भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

25 June, 2019

जब भगवान राम धरती से गए तब हनुमान कहाँ थे। Story of Hanuman When Ram leave earth.

भगवान राम के अंत समय मे हनुमान कहाँ थे?

हम सब जानते है हनुमानजी भगवान राम के सबसे बड़े भक्त थे, अतः उन्हें भक्त शिरोमणि कहा जाता है। हनुमान जी जब से भगवान राम से मिले कभी उनसे दूर नही हुए। वो सुग्रीव के मंत्रिमंडल में जरूर रहते थे परंतु नित भगवान श्रीराम की सेवा में भी उपस्थित रहते थे। लेकिन जब भगवान राम का धरती में समय खत्म हो गया और वो सरयू में समाधि लेकर वैकुंठ चले गए तब उनके प्रिय भक्त हनुमान उपस्थित नही थे। तो जानते है कहाँ थे हनुमान:





कथा के अनुसार जब भगवान राम से मिलने काल आया और उसने यह सूचना दी कि आपने धरती पर रहने का जितना समय सुनिश्चित किया था वह पूर्ण होने वाला है, तो भगवान को एक चिंता हो गयी कि वो हनुमान को कैसे समझाएंगे क्योंकि हनुमान जी तो मानने वाले नही है और न ही भगवान से दूर रह सकेंगे, साथ ही हनुमानजी चिरंजीवी है अतः धरती पर उनका रहना भी जरूरी है।

अतः भगवान ने एक दिन अपनी एक अंगूठी जिसमे राम नाम अंकित था उसे धरती की एक दरार में गिरा देते है। जिसको खोजने के लिए हनुमान जी अति लघुरूप रख कर कूद जाते है। अंगूठी को खोजते खोजते वो पाताल लोक पहुंच जाते है, जहाँ उन्हें एक साधू मिलता है जो भोजन पका रहा था। हनुमान जी प्रतीक्षा करने लगते है कि साधु बाबा का भोजन हो जाय और फिर वो उनसे अंगूठी के बारे में पूछें।

परंतु वो साधु पहले एक रोटी बनाता फिर उसको खाता फिर दूसरी रोटी बनाता फिर उसको खाता । बार बार उसको ऐसा करते देख हनुमानजी से रह नही गया और उन्होंने उससे इस तरह भोजन का रहस्य पूछा।  महात्मा बोले कि अगर मैं सारी रोटियां बनाता हूँ और मृत्यु आजाए तो ब्यर्थ हो जाएगा, अतः मैं ऐसा कर रहा हूँ। 

हनुमानजी ने जब अंगूठी के बारे में पूंछा तो महात्मा एक स्थान की तरफ इशारा करते हुए बोले कि वहां देख लो अपनी अंगूठी। हनुमानजी ने देखा कि वहां तो अंगूठियों का ढेर लगा हुआ है जिसमे सब एक जैसी अंगूठी है और सब मे राम नाम अंकित है। जब हनुमानजी ने महात्मा से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि हर बार युग की समाप्ति पर एक अंगूठी ऊपर से गिरती है और उसे खोजने एक वानर आता है। जब वो वापस जाता है तो श्री राम धरती पर से जा चुके होते है। 

महात्मा ने हनुमानजी बताया कि समय चक्र की तरह घूमता रहता है, एक के बाद दूसरा और हर बार एक के बाद दूसरा युग के आता है वो सभी पात्र और समय। यही हर बार भगवान धरती पर अवतार लेते है और अपनी लीला करते है और अब तुमको भी उनके वचनों का पालन करना चाहिए।



24 June, 2019

गणेश जी और तुलसी की कथा। Story Of Ganesh and Tulsi in hindi.

श्री गणेश और तुलसी को एक साथ नही रखा जाता साथ ही गणेश पूजन में तुलसी के पत्तों का प्रयोग नही होता:


गणेश पूजन में कभी तुलसी नहीं रखी जाती, इसका कारण है तुलसी का गणेश जी के लिए एकतरफा प्रेम। आइए जानें ये कथा:-



एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था।

इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। तुलसी श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई और उनके मन में गणेश से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हुई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया।


श्री गणेश द्वारा अपने विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने से देवी तुलसी बहुत दुखी हुई और आवेश में आकर उन्होंने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दे दिया। इस पर श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा। एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण राक्षस से होगा। उन्‍होंने भी तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर के साथ होगा, इसके बाद तुलसी को अपनी गलती का आभास हुआ। 

उन्‍होंने गणेश जी से माफी मांगी। गणेश जी ने उन्‍हें माफ करते हुआ कहा कि वे एक पूजनीय पौधा बनेंगी। पर उनकी पूजा में तुलसी का कभी प्रयोग नहीं किया जाएगा। बाद में तुलसी का विवाह शंखचूड़ नामक असुर से हुआ, जिसे जालंधर के नाम से भी जाना जाता है।
किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।




19 June, 2019

तिरूपति बालाजी कि कथा, तथा क्यों चढ़ावा देने कि प्रथा है इस मंदिर में। Story of Tirupati Balaji.

