पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

10 February, 2020

श्री हनुमान चालीसा चौपाई-4 हिंदी अनुवाद। Shrihanuman chalisa chupayi-4 hindi translation.


श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:


श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:


 ॥चौपाई 3॥
                                                           ॥कंचन बरन बिराज सुबेसा, 
                                                                 कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥

अर्थ

हे भगवान आपका शरीर सुनहरे रंग का है, अपने अपने शरीर मे सुंदर वस्त्र तथा कानो में कुंडल धारण किया हुआ है। आपके सुंदर घुंघराले बालों के कारण आप अत्यंत सोभायमन हो रहे है।





श्री हनुमान चालीसा चौपाई-3 हिंदी अनुवाद। Shrihanuman chalisa chupayi-3 hindi translation.

श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:

श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:


॥चौपाई 3॥

   ॥महावीर विक्रम बजरंगी, 
   कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥


अर्थ

हे वीरो के वीर महावीर भगवान आपका अंग बज्र के समान है और आप विशेष कार्य और पराक्रम करने वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालों के साथी एवं सहायक है।





06 February, 2020

श्री हनुमान चालीसा चौपाई-2 हिंदी अनुवाद। Shrihanuman chalisa chupayi-2 hindi translation.

श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:

श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे "श्रीरामचरितमानस" की रचना की थी, गोस्वामी जी ने श्रीराम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्रीहनुमान जी के वर्णन में हनुमान चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



॥चौपाई २॥

॥ राम दूत अतुलित बलधामा ।
अंजनी पुत्र पवन सुत नामा ॥२॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी! आप श्रीराम के दूत है जो श्रीराम की सेवा में हमेशा तत्पर रहते है। हे अंजनी के पुत्र तथा पवन देव के पुत्र आपके समान कोई और बलवान नही है, अर्थात आप सम्पूर्ण बल के स्वामी है और आपकी तुलना किसी और से नही की जा सकती है।







अन्य चौपाई के अर्थ विस्तार सहित:



04 February, 2020

हनुमान चालीसा चौपाई 1 का हिंदी अनुवाद। Hanuman Chalisa Chaupayi-1 Hindi anuwad.

श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:

श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे श्री राम चरित मानस की रचना की था, गोस्वामी जी ने श्री राम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्री हनुमान जी के वर्णन में चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:



॥चौपाई १॥

॥जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥




अर्थ:

श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है जिसका कोई ओर या छोर नही है न ही इसका आदि और अंत है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों, स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति फैली हुई है, और इस कीर्ति से ये तीनो लोको में उजाला फैला हुआ है।



चौपाई के अर्थ विस्तार सहित:



हनुमान चालीसा दोहा-1 का हिंदी अर्थ विस्तार सहित। Description of Hanuman Chalisha Doha-1

श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisha:

श्री हनुमान चालीसा के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी है जिन्होंने अवधि भाषा मे श्री राम चरित मानस की रचना की था, गोस्वामी जी ने श्री राम के परम भक्त और अतुलित बल एवं बुद्धि के स्वामी श्री हनुमान जी के वर्णन में चालीसा की रचना की थी। गोस्वामी जी कहते है "हरि अनंत हरि कथा अनंता" अतः चालीसा का सम्पूर्ण वर्णन तो असंभव है इसलिए अपने ज्ञान अनुआर अर्थ है:




॥दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ 
बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥




अर्थ:

श्री गुरु महाराज (जिन्होंने श्री यानी लक्ष्मी और सरस्वती का ज्ञान दिया) के चरण कमलों की धूलि को अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाले है।

हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूं। आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्‍बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुखों व दोषों का हरण(क्योंकि हनुमानजी सम्पूर्ण ग्रहो के स्वामी है अतः वो दुःखो को ऐसे दूर करते है भक्त को पता भी नही चलता) कर दीजिए।






चौपाई के अर्थ विस्तार सहित:


22 January, 2020

मारीच वध की कथा। Story of marich death.

कौन था मारीच Who was Marich?

