भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

19 August, 2019

नटराज कि प्रतिमा में भगवान शिव के पैरों में पड़े "अपस्मार" की कथा। Story of Apasmaar and Lord Shiv.

अपस्मार की कथा जो भगवान शिव से जुड़ी है:

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अपस्मार एक बौना था जो अज्ञानता और मिर्गी का प्रतिनिधित्व करता था। उन्हें मुयालका या मुल्याकन के रूप में भी जाना जाता है। दुनिया में ज्ञान को संरक्षित करने के लिए, अपस्मार को नहीं मारा जा सकता था। अगर ऐसा करने के लिए ज्ञान और अज्ञान के संतुलन को बाहर कर दिया जाएगा - जैसा कि अपस्मार को मारने का मतलब होगा प्रयास, समर्पण और कड़ी मेहनत के बिना ज्ञान प्राप्त करना। नतीजतन, यह सभी रूपों में ज्ञान के अवमूल्यन के लिए प्रेरित करेगा। 

आपस्मरा को वश में करने के लिए, भगवान शिव ने नटराज - नृत्य के भगवान के रूप को अपनाया और एक अलौकिक नृत्य का प्रदर्शन किया। इस नृत्य के दौरान, नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपसमार दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।




अपस्मार और भगवान शिव और माता आदिशक्ति की कथा:


कुछ पौराणिक कथाओ के अनुसार एक बार अपस्मार जो कि एक बौना राक्षस था और उसके पास कई शक्तियां थी, उसने अपनी शक्तियों के मद में माता आदिशक्ति पे एक ऐसे मंत्र का प्रयोग किया जिससे माता आदिशक्ति की समस्त शक्तियां चिह्रीं हो गयी। 
हालांकि यह बहुत कम समय के लिए हुआ था परंतु महादेव उसके इस कृत्य से बहुत क्रोधित हुए। और उन्होंने नटराज का रूप रखकर अलौकिक नृत्य करने लगे ।



महादेव के प्रचंड तांडव और डमरू कर ध्वनि से अपस्मार के मस्तिस्क की नसें फटने लगी और वो महादेव के चरणों मे आकर गिर गया। नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपस्मार का दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।

17 August, 2019

माता सती की कथा और दक्ष प्रजापति जो शिवजी के ससुर थे। Story of Daksh prajapati and mata sati .

दक्ष प्रजापति और माता सती की कथा:

स्वायम्भुव मनु की तीन पुत्रियाँ थीं – अकुति, देवहूति और प्रसूति। इनमें से प्रसूति का विवाह दक्ष नाम के प्रजापति से हुआ। दक्ष को 16 कन्याओं की प्राप्ति हुई। इनमें से एक थी ‘सती’ जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था, उनको किसी संतान की प्राप्ति नहीं हुई, क्योंकि उन्होंने युवावस्था में ही अपने पिताजी के यहाँ देह का परित्याग कर दिया था।
यह कथा शिवमहापुराण के साथ साथ कई पुराणों में वर्णित है। इसमें दक्ष प्रजापति का भगवान महादेव के प्रति उत्पन्न हुई गलत भावनाओं के कारण हुआ था।



दक्ष प्रजापति का भगवान शिव पर क्रोधित होना और श्राप देना:

एक दिन दक्ष प्रजापति त्रिदेव से मिलने गए जहाँ पर उनके जाने पर कोई भी उठकर खड़ा नही हुआ, दक्ष ने सोचा- मेरे आने पर ये खड़ा नहीं हुआ, ये कितना उद्दंड है। मैंने तो अपनी मृगनयनी बेटी का विवाह इस मरकट-लोचन के साथ कर दिया इसको तो कोई सभ्यता, शिष्टाचार ही नहीं। इस तरह से दक्ष ने भगवान शिव को बहुत अपशब्द बोले और खूब गाली-गलोच किया। जब दक्ष ने देखा की उसकी गाली देने के बाद भी शिवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है, तब उसने हाथ में जल लेकर शाप दे दिया- ‘आज के बाद किसी यज्ञ में तुम्हारा हिस्सा नहीं होगा।’ भगवान शिव तब भी कुछ नहीं बोले। दक्ष ऐसा शाप देकर सभा से चला गया।

