पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

19 August, 2019

नटराज कि प्रतिमा में भगवान शिव के पैरों में पड़े "अपस्मार" की कथा। Story of Apasmaar and Lord Shiv.

अपस्मार की कथा जो भगवान शिव से जुड़ी है:

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अपस्मार एक बौना था जो अज्ञानता और मिर्गी का प्रतिनिधित्व करता था। उन्हें मुयालका या मुल्याकन के रूप में भी जाना जाता है। दुनिया में ज्ञान को संरक्षित करने के लिए, अपस्मार को नहीं मारा जा सकता था। अगर ऐसा करने के लिए ज्ञान और अज्ञान के संतुलन को बाहर कर दिया जाएगा - जैसा कि अपस्मार को मारने का मतलब होगा प्रयास, समर्पण और कड़ी मेहनत के बिना ज्ञान प्राप्त करना। नतीजतन, यह सभी रूपों में ज्ञान के अवमूल्यन के लिए प्रेरित करेगा। 

आपस्मरा को वश में करने के लिए, भगवान शिव ने नटराज - नृत्य के भगवान के रूप को अपनाया और एक अलौकिक नृत्य का प्रदर्शन किया। इस नृत्य के दौरान, नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपसमार दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।




अपस्मार और भगवान शिव और माता आदिशक्ति की कथा:


कुछ पौराणिक कथाओ के अनुसार एक बार अपस्मार जो कि एक बौना राक्षस था और उसके पास कई शक्तियां थी, उसने अपनी शक्तियों के मद में माता आदिशक्ति पे एक ऐसे मंत्र का प्रयोग किया जिससे माता आदिशक्ति की समस्त शक्तियां चिह्रीं हो गयी। 
हालांकि यह बहुत कम समय के लिए हुआ था परंतु महादेव उसके इस कृत्य से बहुत क्रोधित हुए। और उन्होंने नटराज का रूप रखकर अलौकिक नृत्य करने लगे ।



महादेव के प्रचंड तांडव और डमरू कर ध्वनि से अपस्मार के मस्तिस्क की नसें फटने लगी और वो महादेव के चरणों मे आकर गिर गया। नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपस्मार का दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।

17 August, 2019

माता सती की कथा और दक्ष प्रजापति जो शिवजी के ससुर थे। Story of Daksh prajapati and mata sati .

दक्ष प्रजापति और माता सती की कथा:

स्वायम्भुव मनु की तीन पुत्रियाँ थीं – अकुति, देवहूति और प्रसूति। इनमें से प्रसूति का विवाह दक्ष नाम के प्रजापति से हुआ। दक्ष को 16 कन्याओं की प्राप्ति हुई। इनमें से एक थी ‘सती’ जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था, उनको किसी संतान की प्राप्ति नहीं हुई, क्योंकि उन्होंने युवावस्था में ही अपने पिताजी के यहाँ देह का परित्याग कर दिया था।
यह कथा शिवमहापुराण के साथ साथ कई पुराणों में वर्णित है। इसमें दक्ष प्रजापति का भगवान महादेव के प्रति उत्पन्न हुई गलत भावनाओं के कारण हुआ था।



दक्ष प्रजापति का भगवान शिव पर क्रोधित होना और श्राप देना:

एक दिन दक्ष प्रजापति त्रिदेव से मिलने गए जहाँ पर उनके जाने पर कोई भी उठकर खड़ा नही हुआ, दक्ष ने सोचा- मेरे आने पर ये खड़ा नहीं हुआ, ये कितना उद्दंड है। मैंने तो अपनी मृगनयनी बेटी का विवाह इस मरकट-लोचन के साथ कर दिया इसको तो कोई सभ्यता, शिष्टाचार ही नहीं। इस तरह से दक्ष ने भगवान शिव को बहुत अपशब्द बोले और खूब गाली-गलोच किया। जब दक्ष ने देखा की उसकी गाली देने के बाद भी शिवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है, तब उसने हाथ में जल लेकर शाप दे दिया- ‘आज के बाद किसी यज्ञ में तुम्हारा हिस्सा नहीं होगा।’ भगवान शिव तब भी कुछ नहीं बोले। दक्ष ऐसा शाप देकर सभा से चला गया।

दक्ष प्रजापति से नही रहा गया और उन्होंने शिवजी को और अपमानित करने की एक योजना बनाई , और एक बहुत विशाल यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने समस्त देवताओं और संसार के समस्त ऋषि मुनियों को बुलाया परंतु भगवान भोलेनाथ को नही बुलाया।

