google.com, pub-8785851238242117, DIRECT, f08c47fec0942fa0 ऋक्षराज जामवंत एवं श्रीकृष्णा के बीच हुए युद्ध की कथा। Story of War Between Jamwant and Shrikrishna. - पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

26 April, 2019

ऋक्षराज जामवंत एवं श्रीकृष्णा के बीच हुए युद्ध की कथा। Story of War Between Jamwant and Shrikrishna.

ऋक्षराज जामवंत का परिचय, जिनका वर्णन त्रेतायुग एवं द्वापरयुग दोनों में मिलता है:

ऋक्षराज जामवंत जी रीछ योनि में जन्मे भगवान ब्रह्मा के पुत्र थे, उन्होने सागर मंथन में भी भाग लिया था।  त्रेतायुग में श्रीराम और रावण के बीच हुए युद्ध मे वानर सेना के महत्वपूर्ण योद्धा तथा सुग्रीव के मंत्री एवं सलाहकार थे। द्वापरयुग में जामवंत जी ने श्रीकृष्ण के साथ युद्ध किया था, तथा बाद में श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु के अवतार जानकर अपनी पुत्री जामवंती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ किया था।


जामवंत जी का श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण से स्यमन्तक मणि के लिए युद्ध हुआ था, जिसजे बहुत आश्चर्य होता है के भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम के सेवक एवं भक्त उन्ही भगवान विष्णुजी के अवतार श्रीकृष्ण को कैसे नही पहचान पाए और उनके बीच इतना बड़ा युद्ध हुआ। इसके बारे में एक धारणा है कि भगवान श्रीराम से कुश्ती करने की मनसा जामवंत जी मे की थी तब श्रीराम ने हँसकर कहा था आपकी इस मनोकामना को अगले अवतार में पूर्ण करेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण और जामवंत जी के बीच हुए युद्ध की कथा:

इस कथा का विस्तरित वर्णन श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण जी के विवाह के वर्णन के समय है। इस कथा के अनुसार सत्राजित नामक राजा जिनका राज्य मथुरा के अंतर्गत आता था, उंन्होने सूर्यदेव कि उपासना की, जिसजे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने स्यमंतक नामक मणि उपहार रूप में दी। इस मणि का एक खासियत थी कि यह हरदिन अपने भार से आठ गुना सोना देती थी।




एक दिन जब श्रीकृष्ण जी अपने राज्य में चौसर खेल रहे थे तब उनके पास सत्राजित जी आये, उस समय उनके पास वह स्यमंतक मणि उनके पास थी, तब श्रीकृष्ण ने कहा कि यह मणि बहुत विशिष्ट है अतः ये राजा के पास होने चाहिए और इसे राजा उग्रसेन के पास दे देनी चाहिए।

सत्राजित कुछ नही बोले और वहां से चले गए, और अपने निवास में पूजा के स्थान में रख दिया। एक दिन उनका भाई प्रसेनजित उस मणि को लेकर शिकार पर चला गया, जहाँ पर एक सिंह के द्वारा उनका और उनके घोड़े की हत्या कर दी। सिंह ने वह मणि रख ली तथा उस सिंह को जामवंत जी ने मारकर वह स्यमन्तक मणि पा गए लेकिंन उसकी विसिस्टता को नही जानते थे और अपने बालक को खेलने को दे दिये।

उधर भाई के वापस न आने पर सत्राजित ने यह भ्रम फैलाने लगे कि श्रीकृष्ण की नजर मणि पर थी अतः उन्होंने मणि पाने के लिए मेरे भाई को मार दिया है। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चली तो वो अपने कुछ मित्रो के साथ वन में गए जहाँ पर उनको  सत्रजीत का भाई और घोड़ा मारा हुआ मिला, पास में सिंह के पदचिन्ह मिले। सिंह के पदचिन्हों का पीछा किया तो वो भी मारा हुआ मिला, साथ ही एक ऋक्ष के पदचिन्ह मिले। ऋक्ष के पदचिन्हों का पीछा किया तो एक गुफा में जाते हुए मिले। श्रीकृष्ण अपने मित्रों को वहाँ छोड़कर गुफा में प्रवेश कर गए, और एक ऋक्ष बालक को स्यमन्तक मणि से खेलता हुआ देखकर मणि ले लिए।

तभी वहां ऋक्षराज जामवंत आ गए और मणि छीन लेने से क्रोधित हो गए और दोनों के बीच युद्ध सुरु हो गया। दोनों अति वीर थे अतः युद्ध करते करते 28 दिन बीत गए। 28 दिन बाद भी जब युद्घ चलता रहा तो उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को याद किया। तब उन्हें कृष्ण में राम के दर्शन हुए और अपनी गलती का पछतावा हुआ।




जामवंत जी ने अपनी पुत्री जामवंती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिए, श्रीकृष्ण जामवंती और स्यमन्तक मणि को लेकर मथुरा गए और मणि सत्रजीत को दे दी। सत्राजित को भी अपने किये का पछतावा हुआ और अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

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