भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

20 May, 2019

कालिदास के जीवनकाल कि कथा एवं मुख्य रचनायें। Story of Kalidas and top Compositions.

कालिदास का जीवन परिचय:

भारतीय साहित्य के महानतम कवि एवं नाटककारों में संस्कृत भाषा के एक महान साहित्यकार थे "कालिदास"। महाकवि कालिदास जी ने राष्ट्र को चेतना और स्वर देने का कार्य किया था। कालिदास जी ने भारतीय पौराणिक कथाओं को प्रेरणा एवं जीवन और दर्शन को आधार बनाते हुए अनेक रचनाएँ की थी। कालिदास की रचनाओं में प्रेम एवं श्रृंगार रस की प्रधानता पाई जाती है, उन्होने सरल भाषा मे अलंकृत रचनाये की थी। जन्म के स्थान तथा काल को लेकर कई मत भेद है, लेकिन उज्जैन से लेकर उनकी साहित्य में अधिक जुड़ाव है। साथ ही कालिदास जी विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे।
कालिदास जी कि अनेक साहित्यिक नाटकों में से उनकी रचना "अभिज्ञानशाकुन्तलम" को सर्वश्रेष्ठ रचना एवं कवि के रूप में "मेघदूतम" शर्वश्रेष्ट रचना मानी जाती है।


कालिदास के जीवनकाल से जुड़ी कहानी:

कालिदास कि एक चर्चित कथा है जिसमे उनके विवाह तथा ज्ञान प्राप्ति के बारे में बताया जाता है। कालिदास जी कि पत्नी का नाम विद्योत्तमा था। विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दिया तो हार को अपमान समझकर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। 
चलते चलते उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जहां पर एक व्यक्ति जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। उन्होंने सोचा कि इससे बड़ा मूर्ख तो कोई मिलेगा ही नहीं। उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा और कहा- "मौन धारण कर लो और जो हम कहेंगे बस वही करना"। उन लोगों ने स्वांग भेष दिलाकर विद्योत्तमा के सामने प्रस्तुत किया कि हमारे गुरु आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए ये हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर हम वाणी में उसका उत्तर आपको देंगे। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे। 
प्रथम प्रश्न विद्योत्तमा ने किया संकेत में एक उंगली दिखा कर कि ईस्वर एक है। परन्तु कालिदास ने समझा कि ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है। क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत किया इस भाव से कि तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों फोड़ दूंगा। तभी विद्वानों ने तर्क दिया कि आप कहना चाहती ईस्वर एक है लेकिन गुरुदेव कह रहे है "ईस्वर एक है पर उसके दो रूप है आत्मा और परमात्मा"।
राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया कि तत्व पांच है। तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया कि तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी, मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। विद्वानों ने समझाया कि गुरु कहना चाह रहे हैं कि भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी जल आकाश वायु अग्नि। परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते। परन्तु आपस में मिलकर एक होकर उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। 
इसके पश्चात राजकुमारी अपनी हर मान जाती है और विवाह हो जाता है। परंतु विवाह के पश्चात राजकुमारी को पता चल जाता है कि यह कोई ज्ञानी नही और छल से मेरा विवाह हुआ है। लेकिन वो सोचती है ज्ञानी न सही पर ये किस जाति का है पता करना चाहिए, और वो एक ऐसे कमरे में ले जाती है जहाँ सभी जातिओं से जुड़ी तस्बीरे लगी होति है, कालिदास सभी को गौर से देखते है पर एक चरवाहे की तस्बीर को उत्सुकता से देखने लगते है। राजकुमारी को क्रोध आता है और वो खिड़की से धक्का देती है, कालिदास नीचे गिरते है और उनकी जिव्हा कटकर पास में काली की प्रतिमा कर गिरती है। माता काली प्रसन्न होकर वरदान देने लगती है, कालिदास अपनी पत्नी का नाम रट रहे होते है जो देवी को विद्या सुनाई पड़ा और विद्या का वरदान दे दिया।
ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा - कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी)। विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा -- अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है)।
कालिदास जी ने अपनी पत्नी को ही अपना गुरु माना और इन्ही वाक्यो से अपनी रचनाएँ की।


कालिदास की प्रमुख रचनाओं का वर्णन:

कालिदास जी की अनेक रचनाएँ है परन्तु मुख्य रूप से उनकी सात रचनाओं को श्रेय दिया जाता है। जिसमे तीन नाटक , दो महाकाव्य, दो खण्डकाव्य है।


कालिदास के प्रमुख तीन नाटक

१) मालविकाग्निमित्रम्

कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र से प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।

२) अभिज्ञान शाकुन्तलम् 

कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। 
इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है।

३) विक्रमोर्वशीयम् 

एक रहस्यों भरा नाटक है। इसमें पुरूरवा इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम करने लगते हैं। पुरूरवा के प्रेम को देखकर उर्वशी भी उनसे प्रेम करने लगती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने जाती है तो पुरूरवा से प्रेम के कारण वह वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है। इससे इंद्र गुस्से में उसे शापित कर धरती पर भेज देते हैं। हालांकि, उसका प्रेमी अगर उससे होने वाले पुत्र को देख ले तो वह फिर स्वर्ग लौट सकेगी। विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौंदर्य और शिल्प से भरपूर है।

कालिदास रचित महाकाव्य:

१) कुमारसंभवम्  

कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।

२) रघुवंशम् 

कालिदास ने रघुकुल के राजाओं का वर्णन किया है।

कालिदास रचित खण्डकाव्य:



१) मेघदूतम् 

मेघदूत एक गीतिकाव्य है जिसमें यक्ष द्वारा मेघ से सन्देश ले जाने की प्रार्थना और उसे दूत बना कर अपनी प्रिय के पास भेजने का वर्णन है। मेघदूत के दो भाग हैं - पूर्वमेघ एवं उत्तरमेघ। नागार्जुना ने इसका हिंदी अनुवाद किया था।

२) ऋतुसंहारम् 

इसमें सभी ऋतुओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है।






19 May, 2019

पृथ्वी के आठ चिरंजीवी पुरुष जो आज भी जीवित है। Aath chirnjivi purush.

कौन है आठ चिरंजीवी महापुरुष:

अलग अलग पुराणो, कथाओं और मान्यताओं में कहा जाता है कि इस पृथ्वी पर आठ ऐसे महापुरुष है जो चिरंजीवी है अर्थात सदा के लिए जीवित है। इनसे कुछ पृथ्वी पर रक्षा के लिए जीवित है तो कुछ अपने किये के कारण श्राप वस जीवित है। ये महापुरुष है:

१) अश्वथामा
२) राजाबलि 
३) वेदव्यास 
४) हनुमान
५) विभीषण
६) कृपाचार्य
७) परशुराम 
८) मार्कण्डेय ऋषि

 


१) अश्वथामा:

अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचर्य के पुत्र हैं, तथा उनके मस्‍तक में अमरमणि विद्यमान है।  अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडवो के पुत्रो की हत्या की थी, तथा अभिमन्यु के पुत्र को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र छोड़ा था। जिस कारण भगवान कृष्ण ने उन्हें कालांतर तक अपने पापों के प्रायश्चित के लिए इस धरती में ही भटकने का श्राप दिया था। तथा मस्तक से मणि निकाल कर उस घाव को कभी न भरने और रक्त रिसाव करते रहे ऐसा श्राप दिया था।

२) राजा बलि:

राजा बलि प्रह्लाद के वंशज हैं। राजा बलि को महादानी के रूप में जाना जाता है। उन्होंने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया, अतः भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बनाया और अमरता का वरदान दिया। 

३) वेद व्यास:

ऋषि व्यास ने महाभारत जैसे प्रसिद्ध काव्य की रचना की है। उनके द्वारा समस्त वेदों एवं पुराणो की रचना हुई। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र हैं। ऋषि वेदव्यास भी अष्टचिरंजीवियो में शामिल हैं।

४) हनुमानजी:

सीता माता ने हनुमान को अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनाने पर वरदान दिया था की, वे सदेव अजर-अमर रहेंगे। हनुमान जी श्रीराम के दूत है तथा वो सदा इस पृथ्वी पर विचरण करते है और भक्तों की रक्षा करते है।

५) विभीषण:

श्री राम ने विभीषण को अजर-अमर रहने का वरदान दिया था। विभीषण ने भगवान राम की महिमा जान कर युद्ध में अपने भाई रावण का साथ छोड़ प्रभु राम का साथ दिया।

६) कृपाचार्य:

कृपाचार्य शरद्वान गौतम के पुत्र हैं। वन में शिकार खेलते हुए शांतु को दो शिशु मिले जिनका नाम उन्होंने कृपि और कृप रखा तथा उनका पालन पोषण किया। कृपाचार्य कौरवो के कुलगुरु तथा अश्वत्थामा के मामा हैं। उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवो को साथ दिया।

७) परशुराम:

परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था। परशुराम का पहले नाम राम था, लेकिन इस शिव के परम भक्त थे। उनकी कठोर तपश्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक फरसा दिया, जिस कारण उनका नाम परशुराम पड़ा।

८) मार्कण्डेय ऋषि

ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त हैं। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपश्या द्वारा महामृत्युंजय तप को शिद्ध कर मृत्यु पर विजयी पा ली और चिरंजीवी हो गए।




14 May, 2019

भगवान ब्रह्मा कि पूजा क्यों नही होती तथा उनका एक ही मंदिर क्यों है। Why only one temple of lord brahma.