हरिद्वार में कनखल नामक स्थान पर यज्ञ का आयोजन है। सारे देवता कैलाश पर्वत से होकर आ रहे हैं तो सती और भगवान शंकर को प्रणाम करके जा रहे हैं।
सती ने पूछा- कहाँ जा रहे हो?
उन्होंने कहा- तुम्हारे पिता के घर यज्ञ है और तुम हमसे पूछ रही हो, कहाँ जा रहे हो?
देवता चले गये, इधर सती ने भगवान शंकर से प्रार्थना की। बोलने में तो चतुर हैं, कहती हैं- प्रभो ! “आपके ससुर के यहाँ” जिससे आपका संबध ज्यादा जुड़ जाये तो शायद चल पड़े। बोलने की चतुराई है।
भगवान शिव मौन हैं। वे जानते हैं क्या घटना हुई है। बताने से सती को सिर्फ दुःख ही होगा। सती कहती हैं- निमंत्रण नहीं मिला, इसलिए शायद आप जाना नहीं चाहते हैं। शास्त्रों में विधान है- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के भी जा सकते हैं। जब सती भगवान शिव को शास्त्र का विधान बताने लग गई तो भगवान शंकर को हँसी आ गई। भगवान शंकर सोचने लग गये- सारे संसार को उपदेश मैं करता हूँ। आज ये सती मुझे शास्त्र का विधान बता रही है।
शिवजी ने सती को समझाया- देवी ! तुम ठीक कहती हो- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के जा सकते हैं। पर यदि जानबूझकर निमंत्रण नहीं दिया गया हो तो बिल्कुल नहीं जाना चाहिये, क्योंकि उसके अन्दर कोई न कोई द्वेष है। वहाँ जाने से भलाई नहीं होगी। अत: मेरी सलाह है- तुमको अपने पिता के यहाँ इस समय नहीं जाना चाहिये।
इतना कहकर भगवान शंकर मौन हो गये। क्योंकि पता है- दक्ष पुत्री है- अपनी बुद्धि बहुत चलाती है,पता नहीं मानेगी या नहीं।
सती के अन्दर द्वन्द्व चल रहा था। पति की याद आये तो अन्दर, पिता की याद आये तो बाहर। समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ? ऐसे अन्दर बाहर कर रहीं थी। फिर उनको गुस्सा आ गया। भगवान शंकर की और लाल-लाल नेत्रों से देखते हुए, बिना बताये चल पड़ीं।
भगवान शंकर ने गणों को आदेश दिया- तुम्हारी मालकिन जा रही है, तुम भी साथ में जाओ। नंदी को ले जाओ और सामान भी ले जाओ, क्योंकि ये अब लौटने वाली नहीं है।

जब माता सती अपने पिता का घर पहुची तो उनका बहुत किया गया और भगवान शिव के लिए अनुचित कथन कहे गए जिसको सुनकर माता को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना देह त्याग दिया।

ये समाचार जब नारद जी को मिला, नारद जी ने भगवान शिव को बताया- प्रभु ! सती की ये दशा हुई है।
अब भगवान शिव को रोष आया। शिव जी को अपने अपमान पर क्रोध नहीं आया पर आज सती का अपमान हुआ तो भयंकर क्रोध आया। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और जमीन पर पटक दी उससे एक विलक्षण पुरुष प्रकट हुआ जिसके तीन नेत्र थे, भयंकर विशाल शरीर वाला था, हाथ में त्रिशूल लिये-‘ये वीरभद्र भगवान थे।’
वीरभद्र ने शिव जी को प्रणाम किया और बोला- क्या आदेश है?
शिवजी ने कहा- एक ही आदेश है। दक्ष को मार डालो, यज्ञ को विध्वंस कर दो।
वीरभद्र जी उत्तराखंड होते हुये हरिद्वार की तरफ पहुँचे। अपरान्ह का समय था। दोपहर के तीन बज रहे थे, यजमान लोग विश्रामशाला में थे। पंडित और देवता लोग यज्ञशाला में थे। वहाँ जाकर वीरभद्र ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया। यज्ञशाला के डंडे उखाड़ दिये, बाँसों से यजमानों की, देवताओं की, पंडितो की पिटाई की। यज्ञ में भगदड़ मच गयी। वीरभद्र ने चार लोगों को पकड़ लिया। एक तो यजमान दक्ष को, एक आचार्य भृगु जी को (जो यज्ञ करा रहे थे) और दो देवता जो शिव के विरोधी थे, ‘पूषा’ और ‘भग’ ।
सबसे पहले दक्षिणा आचार्य को मिली। शास्त्रों में कहा है- आचार्य को डबल दक्षिणा दी जाती है। उनके दाड़ी और मूंछ एक साथ उखाड़ दिए क्योंकि वो अपनी बड़ी-बड़ी दाड़ी फटकार करके शिव जी को सजा देने के लिए इशारा कर रहे थे।
अब पूषा के दांत निकाल दिये, क्योंकि जब दक्ष शिव जी को गाली दे रहा था, पूषा अपने बड़े-बड़े दांत निकाल कर हँस रहा था। इसका अर्थ है यदि हम अपने शरीर की किसी भी इन्द्रिय का उपयोग दूसरों के अहित के लिये करेंगे तो वो अंग बेकार हो जायेगा।पूषा ने दांतों का दुरुपयोग किया।
भग देवता की आँखे निकाल ली क्योंकि वो दक्ष को आँखों से इशारा कर रहा था- और गाली दो, और गाली दो।
अब वीरभद्र ने दक्ष के गले पर तलवार मारी पर वो मरा नहीं। वीरभद्र ने भगवान शिव का ध्यान किया और दक्ष की गर्दन मरोड़कर तोड़ डाली। फिर उसके सिर को हवनकुण्ड में भस्म कर दिया।
इस तरह से दक्ष का यज्ञ विध्वंस हो गया। विध्वंस इसलिए हुआ क्योंकि ये यज्ञ धर्म की दृष्टी से नहीं था, ये तो शिव जी के अपमान के लिये था।
यहाँ सिखने की बात है यदि किसी कार्य का आरम्भ गलत भाव रखकर किया जाये तो वह कार्य सफल नहीं होता है। ऐसे बहुत से काम होते हैं- बाहर से दिखाई देगा जैसे ये धर्म का काम हो रहा है, पर उनका उद्देश्य गलत होने से वो अधर्म का काम होता है। यज्ञ विध्वंस होने के बाद ब्रह्मा जी सभी देवताओं को लेकर शिव जी के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना करने लगे।

