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28 April, 2019

मोक्ष नगरी "गया" कि कथा। Moksha Tirth Gaya.

मोक्ष तीर्थ "गया" :

भारत के बिहार राज्य में स्थित स्थान "गया" हिन्दू परंपरा में मोक्ष का स्थान माना जाता है, इस स्थान पर अपने पूर्वजों, पितरों का तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य अपने पितृऋण से मुक्त हो जाता है और पूर्वजो को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष का अर्थ है कि मृत्यु को प्राप्त हुए पूर्वजों को भटकना न पड़े और नर्क की यातनाएं से मुक्ति पाकर सतगति को प्राप्त हो और भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ की प्राप्ति हो।



यही कारण है कि गया नामक इस स्थान पर सम्पूर्ण भारत और विश्व के अनेक स्थानों से लोग यहाँ पर आते है, और अपने पूर्वजों, पितरो, संबंधियों के लिये यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण आदि कार्य करते है।

क्यों है गया मोक्षदायिनी स्थान:

इसी स्थान में क्यों किया जाता है इसकी एक पैराणिक कथा है, जो 'गय' नामक असुर से जुड़ी हुई है। यह असुर भगवान विष्णु का परम भक्त था। गय असुर या गयासुर ने भगवान विष्णु की तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था कि उसका स्पर्श और दर्शन मात्र से मनुष्यों को मोक्ष और वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति हो जाएगी।



इस वरदान से पापी मनुष्य भी नरक और यमलोक की यातनाएं से मुक्त होकर सीधा वैकुण्ठ की प्राप्ति होने लगी। यमदेवता इस प्रकार से हो रहे कार्य के निवारण हेतु भगवान व्रह्मा के पास गए। व्रह्मा जी ने कहा कि यह वरदान भगवान विष्णु ने दिया है अतः उन्ही से इसके निवारण के मार्ग पुछना चाहिए। अतः सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने देवताओं की प्रार्थना से गयासुर से कहा कि समस्त देवता तुम्हारी पीठ पर यज्ञ आदि पुण्य कर्म करना चाहते है, वो मान गया। सभी देवताओं ने यज्ञ के लिए गए और एक बहुत विशाल सिला उसके ऊपर रख दिये जिसपर देवता अपना आसान बनाया। यज्ञ सुरु होते ही गयासुर का सर धड़ से अलग हो गया और शरीर हिलने लगा। तब भगवान विष्णु स्वयं उस शिला में प्रवेश कर गए।
भगवान विष्णु कार्य के अंत मे पसन्न होकर बोले इस सिला में हमेशा उनका वाश रहेगा और जो भी यह पर पुण्य कर्म करेगा वो उनको प्राप्त होगा। अतः वहां पर पितरो के लिए मोक्ष कार्य की परंपरा बनी। यह भी मान्यता है मनुष्य अपने जीवित रहते हुए भी भी अपना मोक्ष का तर्पण कर सकता है।

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