भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

04 April, 2019

दो माताओं के गर्भ से जन्मे महाबली जरासंध की कथा। Story of Jarasandh who birth by two mothers.

जरासंध का परिचय:

महाऋषि वेदव्यास जी के द्वारा रचित महाभारत में अनेक महाबली राजाओ और वीर पुरुषों का वर्णन है , उन्ही महावीर राजाओ में से है जरासंध। जरासंध "मगध" का राजा था तथा श्रीकृष्ण के मामा कंश का ससुर और मित्र भी था। कंश की मृत्यु के पश्चात वो श्रीकृष्ण को अपना शत्रु मानने लगा था तथा अनेको बार उसने मथुरा पर आक्रमण किया था, सिसुपाल उसका सेनापति था। भगवान श्रीकृष्ण ने बार बार के युद्ध से अपनी प्रजा को बचाने के लिए अपनी राजधानी मथुरा हटाकर द्वारिकापुरी में बसाई।


जरासंध के वध का चित्रण, सौ.- भक्तिदर्शन


जरासंध के जन्म एवं मृत्यु की कथा:

मगध नरेश जरासंध का जन्म विचित्र परिस्थिति में हुआ था। जरासंध के पिता मगध के राजा बृहद्रथ नाम था, जिनकी दो पत्नियां थी। परंतु राजा बृहद्रथ को कोई पुत्र नही था। अतः उन्हीने एक ऋषि से प्रार्थना किये की उन्हें पुत्र प्राप्ति का कोई उपाय बताए। ऋषि राजा के विनय भाव एवं आतिथ्य से बहुत खुश हुए और बृहद्रथ को एक फल दिया। फल देकर बोले इसे अपनी पत्नी को ख़िला देना उसे बलवान पुत्र होगा।
राजा बृहद्रथ वह फल अपनी पत्नी को दिए जिसे उनकी दोनों पत्नियों ने काटकर आधा आधा खा लिया, परिणाम स्वरूप जब उनको पुत्र हुआ तो दोनों रानियों के गर्भ से आधा आधा दो भाग में हुआ। दोनों रानिया डर गई और शिशु के जीवित दोनों भागो को महल के बाहर फेंक दिया। 
उसी समय वहां से जरा नामक राक्षसि जा रही थी जिसने शिशु के दोनों जीवित भागो को देखा और अपनी माया से जोड़ दिया । जोड़ते ही वह शिशु रोने लगा जिसे सुनकर राजा बृहद्रथ अपनी पत्नियों के साथ आ गए, राक्षसि जरा ने वह शिशु उन्हें दे दिया। जरा राक्षसी के जोड़ने कारण उसका नाम जरासंध रखा गया। 
जरासंध के ऊपर राक्षसि माया प्रभाव के कारण उसका स्वभाव राक्षसि हो गया, वो अतिक्रूर एवं निर्दयी राजा हुआ। वो दूसरे राज्यों के ऊपर आक्रमण करता एवं उनके राजाओ को बंदी बनाकर रखता। 
उसने 86 राजाओं को बंदी बना लिया था और जब उनकी संख्या 100 हो जाती तो उनकी बाली देकर अमर होना चाहता था, इस लिए श्रीकृष्ण ने उसे मारने का उपाय करके अर्जुन और भीम के साथ ब्राह्मण वेश में जरासंध के पास गए। जरासंध ब्राह्मणों को मुँहमाँगा वर देता था, तो उन्होंने उसे द्वंद्व युद्ध के लिए कहा। जरासंध समझ गया कि वे व्राह्मण नही है, फिर भी अर्जुन और कृष्ण को छोड़कर भीम से द्वंद्व युद्घ को राजी हो गया।
13 दिनों तक चले भीम और जरासंध के युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण के इशारे पर भीम ने जरासंध के शरीर को दो टुकड़े कर के फेका, परंतु वो हिस्से फिर जुड़ गए और जरासंध जीवित हो गया। तब श्रीकृष्ण ने इसारे में बताया कि दोनों हिस्सो को विपरीत दिशा में फेको , जब भींम ने ऐसा किया तो वो शरीर को दो हिस्से फिर नही जुड़े और जरासंध का वध भीम के द्वारा हो गया।


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