दक्ष प्रजापति से नही रहा गया और उन्होंने शिवजी को और अपमानित करने की एक योजना बनाई , और एक बहुत विशाल यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने समस्त देवताओं और संसार के समस्त ऋषि मुनियों को बुलाया परंतु भगवान भोलेनाथ को नही बुलाया।

हरिद्वार में कनखल नामक स्थान पर यज्ञ का आयोजन है। सारे देवता कैलाश पर्वत से होकर आ रहे हैं तो सती और भगवान शंकर को प्रणाम करके जा रहे हैं।
सती ने पूछा- कहाँ जा रहे हो?
उन्होंने कहा- तुम्हारे पिता के घर यज्ञ है और तुम हमसे पूछ रही हो, कहाँ जा रहे हो?
देवता चले गये, इधर सती ने भगवान शंकर से प्रार्थना की। बोलने में तो चतुर हैं, कहती हैं- प्रभो ! “आपके ससुर के यहाँ” जिससे आपका संबध ज्यादा जुड़ जाये तो शायद चल पड़े। बोलने की चतुराई है।
भगवान शिव मौन हैं। वे जानते हैं क्या घटना हुई है। बताने से सती को सिर्फ दुःख ही होगा। सती कहती हैं- निमंत्रण नहीं मिला, इसलिए शायद आप जाना नहीं चाहते हैं। शास्त्रों में विधान है- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के भी जा सकते हैं। जब सती भगवान शिव को शास्त्र का विधान बताने लग गई तो भगवान शंकर को हँसी आ गई। भगवान शंकर सोचने लग गये- सारे संसार को उपदेश मैं करता हूँ। आज ये सती मुझे शास्त्र का विधान बता रही है।
शिवजी ने सती को समझाया- देवी ! तुम ठीक कहती हो- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के जा सकते हैं। पर यदि जानबूझकर निमंत्रण नहीं दिया गया हो तो बिल्कुल नहीं जाना चाहिये, क्योंकि उसके अन्दर कोई न कोई द्वेष है। वहाँ जाने से भलाई नहीं होगी। अत: मेरी सलाह है- तुमको अपने पिता के यहाँ इस समय नहीं जाना चाहिये।
इतना कहकर भगवान शंकर मौन हो गये। क्योंकि पता है- दक्ष पुत्री है- अपनी बुद्धि बहुत चलाती है,पता नहीं मानेगी या नहीं।
सती के अन्दर द्वन्द्व चल रहा था। पति की याद आये तो अन्दर, पिता की याद आये तो बाहर। समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ? ऐसे अन्दर बाहर कर रहीं थी। फिर उनको गुस्सा आ गया। भगवान शंकर की और लाल-लाल नेत्रों से देखते हुए, बिना बताये चल पड़ीं।
भगवान शंकर ने गणों को आदेश दिया- तुम्हारी मालकिन जा रही है, तुम भी साथ में जाओ। नंदी को ले जाओ और सामान भी ले जाओ, क्योंकि ये अब लौटने वाली नहीं है।

जब माता सती अपने पिता का घर पहुची तो उनका बहुत किया गया और भगवान शिव के लिए अनुचित कथन कहे गए जिसको सुनकर माता को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना देह त्याग दिया।

