भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

29 May, 2019

देवऋषी नारद कि कथा: जब उनका मुख वानर का हो गया था। Story of Devrishi Narad.

देवऋषी नारद को जब अहंकार हो गया था:

अहंकार और घमंड हो जाने पर बुद्धि कुटिल हो जाती है, फिर अच्छे बुरे और धर्म-अधर्म का ज्ञान भंग हो जाता है। इससे मनुष्य तो क्या देवता भी नही बच पाते है। ऐसी ही कथा है देवऋषी नारद कि है जब उनको अपने ज्ञान तथा तपोबल का अहंकार हो गया था, और भगवान शिव कि कृपा से भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त का अहंकार दूर किया था। 
देवऋषी नारद कि इस कथा में उनका मुख वानर का हो गया था। तथा उन्होंने भगवान विष्णु सहित शिवजी के दो पार्षदों को भी श्राप दे दिया था। यह कथा शिवमहापुराण के अलावा और भी जगह वर्णित है।


देवऋषी नारद को अहंकार ग्रसित होना और चूर होने की कथा:


देवऋषी नारद भगवान विष्णु के परम भक्त होने के साथ साथ ज्ञानी, योगी एवं उन्हें तपोवल से शिध्दिया प्राप्त थी। देवऋषी नारद वृहमचारी थे, उन्होंने विवाह नही करने कि प्रतीज्ञा ले रखी थी। वे कभी एक जगह में स्थिर नही रहते थे सदा तीनो लोको में भ्रमण किया करते थे। 

एक दिन वो हिमालय के पास से गुजर रहे थे, जहां से गंगा नदी का उद्गम स्थल है। वहां का मनोरम दृश्य नारद जी को बहुत भा गया और उनके मन मे उसी स्थान पर अपने आराध्य के लिए तप करने कि प्रेरणा हुई। अतः नारद जी उसी स्थान पर तप में लीन हो गए।

जब यह बात देवराज इंद्र को पता चली की देवऋषी नारद तपस्या में लीन है तो इंद्र को संदेश हुआ कि कही नारद भगवान विष्णु को प्रसन्न करके उनके इंद्र लोक का सिंहासन न मांग ले। इंद्र देव ने नारद कि तपस्या को तोडने के लिये कामदेव को भेजा। कामदेव ने बहुत कोशिश की नारद जी के तपस्या को भंग करने के लिए, लेकिन वो असफल हो गए। कामदेव के द्वारा कई बार प्रयत्न करने पर भी जब सफलता नही मिली तो कामदेव डर गए कि असफल होकर वो देवराज के पास कैसे जायेगे। अतः वो देवऋषी नारद से तपस्या रोकने की प्राथना करने लगे।

देवऋषी नारद ने कामदेव की प्राथना मान ली और तप को रोक दिया। लेकिन उनको इस बात का बहुत अभिमान हो गया कि उनपर कामदेव का कोई प्रभाव नही हुआ और उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली।
वो अहंकार बस अपना गुणगान करने कैलाश पर्वत पर भगवान भोलेनाथ के पास गए। भगवान शिवजी को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुए अहंकार दिख गया अतः उन्होंने देवऋषी को भगवान विष्णु के पास जाने को कहा। देवऋषी अपना गुणगान करने छिरसागर में गए भगवान विष्णु को सारी बात बताई तो भगवान को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुआ घमंड दिख गया। 

लेकिन वो अपने भक्त को ऐसे नही छोड़ सकते थे अतः उन्होंने देवऋषी के मार्ग में माया के द्वारा एक मनोरम नगर बना दिया। जहाँ पर उत्सव का माहौल था । नगर के राजा अपनी पुत्री के स्वमन्वर की तैयारी कर रहे थे। देवऋषी भी वहां पहुच गए। नगर के राजा में उनका स्वागत किया और अपनी पुत्री का भविष्य जानने के लिए उसका हाथ दिखाया।
राजा की कन्या इतनी सुंदर थी कि वो विश्व मोहिनी लग रही थी, उसका रूप यौवन देखकर देवऋषी नारद भवचक्के रह गए। और उसी कन्या से विवाह करने की कामना करने लगे।




इस कामना को लेकर वो अपने आराध्य देव भगवान विष्णु के पास गए और अपने मन की व्यथा बताई और कहा कि आप अपना स्वरूप दे दीजिए। भगवान विष्णु ने अपना शरीर तो दे दिया पर चेहरा वानर का दे दिया।

देवऋषी नारद अपना शरीर देखकर खुश हो गए और जा कर स्वयंवर सभा में बैठ गए। उनको लगा कि यह रूप देखकर विश्व मोहनी कन्या उनपर ही वरमाला डालेगी। लेकिन ऐसा नही हुआ और उसने उनकी तरफ देखा तक नही और वरमाला वही पर आए हुए राजा का वेष रखे भगवान विष्णु पर डाल दी।

देवऋषी नारद अपना वानर का चेहरा देखकर अति क्रोधित हो गए। और भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि "धरती पर मनुष्य रूप में जाना पड़ेगा और जिस तरह मेरी पत्नी नही बनने दिया उसी तरह उनको भी पत्नी वियोग का दुख भोगना पड़ेगा और जिस वानर का रूप देकर उपहास बनाया उन्ही वानरों की मदत लेनी पड़ेगी।"

बाद में जब भगवान की माया से बाहर आये और अपने दिए हुए श्राप पर दुख हुआ परन्तु भगवान विष्णु ने उनका श्राप स्वीकार किया और राम रूप में धरती पर अवतार लिया।





No comments:

Post a Comment