तिरुपति बालाजी मंदिर कि मान्यताये:

भगवान वेंकटेश्वर का दक्षिण भारत में तिरुपति स्थित अति विशिष्ट एवं हिन्दू धर्म मे आस्था रखने वालों का महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान वेंकटेश्वर बालाजी भगवान विष्णु के अवतार है जिन्होंने महालक्ष्मी रूपी माता पद्दमावती से विवाह किया था। 
यह मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है क्योंकि यहां पर चढ़ावा चढ़ाने की विशेष मान्यता है। मान्यता है कि भगवान ने कुबेर से बहुत बड़ा कर्ज लिया था जिसे उन्होंने कलयुग के अंत तक चुकाने को कहा था अतः भक्तों के द्वारा चढ़ावा दिया जाता है ताकि भगवान का कर्ज जल्द पूरा हो जाय।




भक्तों का एवं जगत के पालक भगवान पर ऐसा कर्ज कैसे है जो उन्हें कलयुग के अंत तक चुकाना है और इसकी कथा क्या है ये जाने।

तिरुपति बालाजी की कथा:


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान एक समय भगवान विष्णु अपने धाम में छिरसागर पर शेषनाग की सय्या पर ध्यान मग्न थे और माता लक्ष्मी उनकी सेवा में थी। तभी महान तपस्वी महाऋषि भृगु वहां आये और भगवान विष्णु द्वारा उनका स्वागत न करने पर वो क्रोधित हो गए और भगवान विष्णु के छाती पर लात मारी और बोले मैं  तेरे घर आया और तू सो रहा है।

भगवान विष्णु तुरंत महर्षि भृगु के चरण पकड़ लिए और कहने लगे हे महर्षि मेरी छाती अति कठोर है, आपको कही चोट तो नही आई। 





महर्षि भृगु तो परीक्षा ले रहे थे, अतः उन्होंने अपना उद्देश्य बताया कि वो भगवान विष्णु के साहस और सहनशीलता की परीक्षा ले रहे थे और उन्हें ये पता चल गया कि विष्णु जी ही श्रेष्ठ है और अग्रपूज्य है। फिर वो वहां से चले गए।

भगवान विष्णु के ऊपर भृगु के इसतरह के वर्ताव से माता को कस्ट हुआ और विष्णु जी द्वारा ऋषि को दंड न दिए जाने का क्रोध हुआ। अतः माता लक्ष्मी क्रोधित होकर वैकुण्ठ छोड़ कर पृथ्वी पर चली गयी।

भगवान भी उनको खोजते पृथ्वी पर आए तो पता चला कि वो एक राजा की यहा पुत्री पद्दमावती रूप में अवतार ले चुकी है, अतः भगवान ने भी वेंकटेश्वर रूप में अवतार लिए। और बड़े होने पर पद्दमावती से शादी का प्रस्ताव रखा।

शादी के खर्च के लिए वेंकटेश्वर रूपी भगवान के पर धन नही था, अतः उन्होंने भगवान व्रह्मा एवं महेश को साक्षी बनाकर कुबेर से धन कर्ज के रूप में लिया और कहा कि वो ये कर्ज कलयुग के अंत तक कर देंगे और उसका सूत भी देगे।

इसी लिए इस मंदिर में धन का दान देने की मान्यता है, भक्तों का मानना है कि ताकि भगवान का कर्ज जल्द खत्म हो जाय। लेकिन सत्य ये है कि इतना धन होने पर भी भगवान कर्ज में है। क्योंकि उनके वो कर्ज कलयुग के अंत तक देना है।






16 June, 2019

पांडवो के द्वारा स्वर्ग कि यात्रा। Pandavon ki Swarg Yatra.