भगवान ब्रह्मा की पूजा और मंदिर को लेकर विवाद क्यों:

वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अनेक ग्रंथों से यही निष्कर्ष निकलता है कि त्रिदेव ही श्रेष्ठ है जी है परम पिता तथा जगत की रचना करने वाले भगवान व्रह्मा, संसार के पालन कर्ता भगवान विष्णु तथा संहारक भगवान शिव शंकर। परंतु भगवान विष्णु और भगवान शिव के अनेक मंदिर स्थित है तथा घर घर मे इनकी पूजा-अर्चना की जाती है, साथ ही समस्त देवी-देवताओं की पूजा-आराधना की जाती है। लेकिन संसार के रचयिता भगवान व्रह्मा की पूजा क्यों नही होती तथा राजस्थान के पुष्कर में स्थिर एक मात्र विशेष मंदिर क्यों है, यह जानने की उत्सुकता होती है।




इसके अलग-अलग कारण तथा कथाये अलग अलग पुराणो में मिलती है जो इस प्रकार है:

१) शिव पुराण की कथा:

शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार परमात्मा शिव है जिनकी प्रेरणा से भगवान विष्णु का अवतरण हुआ तथा विष्णु जी के नाभि से एक कमल निकला जिशसे व्रह्मा जी का जन्म हुआ। अतः एक बार ब्रह्मा और विष्णु जी मे श्रेष्ठता का विवाद हो गया, तभी वहां एक अग्नि स्तंभ उत्पन्न हो गया तथा आकाशवाणी हुई कि जो इस स्तंभ के छोर को खोज लेगा वही श्रेष्ठ होगा। फिर दोनों देवता स्तंभ का छोर खोजने चल दिये, ब्रह्मा ऊपर तथा विष्णु नीचे की ओर गए।
बहुत समय बीतने के बाद भी जब छोर नही मिला तो दोनों लौट आये , तथा व्रह्मा जी मे झूठ बोला कि छोर मिल गया। तभी वह स्तंभ शिव रूप में परिर्वतित हो गया औऱ व्रह्मा जी का झूठ पकड़ा गया। इसी कारण उनकी पूजा नही होती।



२) पद्मपुराण की कथा:

कथा के अनुसार ब्रह्मा जी एक यज्ञ करना चाहते थे जिसमें उनकी पत्नी का रहना जरूरी था। उनकी पत्नी जिनका नाम "सावित्री" है जो किसी कारण वहां नही पहुच पाई और यज्ञ का समय बीत रहा था। अतः वृह्मजी ने एक ग्वाल की पुत्री "गायत्री" से विवाह कर लिए और यज्ञ करने लगे, तभी वहां सावित्री आ गयी।
अपने स्थान पर किसी अन्य स्त्री को देखकर वो क्रोधित हो गयी औऱ उन्होंने वृह्मजी को श्राप दे दिया कि उनकी इस संसार मे कई पूजा नही होगी और जो भी करेगा उसका विनाश हो जाएगा।
सभी देवता भयभीत हो गए और माता को शांत करने का प्रयत्न करने लगे, तब वो शांत होकर बोली मेरा कथन असत्य नही होगा परंतु इसी स्थान में इनकी पूजा हो सकती है। वही स्थान राजस्थान का पुष्कर मंदिर है।

३) तीसरी कथा:

यह कथा भी अनेक पुराणो में मिलती जी एक बार स्वर्ग की अप्सरा जिसका नाम "मोहिनी" था, वृह्मजी पर आसक्त हो गयी। और उन्हें रिझाने के लिए प्रयत्न करने लगी। 
वह उन्हें रिझाने के लिए नृत्य कर रही थी और जाकर उनके निकट बैठ गयी, तभी वहां शप्तऋषी आ गए। उन्होंने वृह्मजी से पूछा यह स्त्री कौन है तो वृह्मजी ने कहा कि यह एक अप्सरा है जो नृत्य कर रही थी और थक कर बैठ गयी है, ये मेरी पुत्री के समान है। शप्तऋषी तो अंतर्यामी थे उन्होंने घटना देख ली और चले गए।
परंतु अप्सरा मोहिनी क्रोधित हो गयी कि वृह्मजी ने उसका अपमान किया है, वो उनके सामने प्रेम प्रस्ताव लेकर आई थी और ब्रह्मा जी ने उसे पुत्री कह दिया। अतः उसने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया कि उनकी कोई पूजा नही करेगा।



11 May, 2019

एकलव्य की कथा जिसकी मृत्यु भगवान श्रीकृष्ण के हांथो हुआ। Story of Eklavya in hindi.

एकलव्य का जीवन परिचय:

महाभारत काल मे जन्मे अतिपराक्रमि धनुर्धर जो मात्र अपनी धनुर्विद्या से नही अपितु अपने गुरु को दिए गए गुरुदक्षिणा के कारण जाना जाता है वो है "एकलव्य"।




एकलव्य का जन्म प्रयाग के निकट श्रृंगवेरपुर नामक भील राज्य के राजा निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र रूप में हुआ, उनकी माता का नाम शुलेखा था। बचपन मे उनका नाम "अभय" था जो कि बढ़े होने पर वीरता के कारण एकलव्य हो गया। निषादराज का यह राज्य विशाल था जिसकी सीमाएं मथुरा, मगध , हस्तिनापुर आदि राज्यो को छूती थी।
एकलव्य के जीवन की दो घटनाये अधिक प्रचलित है, पहली उनकी विद्या अध्ययन एवं गुरु दकक्षिणा की तथा दूसरी श्रीकृष्ण के द्वारा हुई उनकी मृत्यु की।

एकलव्य की धनुर्विद्या एवं गुरुदक्षिणा:

जब एकलव्य युवा हुए तो उनके अंदर धनुर्विद्या को सीखने की लालसा भी बढ़ी और वो एक ऐसे गुरु की तलाश करने लगे जो उन्हें सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बना दे। अतः उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य का चयन किया और निश्चय किया कि उन्ही से धनुर्विद्या सीखेंगे। 




परंतु एक बाधा थी कि गुरु द्रोणाचार्य केवल छत्रिय और व्राह्मण के बालको को ही विद्या देते थे। जब द्रोणाचार्य से विद्या लेने एकलव्य उनके आश्रम गए तो उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि तुम एक भील जाती के हो और मैं केवल छत्रिय और व्राह्मण के पुत्रों को विद्या देने का संकल्प कर चुका हूं। केलिन एकलव्य नही माना क्योंकि उसने द्रोणाचार्य को ही अपना गुरु मान लिया था। अतः उसने एक निर्जन स्थान पर गुरु द्रोण की प्रतिमा बनाकर उसी प्रतिमा से प्रेरणा लेकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा।

कुछ वर्षों बाद एक दिन जब गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन आदि अपने शिस्यों के साथ उस स्थान के नजदीक से गुजर रहे थे तो उनके साथ चलने वाला एक कुत्ता जोर जोर से भोक रहा था। अचानक किसी ओर से कुछ सब्द भेदी बान आये और कुत्ते के मुख में भर गए और कुत्ते का मुख बन्द हो गया। द्रोणाचार्य को बहुत अचंम्बा हुआ कि ये कौन है जो शब्द भेदी बाण चला रहा है। 

एकलव्य को खोजते वो लोग उस स्थान तक पहुच गए जहाँ पर एकलव्य अभ्यास कर रहा था। द्रोणाचार्य को आया देख एकलव्य ने उन्हें प्रणाम किया , तब एकलव्य से परिचय पूछते हुए आचार्य ने कुत्ते के मुख में बाण मारने का कारण पूछा। 

एकलव्य बोला इस कुत्ते की अबाज से उसके धनुर्विद्या के अभ्यास में विघ्न हो रहा था अतः उसने बाण चलाये, तथा अपना परिचय गुरु द्रोणाचार्य का शिष्य एकलव्य बताया। द्रोणाचार्य बोले मैने तो तुम्हे विद्या नही दी फिर तुम मेरे शिष्य कैसे हुए? तब एकलव्य ने सारी बात बताई की कैसे उसने धनुर्विद्या सीखी।

द्रोणाचार्य समझ गए कि एकलव्य मेहनती है और उसमें धनुर्विद्या की लालसा है और वो संसार का सबसे महान धनुर्धर बन सकता है। और क्योंकि उन्होंने अर्जुन को यह वचन दिया था कि उसे संसार का सबसे बड़ा धनुर्धर बनायेगे, अतः उन्होंने एकलव्य से छल किया और गुरुदक्षिणा देने को कहा।

एकलव्य तुरंत राजी हो गए गुरुदक्षिणा देने को क्योंकि उसके बिना गुरु विद्या सफल नही होती, ऐसे गुरु द्रोणाचार्य ने कहा।
उसके बाद द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया।

यह सुनते ही एकलव्य की आँखे छलक गयी पर वो बिना संदेह के अपने कमर में लटक रही कटार निकाल कर अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काट दिया और गुरु के चरणों मे समर्पित कर दिया।

एकलव्य की मृत्यु श्रीकृष्ण के हाथों क्यों हुई:

अंगूठे के बिना भी एकलव्य के धनुष चलना सीख लिए और धनुर्विद्या में पारंगत हो गया। पिता की मृत्यु के पश्चात वो राजा बना और मगध के राजा जरासंध से मित्रता कर ली, तथा उसी के लिए युद्ध करने लगा।

जब जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया तो एकलव्य भी साथ था, उसका युद्ध कौशक अद्भुद था, वो अकेला ही कई महारथियों पर भारी था। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि एक धनुर्धर जो केवल चार उंगलियों से बाण चला रहा है और सब पर भारी पड़ रहा है, तो ये आगे चल कर अर्जुन के लिए प्रतिद्वंद्वी हो सकता है। अतः उन्होंने अर्जुन प्रेम के कारण उसका युद्ध मे वध कर दिया।





10 May, 2019

नचिकेता की कथा। Story of Nachiketa.

