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16 June, 2019

पांडवो के द्वारा स्वर्ग कि यात्रा। Pandavon ki Swarg Yatra.

क्यों की थी पांडवो ने स्वर्ग कि यात्रा:

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के अनुसार जब यादवों का अमूच विनास हो गया था, तथा भगवान श्री कृष्ण का भी पृथ्वी से अपने धाम जा चुके थे और उनकी नगरी द्वारिका समुंदर में डूब चुकी थी, तब वहां के नगर निवासी स्त्रियों, बूढो और बच्चों के लेने अर्जुन गए ताकि इनको सकुशल इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर में रह सके। जब अर्जुन लौट रहे थे तो कुछ लुटेरों ने उनपर हमला कर दिया, अर्जुन ने उनसे अकेले युद्ध किये परंतु उनका दिव्य ज्ञान लुप्त हो चुका था तथा उनका अक्षय तरकस भी खाली हो गया था। इस कारण वो लुटेरों से जीत नही पाए और लुटेरे कई स्त्रियों को उठा ले गए।
जैसे तैसे अर्जुन बाकियों को लेकर हस्तिनापुर आये, और महाऋषि व्यास से मिलने अपने भाईयों के साथ गए। वेदव्यासजी ने पांडवों को बताया कि आपलोगो का तथा भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य एवं समय खत्म हो चुका है। अतः आपका दिव्य ज्ञान और दिव्यअस्त्र लुप्त हो गया है और अब आपलोगो को भी स्वर्ग की यात्रा करनी चाहिए। युधिष्ठिर ने परीक्षित को राजा बनाकर, द्रोपदी और बाकी भाईओं के साथ स्वर्ग की यात्रा सुरु की।



पांडवो की स्वर्ग यात्रा:

पांडव अपनी यात्रा में कई पर्वतों , नदियों, सागरो और सारी पृथ्वी का भ्रमण करके हिमालय के तल पर पहुचे उनके साथ एक कुत्ता भी चल रहा था। तभी अग्नि देव आये और बोले कि अस्त्रों के साथ आप नही जा सकते अतः सभी ने अपने अस्त्र उनको दे दिया।
अपने स्वर्ग के चढ़ान में सबसे पहले द्रोपती मूर्छित होकर गिरी, भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो युधिष्ठिर बोले वो हम पांचों में से अर्जुन को अधिक प्रेम करती थी इसलिए ऐसा हुआ।
आगे चलकर सहदेव गिरा , भीम के द्वारा कारण पूछने पर युधिष्ठिर बोले इसे अपने ज्ञान और विवेक सिलता का अहंकार था अतः ये गिरा। उसे भी वही छोड़ कर आगे बढ़े तो नकुल गिरा, फिर युधिष्ठिर बोले इसे अपने रूप सौंदर्य का अभिमान था अतः ये गिरा।




आगे चलकर अर्जुन गिरा, उसका कारण युधिष्ठिर ने उसका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का अहंकार बताया। फिर भीम गिरे उनका कारण उनका सर्वसक्तिशाली होने का अहंकार बताया।
अंत मे युधिष्ठिर और उनके साथ चलने वाला कुत्ता बचा, तभी इंद्र अपना रथ लेकर पहुचे और युधिष्ठिर को साथ मे चलने को बोले, युधिष्ठिर ने कहा कि मार्ग में मेरे भाई और पत्नी गिर गए थे उन्हें भी साथ लीजिए। इंद्र ने कहा कि वे सब देह त्यागकर अपने लोक तक पहुच चुके है। फिर युधिष्ठिर ने साथ चल रहे कुत्ते को भी साथ ले जाने को कहा तो इंद्र ने इनकार कर दिया, परंतु युधिष्ठिर नही माने और कहा कि ये हमारे साथ सारी यात्रा में था अतः इसके बिना मैं नही जायूँगा। युधिष्ठिर कि बात सुनकर कुत्ता अपने वास्तविक रूप में आ गया वो वास्तव में काल था।



युधिष्ठिर रथ में बैठे और स्वर्ग पहुचे जहाँ पर दुर्योधन सहित सभी कौरव थे परन्तु पांडव नही थे, युधिष्ठिर ने कहा कि जहाँ मेरे भाई है मुझे वहा ले चलो। दूत युधिष्ठिर को नरक के रास्ते से लेकर गए जहाँ घोर अंधेरा था, भयंकर दुर्गंध थी और कंकाल एवं चीख पुकार का सोर था। युधिष्ठिर को वह स्थान बहुत खराब लगा और बार बार बोल रहे थे कि मुझे मेरे भाईओं के पास ले चलो।
कुछ देर बाद वहां इंद्र आदि देवता आ गए उनके आते ही वहा का वातावरण अच्छा हो गया , उजाला फैल गया और वातावरण खुसबूदार हो गया। उनके भाई भी आसान में मुस्कुराते हुए बैठे दिखाई दिए। इंद्र ने बताया की महाभारत युद्ध के दौरान अश्वस्थामा के विषय मे जो झूठ तुमने बोला था उसी के लिए तुम्हे कुछ देर के लिए नरक कि तकलीफ देखनी पड़ी।
अंत मे युधिष्ठिर देवनदी गंगा में स्नान करके अपना देह त्याग किया और परमधाम को प्राप्त किया। महाभारत की कथा भी यही तक है और यही पर समाप्त हुई है।





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