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11 May, 2019

एकलव्य की कथा जिसकी मृत्यु भगवान श्रीकृष्ण के हांथो हुआ। Story of Eklavya in hindi.

एकलव्य का जीवन परिचय:

महाभारत काल मे जन्मे अतिपराक्रमि धनुर्धर जो मात्र अपनी धनुर्विद्या से नही अपितु अपने गुरु को दिए गए गुरुदक्षिणा के कारण जाना जाता है वो है "एकलव्य"।




एकलव्य का जन्म प्रयाग के निकट श्रृंगवेरपुर नामक भील राज्य के राजा निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र रूप में हुआ, उनकी माता का नाम शुलेखा था। बचपन मे उनका नाम "अभय" था जो कि बढ़े होने पर वीरता के कारण एकलव्य हो गया। निषादराज का यह राज्य विशाल था जिसकी सीमाएं मथुरा, मगध , हस्तिनापुर आदि राज्यो को छूती थी।
एकलव्य के जीवन की दो घटनाये अधिक प्रचलित है, पहली उनकी विद्या अध्ययन एवं गुरु दकक्षिणा की तथा दूसरी श्रीकृष्ण के द्वारा हुई उनकी मृत्यु की।

एकलव्य की धनुर्विद्या एवं गुरुदक्षिणा:

जब एकलव्य युवा हुए तो उनके अंदर धनुर्विद्या को सीखने की लालसा भी बढ़ी और वो एक ऐसे गुरु की तलाश करने लगे जो उन्हें सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना दे। अतः उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य का चयन किया और निश्चय किया कि उन्ही से धनुर्विद्या सीखेंगे। 




परंतु एक बाधा थी कि गुरु द्रोणाचार्य केवल छत्रिय और व्राह्मण के बालको को ही विद्या देते थे। जब द्रोणाचार्य से विद्या लेने एकलव्य उनके आश्रम गए तो उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि तुम एक भील जाती के हो और मैं केवल छत्रिय और व्राह्मण के पुत्रों को विद्या देने का संकल्प कर चुका हूं। केलिन एकलव्य नही माना क्योंकि उसने द्रोणाचार्य को ही अपना गुरु मान लिया था। अतः उसने एक निर्जन स्थान पर गुरु द्रोण की प्रतिमा बनाकर उसी प्रतिमा से प्रेरणा लेकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा।

कुछ वर्षों बाद एक दिन जब गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन आदि अपने शिस्यों के साथ उस स्थान के नजदीक से गुजर रहे थे तो उनके साथ चलने वाला एक कुत्ता जोर जोर से भोक रहा था। अचानक किसी ओर से कुछ सब्द भेदी बान आये और कुत्ते के मुख में भर गए और कुत्ते का मुख बन्द हो गया। द्रोणाचार्य को बहुत अचंम्बा हुआ कि ये कौन है जो शब्द भेदी बाण चला रहा है। 

एकलव्य को खोजते वो लोग उस स्थान तक पहुच गए जहाँ पर एकलव्य अभ्यास कर रहा था। द्रोणाचार्य को आया देख एकलव्य ने उन्हें प्रणाम किया , तब एकलव्य से परिचय पूछते हुए आचार्य ने कुत्ते के मुख में बाण मारने का कारण पूछा। 

एकलव्य बोला इस कुत्ते की अबाज से उसके धनुर्विद्या के अभ्यास में विघ्न हो रहा था अतः उसने बाण चलाये, तथा अपना परिचय गुरु द्रोणाचार्य का शिष्य एकलव्य बताया। द्रोणाचार्य बोले मैने तो तुम्हे विद्या नही दी फिर तुम मेरे शिष्य कैसे हुए? तब एकलव्य ने सारी बात बताई की कैसे उसने धनुर्विद्या सीखी।

द्रोणाचार्य समझ गए कि एकलव्य मेहनती है और उसमें धनुर्विद्या की लालसा है और वो संसार का सबसे महान धनुर्धर बन सकता है। और क्योंकि उन्होंने अर्जुन को यह वचन दिया था कि उसे संसार का सबसे बड़ा धनुर्धर बनायेगे, अतः उन्होंने एकलव्य से छल किया और गुरुदक्षिणा देने को कहा।

एकलव्य तुरंत राजी हो गए गुरुदक्षिणा देने को क्योंकि उसके बिना गुरु विद्या सफल नही होती, ऐसे गुरु द्रोणाचार्य ने कहा।
उसके बाद द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया।

यह सुनते ही एकलव्य की आँखे छलक गयी पर वो बिना संदेह के अपने कमर में लटक रही कटार निकाल कर अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काट दिया और गुरु के चरणों मे समर्पित कर दिया।

एकलव्य की मृत्यु श्रीकृष्ण के हाथों क्यों हुई:

अंगूठे के बिना भी एकलव्य के धनुष चलना सीख लिए और धनुर्विद्या में पारंगत हो गया। पिता की मृत्यु के पश्चात वो राजा बना और मगध के राजा जरासंध से मित्रता कर ली, तथा उसी के लिए युद्ध करने लगा।

जब जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया तो एकलव्य भी साथ था, उसका युद्ध कौशक अद्भुद था, वो अकेला ही कई महारथियों पर भारी था। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि एक धनुर्धर जो केवल चार उंगलियों से बाण चला रहा है और सब पर भारी पड़ रहा है, तो ये आगे चल कर अर्जुन के लिए प्रतिद्वंद्वी हो सकता है। अतः उन्होंने अर्जुन प्रेम के कारण उसका युद्ध मे वध कर दिया।





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