पुनः दक्ष प्रजापति को जीवित करना:


भगवान शंकर के पिता हैं ब्रह्मा जी। शिव जी बोले – पिता जी! आप प्रार्थना मत करिये। आप आज्ञा करिये, क्या करना है?
ब्रह्माजी ने कहा- देखो यजमान को जीवित कर दो। दक्ष, यज्ञ पूरा किये बिना मर गया है। भृगु जी की दाड़ी-मूंछ अभी तक नहीं आयी है, उनको दाड़ी-मूंछे आ जाएं, ऐसी व्यवस्था कर दो। पूषा को दांत मिल जाये। भग देवता को आँखे मिल जाये। बस हम इतना ही मांगते हैं।
भगवान शिव हमेशा अपनी मस्ती में रहते हैं। बोले- अभी कर देता हूँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है। अपने एक गण को बोला- किसी बकरे का सिर काट कर ले आओ। बकरे का सिर ही क्यों मँगाया? हाथी का, शेर का किसी का भी मँगा लेते। भगवान शिव ने सुना था कि नन्दीश्वर ने दक्ष को शाप दिया है की अगले जन्म में ये बकरा बनेगा। भगवान शिव ने सोचा- अगले जन्म में क्यों, इसी जन्म में बना देता हूँ। बकरे का सिर मंगाया और दक्ष के शरीर में जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। दक्ष जीवित हो गया, उसने भगवान की स्तुति की और क्षमायाचना की।


25 July, 2019

मुचुकुन्द कि कथा। Story of Muchukund.

मुचुकुंद की कथा:

महाराज मुचुकुन्द राजा मान्धाता के पुत्र थे। ये पृथ्वी के एक छत्र सम्राट थे। बल और पराक्रम इतना कि देवराज इन्द्र भी इनकी सहायता के इच्छुक रहते थे। उनके पराक्रम का लोहा सभी मानते थे।

एक बार असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। दुखी होकर देवताओं ने महाराज मुचुकुन्द से सहायता की प्रार्थना की। देवराज की प्रार्थना स्वीकार करके वे बहुत समय तक असुरों से युद्ध करते रहे। बहुत समय पश्चात देवताओं को शिव जी की कृपा से स्वामी कार्तिकेय के रूप में योग्य सेनापति मिल गये।

देवराज इन्द्र ने महाराज से कहा –राजन् ! आपने हमारी बड़ी सेवा की। आप हजारों वर्षों से यहाँ हैं। अतः अब आपकी राजधानी का कहीं पता नहीं है। आपके परिवार वाले सब काल के गाल में चले गये। हम आप पर प्रसन्न हैं। मोक्ष को छोड़ आप कुछ भी वर माँग लें, क्योंकि मोक्ष देना हमारी शक्ति से बाहर है।

उन्होंने कहा – देवराज ! मैं यह वरदान माँगता हूँ कि मैं जी भर सो लूँ, कोई विघ्न न डाले।जो मेरी निद्रा भंग करे, वह तुरंत भस्म हो जाय।




देवराज ने कहा –ऐसा ही होगा, आप पृथ्वी पर जाकर शयन कीजिए। जो आपको जगायेगा, वह तुरंत भस्म हो जायगा। महाराज मुचुकुन्द भारतवर्ष में आकर एक गुफा में सो गये। सोते सोते उन्हें कई युग बीत गये। द्वापर आ गया, भगवान ने श्रीकृष्ण के रूप में यदुवंश में अवतार लिया। 

जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा में थे उसी समय कालयवन ने मथुरा को घेर लिया। उसे मरवाने की नियत से और महाराज मुचुकुन्द पर कृपा करने की इच्छा से भगवान श्री कृष्ण कालयवन के सामने से छिपकर भागे। भागते भागते भगवान उस गुफा में घुसकर छिप गये, जहाँ महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। भगवान ने अपना पीताम्बर धीरे से उन्हें ओढ़ा दिया और आप छिपकर तमाशा देखने लगे।

कालयवन गुफा में आया और महाराज को ही भगवान कृष्ण समझकर दुपट्टा खींच कर जगाने लगा। महाराज जल्दी से उठे। सामने कालयवन खड़ा था, दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया ।

अब तो महाराज इधर उधर देखने लगे। भगवान के तेज से गुफा जगमगा रही थी। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को मंद मंद मुस्कराते हुए देखा। देखते ही वे समझ गये कि ये साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, वे भगवान के चरणों में लोट पोट हो गये।
भगवान ने उन्हें उठाकर छाती से लगाया, भाँति भाँति के वरों का प्रलोभन दिया; परंतु उन्होंने यही कहा -प्रभो ! मुझे देना है तो अपनी भक्ति दीजिए। भगवान ने कहा –अब अगले जन्म में तुम सब जीवों में समान दृष्टि बाले ब्राह्मण होओगे, तब तुम मेरी जी खोलकर उपासना करना। वरदान देकर भगवान अन्तर्धान हो गये



22 July, 2019

दधीचि के दान और त्याग कि कथा। Story of Dadhichi.

