google.com, pub-8785851238242117, DIRECT, f08c47fec0942fa0 महर्षि वाल्मीकि का जीवन और कथाये। Story of Maharishi Valmiki. - पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

16 March, 2019

महर्षि वाल्मीकि का जीवन और कथाये। Story of Maharishi Valmiki.

महाऋषि वाल्मीकि Maharishi Valmiki:

महाऋषि वाल्मीकि को "आदिकवि" एवं भगवान के तुल्य माना गया है। महाऋषि वाल्मीकि जी ने सर्वप्रथम संस्कृत भाषा मे माह काव्य "रामायण" की रचना की थी। भगवान राम के ऊपर आधारित उनकी यह रचना महाकाव्य रामायण को "वाल्मीकि रामायण" भी कहा जाता है। अपने महाकाव्य "रामायण" में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोलविद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञानी थे। वाल्मीकि जी ने यह "रामायण" की रचना भगवान राम के पृथ्वी पर रहते ही कर दी थी, तथा उन्होंने भविष्य की घटनाओं की भी व्याख्या कर दी थी क्योंकि वो त्रिकालदर्शी थे।


महाऋषि वाल्मीकि जी को रामायण की प्रेरणा:

एक बार वाल्मीकि एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि बहेलिये ने प्रेम-मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥'

हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।
उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य "रामायण" (जिसे कि "वाल्मीकि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है) की रचना की और "आदिकवि वाल्मीकि" के नाम से अमर हो गये।


महाऋषि वाल्मीकि का अन्य ग्रंथों के अनुसार जीवनपरिचय:

ऐसी प्रचलित कथा है कि महर्षि वाल्मीकि का मूल नाम रत्नाकर था और इनके पिता ब्रह्माजी के मानस पुत्र प्रचेता थे। एक भीलनी ने बचपन में इनका अपहरण कर लिया और भील समाज में इनका लालन पालन हुआ। भील परिवार के लोग जंगल के रास्ते से गुजरने वालों को लूट लिया करते थे। रत्नाकर ने भी परिवार के साथ डकैती और लूटपाट का काम करना शुरू कर दिया।
लेकिन ईश्वर ने इनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। एक दिन संयोगवश नारद मुनि जंगल में उसी रास्ते गुजर रहे थे जहां रत्नाकर रहते थे। डाकू रत्नाकर ने नारद मुनि को पकड़ लिया। इस घटना के बाद डाकू रत्नाकर के जीवन में ऐसा बदलाव आया कि वह डाकू से महर्षि बन गए। दरअसल जब वाल्मीकि ने नारद मुनि को बंदी बनाया तो नारद मुनि ने कहा कि, तुम जो यह पाप कर्म करके परिवार का पालन कर रहे हो क्या उसके भागीदार तुम्हारे परिवार के लोग बनेंगे, जरा उनसे पूछ लो। वाल्मीकि को विश्वास था कि सभी उनके साथ पाप में बराबर के भागीदार बनेंगे, लेकिन जब सभी ने कहा कि नहीं, अपने पाप के भागीदार तो केवल तुम ही बनोगे तो वाल्मीकि का संसार से मोह भंग हो गया। और उनके अंदर महर्षि प्रचेता के गुण और रक्त ने जोर मारना शुरू कर दिया और उन्होंने नारद मुनि से मुक्ति का उपाय पूछा।
नारद मुनि ने रत्नाकर को राम नाम का मंत्र दिया। जीवन भर मारो काटो कहने वाले रत्नाकर के मुंह से राम नाम निकल ही नहीं रहा था। नारद मुनि ने कहा तुम मरा-मरा बोलो इसी से तुम्हें राम मिल जाएंगे। इस मंत्र को बोलते-बोलते रत्नाकर राम में ऐसे रमे कि तपस्या में कब लीन हो गए और उनके शरीर पर कब दीमकों ने बांबी बना ली उन्हें पता ही नहीं चला। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने दर्शन दिए और इनके शरीर पर लगे बांबी को देखा तो रत्नाकर को वाल्मीकि नाम दिया और यह इस नाम से प्रसिद्ध हुए। ब्रह्माजी ने इन्हें रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी।

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