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20 May, 2019

कालिदास के जीवनकाल कि कथा एवं मुख्य रचनायें। Story of Kalidas and top Compositions.

कालिदास का जीवन परिचय:

भारतीय साहित्य के महानतम कवि एवं नाटककारों में संस्कृत भाषा के एक महान साहित्यकार थे "कालिदास"। महाकवि कालिदास जी ने राष्ट्र को चेतना और स्वर देने का कार्य किया था। कालिदास जी ने भारतीय पौराणिक कथाओं को प्रेरणा एवं जीवन और दर्शन को आधार बनाते हुए अनेक रचनाएँ की थी। कालिदास की रचनाओं में प्रेम एवं श्रृंगार रस की प्रधानता पाई जाती है, उन्होने सरल भाषा मे अलंकृत रचनाये की थी। जन्म के स्थान तथा काल को लेकर कई मत भेद है, लेकिन उज्जैन से लेकर उनकी साहित्य में अधिक जुड़ाव है। साथ ही कालिदास जी विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे।
कालिदास जी कि अनेक साहित्यिक नाटकों में से उनकी रचना "अभिज्ञानशाकुन्तलम" को सर्वश्रेष्ठ रचना एवं कवि के रूप में "मेघदूतम" शर्वश्रेष्ट रचना मानी जाती है।


कालिदास के जीवनकाल से जुड़ी कहानी:

कालिदास कि एक चर्चित कथा है जिसमे उनके विवाह तथा ज्ञान प्राप्ति के बारे में बताया जाता है। कालिदास जी कि पत्नी का नाम विद्योत्तमा था। विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दिया तो हार को अपमान समझकर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। 
चलते चलते उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जहां पर एक व्यक्ति जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। उन्होंने सोचा कि इससे बड़ा मूर्ख तो कोई मिलेगा ही नहीं। उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा और कहा- "मौन धारण कर लो और जो हम कहेंगे बस वही करना"। उन लोगों ने स्वांग भेष दिलाकर विद्योत्तमा के सामने प्रस्तुत किया कि हमारे गुरु आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए ये हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर हम वाणी में उसका उत्तर आपको देंगे। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे। 
प्रथम प्रश्न विद्योत्तमा ने किया संकेत में एक उंगली दिखा कर कि ईस्वर एक है। परन्तु कालिदास ने समझा कि ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है। क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत किया इस भाव से कि तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों फोड़ दूंगा। तभी विद्वानों ने तर्क दिया कि आप कहना चाहती ईस्वर एक है लेकिन गुरुदेव कह रहे है "ईस्वर एक है पर उसके दो रूप है आत्मा और परमात्मा"।
राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया कि तत्व पांच है। तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया कि तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी, मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। विद्वानों ने समझाया कि गुरु कहना चाह रहे हैं कि भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी जल आकाश वायु अग्नि। परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते। परन्तु आपस में मिलकर एक होकर उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। 
इसके पश्चात राजकुमारी अपनी हर मान जाती है और विवाह हो जाता है। परंतु विवाह के पश्चात राजकुमारी को पता चल जाता है कि यह कोई ज्ञानी नही और छल से मेरा विवाह हुआ है। लेकिन वो सोचती है ज्ञानी न सही पर ये किस जाति का है पता करना चाहिए, और वो एक ऐसे कमरे में ले जाती है जहाँ सभी जातिओं से जुड़ी तस्बीरे लगी होति है, कालिदास सभी को गौर से देखते है पर एक चरवाहे की तस्बीर को उत्सुकता से देखने लगते है। राजकुमारी को क्रोध आता है और वो खिड़की से धक्का देती है, कालिदास नीचे गिरते है और उनकी जिव्हा कटकर पास में काली की प्रतिमा कर गिरती है। माता काली प्रसन्न होकर वरदान देने लगती है, कालिदास अपनी पत्नी का नाम रट रहे होते है जो देवी को विद्या सुनाई पड़ा और विद्या का वरदान दे दिया।
ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा - कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी)। विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा -- अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है)।
कालिदास जी ने अपनी पत्नी को ही अपना गुरु माना और इन्ही वाक्यो से अपनी रचनाएँ की।


कालिदास की प्रमुख रचनाओं का वर्णन:

कालिदास जी की अनेक रचनाएँ है परन्तु मुख्य रूप से उनकी सात रचनाओं को श्रेय दिया जाता है। जिसमे तीन नाटक , दो महाकाव्य, दो खण्डकाव्य है।


कालिदास के प्रमुख तीन नाटक

१) मालविकाग्निमित्रम्

कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र से प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।

२) अभिज्ञान शाकुन्तलम् 

कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। 
इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है।

३) विक्रमोर्वशीयम् 

एक रहस्यों भरा नाटक है। इसमें पुरूरवा इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम करने लगते हैं। पुरूरवा के प्रेम को देखकर उर्वशी भी उनसे प्रेम करने लगती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने जाती है तो पुरूरवा से प्रेम के कारण वह वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है। इससे इंद्र गुस्से में उसे शापित कर धरती पर भेज देते हैं। हालांकि, उसका प्रेमी अगर उससे होने वाले पुत्र को देख ले तो वह फिर स्वर्ग लौट सकेगी। विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौंदर्य और शिल्प से भरपूर है।

कालिदास रचित महाकाव्य:

१) कुमारसंभवम्  

कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।

२) रघुवंशम् 

कालिदास ने रघुकुल के राजाओं का वर्णन किया है।

कालिदास रचित खण्डकाव्य:



१) मेघदूतम् 

मेघदूत एक गीतिकाव्य है जिसमें यक्ष द्वारा मेघ से सन्देश ले जाने की प्रार्थना और उसे दूत बना कर अपनी प्रिय के पास भेजने का वर्णन है। मेघदूत के दो भाग हैं - पूर्वमेघ एवं उत्तरमेघ। नागार्जुना ने इसका हिंदी अनुवाद किया था।

२) ऋतुसंहारम् 

इसमें सभी ऋतुओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है।






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