मारीच ताड़का का पुत्र था तथा उसक पिता का नाम सुन्द था। वह रामायण कथा के अनुसान राछस योनि का था जो ताडूक वन में श्रीराम से युद्ध के पश्चात आसुरी प्रवित्ति को त्याग कर भगवान शिव की आराधना में लग गया था।


मारीच और ताड़का का श्रीराम से युद्ध Shri Ram bettal with Tadka and Marich:

श्रीराम ने एक स्त्री का वध किया था। स्त्री वध रघुकुल की रीत और क्षत्रीय धर्म के विरुद्ध था लेकिन फिर भी श्रीराम को लोक कल्याण के लिए यह कदम उठाना पड़ा, क्योंकि पिता दसरथ का आदेश था कि महर्षि विश्वामित्र जो आज्ञा दे उसे करना होगा।

भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ जा रहे थे। रास्ते में निर्जन स्थान पर बड़े और भयानक पद चिह्न देखकर उन्होंने अपने गुरु से पूछा कि गुरुदेव यह स्थान तो बड़ा ही भयावह प्रतीत होता है और इस निर्जन वन में ये विशाल पदचिह्न किसके हैं, तब गुरुदेव ने बताया कि 6 कोस तक फैले इस निर्जन स्थान पर केवल राक्षसी ताड़का का ही अधिकार है। यह ताड़का वन कहालता है। यहां आनेवाले किसी भी मनुष्य को वह जीवित नहीं लौटने देती। गुरुदेव आगे कहते हैं कि कभी यह स्थान बहुत ही सुंदर जनपद था। कलद और करुष नाम के दो विशाल नगर यहां की समृद्धि की गाथा गाते थे। फिर अगस्त मुनि के शाप से राक्षसी बनी ताड़का और उसके पुत्र मारीच की विनाशलीला के कारण यह राज्य उजाड़ हो गया।
अतः गुरुदेव के आदेश के कारण श्रीराम ने तड़का का वध किया तथा आगे चलकर तड़का के पुत्र कुंत एवं मारीच से युद्ध हुआ जब वो ऋषियों के यज्ञ में विध्वंस करना चाहते थे,श्रीराम ने बिना फर का बांध मारीच को मारा तो वो लंका में जाकर गिरा और उसे राम की शक्तियों का अंदाजा हुआ।



मारीच का माता सीता के हरण में रावण का सहयोग Why marich help ravan for sita haran?


जब शूर्पणखा ने रावण को अपने अपमान की कथा सुनाई तो रावण ने सीताहरण की योजना बनाई। सीताहरण के दौरान रावण ने मारीच की मायावी बुद्धि की सहायता ली।  रावण ने गुस्से से भरकर कहा कि राम-लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक-कान काट दिए और अब हमें उनसे बदला लेना होगा। मारीच ने कहा- हे रावण, श्रीरामचंद्रजी के पास जाने में तुम्हारा कोई लाभ नहीं है। मैं उनका पराक्रम जानता हूं। भला इस जगत में ऐसा कौन है, जो उनके बाणों के वेग को सह पाए। 
 
रावण ने मारीच पर क्रोधित होकर कहा कहा- रे मामा! तू मेरी बात नहीं मानेगा तो निश्चय ही तुझे अभी मौत के घाट उतार दूंगा। मारीच ने मन ही मन सोचा- यदि मृत्यु निश्चित है तो श्रेष्ठ पुरुष के ही हाथ से मरना अच्छा होगा। 




रावण के माता सीता के हरण के लिए मारीच को क्यों चुना Why Ravan Picked Marich for this work?

मारीच परम मायावी और युद्ध कौसल में निपुण था, उसे माया के द्वारा अपने रूप को किसी भी प्रकार में बदलने में महारथ थी, साथ ही वो राजा भक्त और रावण का मामा भी था। अतः रावण उसके कौसल पर पूर्ण विस्वास था इसीलिए उसने सीता हरण के लिए मारीच की सहायता मांगी, और उसने मारीच को विवश कर दिया कि वो उसकी सहायता करें।

मारीच का श्रीराम द्वारा वध Marich Vadh by shriram:

मारीच ने पूछा- अच्छा बताओ, मुझे क्या करना होगा? रावण ने कहा- तुम एक सुंदर हिरण का रूप बनाओ जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हो। शरीर भी चित्र-विचित्र रत्नों वाला ही प्रतीत हो। ऐसा रूप बनाओ कि सीता मोहित हो जाए। अगर वे मोहित हो गईं तो जरूर वो राम को तुम्हें पकड़ने भेजेंगी। इस दौरान मैं उसे हरकर ले जाऊंगा। मारीच ने रावण के कहे अनुसार ही कार्य किया और रावण अपनी योजना में सफल रहा। इधर राम के बाण से मारीच मारा गया।



21 January, 2020

श्रीकृष्ण ने सुभद्रा से अभिमन्यु के विषय मे क्या कहा!