महर्षि दधीचि की कथा:


प्राचीन काल में एक परम तपस्वी हुए, जिनका नाम महर्षि दधीचि था। उनके पिता एक महान ऋषि अथर्वा जी थे और माता का नाम शांति था। महिर्षि दधीचि बालब्रह्मचारी तथा जितेन्द्रिय थे। लोभ, भय उन्हें छू तक नहीं गया था। वे त्याग के साथ-साथ अन्याय का प्रतिकार करना भी जानते थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शिव की भक्ति में व्यतीत किया था।

वे एक ख्यातिप्राप्त महर्षि थे तथा वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, परोपकारी और बहुत दयालु थे। उनके जीवन में अहंकार के लिए कोई जगह नहीं थी। वे सदा दूसरों का हित करने के लिए तत्पर रहते थे। जहां वे रहते थे, उस वन के पशु-पक्षी तक उनके व्यवहार से संतुष्ट थे। वे इतने परोपकारी थे कि उन्होंने असुरों का संहार के लिए अपनी अस्थियां तक दान में दे दी थी। आइए पढ़ें परोपकारी महर्षि दधीचि की लोक कल्याण के लिए किए गए परोपकार की कथा:



एक बार लोकहित के लिए कठोर तपस्या कर रहे महर्षि दधीचि के तप के तेज से तीनों लोक आलोकित हो उठे, लेकिन इन्द्र के चेहरे का तेज जाता रहा, क्योंकि उसे लगा कि महर्षि उससे इंद्रासन छीनना चाहते हैं। इसलिए उसने तपस्या भंग करने के लिए कामदेव और एक अप्सरा को भेजा, लेकिन वे विफल रहे।

तब इन्द्र उनकी हत्या के इरादे से सेना सहित वहां पहुंचा। लेकिन उसके अस्त्र-शस्त्र महर्षि की तप के अभेद्य कवच को भेद न सके और वे शांत भाव से समाधिस्थ बैठे रहे। हारकर इन्द्र लौट गया। इस घटना के बहुत समय बाद वृत्रासुर ने देवलोक पर कब्जा कर लिया।

पराजित इन्द्र और देवता मारे-मारे फिरने लगे। तब प्रजापिता ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वृत्रासुर का अंत महर्षि दधीचि की आस्थियों से बने अस्त्र से ही संभव है। इसलिए उनके पास जाकर उनकी अस्थियां मांगो। इससे इन्द्र पसोपेश में पड़ गया।

वह सोचने लगा कि जिनकी हत्या का प्रयास कर चुका था, वह उसकी सहायता क्यों करेंगे। लेकिन कोई उपाय न होने पर वह महर्षि के पास पहुंचा और झिझकते हुए बोला- महात्मन्‌, तीनों लोकों के मंगल हेतु हमें आपकी आस्थियां चाहिए।

महर्षि विनम्रता से बोले- देवेंद्र, लोकहित के लिए मैं तुम्हें अपना शरीर देता हूं। इन्द्र आश्चर्य से उनकी ओर देख ही रहे थे कि महर्षि ने योग विद्या से अपना शरीर त्याग दिया। बाद में उनकी अस्थियों से बने वज्र से इन्द्र ने वृत्रासुर को मारकर तीनों लोकों को सुखी किया।

लोकहित के लिए महर्षि दधीचि ने तो अपनी अस्थियां तक दान कर दी थीं, क्योंकि वे जानते थे कि शरीर नश्वर है और एक दिन इसे मिट्टी में मिल जाना है।

तत्पश्चात अपने शरीर पर मिष्ठान का लेपन करके महर्षि समाधिस्थ होकर बैठ गए। कामधेनु ने उनके शरीर को चाटना आरम्भ कर दिया। कुछ ही देर में महर्षि के शरीर की त्वचा, मांस और मज्जा उनके शरीर से विलग हो गए। मानव देह के स्थान पर सिर्फ उनकी अस्थियां ही शेष रह गई।

इंद्र ने उन अस्थियों को श्रद्धापुर्वक नमन किया और उन्हें ले जाकर उन हड्डियों से ‘तेजवान’ नामक वज्र बनाया। तत्पश्चात उस वज्र के बल पर उसने वृत्रासुर को ललकारा। दोनों के मध्य भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन वृत्रासुर ‘तेजवान’ वज्र के आगे देर तक टिका न रह सका। इंद्र ने वज्र प्रहार करके उसका वध कर डाला। देवता उसके भय से मुक्त हो गए।



20 July, 2019

कैसे आया भीम में दस हजार हाथियों का बल। How Bheem get 1000 Elephants Power.

भीम का परिचय:

महाभारत की कथा में पांच पांडव में से एक थे भीमसेन, वे महाराज पांडु के पुत्र थे। भीम एक बहुत बलशाली योद्धा था। महाभारत में भीम के बारे में बताया गया है कि भीम में दस हजार हाथियों के समान बल था। एक बार भीम ने अकेले ही अपने बल से नर्मदा नदी का प्रवाह रोक दिया था। भीम में इतना बल आने के पीछे एक रोचक गाथा है।



कैसे आया भीम में दस हजार हाथियो का बल?