ये समाचार जब नारद जी को मिला, नारद जी ने भगवान शिव को बताया- प्रभु ! सती की ये दशा हुई है।
अब भगवान शिव को रोष आया। शिव जी को अपने अपमान पर क्रोध नहीं आया पर आज सती का अपमान हुआ तो भयंकर क्रोध आया। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और जमीन पर पटक दी उससे एक विलक्षण पुरुष प्रकट हुआ जिसके तीन नेत्र थे, भयंकर विशाल शरीर वाला था, हाथ में त्रिशूल लिये-‘ये वीरभद्र भगवान थे।’
वीरभद्र ने शिव जी को प्रणाम किया और बोला- क्या आदेश है?
शिवजी ने कहा- एक ही आदेश है। दक्ष को मार डालो, यज्ञ को विध्वंस कर दो।
वीरभद्र जी उत्तराखंड होते हुये हरिद्वार की तरफ पहुँचे। अपरान्ह का समय था। दोपहर के तीन बज रहे थे, यजमान लोग विश्रामशाला में थे। पंडित और देवता लोग यज्ञशाला में थे। वहाँ जाकर वीरभद्र ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया। यज्ञशाला के डंडे उखाड़ दिये, बाँसों से यजमानों की, देवताओं की, पंडितो की पिटाई की। यज्ञ में भगदड़ मच गयी। वीरभद्र ने चार लोगों को पकड़ लिया। एक तो यजमान दक्ष को, एक आचार्य भृगु जी को (जो यज्ञ करा रहे थे) और दो देवता जो शिव के विरोधी थे, ‘पूषा’ और ‘भग’ ।
सबसे पहले दक्षिणा आचार्य को मिली। शास्त्रों में कहा है- आचार्य को डबल दक्षिणा दी जाती है। उनके दाड़ी और मूंछ एक साथ उखाड़ दिए क्योंकि वो अपनी बड़ी-बड़ी दाड़ी फटकार करके शिव जी को सजा देने के लिए इशारा कर रहे थे।
अब पूषा के दांत निकाल दिये, क्योंकि जब दक्ष शिव जी को गाली दे रहा था, पूषा अपने बड़े-बड़े दांत निकाल कर हँस रहा था। इसका अर्थ है यदि हम अपने शरीर की किसी भी इन्द्रिय का उपयोग दूसरों के अहित के लिये करेंगे तो वो अंग बेकार हो जायेगा।पूषा ने दांतों का दुरुपयोग किया।
भग देवता की आँखे निकाल ली क्योंकि वो दक्ष को आँखों से इशारा कर रहा था- और गाली दो, और गाली दो।
अब वीरभद्र ने दक्ष के गले पर तलवार मारी पर वो मरा नहीं। वीरभद्र ने भगवान शिव का ध्यान किया और दक्ष की गर्दन मरोड़कर तोड़ डाली। फिर उसके सिर को हवनकुण्ड में भस्म कर दिया।
इस तरह से दक्ष का यज्ञ विध्वंस हो गया। विध्वंस इसलिए हुआ क्योंकि ये यज्ञ धर्म की दृष्टी से नहीं था, ये तो शिव जी के अपमान के लिये था।
यहाँ सिखने की बात है यदि किसी कार्य का आरम्भ गलत भाव रखकर किया जाये तो वह कार्य सफल नहीं होता है। ऐसे बहुत से काम होते हैं- बाहर से दिखाई देगा जैसे ये धर्म का काम हो रहा है, पर उनका उद्देश्य गलत होने से वो अधर्म का काम होता है। यज्ञ विध्वंस होने के बाद ब्रह्मा जी सभी देवताओं को लेकर शिव जी के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना करने लगे।

पुनः दक्ष प्रजापति को जीवित करना:


भगवान शंकर के पिता हैं ब्रह्मा जी। शिव जी बोले – पिता जी! आप प्रार्थना मत करिये। आप आज्ञा करिये, क्या करना है?
ब्रह्माजी ने कहा- देखो यजमान को जीवित कर दो। दक्ष, यज्ञ पूरा किये बिना मर गया है। भृगु जी की दाड़ी-मूंछ अभी तक नहीं आयी है, उनको दाड़ी-मूंछे आ जाएं, ऐसी व्यवस्था कर दो। पूषा को दांत मिल जाये। भग देवता को आँखे मिल जाये। बस हम इतना ही मांगते हैं।
भगवान शिव हमेशा अपनी मस्ती में रहते हैं। बोले- अभी कर देता हूँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है। अपने एक गण को बोला- किसी बकरे का सिर काट कर ले आओ। बकरे का सिर ही क्यों मँगाया? हाथी का, शेर का किसी का भी मँगा लेते। भगवान शिव ने सुना था कि नन्दीश्वर ने दक्ष को शाप दिया है की अगले जन्म में ये बकरा बनेगा। भगवान शिव ने सोचा- अगले जन्म में क्यों, इसी जन्म में बना देता हूँ। बकरे का सिर मंगाया और दक्ष के शरीर में जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। दक्ष जीवित हो गया, उसने भगवान की स्तुति की और क्षमायाचना की।