अभिमन्यु कौन थे Who Was Abhimanyu?

अभिमन्यु महाभारत के नायक अर्जुन और सुभद्रा, जो बलराम व कृष्ण की बहन थीं, के पुत्र थे। वीरता, बुद्धिमानी और पौरुष का एक महान उदाहरण है महाभारत युग का ‘वीर अभिमन्यु’, जिसे अर्जुन-पुत्र के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में से सबसे कुशल और आकर्षक, इन्द्र देव द्वारा कुंती को वरदान में दिए गए अर्जुन को समस्त संसार उनके धनुर्धारी कौशल के लिए जानता है।


अभिमन्यु के गुरु श्रीकृष्ण कैसे बने How ShriKrishna become Teacher of Abhimanyu?

पांडवो में वनवास के कारण सुभद्रा द्वारिका में रहती थी और श्री कृष्ण की प्रिय बहन होने के कारण उनके पुत्र अभिमन्यु के गुरु बने थे श्रीकृष्ण और सारी विद्याएं दी थी। श्रीकृष्ण कहते थे कि ये भविष्य की धरोहर है और सबसे कम उम्र का महारथी बनेगा।



अभिमन्यु का महाभारत युद्ध मे भूमिका Role of abhimanyu in Mahabharat:

अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया। चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद अभिमन्यु ने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के छः चरण भेद लिए। इसके दौरान अभिमन्यु द्वारा दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का वध किया गया। अपने पुत्र को मृत देख दुर्योधन के क्रोध की कोई सीमा ना रही। तब कौरवों ने युद्ध के सारे नियम भुलाकर ऐसा कदम उठाया जो इतिहास में कभी नहीं लिया गया। छह चरण पार करने के बाद अभिमन्यु जैसे ही सातवें और आखिरी चरण पर पहुंचा, तो उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि सात महारथियों ने घेर लिया। अपने सामने इतने सारे महारथी देख कर भी अभिमन्यु ने साहस ना छोड़ा। उन्होंने अभिमन्यु के रथ को घेर लिया और उसके घोड़ों को मार दिया।

अभिमन्यु ने महाभारत युद्ध मे किस किस महारथी से युद्ध किया Who fight with Abhimanyu in Mahabharat:

अभिमन्यु का कौशल सभी ने कुरुक्षेत्र युद्ध के 13वें दिन देखा, जब अभिमन्यु एक के बाद एक कौरवों के महारथियों को पराजित कर रहे थे। कौरव सेना भयभीत हो गई। वह समझ नहीं पा रहे थे कि किस प्रकार से अभिमन्यु को रोका जाए। कहते हैं कि अभिमन्यु द्वंद्व युद्ध में इतने माहिर थे कि कौरवों में शायद ही कोई ऐसा योद्धा था जो उन्हें पराजित कर सके। इसीलिए उन्हें पराजित करने के लिए कौरवों ने छ्ल का सहारा लिया। गुरु द्रोण द्वारा पाण्डवों को हराने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गई। वे जानते थे कि चक्रव्यूह को भेदने की कला केवल अर्जुन को आती है, लेकिन अर्जुन-पुत्र की क्षमता से अनजान थे गुरु द्रोण।



अभिमन्यु की मृत्यु How Abhimanyu died:

अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया। चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद अभिमन्यु ने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के 6 चरण भेद लिए। इस दौरान अभिमन्यु द्वारा दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का वध किया गया। अपने पुत्र को मृत देख दुर्योधन के क्रोध की कोई सीमा न रही। तब कौरवों ने युद्ध के सारे नियम ताक में रख दिए।
छह चरण पार करने के बाद अभिमन्यु जैसे ही 7वें और आखिरी चरण पर पहुंचे, तो उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि 7 महारथियों ने घेर लिया। अभिमन्यु फिर भी साहसपूर्वक उनसे लड़ते रहे। सातों ने मिलकर अभिमन्यु के रथ के घोड़ों को मार दिया। फिर भी अपनी रक्षा करने के लिए अभिमन्यु ने अपने रथ के पहिए को अपने ऊपर रक्षा कवच बनाते हुए रख लिया और दाएं हाथ से तलवारबाजी करता रहा। कुछ देर बाद अभिमन्यु की तलवार टूट गई और रथ का पहिया भी चकनाचूर हो गया।
अब अभिमन्यु निहत्था था। युद्ध के नियम के तहत निहत्‍थे पर वार नहीं करना था। किंतु तभी जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर जोरदार तलवार का प्रहार किया। इसके बाद एक के बाद एक सातों योद्धाओं ने उस पर वार पर वार कर दिए। अभिमन्यु वहां वीरगति को प्राप्त हो गया।