क्यों की थी पांडवो ने स्वर्ग कि यात्रा:

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के अनुसार जब यादवों का अमूच विनास हो गया था, तथा भगवान श्री कृष्ण का भी पृथ्वी से अपने धाम जा चुके थे और उनकी नगरी द्वारिका समुंदर में डूब चुकी थी, तब वहां के नगर निवासी स्त्रियों, बूढो और बच्चों के लेने अर्जुन गए ताकि इनको सकुशल इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर में रह सके। जब अर्जुन लौट रहे थे तो कुछ लुटेरों ने उनपर हमला कर दिया, अर्जुन ने उनसे अकेले युद्ध किये परंतु उनका दिव्य ज्ञान लुप्त हो चुका था तथा उनका अक्षय तरकस भी खाली हो गया था। इस कारण वो लुटेरों से जीत नही पाए और लुटेरे कई स्त्रियों को उठा ले गए।
जैसे तैसे अर्जुन बाकियों को लेकर हस्तिनापुर आये, और महाऋषि व्यास से मिलने अपने भाईयों के साथ गए। वेदव्यासजी ने पांडवों को बताया कि आपलोगो का तथा भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य एवं समय खत्म हो चुका है। अतः आपका दिव्य ज्ञान और दिव्यअस्त्र लुप्त हो गया है और अब आपलोगो को भी स्वर्ग की यात्रा करनी चाहिए। युधिष्ठिर ने परीक्षित को राजा बनाकर, द्रोपदी और बाकी भाईओं के साथ स्वर्ग की यात्रा सुरु की।



पांडवो की स्वर्ग यात्रा:

पांडव अपनी यात्रा में कई पर्वतों , नदियों, सागरो और सारी पृथ्वी का भ्रमण करके हिमालय के तल पर पहुचे उनके साथ एक कुत्ता भी चल रहा था। तभी अग्नि देव आये और बोले कि अस्त्रों के साथ आप नही जा सकते अतः सभी ने अपने अस्त्र उनको दे दिया।
अपने स्वर्ग के चढ़ान में सबसे पहले द्रोपती मूर्छित होकर गिरी, भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो युधिष्ठिर बोले वो हम पांचों में से अर्जुन को अधिक प्रेम करती थी इसलिए ऐसा हुआ।
आगे चलकर सहदेव गिरा , भीम के द्वारा कारण पूछने पर युधिष्ठिर बोले इसे अपने ज्ञान और विवेक सिलता का अहंकार था अतः ये गिरा। उसे भी वही छोड़ कर आगे बढ़े तो नकुल गिरा, फिर युधिष्ठिर बोले इसे अपने रूप सौंदर्य का अभिमान था अतः ये गिरा।




आगे चलकर अर्जुन गिरा, उसका कारण युधिष्ठिर ने उसका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का अहंकार बताया। फिर भीम गिरे उनका कारण उनका सर्वसक्तिशाली होने का अहंकार बताया।
अंत मे युधिष्ठिर और उनके साथ चलने वाला कुत्ता बचा, तभी इंद्र अपना रथ लेकर पहुचे और युधिष्ठिर को साथ मे चलने को बोले, युधिष्ठिर ने कहा कि मार्ग में मेरे भाई और पत्नी गिर गए थे उन्हें भी साथ लीजिए। इंद्र ने कहा कि वे सब देह त्यागकर अपने लोक तक पहुच चुके है। फिर युधिष्ठिर ने साथ चल रहे कुत्ते को भी साथ ले जाने को कहा तो इंद्र ने इनकार कर दिया, परंतु युधिष्ठिर नही माने और कहा कि ये हमारे साथ सारी यात्रा में था अतः इसके बिना मैं नही जायूँगा। युधिष्ठिर कि बात सुनकर कुत्ता अपने वास्तविक रूप में आ गया वो वास्तव में काल था।



युधिष्ठिर रथ में बैठे और स्वर्ग पहुचे जहाँ पर दुर्योधन सहित सभी कौरव थे परन्तु पांडव नही थे, युधिष्ठिर ने कहा कि जहाँ मेरे भाई है मुझे वहा ले चलो। दूत युधिष्ठिर को नरक के रास्ते से लेकर गए जहाँ घोर अंधेरा था, भयंकर दुर्गंध थी और कंकाल एवं चीख पुकार का सोर था। युधिष्ठिर को वह स्थान बहुत खराब लगा और बार बार बोल रहे थे कि मुझे मेरे भाईओं के पास ले चलो।
कुछ देर बाद वहां इंद्र आदि देवता आ गए उनके आते ही वहा का वातावरण अच्छा हो गया , उजाला फैल गया और वातावरण खुसबूदार हो गया। उनके भाई भी आसान में मुस्कुराते हुए बैठे दिखाई दिए। इंद्र ने बताया की महाभारत युद्ध के दौरान अश्वस्थामा के विषय मे जो झूठ तुमने बोला था उसी के लिए तुम्हे कुछ देर के लिए नरक कि तकलीफ देखनी पड़ी।
अंत मे युधिष्ठिर देवनदी गंगा में स्नान करके अपना देह त्याग किया और परमधाम को प्राप्त किया। महाभारत की कथा भी यही तक है और यही पर समाप्त हुई है।