पांडव और कौरव एक साथ बड़े हुए , कौरवों के बड़े भाई दुर्योधन के मन में भीम के प्रति दुर्भावना पैदा हो गई। तब उसने उचित अवसर मिलते ही भीम को मारने का विचार किया।

दुर्योधन ने एक बार खेलने के लिए गंगा तट पर शिविर लगवाया। उस स्थान का नाम रखा उदकक्रीडन। वहां खाने-पीने इत्यादि सभी सुविधाएं भी थीं। दुर्योधन ने पाण्डवों को भी वहां बुलाया। एक दिन मौका पाकर दुर्योधन ने भीम के भोजन में विष मिला दिया। विष के असर से जब भीम अचेत हो गए तो दुर्योधन ने दु:शासन के साथ मिलकर उसे गंगा में डाल दिया। भीम इसी अवस्था में नागलोक पहुंच गए। वहां सांपों ने भीम को खूब डंसा जिसके प्रभाव से विष का असर कम हो गया। जब भीम को होश आया तो वे सर्पों को मारने लगे। सभी सर्प डरकर नागराज वासुकि के पास गए और पूरी बात बताई।




तब वासुकि स्वयं भीमसेन के पास गए। उनके साथ आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया। आर्यक नाग भीम के नाना का नाना था। वह भीम से बड़े प्रेम से मिले। तब आर्यक ने वासुकि से कहा कि भीम को उन कुण्डों का रस पीने की आज्ञा दी जाए जिनमें हजारों हाथियों का बल है। वासुकि ने इसकी स्वीकृति दे दी। तब भीम आठ कुण्ड पीकर एक दिव्य शय्या पर सो गए।

जब दुर्योधन ने भीम को विष देकर गंगा में फेंक दिया तो उसे बड़ा हर्ष हुआ। शिविर के समाप्त होने पर सभी कौरव व पाण्डव भीम के बिना ही हस्तिनापुर के लिए रवाना हो गए। पाण्डवों ने सोचा कि भीम आगे चले गए होंगे। जब सभी हस्तिनापुर पहुंचे तो युधिष्ठिर ने माता कुंती से भीम के बारे में पूछा। तब कुंती ने भीम के न लौटने की बात कही। सारी बात जानकर कुंती व्याकुल हो गई तब उन्होंने विदुर को बुलाया और भीम को ढूंढने के लिए कहा। तब विदुर ने उन्हें सांत्वना दी और सैनिकों को भीम को ढूंढने के लिए भेजा।

उधर नागलोक में भीम आठवें दिन रस पच जाने पर जागे। तब नागों ने भीम को गंगा के बाहर छोड़ दिया। जब भीम सही-सलामत हस्तिनापुर पहुंचे तो सभी को बड़ा संतोष हुआ। तब भीम ने माता कुंती व अपने भाइयों के सामने दुर्योधन द्वारा विष देकर गंगा में फेंकने तथा नागलोक में क्या-क्या हुआ, यह सब बताया। युधिष्ठिर ने भीम से यह बात किसी और को नहीं बताने के लिए कहा।

25 June, 2019

जब भगवान राम धरती से गए तब हनुमान कहाँ थे। Story of Hanuman When Ram leave earth.

भगवान राम के अंत समय मे हनुमान कहाँ थे?

हम सब जानते है हनुमानजी भगवान राम के सबसे बड़े भक्त थे, अतः उन्हें भक्त शिरोमणि कहा जाता है। हनुमान जी जब से भगवान राम से मिले कभी उनसे दूर नही हुए। वो सुग्रीव के मंत्रिमंडल में जरूर रहते थे परंतु नित भगवान श्रीराम की सेवा में भी उपस्थित रहते थे। लेकिन जब भगवान राम का धरती में समय खत्म हो गया और वो सरयू में समाधि लेकर वैकुंठ चले गए तब उनके प्रिय भक्त हनुमान उपस्थित नही थे। तो जानते है कहाँ थे हनुमान:





कथा के अनुसार जब भगवान राम से मिलने काल आया और उसने यह सूचना दी कि आपने धरती पर रहने का जितना समय सुनिश्चित किया था वह पूर्ण होने वाला है, तो भगवान को एक चिंता हो गयी कि वो हनुमान को कैसे समझाएंगे क्योंकि हनुमान जी तो मानने वाले नही है और न ही भगवान से दूर रह सकेंगे, साथ ही हनुमानजी चिरंजीवी है अतः धरती पर उनका रहना भी जरूरी है।

अतः भगवान ने एक दिन अपनी एक अंगूठी जिसमे राम नाम अंकित था उसे धरती की एक दरार में गिरा देते है। जिसको खोजने के लिए हनुमान जी अति लघुरूप रख कर कूद जाते है। अंगूठी को खोजते खोजते वो पाताल लोक पहुंच जाते है, जहाँ उन्हें एक साधू मिलता है जो भोजन पका रहा था। हनुमान जी प्रतीक्षा करने लगते है कि साधु बाबा का भोजन हो जाय और फिर वो उनसे अंगूठी के बारे में पूछें।

परंतु वो साधु पहले एक रोटी बनाता फिर उसको खाता फिर दूसरी रोटी बनाता फिर उसको खाता । बार बार उसको ऐसा करते देख हनुमानजी से रह नही गया और उन्होंने उससे इस तरह भोजन का रहस्य पूछा।  महात्मा बोले कि अगर मैं सारी रोटियां बनाता हूँ और मृत्यु आजाए तो ब्यर्थ हो जाएगा, अतः मैं ऐसा कर रहा हूँ। 

हनुमानजी ने जब अंगूठी के बारे में पूंछा तो महात्मा एक स्थान की तरफ इशारा करते हुए बोले कि वहां देख लो अपनी अंगूठी। हनुमानजी ने देखा कि वहां तो अंगूठियों का ढेर लगा हुआ है जिसमे सब एक जैसी अंगूठी है और सब मे राम नाम अंकित है। जब हनुमानजी ने महात्मा से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि हर बार युग की समाप्ति पर एक अंगूठी ऊपर से गिरती है और उसे खोजने एक वानर आता है। जब वो वापस जाता है तो श्री राम धरती पर से जा चुके होते है। 

महात्मा ने हनुमानजी बताया कि समय चक्र की तरह घूमता रहता है, एक के बाद दूसरा और हर बार एक के बाद दूसरा युग के आता है वो सभी पात्र और समय। यही हर बार भगवान धरती पर अवतार लेते है और अपनी लीला करते है और अब तुमको भी उनके वचनों का पालन करना चाहिए।



24 June, 2019

गणेश जी और तुलसी की कथा। Story Of Ganesh and Tulsi in hindi.