अभिमन्यु की पत्नी और पुत्र Wife and Son of Abhimanyu:

अभिमन्यु का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा से हुआ। अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित, जिसका जन्म अभिमन्यु के मृत्योपरांत हुआ, कुरुवंश के एक मात्र जीवित सदस्य पुरुष थे जिन्होंने युद्ध की समाप्ति के पश्चात पांडव वंश को आगे बढ़ाया।

19 August, 2019

नटराज कि प्रतिमा में भगवान शिव के पैरों में पड़े "अपस्मार" की कथा। Story of Apasmaar and Lord Shiv.

अपस्मार की कथा जो भगवान शिव से जुड़ी है:

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, अपस्मार एक बौना था जो अज्ञानता और मिर्गी का प्रतिनिधित्व करता था। उन्हें मुयालका या मुल्याकन के रूप में भी जाना जाता है। दुनिया में ज्ञान को संरक्षित करने के लिए, अपस्मार को नहीं मारा जा सकता था। अगर ऐसा करने के लिए ज्ञान और अज्ञान के संतुलन को बाहर कर दिया जाएगा - जैसा कि अपस्मार को मारने का मतलब होगा प्रयास, समर्पण और कड़ी मेहनत के बिना ज्ञान प्राप्त करना। नतीजतन, यह सभी रूपों में ज्ञान के अवमूल्यन के लिए प्रेरित करेगा। 

आपस्मरा को वश में करने के लिए, भगवान शिव ने नटराज - नृत्य के भगवान के रूप को अपनाया और एक अलौकिक नृत्य का प्रदर्शन किया। इस नृत्य के दौरान, नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपसमार दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।




अपस्मार और भगवान शिव और माता आदिशक्ति की कथा:


कुछ पौराणिक कथाओ के अनुसार एक बार अपस्मार जो कि एक बौना राक्षस था और उसके पास कई शक्तियां थी, उसने अपनी शक्तियों के मद में माता आदिशक्ति पे एक ऐसे मंत्र का प्रयोग किया जिससे माता आदिशक्ति की समस्त शक्तियां चिह्रीं हो गयी। 
हालांकि यह बहुत कम समय के लिए हुआ था परंतु महादेव उसके इस कृत्य से बहुत क्रोधित हुए। और उन्होंने नटराज का रूप रखकर अलौकिक नृत्य करने लगे ।



महादेव के प्रचंड तांडव और डमरू कर ध्वनि से अपस्मार के मस्तिस्क की नसें फटने लगी और वो महादेव के चरणों मे आकर गिर गया। नटराज ने अपने दाहिने पैर से कुचलकर अपस्मरा को दबा दिया। जैसा कि अप्समास अमरता के लिए नियत कुछ राक्षसों में से एक है, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव हमेशा के लिए अपस्मार का दमन करते हुये उसी मुद्रा के बने हुए है बने हुए हैं।

17 August, 2019

माता सती की कथा और दक्ष प्रजापति जो शिवजी के ससुर थे। Story of Daksh prajapati and mata sati .

दक्ष प्रजापति और माता सती की कथा:

स्वायम्भुव मनु की तीन पुत्रियाँ थीं – अकुति, देवहूति और प्रसूति। इनमें से प्रसूति का विवाह दक्ष नाम के प्रजापति से हुआ। दक्ष को 16 कन्याओं की प्राप्ति हुई। इनमें से एक थी ‘सती’ जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ था, उनको किसी संतान की प्राप्ति नहीं हुई, क्योंकि उन्होंने युवावस्था में ही अपने पिताजी के यहाँ देह का परित्याग कर दिया था।
यह कथा शिवमहापुराण के साथ साथ कई पुराणों में वर्णित है। इसमें दक्ष प्रजापति का भगवान महादेव के प्रति उत्पन्न हुई गलत भावनाओं के कारण हुआ था।



