भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

27 May, 2019

श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा कि कथा, और सुदामा दरिद्रता को प्राप्त क्यों हुए। Story of Sudama friend of Shrikrishna.

सुदामा का परिचय एवं चरित्र का संछिप्त वर्णन:

सुदामा ब्राह्मण कुल में जन्मे तथा भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र के साथ साथ भक्त थे। सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता उनके बाल्य काल मे उज्जैन स्थित संदीपनी ऋषि के आश्रम में विद्या अध्ययन के साथ हुई थी। सुदामा वेदों एवं पुराणो के ज्ञाता और विद्धवान थे, जो अपना जीवन बालको को विद्या देकर तथा भिक्षा मांगकर जीवन यापन करते थे। सुदामा को अपनी गरीबी और दरिद्रता पे जरा भी दुख नही था, बल्कि वो प्रसन्नता के साथ भगवान भजन और पूजन के साथ अपना जीवन यापन करते थे।





"सुदामा चरित्र" नामक काव्य-ग्रंथ है जो कवि नरोत्तमदास जी द्वारा अवधि भाषा मे रचित है। कवि नरोत्तमदास जी ने सुदामा के जीवन एवं चरित्र का उत्तम वर्णन किया है। साथ ही श्रीमद्भागवत कथा में भी सुदामा चरित्र का वर्णन किया गया है। सुदामा को निर्धनता का कोई दुख नही था लेकिन उनकी पत्नी द्वारा बार बार प्रेरित किये जाने पर वो अपने मित्र द्वारिकाधीश के पास गए, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने मित्र का स्वागत और बिना मांगे उनकी दरिद्रता को दूर किये जाने का मनोरम कथा है।

सुदामा की गरीबी या दरिद्रता का कारण:

सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के मित्र थे उन्होंने भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ सारी शिक्षा मुनि आश्रम में ग्रहण की थी। फिर वो इतने गरीब कैसे हो गए? इसकी कथा इस प्रकार है:

सुदामा और श्रीकृष्ण उज्जैन स्थित संदीपनी के आश्रम में ग्रहण कर रहे थे। उसी के पास नगर में एक गरीब ब्राह्मणी निवास करती थी। जो अपना जीवन भिक्षा मांगकर चलाती थी। एक ऐसा समय आया जब बहुत दिनों तक उसे भिक्षा नही मिली और वो केबल जलपान करके दिन बिताती थी। उसके बाद एक दिन उसे दो मुट्ठी चने मिले जिसे उसने एक पोटली में बांधकर सुबह भगवान को भोग लगाकर फिर खाने को रख दिये।
रात में उसकी झोपड़ी में चोर घुस गए और उसकी पोटली यह सोचकर कि इसमें धन होगा, चुराकर ले गए। तभी नगर में चोरी खबर फैल गयी और लोग चोरों के पीछे भागने लगे। चोर भागकर मुनिआश्रम में छुप गए। और सुबह होने से पहले भाग गए। लेकिन चने की पोटली वही गिर गयी।



उधर जब ब्राह्मणी ने सुबह देखा कि चने की पोटली चोरी हो गयी तो उसने श्राप दे दिया कि "जो भी मेरे चने खाये वो दरिद्रता को प्राप्त हो जाय"।
गुरु आश्रम में वह पोटली गुरुमाता को मिल गयी और उन्होंने वो चने सुदामा को दे दिये जब वो रोज की तरह लकड़ी काटने जा रहे थे। भिन्न भिन्न मतों का मानना है कि वो चने जानकर या अनजाने में सुदामा खा गए और दरिद्रता को प्राप्त हो गए।




No comments:

Post a Comment