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10 March, 2019

कुंती के जीवन कि कथा। Story of Kunti in hindi

कुंती का जन्म एवं परिचय 


महाभारत में वर्णित कुंती हस्तिनापुर के राजा पाण्डु की पहली पत्नी तथा पांडवो में से प्रथम तीन की माता थी। कुंती भगवान श्रीकृष्ण के पितामह यदुवंश के राजा सूरसेन की कन्या थी। पहले उनका नाम पृथा था, वो अतयंत रूपवान थी जिसके कारण उनकी कीर्ति सभी ओर फैली हुयी थी। राजा सूरसेन के फूफा के भाई कुन्तिभोज को कोई संतान न होने कारण राजा सूरसेन ने पृथा को कुन्तिभोज को पुत्री रूप में गोद दे दिया था , जिसके कारण कुंती का नाम पृथा से कुंती को गया था। भगवान श्री कृष्णा उन्हें बुआ कहकर सम्बोधित करते थे। कुंती को राजनीती तथा धर्म निति का सम्पूर्ण ज्ञान था। अतः उन्हें पांच कन्याओं में स्थान प्राप्त है। उन्हें चिरकुमारी होने का वरदान दुर्वाशा ऋषि से प्राप्त था।

कुंती को वरदान प्राप्ति की कहानी


कुंती के विवाह के पहले जब वो अपने पिता महाराज कुन्तिभोज के यहाँ रहती थी, एक दिन महा तपस्वी ऋषि दुर्वाशा का आगमन हुआ, जिनका स्वागत कुंतीभोज के महल में बड़े ही भाभ्या तरीके से हुआ इस अवसर पर कुंती ने एक वर्ष तक उनकी बहुत ही लगन के साथ और पूरी निष्ठां के साथ मन लगाकर सेवा की जिससे महर्षि दुर्वासा बहुत प्रसन्न हुए। महर्षि दुर्वासा त्रिकाल दर्शी थे अतः उन्होंने कुंती के भविष्य को देख लिया और कुंती को वरदान स्वरुप एक मंत्र दिया, और कहा कि वो जिस भी देवता का इस मंत्र के पश्चात स्मरण करेगी वो प्रगट होगा और तुम्हे पुत्र देकर जायेगा।
महर्षि दुर्वाशा के चले जाने के बाद कुंती को संदेह हुआ कि क्या सच में यह मन्त्र फलीभूत होता है, एक दिन संध्या के समय कुंती में सूर्य भगवान को देखा तो उसे अपने मंत्र के सिद्धि को जानने कि इक्छा हुयी , उसने मंत्र पढ़कर सूर्य देव का स्मरण किया तो सूर्य देवता प्रगट हो गए और बोले मई तुम्हे पुत्र देने आया हूँ। कुंती डर गयी और बोली भगवान मैं तो केवल अपने मंत्र को जाँच रही थी और मेरा अभी विवाह नहीं हुआ है तो मैं मां नहीं बन सकती हूँ । सूर्य देवता ने कहा कि यह मंत्र अमोख अतः पुत्र तो मैं देकर जाऊंगा परन्तु तुम पुत्र जन्म के उप्रान्त भी कुवारी रहोगी। अतः सूर्य देव के आशीर्वाद से कुंती को एक परम तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ जो अभेद्य कवच और कुण्डल धारण किये हुए था। 
कुंती ने लोग लाज के भय से उस पुत्र को गंगा में बहा दिया जो हस्तिनापुर के राजशरथी अधिरथ को मिला , अधिरथ को कोई संतान नहीं थी अतः उसने उसे पाला और बड़ा होकर वह "कर्ण" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कुंती का विवाह एवं पुत्रों के जन्म कि कहानी 


कुंती के विवाह हेतु रहा कुन्तिभोज ने एक स्वम्वर का आयोजन किया जंहा पर समस्त देशों के राजा और राजकुमार उपस्थित हुए। वंही पर हस्तिनापुर के नरेश महाराज पाण्डु भी आये थे , कुंती को उनका रूप सौंदर्य पसंद आया और उनको ही अपने पति के रूप में चुन लिया। कुंती के विवाह के उपरांत पाण्डु का एक और विवाह हुआ जिन्हे नाम माद्री था। 
पाण्डु को एक ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कारण पुत्र पैदा करने में असमर्थ हो गए तब कुंती ने ऋषि दुर्वाशा के दिए हुए मंत्र का इस्तेमाल करके तीन पुत्र उत्पन किये पहला धर्मराज से "युधिष्ठिर" , दूसरा पवन देव से "भीम" तीसरा इन्द्र से "अर्जुन" । उसके बाद उन्होंने अपने मंत्र से पाण्डु कि दूसरी पत्नी माद्री से "नकुल" एवं "सहदेव" पैदा हुए।




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