नचिकेता का परिचय:

नचिकेता एक परम तेजस्वी ऋषिकुमार थे जिनके पिता का नाम वाजश्रव था। अपने तपोवल और हठ से यमराज को विवश करने वाले वो इतिहास के दूसरे व्यक्ति थे, इनके अलावा सती सावित्री ने किया था। वाजश्रवस पुत्र नचिकेता यमराज को विवश कर व्रह्माज्ञान एवं मृत्यु के रहस्यों का ज्ञान प्राप्त किया था। नचिकेता कि कथा का वर्णन कई ग्रंथों एवं पुराणो में मिलता है, कुछ जगह उनके पिता का नाम उद्दालक कहा गया है।





नचिकेता की कथा:

एक बार नचिकेता के पिता ने विश्वजीत नामक यज्ञ किया था जिसमे उंन्होने अपनी सारी संपत्ति दान देने का संकल्प किया था, अतः यज्ञ की समाप्ति के दिन चारो ओर से अनेक ऋषिमुनि पधारे हुए थे। परंतु यज्ञ की समाप्ति पर इनके पिता जब दान देना शुरू किए तो उन्होंने ऐसी गायों का दान देना शुरू किया जो बीमार , बूढ़ी और दूध देना बंद कर दी थी।

नचिकेता ने जब अपने पिता को ऐसा करते हुए देखा तो उन्हें दुख हुआ तथा उंन्होने अपने पिता के पास जाकर जिद की उन्हें भी किसी को दान दे, तथा बार बार अपने पिता को हठ करके पूछने लगे कि वो उनको किसे दान देंगे। बार बार पूछने पर उनके पिता परेशान होकर बोल दिए कि जा तुझे मृत्यु अर्थात यमराज को दान देता हूं।

पिता की इस बात को सुनकर नचिकेता तनिक भी दुःखी नही हुए और तुरंत यमपुरी की ओर प्रस्थान कर गए। बहुत परिश्रम के उपरांत वो यमपुरी पहुच गए वहां पर यमदूतों के द्वारा पूछे जाने पर नचिकेता ने बताया कि उनके पिता ने उनका दान यमराज को कर दिया है अतः वो उनसे मिलने आये है। दूतों ने बताया कि यमदेवता अभी यहां नही है तो नचिकेता ने यमदेव की प्रतीक्षा में बैठ गए।

प्रतीक्षा करते करते तीन दिन बीत गए औऱ जब तीन दिन बाद जब यमराज आये तो दूतों ने नचिकेता के बारे में बताया। यमराज नचिकेता के बारे में जानकर बहुत प्रसन्न हुए, और उन्होंने नचिकेता से तीन वरदान मांगने को कहा।

नचिकेता ने पहला वरदान मांगा की "उसके पिता का उसके प्रति क्रोध शांत हो जाय और वो पहले जैसे प्यार करने लगे"

यमराज ने तथास्तु कहा और मान गए।

नचिकेता ने दूसरा वरदान मांगा की "स्वर्ग कैसे प्राप्त हो उसका उपदेश दे"

यमदेव थोड़ा सकुचाये परंतु वो मान गए।

नचिकेता ने तीसरा वरदान मांगा "मृत्यु तथा आत्मा के रहस्य का उपदेश दे"

यमदेवता तो यह वरदान देने से मना किया बोले यह संसार का परम गोपनीय रहस्य है जिसका वर्णन किसी के सम्मुख करने की मनाही है, अतः उन्होंने ने नचिकेता को कहा कि वो कोई दूसरा वरदान मांग ले।

लेकिन नचिकेता इसी वरदान को पाने का हठ करने लगे, बाद मव उनके इस हठ से यमदेव हार गए और संसार का परम गोपनीय रहस्य का वर्णन नचिकेता के सम्मुख किया।




07 May, 2019

मनुस्मृति की विवेचना एवं मनुस्मृति पर आधुनिक विवादो के कारण। Description of Manusmriti.


क्या है "मनुस्मृति"? :


हिन्दू धर्म का प्राचीन धर्मशास्त्र है मनुस्मृति, यह उपदेश रूप में है जो मनु द्वारा ऋषियों को दिया गया था। इसे हिन्दू धर्म शास्त्र या मनुशंहता के नामों से भी जाना जाता है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव है। यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। मनु महाराज के जीवन और उनके रचनाकाल के विषय में इतिहास-पुराण स्पष्ट नहीं हैं। तथापि सभी एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि मनु आदिपुरुष थे और उनका यह शास्त्र आदिशास्त्र है।






मनुशंहता या मनुस्मृति स्वयंभुव मनु के द्वारा ही रचित है,  मनुस्मृति से यह भी पता चलता है कि स्वायंभुव मनु के मूलशास्त्र का आश्रय कर भृगु ने उस स्मृति का उपवृहण किया था, जो प्रचलित मनुस्मृति के नाम से प्रसिद्ध है। इस 'भार्गवीया मनुस्मृति' की तरह 'नारदीया मनुस्मृति' भी प्रचलित है।

मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हजार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है।

मनुस्मृति को लेकर विरोधाभास क्यों? :


भारत शुरू से ही बौद्धिक और अध्यात्मिक संघर्षों और समन्वयों की स्थली रहा है, मनुस्मृति एक ऐसा ग्रंथ है जो पहले स्वार्थी लोगों की मिलावट का शिकार हुआ और फिर हमारी राजनीति का।

मनुशंहता या मनुस्मृति नाम से अनेक रचनाये प्रचलित है, जिनमे श्लोकों और अध्याय की संख्या भिन्न है। अतः सिद्ध है कि अलग अलग समय मे इसकी रचना और संस्करण में श्लोकों का मिलावट और गवन किया गया है। यह मिलावट इतना हास्यास्पद है कि एक ही समय के दो श्लोकों के अर्थ  भावना एकदम भिन्न है।

आधुनिक राजनीतिक विवादों में मनुस्मृति को जिस तरह से अपमानित किया गया है वो निंदनीय है। यह स्पष्ट है कि अलग अलग समय में धर्माचार्यों ने अनेको धर्मग्रंथों की विवेचना और अनुवाद में अस्पस्टता और अलस्यता दिखाई है जिससे विवाद बढ़े है।






विरोधी जिन मुद्दों को लेकर विवाद रखते भी वो मुख्यतः है स्त्रियों और तथाकथित जातियों को लेकर कही गयी अन्याय पूर्ण बाते है। इन मुद्दों को गांधी जी ने भी माना था और इनको लेकर अम्बेडकर जी ने मनुस्मृति की एक प्रति को जलाया था, जिशसे राजनीतिक विवाद बढ़ा।

मनुस्मृति की रचना का काल भी पूर्ण रूप से सिद्ध नही है क्योंकि रामायण में भी मनुस्मृति की और श्लोक के अंश है परंतु मनुस्मृति में रामायण का कोई अंश नही है। अतः मूलतः मनुस्मृति कितना प्राचीन है शिद्ध नही है, तो फिर उसकी मूलप्रति तो असंभव है यानी मिलावट और तथ्यों से छेड़छाड़ संभव है।

अब अगर मूल विवादों की बात करे तो भारतीय संस्कृति में हर युग मे स्त्रियों को आदर दिया गया है हम देवताओं के साथ साथ देवियों की भी समान रूप से पूजा अर्चना करते है, तो हमारा धर्मग्रंथ उनके प्रति अपमानित और अन्याय पूर्ण बातों की कोई संभावना नही दिखाई देती।

दूसरा मुद्दा जो यह कहा जाता है कि मनुस्मृति द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था , जातीयता का कारण है। जबकि ऐसा बिलकुल नही है। वर्ण व्यवस्था मनुष्य के कर्म, छमता, बल और बुद्धि के आधार पर की गई थी। जिसपर जातीय ढांचा लोगो ने अपने अनुसार बनाया ।
जिस तरह ग्रंथो के अनुवाद में उनका भाव बदल दिया गया उसी तरह वर्ण व्यवस्था को जातीय व्यवस्था में बदला गया।


क्या निवारण है इन विवादों का?


ज्ञात है कि बाइबल और महाभारत जैसे धर्म ग्रंथो में भी मिलावट और व्याख्या में त्रुटि की गई है। तथा तुलसीदास जी जैसे महात्मा अगर रामायण प्रासंगिक अनुवाद नही करते तो उन्हें भी समझने में त्रुटि की जाती और गलत मतलब निकाले जाते।

जरूरत है कि इनका गहन अध्ययन और शोध हो, जब तक इनका ठीक से अनुवाद नही होगा विरोधाभास बढ़ता रहेगा। उसके बाद जो भी इसमे बुराईया हो उनको हटाया जाय, जिसमे किसी को भी आपत्ति न हो। क्योंकि ज्ञानी लोगो को अच्छाईयों को ग्रहण करके बुराइयों को अलग कर देना चाहिए।
ऐसे धर्म ग्रंथो को जलाना, उनपर गलत टिप्पणी करना या इनपर जूता या पैर रखकर अपमानित करना शर्मनाक है और जो लोग इन ग्रंथों पर किसी विशेष के ऊपर अन्याय की बात करते है वो इन ग्रंथों पर इस तरह का आचरण करे वह कौन सा न्याय है।

सदियों से कुछ कुरीतियों को मुद्दा बनाकर धर्म को बांटने का कार्य समाज मे होता आ रहा है, उसमे ऐसा करने वाले लोगो का निजी स्वार्थ होता है। जरूरत है कुरीतियों को हटाने का और एक जुट रहने का न कि आपस मे जातियों में विभाजित होने का।







02 May, 2019

भस्मासुर की कथा। Story of Bhasmasur and lord Shiva

भस्मासुर का परिचय:

भस्मासुर नामक असुर जिसने भगवान शिव की भक्ति करके वरदान प्राप्त किया था, उसकी विचित्र कथा प्रचलित है। भस्मासुर अन्य असुरों की तरह आततयी असुर था जो तीनो लोको में राज करना चाहता था। भस्मासुर का वध खुद उसके द्वारा ही हुआ था, जो भगवान विष्णु के मोहनी रूप के कारण हुआ था।



भगवान शिव और भस्मासुर की कथा:

पूर्व काल में भस्मासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था। उसको समस्त विश्व पर राज करना था। अपने इसी प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु वह शिव की कठोर तपस्या करता है। अंत में भोलेनाथ उसकी बरसों की गहन तपस्या से प्रसन्न हो कर उस के सामने प्रकट होते हैं।
शिव उसे वरदान मांगने के लिए कहते हैं। तब भस्मासुर अमरत्व का वरदान मांगता है। अमर होने का वरदान सृष्टि विरुद्ध विधान होने के कारण शंकर भगवान उसकी यह मांग नकार देते हैं। तब भस्मासुर अपनी मांग बदल कर यह वरदान मांगता है की वह जिसके भी सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाए।



शिवजी उसे यह वरदान दे देते हैं। तब भस्मासुर शिवजी को ही भस्म करने उसके पीछे दौड़ पड़ता है। जैसे तैसे अपनी जान बचा कर शंकर भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और उन्हे पूरी बात बताते हैं। भगवान विष्णु फिर भस्मासुर का अंत करने के लिए मोहिनी रूप रचते हैं।
भस्मासुर जब भटक भटक कर शिवजी को भस्म करने के लिए ढूंढ रहा होता है तब मोहीनी उसके समीप प्रकट हो आती है। उसकी सुंदरता से मुग्ध हो कर भस्मासुर वहीं रुक जाता है, और मोहिनी से विवाह का प्रस्ताव रख देता है। मोहिनी जवाब में कहती है कि वह नृत्य करके दिखाए तभी वो उसके साथ विवाह करेगी।




अब भस्मासुर को नृत्य आता नहीं था तो उसने इस कार्य में मोहिनी से मदद मांगी। मोहिनी तुरंत तैयार हो गयी। नृत्य सिखाते-सिखाते मोहिनी ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा और उसकी देखा-देखी भस्मासुर भी शिव का वरदान भूल कर अपना ही हाथ अपने सिर पर रख बैठा और खुद ही भस्म हो गया। इस तरह विष्णु भगवान की सहायता से भोलेनाथ की विकट समस्या का हल हो जाता है।

28 April, 2019

मोक्ष नगरी "गया" कि कथा। Moksha Tirth Gaya.

मोक्ष तीर्थ "गया" :

भारत के बिहार राज्य में स्थित स्थान "गया" हिन्दू परंपरा में मोक्ष का स्थान माना जाता है, इस स्थान पर अपने पूर्वजों, पितरों का तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य अपने पितृऋण से मुक्त हो जाता है और पूर्वजो को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष का अर्थ है कि मृत्यु को प्राप्त हुए पूर्वजों को भटकना न पड़े और नर्क की यातनाएं से मुक्ति पाकर सतगति को प्राप्त हो और भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ की प्राप्ति हो।



यही कारण है कि गया नामक इस स्थान पर सम्पूर्ण भारत और विश्व के अनेक स्थानों से लोग यहाँ पर आते है, और अपने पूर्वजों, पितरो, संबंधियों के लिये यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण आदि कार्य करते है।

क्यों है गया मोक्षदायिनी स्थान:

इसी स्थान में क्यों किया जाता है इसकी एक पैराणिक कथा है, जो 'गय' नामक असुर से जुड़ी हुई है। यह असुर भगवान विष्णु का परम भक्त था। गय असुर या गयासुर ने भगवान विष्णु की तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था कि उसका स्पर्श और दर्शन मात्र से मनुष्यों को मोक्ष और वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति हो जाएगी।



इस वरदान से पापी मनुष्य भी नरक और यमलोक की यातनाएं से मुक्त होकर सीधा वैकुण्ठ की प्राप्ति होने लगी। यमदेवता इस प्रकार से हो रहे कार्य के निवारण हेतु भगवान व्रह्मा के पास गए। व्रह्मा जी ने कहा कि यह वरदान भगवान विष्णु ने दिया है अतः उन्ही से इसके निवारण के मार्ग पुछना चाहिए। अतः सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने देवताओं की प्रार्थना से गयासुर से कहा कि समस्त देवता तुम्हारी पीठ पर यज्ञ आदि पुण्य कर्म करना चाहते है, वो मान गया। सभी देवताओं ने यज्ञ के लिए गए और एक बहुत विशाल सिला उसके ऊपर रख दिये जिसपर देवता अपना आसान बनाया। यज्ञ सुरु होते ही गयासुर का सर धड़ से अलग हो गया और शरीर हिलने लगा। तब भगवान विष्णु स्वयं उस शिला में प्रवेश कर गए।
भगवान विष्णु कार्य के अंत मे पसन्न होकर बोले इस सिला में हमेशा उनका वाश रहेगा और जो भी यह पर पुण्य कर्म करेगा वो उनको प्राप्त होगा। अतः वहां पर पितरो के लिए मोक्ष कार्य की परंपरा बनी। यह भी मान्यता है मनुष्य अपने जीवित रहते हुए भी भी अपना मोक्ष का तर्पण कर सकता है।

26 April, 2019

ऋक्षराज जामवंत एवं श्रीकृष्णा के बीच हुए युद्ध की कथा। Story of War Between Jamwant and Shrikrishna.

ऋक्षराज जामवंत का परिचय, जिनका वर्णन त्रेतायुग एवं द्वापरयुग दोनों में मिलता है:

ऋक्षराज जामवंत जी रीछ योनि में जन्मे भगवान ब्रह्मा के पुत्र थे, उन्होने सागर मंथन में भी भाग लिया था।  त्रेतायुग में श्रीराम और रावण के बीच हुए युद्ध मे वानर सेना के महत्वपूर्ण योद्धा तथा सुग्रीव के मंत्री एवं सलाहकार थे। द्वापरयुग में जामवंत जी ने श्रीकृष्ण के साथ युद्ध किया था, तथा बाद में श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु के अवतार जानकर अपनी पुत्री जामवंती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ किया था।


जामवंत जी का श्रीकृष्ण श्रीकृष्ण से स्यमन्तक मणि के लिए युद्ध हुआ था, जिसजे बहुत आश्चर्य होता है के भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम के सेवक एवं भक्त उन्ही भगवान विष्णुजी के अवतार श्रीकृष्ण को कैसे नही पहचान पाए और उनके बीच इतना बड़ा युद्ध हुआ। इसके बारे में एक धारणा है कि भगवान श्रीराम से कुश्ती करने की मनसा जामवंत जी मे की थी तब श्रीराम ने हँसकर कहा था आपकी इस मनोकामना को अगले अवतार में पूर्ण करेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण और जामवंत जी के बीच हुए युद्ध की कथा:

इस कथा का विस्तरित वर्णन श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण जी के विवाह के वर्णन के समय है। इस कथा के अनुसार सत्राजित नामक राजा जिनका राज्य मथुरा के अंतर्गत आता था, उंन्होने सूर्यदेव कि उपासना की, जिसजे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने स्यमंतक नामक मणि उपहार रूप में दी। इस मणि का एक खासियत थी कि यह हरदिन अपने भार से आठ गुना सोना देती थी।




एक दिन जब श्रीकृष्ण जी अपने राज्य में चौसर खेल रहे थे तब उनके पास सत्राजित जी आये, उस समय उनके पास वह स्यमंतक मणि उनके पास थी, तब श्रीकृष्ण ने कहा कि यह मणि बहुत विशिष्ट है अतः ये राजा के पास होने चाहिए और इसे राजा उग्रसेन के पास दे देनी चाहिए।

सत्राजित कुछ नही बोले और वहां से चले गए, और अपने निवास में पूजा के स्थान में रख दिया। एक दिन उनका भाई प्रसेनजित उस मणि को लेकर शिकार पर चला गया, जहाँ पर एक सिंह के द्वारा उनका और उनके घोड़े की हत्या कर दी। सिंह ने वह मणि रख ली तथा उस सिंह को जामवंत जी ने मारकर वह स्यमन्तक मणि पा गए लेकिंन उसकी विसिस्टता को नही जानते थे और अपने बालक को खेलने को दे दिये।

उधर भाई के वापस न आने पर सत्राजित ने यह भ्रम फैलाने लगे कि श्रीकृष्ण की नजर मणि पर थी अतः उन्होंने मणि पाने के लिए मेरे भाई को मार दिया है। जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चली तो वो अपने कुछ मित्रो के साथ वन में गए जहाँ पर उनको  सत्रजीत का भाई और घोड़ा मारा हुआ मिला, पास में सिंह के पदचिन्ह मिले। सिंह के पदचिन्हों का पीछा किया तो वो भी मारा हुआ मिला, साथ ही एक ऋक्ष के पदचिन्ह मिले। ऋक्ष के पदचिन्हों का पीछा किया तो एक गुफा में जाते हुए मिले। श्रीकृष्ण अपने मित्रों को वहाँ छोड़कर गुफा में प्रवेश कर गए, और एक ऋक्ष बालक को स्यमन्तक मणि से खेलता हुआ देखकर मणि ले लिए।

तभी वहां ऋक्षराज जामवंत आ गए और मणि छीन लेने से क्रोधित हो गए और दोनों के बीच युद्ध सुरु हो गया। दोनों अति वीर थे अतः युद्ध करते करते 28 दिन बीत गए। 28 दिन बाद भी जब युद्घ चलता रहा तो उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को याद किया। तब उन्हें कृष्ण में राम के दर्शन हुए और अपनी गलती का पछतावा हुआ।




जामवंत जी ने अपनी पुत्री जामवंती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिए, श्रीकृष्ण जामवंती और स्यमन्तक मणि को लेकर मथुरा गए और मणि सत्रजीत को दे दी। सत्राजित को भी अपने किये का पछतावा हुआ और अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

23 April, 2019

काली माता की कथा एवं शिवजी का काली माता के पैरों के नीचे आने की कथा। Story of Kali Mata.

