भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

22 February, 2019

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के जन्म की कथा। Birth story of hiranyakashipu and hiranyaksh.

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म:



चित्र साभार : www.spiritualawareness.co.in


विष्णुपुराण में इनके जन्म और मृत्यु का सम्पूर्ण वर्णन मिलता है जिसमे एक कथा के अनुसार ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए जिनका नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। जिनका जन्म की विचित्र कथा है।
एक दिन कश्यप जी की पत्नी दिति को संध्या के समय कामातुर हो गयी और कश्यप जी को संबंध बनाने के लिए प्रेरीर करने लगी, कश्यप जी ने समझाया कि प्रेत्यक क्रिया का समय का विधान किया गया है इसलिए संध्या का समय साधना और संध्यावंदन का होता है। परंतु जब देवी दिति ने हट किया तो ऋषि कश्यप ने इसे देव विधान मानकर किया।
उसके उपरांत उन्होंने दिति को बताया कि यह समय भगवान शिव के विचरण का होता है जिनके साथ भूतों की सेना होती है अतः इस संबंध से तुम्हे महावीर परंतु आसुरी प्रवित्ति के पुत्र होंगे। दिति बहुत दुखी हुई और उन्होंने वर मांगा की मेरे पुत्रों का वध नारायण के हाँथ से हो ताकि मृत्यु के पाश्चात सतगति प्राप्त हो जाये।

एक और कथा के अनुसार सनकादिक ऋषि वैकुंठ लोक भगवान विष्णु से मिलने गए, जहाँ पर भगवान विष्णु के दो पार्षद द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें मिलने से रोक क्योंकि वह भगवान विष्णु के सयन का समय था। जिसजे क्रोधित होकर सनकादिक ऋषियों ने उन्हें धरतीपर असुर रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया था। बाद में भगवान विष्णु के के समझाने पर उन्होंने कहा कि आपके द्वारा ही वे मृत्यु को प्राप्त होंगे और उनका उद्धार होगा।

हिरण्याक्ष का वध भगवान विष्णु के वराह अवतार से हुआ।
हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में मारा जा सकेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और उसकी रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया।



उम्मीद है आपको यह कथा पसंद आईहोगी अपने सुझाव दे और कथा को शेयर करे।



No comments:

Post a Comment