भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

20 March, 2019

माता वैष्णो देवी की कथा। Story of Mata Vaishnon Devi.

वैष्णो देवी तीर्थ स्थल :

माता वैष्णो देवी का मंदिर जम्मू और कश्मीर के कटरा नामक स्थान से 15 किलोमीटर दूर लगभग 5,200 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है। माता वैष्णो देवी का यह स्थान हिन्दू तीर्थो का अतिमहत्वपूर्ण स्थान है, अतः भारत के अलावा विश्व भर से भक्त एवं श्रद्धालु यहाँ पर पूरे साल आते है। रेल , रोड और विमान मार्ग से इस स्थान तक पहुँचा जाता है, तथा चढ़ाई चढ़ने हेतु कई साधन उपलब्ध है। मुख्य मंदिर के अलावा यहां पर बाण गंगा, अर्धकुमारी, तथा भैरव बाबा मंदिर आदि दार्शनिक स्थल है।




माता वैष्णो देवी की प्रशिद्ध कथा:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कटरा के पास एक ग्राम में श्रीधर नामक ब्राह्मण रहता था, जो निःसंतान होने के कारण दुखी रहता था। परंतु वह माता का बहुत बड़ा भक्त था अतः वो हमेशा नवरात्रि का व्रत रहता था और कन्या भोजन करवाता था।
एक बार श्रीधर के घर कन्या भोजन के लिए आई हुई कन्याओं में माता भी बालिका के स्वरूप में श्रीधर के घर पर आई जिनका नाम वैष्णवी था , तथा कन्या भोजन के उपरांत सभी कन्यायें चली गयी पर कन्या रूपी माता नही गयी। और उंन्होने श्रीधर से आग्रह किया कि वो समस्त ग्राम वासियो को भोजन के लिए आमंत्रित करें। श्रीधर उस दिव्य कन्या की बात को मानते हुए समस्त ग्राम वासियो को आमंत्रित किया तथा अपने गुरु गोरखनाथ जी को उनके शिस्यो सहित आमंत्रित किया, उनके शिस्यो में भैरवनाथ भी थे। श्रीधर इस बात से विचलित थे कि इतने लोगो को भोजन कैसे कराऊंगा।
समस्त ग्राम वासियो के साथ गुरु गोरखनाथ अपने शिष्यों के साथ वहां पर आये साथ मे भैरवनाथ भी थे। जब कन्या रूपी माता सबको भोजन परोस रही थी और कोई परेशानी नही आ रही थी, उंन्होने श्रीधर की लाज रख ली थी। उनके दिव्य रूप को देखकर भैरवनाथ को शक हो गया और वो बोलने लगे कि मैं मांस एवं मदिरा का भोजन करूँगा। बहुत प्रयत्न पर भी वो नही माने, और कन्या रूपी माता को पकड़ने के लिए भागे। परंतु माता गायब हो गयी और पर्वत के ऊपर चली गयी, भैरवनाथ भी उनके पीछे भागा। माता की रक्षा के लिए हनुमान जी आये, माता ने उन्हें बाहर रुककर अपना पीछा कर रहे भैरवनाथ को रोककर रखने को कहा तथा वो गुफा में प्रवेश कर गयी, उस स्थान को अर्धकुमारी कहा जाता है जहां पर माता ने 9 महीने तक तपस्या की थी।



माता का पीछा करते हुए भैरवनाथ आया और हनुमानजी के साथ भयानक युद्ध हुआ, जब वह युद्ध विकराल हो गया और हनुमानजी परास्त होने लगे तो माता अपने दिव्य काली के रूप में बाहर आई और भैरवनाथ का अपने त्रिशूल से मस्तक काट दिया।
मस्तक कट जाने के बाद भैरवनाथ को अपने कृत्य का बोध हुआ और उसने छमा मांगी, माता ने बताया कि "तपस्या से प्राप्त सक्तियों के कारण तुम्हे अहंकार हो गया था इसलिए तुम मुझे पहचान नही पाए, परंतु अब मैं प्रसन्न हूँ अतः मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी और दोनों की पूजा के उपरांत ही यात्रा पूर्ण कहलाएगी"।
अतः वैष्णो देवी की यात्रा में माता के मंदिर में स्थित तीन पिंडियों जो महाकाली, महालक्ष्मी, और महासरस्वती का रूप है लोग दर्शन करते है और बाद में भैरवनाथ के दर्शन करते है, जो उस स्थान पर स्थित है जहां पर भैरवनाथ का कटा हुआ सर गिरा था।




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