महाकाली माता के सवरूप का परिचय:

आदि शक्ति माता जगदम्बा के कई रूपो में से एक रूप है काली माता का रूप। माता का यह रूप काजल के समान कला है, उनके तीन नेत्र तथा गले मे मुंडमाला है। देवी ने इस रूप में अनेक आभूषण और अस्त्र धारण किये है परन्तु मुख्यरूप से खड्ग खप्पर धारण किये है। 


माता महाकाली का यह रूप विकराल तथा इतने क्रोध में है कि काल भी भयभीत हो जाता है। इनके क्रोध को शांत करने की शक्ति समस्त संसार के नही है। माता काली का स्वरूप भले ही भयानक है परंतु इनके हृदय में भक्तों के लिए स्नेह एवं वात्सल्य भरा हुआ है, वे भक्तों को अभय देने वाली एवं उनके भय को दूर करने वाली है। इसलिए कलयुग में इनकी भक्ति को श्रेष्ठ एवं उत्तम माना गया है।

माता महाकाली के उत्पन्न होने का कारण:

स्कन्द पुराण सहित कई पुराणो में देवी के उत्पन्न होने की कथा का वर्णन है। कुछ कथायों में भिन्नता भी है, अतः एक कथा के अनुसार:


एक बार दारुक नामक अति बलशाली दैत्य धरती पर रहता था, जिसके अत्याचार से मनुष्यों एवं ऋषियों मुनियों के जीवन प्रभावित था। उस दानव को यह वरदान था कि उसका अंत एक स्त्री के हांथो ही हो सकता है। अतः देवताओं ने अपने कष्टों के निवारण हेतु जगत जननी माता पार्वती के पास गए और दैत्यों के संघार हेतु प्रार्थना करने लगे। भक्तवत्सल माता ने देवताओं प्रार्थना को मानकर , अपने एक अंश को महादेव शिव जी के अंदर प्रवेश करवाया। देवी का वह अंश शिवजी के कंठ में जहाँ हलाहल नामक विष था , वहीं बढ़ने लगा । उसे बाहर निकलने के लिए महादेव ने तीसरा नेत्र खोल दिया, जिससे भयानक ज्वाला के साथ देवी का यह स्वरुप उत्पन्न हुआ। शिवजी के गले के विष के कारण उनका स्वरूप काला हो गया, और उनका विकराल रूप ऐसा था जैसे कई ज्वालामुखी एक साथ फूट रहे हो। देवी के हुंकार मात्रा से सभी दैत्य भस्म हो गए।

क्यों शिवजी लेट गए थे माता महाकाली में रास्ते पर और माता ने पैर रख दिया था:




रक्त बीज नामक दैत्य ने वृह्मदेव से वरदान लिया था कि उसका रक्त पृथ्वी पर जिस जगह गिरेगा वहां पर कई रक्तवीज उत्पन्न हो जायेगे। यही वरदान के प्रभाव से रक्तवीज ने समूचे पृथ्वी पर अत्याचार करना सुरु कर दिया। रक्तवीज ने देवताओं को भी युद्ध के लिए ललकारा और जब देवताओं ने उसे मारने के लिये प्रहार किया तो उसके रक्त से कई रक्तवीज उत्पन्न हो गए। रक्तवीज को मारने में देवता असमर्थ थे और वो पराजित हो गए।
पराजित होकर देवता, महाकाली माता की शरण में गए तथा अपने ऊपर आयी हुई विपत्तियों को निवारण के लिए माता से प्रार्थना करने लगे। देवताओं की बातों को सुनकर माता का क्रोध बढ गया , और वो स्वयं युद्ध करने चली गयी। 
माता काली ने दैत्यराज रक्तवीज के सभी रूपों और दानवो का वध करने लगी, तथा अपनी जिव्हा का विस्तार कर लिया जिशसे रक्तवीज का रक्त उनकी जिव्हा में गिरने लगा। माता ने रक्तवीज का वध किया और उसके रक्त को जिव्हा और खप्पर से पिया।
इस युद्ध के दौरान माता का क्रोध इतना विकराल हो गया कि वो रक्तवीज के वध और युद्ध के अंत होने पर भी शांत नही हो रही थी। तीनो लोको में उनकी क्रोध की लपटें बढ़ने लगी थी। सभी देवता मिलकर भी माता का क्रोध शांत नही कर पा रहे थे, तो वो शिवजी की शरण मे गए।
शिवजी माता का क्रोध शांत करने के लिए उनके मार्ग पर लेट गए और जब तांडव करती हुई माता वहां पर पहुची तो उनका पैर शिवजी के ऊपर पड़ गया, और उन्हें बहुत पछतावा हुआ और उनका क्रोध शांत हो गया।

22 April, 2019

हनुमान जी के जन्म की कथा। Birth Story of Hanuman ji.

हनुमान जी का परिचय:

महाबली हनुमान जी का जन्म वानर कुल में हुआ उनकी माता का नाम अंजना तथा पिता केसरी है। हनुमान जी का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा को हुआ जो मंगलवार का दिन था। हनुमान जी भगवान श्री राम को अपना स्वामी मानते है तथा उन्ही की सेवा को अपना परम धर्म मानते थे, इसीलिए उन्हें भक्तशिरोमणि कहा जाता है। हनुमान जी अति वलवान तथा बुद्धिमान है। उन्होने अपनी बुद्धि और बल से सिर्फ अपने भक्तों के संकट दूर नही किये अपितु श्रीराम के भी संकट दूर किये, अतः उन्हें संकटमोचन कहा जाता है।


हनुमान जी को पवनपुत्र तथा भगवान शिवजी का रुद्र रूप भी माना जाता है। हनुमान जी के गुरु स्वयं सूर्य देव है, उनके अलावा भी हनुमान जी को अनेक देवताओं और वृह्मदेव से कई वरदान प्राप्त है। 

हनुमानजी के जन्म की कई कथायों का वर्णन अनेक ग्रंथों एवं पुराण में है। उन मे से कुछ कथाये इस प्रकार है:


१) कथा: जब माता अंजना ने पवनदेव की तपस्या की थी

माता अंजना और वानर राज केसरी के विवाह के बहुत अधिक समय बीत जाने के बाद में भी जब कोई संतान नही हुई तो वो चिंता करने लगे। माता अंजना शिवजी की बहुत बड़ी भक्त थी, अतः उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शिव की तपस्या करने लगीं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पवन देव को भेजा जिन्होंने माता अंजना को वरदान दिए कि उन्हें पुत्र होगा जो पवन देव की तरह तेजस्वी तथा वलवान होगा, तथा उसके अंदर समस्त गुण भी रहेंगे।


२) कथा : शिव के रुद्र अवतार के रूप में जन्म की कथा

वेसव्यास जी के पुराण के अनुसार एक समय पृथ्वी पर जल शून्य हो गया था, तब पृथ्वी पर पुनः जल की के संचार के लिये सभी देवता गण भगवान महादेव की शरण में गए तथा समस्या के निवारण की विनती की। भगवान शिवजी ने अपने सभी रुद्रों को बुलाकर कहा कि तुम मे से किसमे समर्थ है पृथ्वी पर पुनः जल के संचार के लिए। तब उनमें से 11वे रुद्र जिनका नाम "हर " था बोले कि मेरे अंतःकरण में जल व्याप्त है मैं जल का संचार कर सकता हु परंतु मुझे अपने शरीर को गलाना पड़ेगा, और फिर उन्होंने ऐसे ही किया। भगवान शिवजी ने अपने रुद्र "हर" से कहा की तुम्हारे अस्तित्व का अंत नही होगा और उन्ही रुद्र के अंश का मत अंजना के यहां हनुमान रूप में जन्म हुआ।


३) कथा : जब मोहनी रूप देखकर स्खलित हुआ था शिवजी का वीर्य


पैराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के उपरांत भगवान विष्णु में मोहनी रूप रखकर देवताओं को अमृत पान करवाया था। उस घटना के उपरांत एक दिन शिवजी ने भगवान विष्णु से पुनः उस मोहनी रूप को दिखाने की प्राथना की , भगवान शिव की प्रार्थना को मानकर विष्णु भगवान में वही मोहनी रूप रखा। जिसे देखकर शिवजी मोहित हो गए और उनका वीर्य स्खलित हो गया। तभी सप्तऋषियों ने उनके वीर्य को संग्रहित कर लिया था। तथा जब माता अंजना ने पुत्र प्राप्ति के लिए शिव आराधना की तो उनसे प्रसन्न हो शिवजी ने पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया तथा पवन देव के द्वारा , माया से उस शप्तऋषी के पास एकत्रित वीर्य को अंजना के गर्भ में डाला गया, और महाबली हनुमानजी का जन्म हुआ।

18 April, 2019

पांडवों मे से सिर्फ़ अर्जुन को क्यों मिली थी 12 साल का वनवास। Why Only Arjun Got 12 year Vanvash.

