भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

19 June, 2019

तिरूपति बालाजी कि कथा, तथा क्यों चढ़ावा देने कि प्रथा है इस मंदिर में। Story of Tirupati Balaji.

तिरुपति बालाजी मंदिर कि मान्यताये:

भगवान वेंकटेश्वर का दक्षिण भारत में तिरुपति स्थित अति विशिष्ट एवं हिन्दू धर्म मे आस्था रखने वालों का महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान वेंकटेश्वर बालाजी भगवान विष्णु के अवतार है जिन्होंने महालक्ष्मी रूपी माता पद्दमावती से विवाह किया था। 
यह मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है क्योंकि यहां पर चढ़ावा चढ़ाने की विशेष मान्यता है। मान्यता है कि भगवान ने कुबेर से बहुत बड़ा कर्ज लिया था जिसे उन्होंने कलयुग के अंत तक चुकाने को कहा था अतः भक्तों के द्वारा चढ़ावा दिया जाता है ताकि भगवान का कर्ज जल्द पूरा हो जाय।




भक्तों का एवं जगत के पालक भगवान पर ऐसा कर्ज कैसे है जो उन्हें कलयुग के अंत तक चुकाना है और इसकी कथा क्या है ये जाने।

तिरुपति बालाजी की कथा:


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान एक समय भगवान विष्णु अपने धाम में छिरसागर पर शेषनाग की सय्या पर ध्यान मग्न थे और माता लक्ष्मी उनकी सेवा में थी। तभी महान तपस्वी महाऋषि भृगु वहां आये और भगवान विष्णु द्वारा उनका स्वागत न करने पर वो क्रोधित हो गए और भगवान विष्णु के छाती पर लात मारी और बोले मैं  तेरे घर आया और तू सो रहा है।

भगवान विष्णु तुरंत महर्षि भृगु के चरण पकड़ लिए और कहने लगे हे महर्षि मेरी छाती अति कठोर है, आपको कही चोट तो नही आई। 





महर्षि भृगु तो परीक्षा ले रहे थे, अतः उन्होंने अपना उद्देश्य बताया कि वो भगवान विष्णु के साहस और सहनशीलता की परीक्षा ले रहे थे और उन्हें ये पता चल गया कि विष्णु जी ही श्रेष्ठ है और अग्रपूज्य है। फिर वो वहां से चले गए।

भगवान विष्णु के ऊपर भृगु के इसतरह के वर्ताव से माता को कस्ट हुआ और विष्णु जी द्वारा ऋषि को दंड न दिए जाने का क्रोध हुआ। अतः माता लक्ष्मी क्रोधित होकर वैकुण्ठ छोड़ कर पृथ्वी पर चली गयी।

भगवान भी उनको खोजते पृथ्वी पर आए तो पता चला कि वो एक राजा की यहा पुत्री पद्दमावती रूप में अवतार ले चुकी है, अतः भगवान ने भी वेंकटेश्वर रूप में अवतार लिए। और बड़े होने पर पद्दमावती से शादी का प्रस्ताव रखा।

शादी के खर्च के लिए वेंकटेश्वर रूपी भगवान के पर धन नही था, अतः उन्होंने भगवान व्रह्मा एवं महेश को साक्षी बनाकर कुबेर से धन कर्ज के रूप में लिया और कहा कि वो ये कर्ज कलयुग के अंत तक कर देंगे और उसका सूत भी देगे।

इसी लिए इस मंदिर में धन का दान देने की मान्यता है, भक्तों का मानना है कि ताकि भगवान का कर्ज जल्द खत्म हो जाय। लेकिन सत्य ये है कि इतना धन होने पर भी भगवान कर्ज में है। क्योंकि उनके वो कर्ज कलयुग के अंत तक देना है।






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