श्री गणेश और तुलसी को एक साथ नही रखा जाता साथ ही गणेश पूजन में तुलसी के पत्तों का प्रयोग नही होता:


गणेश पूजन में कभी तुलसी नहीं रखी जाती, इसका कारण है तुलसी का गणेश जी के लिए एकतरफा प्रेम। आइए जानें ये कथा:-



एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था।

इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। तुलसी श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई और उनके मन में गणेश से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हुई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया।


श्री गणेश द्वारा अपने विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने से देवी तुलसी बहुत दुखी हुई और आवेश में आकर उन्होंने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दे दिया। इस पर श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा। एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण राक्षस से होगा। उन्‍होंने भी तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर के साथ होगा, इसके बाद तुलसी को अपनी गलती का आभास हुआ। 

उन्‍होंने गणेश जी से माफी मांगी। गणेश जी ने उन्‍हें माफ करते हुआ कहा कि वे एक पूजनीय पौधा बनेंगी। पर उनकी पूजा में तुलसी का कभी प्रयोग नहीं किया जाएगा। बाद में तुलसी का विवाह शंखचूड़ नामक असुर से हुआ, जिसे जालंधर के नाम से भी जाना जाता है।
किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।




19 June, 2019

तिरूपति बालाजी कि कथा, तथा क्यों चढ़ावा देने कि प्रथा है इस मंदिर में। Story of Tirupati Balaji.

तिरुपति बालाजी मंदिर कि मान्यताये:

भगवान वेंकटेश्वर का दक्षिण भारत में तिरुपति स्थित अति विशिष्ट एवं हिन्दू धर्म मे आस्था रखने वालों का महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान वेंकटेश्वर बालाजी भगवान विष्णु के अवतार है जिन्होंने महालक्ष्मी रूपी माता पद्दमावती से विवाह किया था। 
यह मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है क्योंकि यहां पर चढ़ावा चढ़ाने की विशेष मान्यता है। मान्यता है कि भगवान ने कुबेर से बहुत बड़ा कर्ज लिया था जिसे उन्होंने कलयुग के अंत तक चुकाने को कहा था अतः भक्तों के द्वारा चढ़ावा दिया जाता है ताकि भगवान का कर्ज जल्द पूरा हो जाय।




भक्तों का एवं जगत के पालक भगवान पर ऐसा कर्ज कैसे है जो उन्हें कलयुग के अंत तक चुकाना है और इसकी कथा क्या है ये जाने।

तिरुपति बालाजी की कथा:


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान एक समय भगवान विष्णु अपने धाम में छिरसागर पर शेषनाग की सय्या पर ध्यान मग्न थे और माता लक्ष्मी उनकी सेवा में थी। तभी महान तपस्वी महाऋषि भृगु वहां आये और भगवान विष्णु द्वारा उनका स्वागत न करने पर वो क्रोधित हो गए और भगवान विष्णु के छाती पर लात मारी और बोले मैं  तेरे घर आया और तू सो रहा है।

भगवान विष्णु तुरंत महर्षि भृगु के चरण पकड़ लिए और कहने लगे हे महर्षि मेरी छाती अति कठोर है, आपको कही चोट तो नही आई। 





महर्षि भृगु तो परीक्षा ले रहे थे, अतः उन्होंने अपना उद्देश्य बताया कि वो भगवान विष्णु के साहस और सहनशीलता की परीक्षा ले रहे थे और उन्हें ये पता चल गया कि विष्णु जी ही श्रेष्ठ है और अग्रपूज्य है। फिर वो वहां से चले गए।

भगवान विष्णु के ऊपर भृगु के इसतरह के वर्ताव से माता को कस्ट हुआ और विष्णु जी द्वारा ऋषि को दंड न दिए जाने का क्रोध हुआ। अतः माता लक्ष्मी क्रोधित होकर वैकुण्ठ छोड़ कर पृथ्वी पर चली गयी।

भगवान भी उनको खोजते पृथ्वी पर आए तो पता चला कि वो एक राजा की यहा पुत्री पद्दमावती रूप में अवतार ले चुकी है, अतः भगवान ने भी वेंकटेश्वर रूप में अवतार लिए। और बड़े होने पर पद्दमावती से शादी का प्रस्ताव रखा।

शादी के खर्च के लिए वेंकटेश्वर रूपी भगवान के पर धन नही था, अतः उन्होंने भगवान व्रह्मा एवं महेश को साक्षी बनाकर कुबेर से धन कर्ज के रूप में लिया और कहा कि वो ये कर्ज कलयुग के अंत तक कर देंगे और उसका सूत भी देगे।

इसी लिए इस मंदिर में धन का दान देने की मान्यता है, भक्तों का मानना है कि ताकि भगवान का कर्ज जल्द खत्म हो जाय। लेकिन सत्य ये है कि इतना धन होने पर भी भगवान कर्ज में है। क्योंकि उनके वो कर्ज कलयुग के अंत तक देना है।






16 June, 2019

पांडवो के द्वारा स्वर्ग कि यात्रा। Pandavon ki Swarg Yatra.