अकेले अर्जुन को मिली 12 वर्षों के वनवास की कथा:

महाभारत की कथा के अनुसार लाक्षागृह की सडयंत्र के पश्चात पांडव बच गए थे और उन्हें कुछ दिनों तक अज्ञातवास में रहना पड़ा था, और इस अज्ञातवास के अंत के पहले अर्जुन ने स्वयंवर जीत कर द्रोपती से विवाह किया। परंतु कुंती के कथन को पूर्ण करने के लिए द्रोपदी का पांच पांडव से विवाह करना पड़ा था।


उसी के बाद एक दिन देवऋषी नारद पांडवो से मिलने आये, पांडवों ने उनका स्वागत बड़े ही आदर के साथ किया। तब उनसे प्रसन्न होकर नारद जी ने दो असुर भाईओं की कथा सुनाई। उंन्होने यह कथा इसलिए सुनाई थी क्योंकि भाईओं के स्त्री के कारण विवाद होता है। उस कथा के अनुसार:
उन दोनों असुर भाईओं के बीच बहुत प्रेम था, उस प्रेम के कारण उंन्होने जब वृह्मदेव को प्रसन्न किया तो पहले अमृत्व का वरदान मांगा परंतु जब वृह्मदेव अमृत्व का वरदान नही दिया, तो उन्होंने यह वरदान मांगा की उनका वध उन्ही भाईओं के हाथों हो। वृह्मदेव से आपस मे एक दूसरे के हाथों मरने का वरदान पाकर दोनों भाई समुचित पृथ्वी पर अत्याचार करना सुरु किया। देवता भी उनके अत्याचार नही बचे और उंन्होने भगवान विष्णु के सरण में गए। जब विष्णु जी ने माया से एक अति सुंदर स्त्री को वनाकर उन असुर भाईओं के पास भेजा। उस स्त्री को देखकर दोनों भाई मोहित हो गए और उसे पाने के लिए अपना आपस का प्रेम भूलकर , दोनों भाई आपस मे युद्घ करना प्रारंभ कर दिया और दोनों ने एक दूसरे को मार डाला।

नारद मुनि की यह बात को मानकर पांडवों ने नियम बनाये की द्रोपदी एक एक महीने तक प्रेत्यक पति के पास रहेगी, और जब वो किसी के पास हो तो वहां दूसरा कोई भी नही जा सके। अगर किसी ने नियम तोड़ा तो उसके लिए दंड का प्रावधान था।

उस दिन की घटना जब अर्जुन को मिली थी सजा:




जब पांडवो का इंद्रप्रस्थ पर शासन था तो एक दिन एक व्राह्मण आया और पांडवों को बोला को कुछ लुटेरे उनकी गायों को भगा कर ले जा रहे है, अतः उस व्राह्मण ने पांडवों से मदत की गुहार लगाई। अर्जुन और पांडव भाई मदत करना चाह रहे थे परंतु उनके अस्त्र सस्त्र द्रोपती के कमरे मे थे और उस समय वहां युधिष्ठिर थे। व्राह्मण की मदत करना था जिसके लिए नियम का उल्लंघन करना पड़ता अतः वो लोग कस मकस में थे। पर अर्जुन में व्राह्मण की मदत को चुना और वो द्रोपदी के कमरे में चले गए, तथा अपने अस्त्र लेकर लुटेरों से व्राह्मण की गाये छुड़वाई।
वापस आकर अर्जुन ने खुद को नियम उलंघन का दोसी मानकर 12 वर्षो का वनवास मांगा, और 12 वर्षों के वनवास पर चले गए।




12 April, 2019

जब हनुमान जी के डर से शनि देव ने स्त्री रूप रखा था। Story of Hanuman ji and shani dev.

हनुमान जी एवं शनि देव की कथा:

शनि देव के बारे में सभी जानते है, जिसके ऊपर इनकी दसा बिगडती है तो उस इंसान के लिए जीवन मुश्किल हो जाता है। तथा शनि की साढ़ेसाती, आढ़ायीया और वक्र दृष्टि के बारे में सुनते ही लोगो के पसीने छूट जाते है। वही हनुमानजी संकट मोचन है, उनकी भक्ति से ग्रहों की दशाओं को ठीक किया जाता है। हनुमानजी को यह वरदान है कि वो अपने भक्तों की रक्षा के लिए ग्रहों की दशाओं को ठीक कर देते है।

कष्टभंजन हनुमानजी


शनि देव की दशाओ की सुधार के लिए शनिवार को हनुमानजी के ऊपर तेल एवं सिंदूर चढ़ाने का रिवाज है।


जब हनुमानजी के क्रोध से बचने के लिए शनि देव ने स्त्री का रूप रखा था:


गुजरात में भावनगर में सारंगपुर में हनुमानजी का एक विशेष मंदिर है जिसे कष्टभंजन हनुमानजी मंदिर नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की एक खास बात है कि यहां पर स्थित हनुमानजी के पैरों के पास एक स्त्री है, हम सब जानते है कि हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी है तो उनके पास स्त्री कैसे है।
इसकी बड़ी अनोखी कथा है, इस कथा के अनुसार एक बार शनि देव का प्रकोप मनुष्यों के ऊपर बहुत अधिक हो गया था। जिशसे परेशान मनुष्य महाबली हनुमानजी की शरण मे गए, तथा भक्तों ने हनुमानजी से शनिदेव के प्रकोप के बारे में बताया। भक्तों के कष्टों को देखकर हनुमानजी बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने शनिदेव को दंड देने के लिए उनके लोक में गए।


कष्टभंजन हनुमान मंदिर


जब शनिदेव को पता चला कि हनुमानजी बहुत क्रोध में उनके पास आ रहे है तो उंन्होने एक उपाय सोचा उनको पता था कि हनुमानजी स्त्रियों के ऊपर क्रोध नही करते अतः उन्होंने स्त्री का रूप धारण कर लिए। तथा जब हनुमानजी आये तो उनके पैरों में गिरकर माफी मांगी। 
हनुमानजी ने उनका यह रूप देखकर अपने क्रोध को छोड़कर शनिदेव को छमा कर दिए तथा भक्तों के संकट को खत्म करने को कहा।

09 April, 2019

माता नवदुर्गा के नौ रुपों की व्याख्या। Description of navrup of Nav durga.

मां दुर्गा के नौ रूप:


मां दुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा नवरात्रि के पावन पर्व पर की जाती है। माता के ये नौ रूप वेद भगवान द्वारा ही प्रतिपादित है। देवी ने यह रूप देवताओं के कल्याण और भक्तों को अभयदान देने के लिए ही रखे है, भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करना माता का उदेश्य है।




माता के नवरूप इस प्रकार है:
१) शैलपुत्री
२) ब्रह्मचारिणी
३) चंद्रघंटा
४) कुष्मांडा
५) स्कंदमाता
६) कात्यायनी
७) कालरात्रि
८) महागौरी
९) सिद्धदात्री

माता के नौ रूपों की व्याख्या:



शैलपुत्री

१) शैलपुत्री:

नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है, माता का यह नाम हिमालय राज के यहां पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण हुआ है। माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ है। माता की दो भुजाएं है उन्होंने अपने दाहिने हाँथ में त्रिशूल एवं बाएं हाँथ में कमल पुष्प धारण किए है।


ब्रह्मचारिणी


२) ब्रह्मचारिणी

माता के दूसरे रूप में ब्रह्मचारिणी की पूजा नवरात्रि में की जाती है। माता के इस नाम का अर्थ है ब्रह्म आचरण यानी तापश्वि का आचरण। माता ने भगवान चंद्रमौली को पति रूप में प्राप्त करने के लिए बड़ी घोर तपस्या की थी, तभी ऋषिमुनियों और देवताओं में माता के इस रूप को यह नाम दिया था।
माता ने इस रूप में स्वेत वस्त्र धारण किये है तथा एक हाथ मे तप की माला और दूसरे हाथ मे कमंडल धारण की है।


 चन्द्रघण्टा


३) चन्द्रघण्टा

नवरात्र में माता की तीसरे रूप चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। माता के इस रूप का नाम उनके मस्तक पर घण्टी के समान अर्धचंद्र को धारण करने के कारण है। माता इस रूप में सिंह पर सवार है तथा इनकी दस भुजाएं है जिसमे अनेक अस्त्र- शस्त्र धारण किये हुए है। माता का यह रूप भक्तों का शोक का विनाश करती है और कल्याणकारी है।


कुष्मांडा

४) कुष्मांडा

कुष्मांडा माता दुर्गा का रूप है जिनकी पूजा नवरात्रि के चौथे दिन में किया जाता है। माता के इस रूप की आठ भुजाएं है जिसके कारण इन्हें अष्ठभुजी देवी भी कहा जाता है। सिंह पर सवार माता ने अपने भुजाओं में अनेक अस्त्र धारण किये हुए है तथा एक हाथ मे कमंडल और एक हाथ मे जप की माला है। माता की कांति सूर्य के समान है क्योंकि इन माता वास सूर्य मंडल में है।



स्कंदमाता

५) स्कंदमाता

भगवान स्कन्द कुमार यानी कार्तिकेय की माता के कारण इनका नाम स्कंदमाता है, जिनका नवरात्रि के पंचमी को पूजा आराधना कि जाति है। माता का यह रूप अत्यंत सौम्य है जिन्हीने अपने गोद मे भगवान कार्तिकेय को बिठाए हुए है। इनकी चार भुजाएं है जिनमे कमल पुष्प धारण की है, तथा एक हाथ वर मुद्रा में है। कमल को आसन बनाने के कारण इन्हें पद्मआशना देवी भी कहा जाता है। स्कंदमाता की सवारी शेर है।


कात्यानी

६) कात्यानी

नवरात्रि के छठवें दिन माता कात्यानी की पूजा की जाती है। माता का यह नाम उनका कात्यायन ऋषि के घर पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण हुआ था।  माता के इन रूप की चार भुजाएं जिसमे एक हाथ वर मुद्रा, एक अभय मुद्रा में है तथा एक मे कमल और चौथे में तलवार धारण की है।
एक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए गोपियों ने इनकी पूजा यमुना तट पर की थी।



कालरात्रि

७) कालरात्रि

नवरात्रि में सातवे दिन माता कालरात्रि की पूजा की जाती है। माता का यह रूप घने अंधकार के समान काला है, इनके बाल बिखरे हुए है। माँ कालरात्रि की चार भुजाएं है तथा वाहन गधा है, ये भक्तों के अंधकारमय स्थितियों का नाश करने वाली है। माता की दहनी भुजाएं वर एवं अभय मुद्रा में है तथा बाई भुजाओं में खड्ग और कांटा धारण की हुई है।



महागौरी

८) महागौरी

वृषवाहना देवी महागौरी की पूजा नवरात्रि के आटवे दिन होती है। माता इस रूप में सभी आभूषण एवं श्वेत वस्त्र धारण की है। जब माता ने भगवान शिव को पति रूप में पाने की कठोर तपस्या की थी तो उनका स्वरूप काला हो गया था, अतः जब भगवान शिव प्रसन्न हो गए तो उन्होंने गंगा के पवित्र जल से उनके शरीर को साफ कराया तो माता का स्वरूप दूध के समान गोरा हो गया अतः उन्हें महागौरी कहा जाता है।



 शिद्धदात्री

९) शिद्धदात्री

वनरात्री के नवे दिन माता शिद्धदात्री की पूजा की जाती है। माता शिद्धदात्री आठ सिद्धियों को देने वाली माता है। इनकी उपासना मनुष्य को लौकिक एवं पारलौकिक सुखों को प्रदान कराने वाला है। चार भुजाओं वाली इन माता ने कमल को अपना आशन बनाया हुआ है।






05 April, 2019

सती अनुसूइया की कथा जिन्होंने त्रिदेव को बालक बना दिया था। Story of Sati Anusuya.

