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23 April, 2019

काली माता की कथा एवं शिवजी का काली माता के पैरों के नीचे आने की कथा। Story of Kali Mata.

महाकाली माता के सवरूप का परिचय:

आदि शक्ति माता जगदम्बा के कई रूपो में से एक रूप है काली माता का रूप। माता का यह रूप काजल के समान कला है, उनके तीन नेत्र तथा गले मे मुंडमाला है। देवी ने इस रूप में अनेक आभूषण और अस्त्र धारण किये है परन्तु मुख्यरूप से खड्ग खप्पर धारण किये है। 


माता महाकाली का यह रूप विकराल तथा इतने क्रोध में है कि काल भी भयभीत हो जाता है। इनके क्रोध को शांत करने की शक्ति समस्त संसार के नही है। माता काली का स्वरूप भले ही भयानक है परंतु इनके हृदय में भक्तों के लिए स्नेह एवं वात्सल्य भरा हुआ है, वे भक्तों को अभय देने वाली एवं उनके भय को दूर करने वाली है। इसलिए कलयुग में इनकी भक्ति को श्रेष्ठ एवं उत्तम माना गया है।

माता महाकाली के उत्पन्न होने का कारण:

स्कन्द पुराण सहित कई पुराणो में देवी के उत्पन्न होने की कथा का वर्णन है। कुछ कथायों में भिन्नता भी है, अतः एक कथा के अनुसार:


एक बार दारुक नामक अति बलशाली दैत्य धरती पर रहता था, जिसके अत्याचार से मनुष्यों एवं ऋषियों मुनियों के जीवन प्रभावित था। उस दानव को यह वरदान था कि उसका अंत एक स्त्री के हांथो ही हो सकता है। अतः देवताओं ने अपने कष्टों के निवारण हेतु जगत जननी माता पार्वती के पास गए और दैत्यों के संघार हेतु प्रार्थना करने लगे। भक्तवत्सल माता ने देवताओं प्रार्थना को मानकर , अपने एक अंश को महादेव शिव जी के अंदर प्रवेश करवाया। देवी का वह अंश शिवजी के कंठ में जहाँ हलाहल नामक विष था , वहीं बढ़ने लगा । उसे बाहर निकलने के लिए महादेव ने तीसरा नेत्र खोल दिया, जिससे भयानक ज्वाला के साथ देवी का यह स्वरुप उत्पन्न हुआ। शिवजी के गले के विष के कारण उनका स्वरूप काला हो गया, और उनका विकराल रूप ऐसा था जैसे कई ज्वालामुखी एक साथ फूट रहे हो। देवी के हुंकार मात्रा से सभी दैत्य भस्म हो गए।

क्यों शिवजी लेट गए थे माता महाकाली में रास्ते पर और माता ने पैर रख दिया था:




रक्त बीज नामक दैत्य ने वृह्मदेव से वरदान लिया था कि उसका रक्त पृथ्वी पर जिस जगह गिरेगा वहां पर कई रक्तवीज उत्पन्न हो जायेगे। यही वरदान के प्रभाव से रक्तवीज ने समूचे पृथ्वी पर अत्याचार करना सुरु कर दिया। रक्तवीज ने देवताओं को भी युद्ध के लिए ललकारा और जब देवताओं ने उसे मारने के लिये प्रहार किया तो उसके रक्त से कई रक्तवीज उत्पन्न हो गए। रक्तवीज को मारने में देवता असमर्थ थे और वो पराजित हो गए।
पराजित होकर देवता, महाकाली माता की शरण में गए तथा अपने ऊपर आयी हुई विपत्तियों को निवारण के लिए माता से प्रार्थना करने लगे। देवताओं की बातों को सुनकर माता का क्रोध बढ गया , और वो स्वयं युद्ध करने चली गयी। 
माता काली ने दैत्यराज रक्तवीज के सभी रूपों और दानवो का वध करने लगी, तथा अपनी जिव्हा का विस्तार कर लिया जिशसे रक्तवीज का रक्त उनकी जिव्हा में गिरने लगा। माता ने रक्तवीज का वध किया और उसके रक्त को जिव्हा और खप्पर से पिया।
इस युद्ध के दौरान माता का क्रोध इतना विकराल हो गया कि वो रक्तवीज के वध और युद्ध के अंत होने पर भी शांत नही हो रही थी। तीनो लोको में उनकी क्रोध की लपटें बढ़ने लगी थी। सभी देवता मिलकर भी माता का क्रोध शांत नही कर पा रहे थे, तो वो शिवजी की शरण मे गए।
शिवजी माता का क्रोध शांत करने के लिए उनके मार्ग पर लेट गए और जब तांडव करती हुई माता वहां पर पहुची तो उनका पैर शिवजी के ऊपर पड़ गया, और उन्हें बहुत पछतावा हुआ और उनका क्रोध शांत हो गया।

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