भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

07 May, 2019

मनुस्मृति की विवेचना एवं मनुस्मृति पर आधुनिक विवादो के कारण। Description of Manusmriti.


क्या है "मनुस्मृति"? :


हिन्दू धर्म का प्राचीन धर्मशास्त्र है मनुस्मृति, यह उपदेश रूप में है जो मनु द्वारा ऋषियों को दिया गया था। इसे हिन्दू धर्म शास्त्र या मनुशंहता के नामों से भी जाना जाता है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव है। यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। मनु महाराज के जीवन और उनके रचनाकाल के विषय में इतिहास-पुराण स्पष्ट नहीं हैं। तथापि सभी एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि मनु आदिपुरुष थे और उनका यह शास्त्र आदिशास्त्र है।






मनुशंहता या मनुस्मृति स्वयंभुव मनु के द्वारा ही रचित है,  मनुस्मृति से यह भी पता चलता है कि स्वायंभुव मनु के मूलशास्त्र का आश्रय कर भृगु ने उस स्मृति का उपवृहण किया था, जो प्रचलित मनुस्मृति के नाम से प्रसिद्ध है। इस 'भार्गवीया मनुस्मृति' की तरह 'नारदीया मनुस्मृति' भी प्रचलित है।

मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हजार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है।

मनुस्मृति को लेकर विरोधाभास क्यों? :


भारत शुरू से ही बौद्धिक और अध्यात्मिक संघर्षों और समन्वयों की स्थली रहा है, मनुस्मृति एक ऐसा ग्रंथ है जो पहले स्वार्थी लोगों की मिलावट का शिकार हुआ और फिर हमारी राजनीति का।

मनुशंहता या मनुस्मृति नाम से अनेक रचनाये प्रचलित है, जिनमे श्लोकों और अध्याय की संख्या भिन्न है। अतः सिद्ध है कि अलग अलग समय मे इसकी रचना और संस्करण में श्लोकों का मिलावट और गवन किया गया है। यह मिलावट इतना हास्यास्पद है कि एक ही समय के दो श्लोकों के अर्थ  भावना एकदम भिन्न है।

आधुनिक राजनीतिक विवादों में मनुस्मृति को जिस तरह से अपमानित किया गया है वो निंदनीय है। यह स्पष्ट है कि अलग अलग समय में धर्माचार्यों ने अनेको धर्मग्रंथों की विवेचना और अनुवाद में अस्पस्टता और अलस्यता दिखाई है जिससे विवाद बढ़े है।






विरोधी जिन मुद्दों को लेकर विवाद रखते भी वो मुख्यतः है स्त्रियों और तथाकथित जातियों को लेकर कही गयी अन्याय पूर्ण बाते है। इन मुद्दों को गांधी जी ने भी माना था और इनको लेकर अम्बेडकर जी ने मनुस्मृति की एक प्रति को जलाया था, जिशसे राजनीतिक विवाद बढ़ा।

मनुस्मृति की रचना का काल भी पूर्ण रूप से सिद्ध नही है क्योंकि रामायण में भी मनुस्मृति की और श्लोक के अंश है परंतु मनुस्मृति में रामायण का कोई अंश नही है। अतः मूलतः मनुस्मृति कितना प्राचीन है शिद्ध नही है, तो फिर उसकी मूलप्रति तो असंभव है यानी मिलावट और तथ्यों से छेड़छाड़ संभव है।

अब अगर मूल विवादों की बात करे तो भारतीय संस्कृति में हर युग मे स्त्रियों को आदर दिया गया है हम देवताओं के साथ साथ देवियों की भी समान रूप से पूजा अर्चना करते है, तो हमारा धर्मग्रंथ उनके प्रति अपमानित और अन्याय पूर्ण बातों की कोई संभावना नही दिखाई देती।

दूसरा मुद्दा जो यह कहा जाता है कि मनुस्मृति द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था , जातीयता का कारण है। जबकि ऐसा बिलकुल नही है। वर्ण व्यवस्था मनुष्य के कर्म, छमता, बल और बुद्धि के आधार पर की गई थी। जिसपर जातीय ढांचा लोगो ने अपने अनुसार बनाया ।
जिस तरह ग्रंथो के अनुवाद में उनका भाव बदल दिया गया उसी तरह वर्ण व्यवस्था को जातीय व्यवस्था में बदला गया।


क्या निवारण है इन विवादों का?


ज्ञात है कि बाइबल और महाभारत जैसे धर्म ग्रंथो में भी मिलावट और व्याख्या में त्रुटि की गई है। तथा तुलसीदास जी जैसे महात्मा अगर रामायण प्रासंगिक अनुवाद नही करते तो उन्हें भी समझने में त्रुटि की जाती और गलत मतलब निकाले जाते।

जरूरत है कि इनका गहन अध्ययन और शोध हो, जब तक इनका ठीक से अनुवाद नही होगा विरोधाभास बढ़ता रहेगा। उसके बाद जो भी इसमे बुराईया हो उनको हटाया जाय, जिसमे किसी को भी आपत्ति न हो। क्योंकि ज्ञानी लोगो को अच्छाईयों को ग्रहण करके बुराइयों को अलग कर देना चाहिए।
ऐसे धर्म ग्रंथो को जलाना, उनपर गलत टिप्पणी करना या इनपर जूता या पैर रखकर अपमानित करना शर्मनाक है और जो लोग इन ग्रंथों पर किसी विशेष के ऊपर अन्याय की बात करते है वो इन ग्रंथों पर इस तरह का आचरण करे वह कौन सा न्याय है।

सदियों से कुछ कुरीतियों को मुद्दा बनाकर धर्म को बांटने का कार्य समाज मे होता आ रहा है, उसमे ऐसा करने वाले लोगो का निजी स्वार्थ होता है। जरूरत है कुरीतियों को हटाने का और एक जुट रहने का न कि आपस मे जातियों में विभाजित होने का।







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