दक्ष प्रजापति का भगवान शिव पर क्रोधित होना और श्राप देना:

एक दिन दक्ष प्रजापति त्रिदेव से मिलने गए जहाँ पर उनके जाने पर कोई भी उठकर खड़ा नही हुआ, दक्ष ने सोचा- मेरे आने पर ये खड़ा नहीं हुआ, ये कितना उद्दंड है। मैंने तो अपनी मृगनयनी बेटी का विवाह इस मरकट-लोचन के साथ कर दिया इसको तो कोई सभ्यता, शिष्टाचार ही नहीं। इस तरह से दक्ष ने भगवान शिव को बहुत अपशब्द बोले और खूब गाली-गलोच किया। जब दक्ष ने देखा की उसकी गाली देने के बाद भी शिवजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है, तब उसने हाथ में जल लेकर शाप दे दिया- ‘आज के बाद किसी यज्ञ में तुम्हारा हिस्सा नहीं होगा।’ भगवान शिव तब भी कुछ नहीं बोले। दक्ष ऐसा शाप देकर सभा से चला गया।

दक्ष प्रजापति से नही रहा गया और उन्होंने शिवजी को और अपमानित करने की एक योजना बनाई , और एक बहुत विशाल यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने समस्त देवताओं और संसार के समस्त ऋषि मुनियों को बुलाया परंतु भगवान भोलेनाथ को नही बुलाया।

हरिद्वार में कनखल नामक स्थान पर यज्ञ का आयोजन है। सारे देवता कैलाश पर्वत से होकर आ रहे हैं तो सती और भगवान शंकर को प्रणाम करके जा रहे हैं।
सती ने पूछा- कहाँ जा रहे हो?
उन्होंने कहा- तुम्हारे पिता के घर यज्ञ है और तुम हमसे पूछ रही हो, कहाँ जा रहे हो?
देवता चले गये, इधर सती ने भगवान शंकर से प्रार्थना की। बोलने में तो चतुर हैं, कहती हैं- प्रभो ! “आपके ससुर के यहाँ” जिससे आपका संबध ज्यादा जुड़ जाये तो शायद चल पड़े। बोलने की चतुराई है।
भगवान शिव मौन हैं। वे जानते हैं क्या घटना हुई है। बताने से सती को सिर्फ दुःख ही होगा। सती कहती हैं- निमंत्रण नहीं मिला, इसलिए शायद आप जाना नहीं चाहते हैं। शास्त्रों में विधान है- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के भी जा सकते हैं। जब सती भगवान शिव को शास्त्र का विधान बताने लग गई तो भगवान शंकर को हँसी आ गई। भगवान शंकर सोचने लग गये- सारे संसार को उपदेश मैं करता हूँ। आज ये सती मुझे शास्त्र का विधान बता रही है।
शिवजी ने सती को समझाया- देवी ! तुम ठीक कहती हो- गुरु के यहाँ, पिता के यहाँ और मित्र के यहाँ बिना निमंत्रण के जा सकते हैं। पर यदि जानबूझकर निमंत्रण नहीं दिया गया हो तो बिल्कुल नहीं जाना चाहिये, क्योंकि उसके अन्दर कोई न कोई द्वेष है। वहाँ जाने से भलाई नहीं होगी। अत: मेरी सलाह है- तुमको अपने पिता के यहाँ इस समय नहीं जाना चाहिये।
इतना कहकर भगवान शंकर मौन हो गये। क्योंकि पता है- दक्ष पुत्री है- अपनी बुद्धि बहुत चलाती है,पता नहीं मानेगी या नहीं।
सती के अन्दर द्वन्द्व चल रहा था। पति की याद आये तो अन्दर, पिता की याद आये तो बाहर। समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ? ऐसे अन्दर बाहर कर रहीं थी। फिर उनको गुस्सा आ गया। भगवान शंकर की और लाल-लाल नेत्रों से देखते हुए, बिना बताये चल पड़ीं।
भगवान शंकर ने गणों को आदेश दिया- तुम्हारी मालकिन जा रही है, तुम भी साथ में जाओ। नंदी को ले जाओ और सामान भी ले जाओ, क्योंकि ये अब लौटने वाली नहीं है।

जब माता सती अपने पिता का घर पहुची तो उनका बहुत किया गया और भगवान शिव के लिए अनुचित कथन कहे गए जिसको सुनकर माता को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपना देह त्याग दिया।

