युधिष्ठिर" , दूसरा पवन देव से "भीम" तीसरा इन्द्र से "अर्जुन" । उसके बाद उन्होंने अपने मंत्र से पाण्डु कि दूसरी पत्नी माद्री से "नकुल" एवं "सहदेव" पैदा हुए।




09 March, 2019

ध्रुव कि तारा बनने की कथा। Story of Dhruv to becoming Star in hindi.

ध्रुव के तारा बनने की कथा: 


ध्रुव कि कथा का वर्णन कई पुराणो में है उनकी श्रीमद्भागवत में वर्णित कथा के अनुसार, मनु और शतरुपा के पुत्र थे उत्तानपाद। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियां थीं। राजा उत्तानपाद को सुनीति से ध्रुव और सुरुचि से उत्तम नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। पहली पत्नी सुनीति के पुत्र न होने की वजह से राजा उत्तानपाद ने दूसरी शादी की थी जिनका नाम सुरुचि था। उत्तानपाद के दूसरे विवाह के पश्चात सुनीति को वन भेज दिया गया था क्योंकि यही उनकी दूसरी पत्नी सुनीति की शर्त थी।

चित्र साभार: riligiuskart

एक बार उत्तानपाद वन में शिकार पर गए और घायल हो गए, यह बात सुनीति को पता चली तो उसने उत्तानपाद को अपनी कुटिया पर ले गयी और उत्तानपाद की सेवा करके ठीक कर लिया, इन्ही कुछ दिनों तक साथ रहने के कारण सुनीति गर्भवती हो गयी और ध्रुव नामक पुत्र को जन्म दिया।
कुछ समय पश्चात उत्तानपाद ध्रुव को अपने महल में ले आये, और साथ मे रखने लगे। ध्रुव को उनकी माँ ने बताया था कि अगर उनको महल में प्यार न मिले तो भगवान की भक्ति करे जिनसे उनको प्यार मिलेगा।
एक दिन उत्तानपाद की गोद में खेलते देख उत्तानपाद की दूसरी पत्नी सुरुचि का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। सौतन के पुत्र को अपने पति की गोद में वह बर्दाश्त न कर सकी। उसका मन ईष्र्या से जल उठा। उसने झपट कर बालक ध्रुव को राजा की गोद से खींच लिया और अपने पुत्र उत्तम को उसकी गोद में बिठा दिया तथा बालक ध्रुव से बोली, अरे मूर्ख! राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है जो मेरी कोख से उत्पन्न हुआ हो। सुरूचि ने कहा कि तू मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हुआ है। इसलिए तुझे इनकी गोद में या राजसिंहासन पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है।
पांच वर्ष के ध्रुव को अपनी सौतेली मां के व्यवहार पर क्रोध आया, और वह भागते हुए अपनी मां सुनीति के पास आए तथा सारी बात बताई। सुनीति बोली, बेटा! तेरी सौतेली माता सुरुचि से अधिक प्रेम के कारण तुम्हारे पिता हम लोगों से दूर हो गए हैं। अतः तुम भगवान श्रीहरि की भक्ति करो वो तुम्हे अपनी गोद मे बैठा लेगे।
उसके बाद यमुना के तट पर ध्रुव में भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की और उसकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान भक्तवत्सल प्रगट हुए और वरदान मांगने को कहा। तब ध्रुव ने कहा कि मुझे अपने पिता से प्यार नही मिला है और मेरी माता कहती है कि आप संसार के पिता है तो आप मुझे अपनी गोद मे बिठा लीजिए। अतः भगवान विष्णु में उनको तारा बनने का आशीर्वाद दिया जिसके बाद उन्हें सप्तर्षियों से भी उच्च स्थान प्राप्त हुआ।