सती अनुसुइया का परिचय:

सती अनुसुइया "प्रजापति कर्मद" की नौ कन्याओं में से एक थी, इनके पति का नाम महाऋषि "अत्रि" था। अनुसुइया महान पतिव्रता नारी थी जिनके तेज के अनुभव करके देवताओं ने उन्हें सती की मान दिया था। तुलसीदास कृत रामचरितमानस में कहा गया है कि श्रीराम जी लक्ष्मण और सीता के साथ पंचवटी के निकट उनके आश्रम में गए थे। वहां पर सती अनुसुइया ने माता सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी, तथा विदाई करते समय उपहार स्वरूप आभूषण और दिव्य वस्त्र दिए जो कभी मैले नही होते और न ही फटते थे।


माता अनुसुइया के समक्ष त्रिदेव बालक रूप में

सती अनुसुइया ने त्रिदेव को छोटे से बालक बना दिया था:


एक कथा के अनुसार एक बार देवऋषि नारद ने बारी बारी माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती से मिलकर माता अनुसुइया की बहुत प्रसंसा की तथा उन्हें संसार का सबसे महान पतिव्रता नारी होने का बखान किये। तीनो देवियों को माता अनुसुइया से बहुत ईर्ष्या हो गयी और उंन्होने अनुसुइया के सतीत्व को भंग करने का निश्चय कर लिया। अतः उन्होंने अपने अपने पतियों अर्थात त्रिदेव व्रह्मा , विष्णु और शिव को माता अनुसुइया के सतीत्व को भंग करने को कहा और जब उन्होंने ऐसा न करने को कहा तो तीनों देवियों ने बहुत हट किया।
जब बहुत समझने पर भी वो नही मानी तो विवश होकर व्राह्मण वेश में महर्षि अत्रि के आश्रम में गए। माता अनुसुइया ने उनका स्वागत किया। व्राह्मण देहधारी त्रिदेव ने उनसे भिक्षा मागा और कहा कि हम भिक्षा तभी लेंगे जब वो निर्वस्त्र होकर भिक्षा देगी।
माता अनुसुइया बहुत चिंतित हो गयी अगर वो ब्राह्मणों की बात माने तो सतीत्व नष्ट होगा और अगर न माने तो व्राह्मण को भिक्षा न दे पाने का पाप होगा। अतः उन्होंने अपने तपोबल से तीनों ब्राह्मणो को नन्हे शिशुओं में बदल दिया और उनको दूध पिलाकर पालने में लिटा दिया।
उधर जब तीनो देवियो को पता चला कि अनुसुइया ने त्रिदेव को छोटे शिशुओं में बदल करके पालने में सुला दिया है तो उन्हें अनुसुइया माता की सतीत्व के बल का आभास हुआ और वो तीनो माता अनुसुइया के आश्रम में जाकर उनसे छमा मांगकर अपने पातियो को पुनः वास्तविक रूप में लाने का अनुरोध किया। 
माता अनुसुइया ने जब उन्हें वास्तविक रूप दिया तो त्रिदेव व्रह्मा, विष्णु और महेश ने उनसे वरदान मांगने को कहा, इसपर माता अनुसुइया बोली मेरी कोई संतान नही है अतः मैं आप तीनो को पुत्र रूप में पाना चाहती हूं। तीनो ने उन्हें पुत्र रूप में आने का वरदान देकर चले गए। 
माता अनुसुइया के इस वरदान स्वरूप व्रह्मा जी चंद्र रूप में , विष्णु जी श्री दत्त रूप में तथा शिवजी दुर्वाशा रूप में माता अनुसुइया के यह जन्म लिए।



04 April, 2019

दो माताओं के गर्भ से जन्मे महाबली जरासंध की कथा। Story of Jarasandh who birth by two mothers.

जरासंध का परिचय:

महाऋषि वेदव्यास जी के द्वारा रचित महाभारत में अनेक महाबली राजाओ और वीर पुरुषों का वर्णन है , उन्ही महावीर राजाओ में से है जरासंध। जरासंध "मगध" का राजा था तथा श्रीकृष्ण के मामा कंश का ससुर और मित्र भी था। कंश की मृत्यु के पश्चात वो श्रीकृष्ण को अपना शत्रु मानने लगा था तथा अनेको बार उसने मथुरा पर आक्रमण किया था, सिसुपाल उसका सेनापति था। भगवान श्रीकृष्ण ने बार बार के युद्ध से अपनी प्रजा को बचाने के लिए अपनी राजधानी मथुरा हटाकर द्वारिकापुरी में बसाई।


जरासंध के वध का चित्रण, सौ.- भक्तिदर्शन


जरासंध के जन्म एवं मृत्यु की कथा:

मगध नरेश जरासंध का जन्म विचित्र परिस्थिति में हुआ था। जरासंध के पिता मगध के राजा बृहद्रथ नाम था, जिनकी दो पत्नियां थी। परंतु राजा बृहद्रथ को कोई पुत्र नही था। अतः उन्हीने एक ऋषि से प्रार्थना किये की उन्हें पुत्र प्राप्ति का कोई उपाय बताए। ऋषि राजा के विनय भाव एवं आतिथ्य से बहुत खुश हुए और बृहद्रथ को एक फल दिया। फल देकर बोले इसे अपनी पत्नी को ख़िला देना उसे बलवान पुत्र होगा।
राजा बृहद्रथ वह फल अपनी पत्नी को दिए जिसे उनकी दोनों पत्नियों ने काटकर आधा आधा खा लिया, परिणाम स्वरूप जब उनको पुत्र हुआ तो दोनों रानियों के गर्भ से आधा आधा दो भाग में हुआ। दोनों रानिया डर गई और शिशु के जीवित दोनों भागो को महल के बाहर फेंक दिया। 
उसी समय वहां से जरा नामक राक्षसि जा रही थी जिसने शिशु के दोनों जीवित भागो को देखा और अपनी माया से जोड़ दिया । जोड़ते ही वह शिशु रोने लगा जिसे सुनकर राजा बृहद्रथ अपनी पत्नियों के साथ आ गए, राक्षसि जरा ने वह शिशु उन्हें दे दिया। जरा राक्षसी के जोड़ने कारण उसका नाम जरासंध रखा गया। 
जरासंध के ऊपर राक्षसि माया प्रभाव के कारण उसका स्वभाव राक्षसि हो गया, वो अतिक्रूर एवं निर्दयी राजा हुआ। वो दूसरे राज्यों के ऊपर आक्रमण करता एवं उनके राजाओ को बंदी बनाकर रखता। 
उसने 86 राजाओं को बंदी बना लिया था और जब उनकी संख्या 100 हो जाती तो उनकी बाली देकर अमर होना चाहता था, इस लिए श्रीकृष्ण ने उसे मारने का उपाय करके अर्जुन और भीम के साथ ब्राह्मण वेश में जरासंध के पास गए। जरासंध ब्राह्मणों को मुँहमाँगा वर देता था, तो उन्होंने उसे द्वंद्व युद्ध के लिए कहा। जरासंध समझ गया कि वे व्राह्मण नही है, फिर भी अर्जुन और कृष्ण को छोड़कर भीम से द्वंद्व युद्घ को राजी हो गया।
13 दिनों तक चले भीम और जरासंध के युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण के इशारे पर भीम ने जरासंध के शरीर को दो टुकड़े कर के फेका, परंतु वो हिस्से फिर जुड़ गए और जरासंध जीवित हो गया। तब श्रीकृष्ण ने इसारे में बताया कि दोनों हिस्सो को विपरीत दिशा में फेको , जब भींम ने ऐसा किया तो वो शरीर को दो हिस्से फिर नही जुड़े और जरासंध का वध भीम के द्वारा हो गया।


02 April, 2019

सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा। Satyavadi Raja Harishchandra.