क्यों की थी पांडवो ने स्वर्ग कि यात्रा:

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के अनुसार जब यादवों का अमूच विनास हो गया था, तथा भगवान श्री कृष्ण का भी पृथ्वी से अपने धाम जा चुके थे और उनकी नगरी द्वारिका समुंदर में डूब चुकी थी, तब वहां के नगर निवासी स्त्रियों, बूढो और बच्चों के लेने अर्जुन गए ताकि इनको सकुशल इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर में रह सके। जब अर्जुन लौट रहे थे तो कुछ लुटेरों ने उनपर हमला कर दिया, अर्जुन ने उनसे अकेले युद्ध किये परंतु उनका दिव्य ज्ञान लुप्त हो चुका था तथा उनका अक्षय तरकस भी खाली हो गया था। इस कारण वो लुटेरों से जीत नही पाए और लुटेरे कई स्त्रियों को उठा ले गए।
जैसे तैसे अर्जुन बाकियों को लेकर हस्तिनापुर आये, और महाऋषि व्यास से मिलने अपने भाईयों के साथ गए। वेदव्यासजी ने पांडवों को बताया कि आपलोगो का तथा भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य एवं समय खत्म हो चुका है। अतः आपका दिव्य ज्ञान और दिव्यअस्त्र लुप्त हो गया है और अब आपलोगो को भी स्वर्ग की यात्रा करनी चाहिए। युधिष्ठिर ने परीक्षित को राजा बनाकर, द्रोपदी और बाकी भाईओं के साथ स्वर्ग की यात्रा सुरु की।



पांडवो की स्वर्ग यात्रा:

पांडव अपनी यात्रा में कई पर्वतों , नदियों, सागरो और सारी पृथ्वी का भ्रमण करके हिमालय के तल पर पहुचे उनके साथ एक कुत्ता भी चल रहा था। तभी अग्नि देव आये और बोले कि अस्त्रों के साथ आप नही जा सकते अतः सभी ने अपने अस्त्र उनको दे दिया।
अपने स्वर्ग के चढ़ान में सबसे पहले द्रोपती मूर्छित होकर गिरी, भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो युधिष्ठिर बोले वो हम पांचों में से अर्जुन को अधिक प्रेम करती थी इसलिए ऐसा हुआ।
आगे चलकर सहदेव गिरा , भीम के द्वारा कारण पूछने पर युधिष्ठिर बोले इसे अपने ज्ञान और विवेक सिलता का अहंकार था अतः ये गिरा। उसे भी वही छोड़ कर आगे बढ़े तो नकुल गिरा, फिर युधिष्ठिर बोले इसे अपने रूप सौंदर्य का अभिमान था अतः ये गिरा।




आगे चलकर अर्जुन गिरा, उसका कारण युधिष्ठिर ने उसका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का अहंकार बताया। फिर भीम गिरे उनका कारण उनका सर्वसक्तिशाली होने का अहंकार बताया।
अंत मे युधिष्ठिर और उनके साथ चलने वाला कुत्ता बचा, तभी इंद्र अपना रथ लेकर पहुचे और युधिष्ठिर को साथ मे चलने को बोले, युधिष्ठिर ने कहा कि मार्ग में मेरे भाई और पत्नी गिर गए थे उन्हें भी साथ लीजिए। इंद्र ने कहा कि वे सब देह त्यागकर अपने लोक तक पहुच चुके है। फिर युधिष्ठिर ने साथ चल रहे कुत्ते को भी साथ ले जाने को कहा तो इंद्र ने इनकार कर दिया, परंतु युधिष्ठिर नही माने और कहा कि ये हमारे साथ सारी यात्रा में था अतः इसके बिना मैं नही जायूँगा। युधिष्ठिर कि बात सुनकर कुत्ता अपने वास्तविक रूप में आ गया वो वास्तव में काल था।



युधिष्ठिर रथ में बैठे और स्वर्ग पहुचे जहाँ पर दुर्योधन सहित सभी कौरव थे परन्तु पांडव नही थे, युधिष्ठिर ने कहा कि जहाँ मेरे भाई है मुझे वहा ले चलो। दूत युधिष्ठिर को नरक के रास्ते से लेकर गए जहाँ घोर अंधेरा था, भयंकर दुर्गंध थी और कंकाल एवं चीख पुकार का सोर था। युधिष्ठिर को वह स्थान बहुत खराब लगा और बार बार बोल रहे थे कि मुझे मेरे भाईओं के पास ले चलो।
कुछ देर बाद वहां इंद्र आदि देवता आ गए उनके आते ही वहा का वातावरण अच्छा हो गया , उजाला फैल गया और वातावरण खुसबूदार हो गया। उनके भाई भी आसान में मुस्कुराते हुए बैठे दिखाई दिए। इंद्र ने बताया की महाभारत युद्ध के दौरान अश्वस्थामा के विषय मे जो झूठ तुमने बोला था उसी के लिए तुम्हे कुछ देर के लिए नरक कि तकलीफ देखनी पड़ी।
अंत मे युधिष्ठिर देवनदी गंगा में स्नान करके अपना देह त्याग किया और परमधाम को प्राप्त किया। महाभारत की कथा भी यही तक है और यही पर समाप्त हुई है।





29 May, 2019

देवऋषी नारद कि कथा: जब उनका मुख वानर का हो गया था। Story of Devrishi Narad.