राजा हरिश्चन्द्र का परिचय:
राजा हरिश्चन्द्र इक्ष्वाकु कुल के राजा थे, जो रघुकुल नाम से भी जाना जाता है। वे अयोध्या के सूर्यवंशी राजा तथा भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। उनकी पत्नी का नाम तारावती तथा पुत्र का नाम रोहिताश्व था। हरिश्चन्द्र सत्यवादी एवं धर्म पालक थे, वो स्वप्न में भी जो वचन देते थे उसे पूरा करते थे। यही कारण हैं कि उनका नाम हमेशा सत्यवादी के रूप में उदाहरण लिया जाता है। सत्य और धर्म के पालन के लिए उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा परंतु उंन्होने कभी भी सत्य का मार्ग नही छोड़ा। उनके बारे मे एक दोहा प्रचलित है:

" चंद्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार।
पै दृन्हवृत हरिश्चंद्र को, टरे न सत्य विचार।। "


Raja Harishchandr


राजा हरिश्चन्द्र की कथा:

पौराणिक कथायों के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र सत्यवादी थे अतः उनके सत्य और धर्म की परीक्षा लेने के लिए महर्षि विस्वामित्र गए। विश्वामित्र जी ने माया द्वारा राजा हरिश्चन्द्र को स्वप्न दिखाया जिसमे राजा के महल में एक व्राह्मण आये जिनका राजा हरिश्चन्द्र ने बहुत आदर सत्कार किया, तथा भिक्षा में सारा राज्य दान दे दिया।
अगले दिन विस्वामित्र स्वयं आये, हरिश्चन्द्र जी ने महर्षि का स्वागत किया तथा राजसभा में ले गए। विस्वामित्र ने राजा से उनके स्वप्न के बारे में याद दिलाया तथा कहा कि ध्यान करो कि वो व्राह्मण मैं ही था जिसे तुमने अपना सारा राज्य दान में दे दिया है। राजा हरिश्चन्द्र को याद आ गया तथा उंन्होने अपना सारा राज्य महाऋषि विस्वामित्र को देने की घोषणा कर दी।
महाऋषि विस्वामित्र ने कहा कि दान के पश्चात दक्षिणा का प्रावधान है अतः तुम्हे दकक्षिणा देना होगा तभी तुम्हारा दान पूर्ण होगा। हरिश्चन्द्र ने मंत्री को आदेश दिया कि तीन स्वर्ण सीक्के महाऋषि को दकक्षिणा के तौर पर दी जाय। परंतु महाऋषि विश्वामित्र बोले जब तुमने सारा राज्य मुझे दान दे दिया है तो सारा राज कोष मेरा हुआ फिर उनमें से दक्षिणा तुम कैसे दे सकते हो? राजा हरिश्चंद्र ने अपनी गलती मानकर बोले मुझे थोड़ा समय दे मैं आपको दक्षिणा अवस्य दूँगा।
राजा हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी तथा पुत्र के साथ काशी के उस स्थान पर गए जहां पर मनुष्य तथा पसुओं का खरीदी एवं विक्री होती थी। बहुत प्रयास के बाद भी उन्हें किसी ने नही खरीदा। अंत मे उनकी पत्नी तथा पुत्र को एक महाजन ने गृहकार्य के लिए तथा राजा हरिश्चन्द्र को एक समशान घाट के डोम ने खरीदा। इससे जो धन इकट्ठा हुआ उससे उंन्होने महाऋषि की दकक्षिणा चुका दिए।
सत्य और धर्म के पालन हेतु एक महारानी जिसके चारों तरफ दास दासीओ की कतार लगी रहती थी वो दूसरे के घर के जुठे बर्तन धोती थी तथा एक चक्रवर्ती राजा समशान घाट की रखवाली करता था तथा अंतिम क्रिया के लिए आने वालों से कर वसूली करता था।
इतने होने के बाद भी एक दिन जब उनका पुत्र खेल रहा था तो काल सर्प बनकर काट लिया जिशसे इनके पुत्र की मृत्यु हो गयी। महारानी पुत्र सोक में तड़पकर रो रही थी उस समय न तो पति था और न ही धन। बाद में उंन्होने अपने पुत्र के अंतिम संस्कार हेतु अपनी गोद मे लेकर समशान गयी, जंहा का देखरेख हरिश्चंद्र कर रहे थे। वो अपनी पत्नी तथा पुत्र को पहचान गए और बहुत दुखी हुए। 
अंतिम संस्कार हेतु उंन्होने अपनी पत्नी को कहा कि उन्हें कर देना होगा क्योंकि वो अपने मालिक को धोखा नही दे सकते यह धर्म विरुद्ध होगा। हरिश्चंद्र की पत्नी ने कहा कि उनके पास कुछ नही है जिससे कर चुकाया जा सके। 
तब हरिश्चंद्र बोले कि अपनी साड़ी की आधा हिस्सा फाड़कर कर के रूप में दे जिसजे कर चुकाया जा सके। जब वो ऐसा करने लगी तो आकाशवाड़ी हुई और बताया गया कि विश्वामित्र के द्वारा उनकी परीक्षा ली जा रही थी जिसमे वो सफल रहे । अतः उनके पुत्र को जीवित कर दिया गया और उनको अपना राज्य वापस मिला।

01 April, 2019

श्रीराम के समय से जुड़ी हुई कथाये जिनका विवरण रामायण में नही मिलता। Story which not describe in ramayana.

वो घटनाएं जिनका विवरण रामायण में नही है:

ब्रह्मा द्वारा महाऋषि वाल्मीकि जी को रामायण की रचना करने की प्रेरणा दी गयी थी, जिसके उपरांत महाऋषि वाल्मीकि ने संस्कृत में छंदबद्ध तरीके से श्रीराम कथा को लिखा जो रामायण या बाल्मिकी के नाम से जाना जाता है। अलग अलग समय मे अनेको महापुरुषों ने अलग अलग भाषाओं में अनुवाद किया, इसी में से अवधी भाषा मे तुलसीदास कृत रामचरित मानस है।



कुछ ऐसी कथाये है जो प्रचलित है किंतु रामायण एवं रामचरित मानस में नही है। वो इस प्रकार है:

१) सुलोचना के सती होने की कथा: 

सुलोचना नाग कुल में पैदा हुई वासुकी नाग की पुत्री एवं रावण के जेष्ठ पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। सुलोचना पतिव्रता एवं तेजस्वी नारी थी। श्रीराम और रावण के युद्ध मे मेधनाद जिसे इंद्रजीत भी कहा जाता था, उसका श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी के साथ बहुत विकराल युद्ध हुआ। अंत मे लक्ष्मण ने मेघनाद का एक हाँथ काट दिया और फिर उसका सिर काटकर मेधनाद का वध किया।




जब लक्ष्मण जी ने मेघनाद का हाँथ काटा तो वो सुलोचना के पास जाकर गिरा, सुलोचना को विस्मय हुआ अतः उसने कहा कि अगर यह मेरे पति का हाँथ है तो ये लेखनी से लिखकर अपना परिचय दे। सुलोचना के इस प्रकार कहने पर मेघनाद के हाथ ने लिखा " हां प्रिये यह मेरा ही यानी मेघनाद का हाँथ है, युद्ध मे मेरा वध हो चुका है तथा हनुमान जी द्वारा मेरा कटा हुआ सर श्रीराम के चरणों मे रखा गया है जिससे मुझे सतगति प्राप्त हुई है"।
तब शुलोचना रावण के पास गई और श्रीराम से मेघनाद का सिर मांगकर लाने को कहा। रावण बोला कि मेधनाद वीर था और उसे वीरगति प्राप्त हुई है अतः वो मस्तक लेने नही जाएगा। तब सुलोचना स्वम् श्रीराम के शिविर में गयी, तथा मेधनाद के सिर को मांगने पर श्रीराम ने आदर के साथ कहा, कि देवी मेघनाद परमवीर था तथा हम उसके शरीर को लंका वापस देने ही वाले थे ताकि उसका अंतिम संस्कार उसके परिजनों के द्वारा हो सके।
तभी कुछ वानरों ने पूछा कि उसको कैसे पता कि इंद्रजीत का मस्तक प्रभु के पास है तो सुलोचना ने बताया कि मेधनाद के हाँथ ने लिखकर बताया। तो वानर हसने लगे और बोले कि फिर तो ये सिर भी बोलने लगेगा। तब सुलोचना ने कहा कि अगर मैं पूर्ण पतिब्रता हु तो अवश्य यह सिर बोलेगा। जिसके बाद वो मेधनाद का सिर जोर जोर से हसने की गर्जना करने लगा।
श्रीराम ने सुलोचना की बहुत प्रसंसा की तथा मेघनाद का मस्तक सुलोचना को दे दिया। जिसके उपरांत सुलोचना अपने गोद मे मस्तक लेकर चिता में बैठ गयी और सती हो गई।
इस कथा का वर्णन न तो वाल्मीकि रामायण में है ना ही तुलसीदास कृत रामचरित मानस में।

२) रावण के द्वारा रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की स्थापना:

रावण परम ज्ञानी पुरोहित तथा भगवान शिव का परम भक्त था। कई तरह को ऐसी मान्यता और कथा प्रचलित है कि जब श्रीराम सेतु का निर्माण हो रहा था तब राम जी ने भगवान शिव आराधना की थी तथा बालू के शिवलिंग की स्थापना की थी। जिसको स्थापित करने के लिए रावण को बुलवाया गया था तथा उसी ने विशेष पूजा करवाकर शिवलिंग की स्थापना करवाई थी। 
परंतु रावण के पुरोहित बनकर शिवलिंग की स्थापना की कथा का वर्णन न तो रामायण में है और न ही रामचरित मानस में।


३) श्रीराम की बहन की कथा:

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शांता राजा दशरथ एवं कौशिल्या की पुत्री थी जिनको राजा दशरथ ने अपने मित्र अंगदेश के राजा "रोमपाद" को पुत्री के तौर पर दे दिया था। यह कथा रामायण में विस्तारीत है किंतु तुलसीदास कृत रामचरित मानस में नही है। शांता श्रीराम की बड़ी बहन थी जिनका विवाह शृंग मुनि के साथ हुआ था।



४) शबरी की कथा:

मतांगमुनि के आश्रम में रहने वाली श्रीराम की परम भक्त थी सबरी। शबरी को मतांगमुनि ने कहा था कि प्रभु श्रीराम तुम्हारे पास अतिथि के रूप में आएंगे, तब से रोज शबरी श्रीराम के स्वागत में पुष्प बिछाती एवं फल इकट्ठा करती थी। शबरी भीलनि थी परंतु भगवान ने केवल उनकी भक्ति भाव देखकर जूठे वेर खाये थे।





यह कथा वाल्मीकि रामायण में नही है इसे तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में चल रही जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए लिखा था, ऐसी मान्यता इतिहासकारो की है।