देवऋषी नारद को जब अहंकार हो गया था:

अहंकार और घमंड हो जाने पर बुद्धि कुटिल हो जाती है, फिर अच्छे बुरे और धर्म-अधर्म का ज्ञान भंग हो जाता है। इससे मनुष्य तो क्या देवता भी नही बच पाते है। ऐसी ही कथा है देवऋषी नारद कि है जब उनको अपने ज्ञान तथा तपोबल का अहंकार हो गया था, और भगवान शिव कि कृपा से भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त का अहंकार दूर किया था। 
देवऋषी नारद कि इस कथा में उनका मुख वानर का हो गया था। तथा उन्होंने भगवान विष्णु सहित शिवजी के दो पार्षदों को भी श्राप दे दिया था। यह कथा शिवमहापुराण के अलावा और भी जगह वर्णित है।


देवऋषी नारद को अहंकार ग्रसित होना और चूर होने की कथा:


देवऋषी नारद भगवान विष्णु के परम भक्त होने के साथ साथ ज्ञानी, योगी एवं उन्हें तपोवल से शिध्दिया प्राप्त थी। देवऋषी नारद वृहमचारी थे, उन्होंने विवाह नही करने कि प्रतीज्ञा ले रखी थी। वे कभी एक जगह में स्थिर नही रहते थे सदा तीनो लोको में भ्रमण किया करते थे। 

एक दिन वो हिमालय के पास से गुजर रहे थे, जहां से गंगा नदी का उद्गम स्थल है। वहां का मनोरम दृश्य नारद जी को बहुत भा गया और उनके मन मे उसी स्थान पर अपने आराध्य के लिए तप करने कि प्रेरणा हुई। अतः नारद जी उसी स्थान पर तप में लीन हो गए।

जब यह बात देवराज इंद्र को पता चली की देवऋषी नारद तपस्या में लीन है तो इंद्र को संदेश हुआ कि कही नारद भगवान विष्णु को प्रसन्न करके उनके इंद्र लोक का सिंहासन न मांग ले। इंद्र देव ने नारद कि तपस्या को तोडने के लिये कामदेव को भेजा। कामदेव ने बहुत कोशिश की नारद जी के तपस्या को भंग करने के लिए, लेकिन वो असफल हो गए। कामदेव के द्वारा कई बार प्रयत्न करने पर भी जब सफलता नही मिली तो कामदेव डर गए कि असफल होकर वो देवराज के पास कैसे जायेगे। अतः वो देवऋषी नारद से तपस्या रोकने की प्राथना करने लगे।

देवऋषी नारद ने कामदेव की प्राथना मान ली और तप को रोक दिया। लेकिन उनको इस बात का बहुत अभिमान हो गया कि उनपर कामदेव का कोई प्रभाव नही हुआ और उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली।
वो अहंकार बस अपना गुणगान करने कैलाश पर्वत पर भगवान भोलेनाथ के पास गए। भगवान शिवजी को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुए अहंकार दिख गया अतः उन्होंने देवऋषी को भगवान विष्णु के पास जाने को कहा। देवऋषी अपना गुणगान करने छिरसागर में गए भगवान विष्णु को सारी बात बताई तो भगवान को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुआ घमंड दिख गया। 

लेकिन वो अपने भक्त को ऐसे नही छोड़ सकते थे अतः उन्होंने देवऋषी के मार्ग में माया के द्वारा एक मनोरम नगर बना दिया। जहाँ पर उत्सव का माहौल था । नगर के राजा अपनी पुत्री के स्वमन्वर की तैयारी कर रहे थे। देवऋषी भी वहां पहुच गए। नगर के राजा में उनका स्वागत किया और अपनी पुत्री का भविष्य जानने के लिए उसका हाथ दिखाया।
राजा की कन्या इतनी सुंदर थी कि वो विश्व मोहिनी लग रही थी, उसका रूप यौवन देखकर देवऋषी नारद भवचक्के रह गए। और उसी कन्या से विवाह करने की कामना करने लगे।




इस कामना को लेकर वो अपने आराध्य देव भगवान विष्णु के पास गए और अपने मन की व्यथा बताई और कहा कि आप अपना स्वरूप दे दीजिए। भगवान विष्णु ने अपना शरीर तो दे दिया पर चेहरा वानर का दे दिया।

देवऋषी नारद अपना शरीर देखकर खुश हो गए और जा कर स्वयंवर सभा में बैठ गए। उनको लगा कि यह रूप देखकर विश्व मोहनी कन्या उनपर ही वरमाला डालेगी। लेकिन ऐसा नही हुआ और उसने उनकी तरफ देखा तक नही और वरमाला वही पर आए हुए राजा का वेष रखे भगवान विष्णु पर डाल दी।

देवऋषी नारद अपना वानर का चेहरा देखकर अति क्रोधित हो गए। और भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि "धरती पर मनुष्य रूप में जाना पड़ेगा और जिस तरह मेरी पत्नी नही बनने दिया उसी तरह उनको भी पत्नी वियोग का दुख भोगना पड़ेगा और जिस वानर का रूप देकर उपहास बनाया उन्ही वानरों की मदत लेनी पड़ेगी।"

बाद में जब भगवान की माया से बाहर आये और अपने दिए हुए श्राप पर दुख हुआ परन्तु भगवान विष्णु ने उनका श्राप स्वीकार किया और राम रूप में धरती पर अवतार लिया।