ये समाचार जब नारद जी को मिला, नारद जी ने भगवान शिव को बताया- प्रभु ! सती की ये दशा हुई है।
अब भगवान शिव को रोष आया। शिव जी को अपने अपमान पर क्रोध नहीं आया पर आज सती का अपमान हुआ तो भयंकर क्रोध आया। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और जमीन पर पटक दी उससे एक विलक्षण पुरुष प्रकट हुआ जिसके तीन नेत्र थे, भयंकर विशाल शरीर वाला था, हाथ में त्रिशूल लिये-‘ये वीरभद्र भगवान थे।’
वीरभद्र ने शिव जी को प्रणाम किया और बोला- क्या आदेश है?
शिवजी ने कहा- एक ही आदेश है। दक्ष को मार डालो, यज्ञ को विध्वंस कर दो।
वीरभद्र जी उत्तराखंड होते हुये हरिद्वार की तरफ पहुँचे। अपरान्ह का समय था। दोपहर के तीन बज रहे थे, यजमान लोग विश्रामशाला में थे। पंडित और देवता लोग यज्ञशाला में थे। वहाँ जाकर वीरभद्र ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया। यज्ञशाला के डंडे उखाड़ दिये, बाँसों से यजमानों की, देवताओं की, पंडितो की पिटाई की। यज्ञ में भगदड़ मच गयी। वीरभद्र ने चार लोगों को पकड़ लिया। एक तो यजमान दक्ष को, एक आचार्य भृगु जी को (जो यज्ञ करा रहे थे) और दो देवता जो शिव के विरोधी थे, ‘पूषा’ और ‘भग’ ।
सबसे पहले दक्षिणा आचार्य को मिली। शास्त्रों में कहा है- आचार्य को डबल दक्षिणा दी जाती है। उनके दाड़ी और मूंछ एक साथ उखाड़ दिए क्योंकि वो अपनी बड़ी-बड़ी दाड़ी फटकार करके शिव जी को सजा देने के लिए इशारा कर रहे थे।
अब पूषा के दांत निकाल दिये, क्योंकि जब दक्ष शिव जी को गाली दे रहा था, पूषा अपने बड़े-बड़े दांत निकाल कर हँस रहा था। इसका अर्थ है यदि हम अपने शरीर की किसी भी इन्द्रिय का उपयोग दूसरों के अहित के लिये करेंगे तो वो अंग बेकार हो जायेगा।पूषा ने दांतों का दुरुपयोग किया।
भग देवता की आँखे निकाल ली क्योंकि वो दक्ष को आँखों से इशारा कर रहा था- और गाली दो, और गाली दो।
अब वीरभद्र ने दक्ष के गले पर तलवार मारी पर वो मरा नहीं। वीरभद्र ने भगवान शिव का ध्यान किया और दक्ष की गर्दन मरोड़कर तोड़ डाली। फिर उसके सिर को हवनकुण्ड में भस्म कर दिया।
इस तरह से दक्ष का यज्ञ विध्वंस हो गया। विध्वंस इसलिए हुआ क्योंकि ये यज्ञ धर्म की दृष्टी से नहीं था, ये तो शिव जी के अपमान के लिये था।
यहाँ सिखने की बात है यदि किसी कार्य का आरम्भ गलत भाव रखकर किया जाये तो वह कार्य सफल नहीं होता है। ऐसे बहुत से काम होते हैं- बाहर से दिखाई देगा जैसे ये धर्म का काम हो रहा है, पर उनका उद्देश्य गलत होने से वो अधर्म का काम होता है। यज्ञ विध्वंस होने के बाद ब्रह्मा जी सभी देवताओं को लेकर शिव जी के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना करने लगे।

पुनः दक्ष प्रजापति को जीवित करना:


भगवान शंकर के पिता हैं ब्रह्मा जी। शिव जी बोले – पिता जी! आप प्रार्थना मत करिये। आप आज्ञा करिये, क्या करना है?
ब्रह्माजी ने कहा- देखो यजमान को जीवित कर दो। दक्ष, यज्ञ पूरा किये बिना मर गया है। भृगु जी की दाड़ी-मूंछ अभी तक नहीं आयी है, उनको दाड़ी-मूंछे आ जाएं, ऐसी व्यवस्था कर दो। पूषा को दांत मिल जाये। भग देवता को आँखे मिल जाये। बस हम इतना ही मांगते हैं।
भगवान शिव हमेशा अपनी मस्ती में रहते हैं। बोले- अभी कर देता हूँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है। अपने एक गण को बोला- किसी बकरे का सिर काट कर ले आओ। बकरे का सिर ही क्यों मँगाया? हाथी का, शेर का किसी का भी मँगा लेते। भगवान शिव ने सुना था कि नन्दीश्वर ने दक्ष को शाप दिया है की अगले जन्म में ये बकरा बनेगा। भगवान शिव ने सोचा- अगले जन्म में क्यों, इसी जन्म में बना देता हूँ। बकरे का सिर मंगाया और दक्ष के शरीर में जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। दक्ष जीवित हो गया, उसने भगवान की स्तुति की और क्षमायाचना की।


25 July, 2019

मुचुकुन्द कि कथा। Story of Muchukund.

मुचुकुंद की कथा:

महाराज मुचुकुन्द राजा मान्धाता के पुत्र थे। ये पृथ्वी के एक छत्र सम्राट थे। बल और पराक्रम इतना कि देवराज इन्द्र भी इनकी सहायता के इच्छुक रहते थे। उनके पराक्रम का लोहा सभी मानते थे।

एक बार असुरों ने देवताओं को परास्त कर दिया। दुखी होकर देवताओं ने महाराज मुचुकुन्द से सहायता की प्रार्थना की। देवराज की प्रार्थना स्वीकार करके वे बहुत समय तक असुरों से युद्ध करते रहे। बहुत समय पश्चात देवताओं को शिव जी की कृपा से स्वामी कार्तिकेय के रूप में योग्य सेनापति मिल गये।

देवराज इन्द्र ने महाराज से कहा –राजन् ! आपने हमारी बड़ी सेवा की। आप हजारों वर्षों से यहाँ हैं। अतः अब आपकी राजधानी का कहीं पता नहीं है। आपके परिवार वाले सब काल के गाल में चले गये। हम आप पर प्रसन्न हैं। मोक्ष को छोड़ आप कुछ भी वर माँग लें, क्योंकि मोक्ष देना हमारी शक्ति से बाहर है।

उन्होंने कहा – देवराज ! मैं यह वरदान माँगता हूँ कि मैं जी भर सो लूँ, कोई विघ्न न डाले।जो मेरी निद्रा भंग करे, वह तुरंत भस्म हो जाय।




देवराज ने कहा –ऐसा ही होगा, आप पृथ्वी पर जाकर शयन कीजिए। जो आपको जगायेगा, वह तुरंत भस्म हो जायगा। महाराज मुचुकुन्द भारतवर्ष में आकर एक गुफा में सो गये। सोते सोते उन्हें कई युग बीत गये। द्वापर आ गया, भगवान ने श्रीकृष्ण के रूप में यदुवंश में अवतार लिया। 

जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा में थे उसी समय कालयवन ने मथुरा को घेर लिया। उसे मरवाने की नियत से और महाराज मुचुकुन्द पर कृपा करने की इच्छा से भगवान श्री कृष्ण कालयवन के सामने से छिपकर भागे। भागते भागते भगवान उस गुफा में घुसकर छिप गये, जहाँ महाराज मुचुकुन्द सो रहे थे। भगवान ने अपना पीताम्बर धीरे से उन्हें ओढ़ा दिया और आप छिपकर तमाशा देखने लगे।

कालयवन गुफा में आया और महाराज को ही भगवान कृष्ण समझकर दुपट्टा खींच कर जगाने लगा। महाराज जल्दी से उठे। सामने कालयवन खड़ा था, दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो गया ।

अब तो महाराज इधर उधर देखने लगे। भगवान के तेज से गुफा जगमगा रही थी। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण को मंद मंद मुस्कराते हुए देखा। देखते ही वे समझ गये कि ये साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं, वे भगवान के चरणों में लोट पोट हो गये।
भगवान ने उन्हें उठाकर छाती से लगाया, भाँति भाँति के वरों का प्रलोभन दिया; परंतु उन्होंने यही कहा -प्रभो ! मुझे देना है तो अपनी भक्ति दीजिए। भगवान ने कहा –अब अगले जन्म में तुम सब जीवों में समान दृष्टि बाले ब्राह्मण होओगे, तब तुम मेरी जी खोलकर उपासना करना। वरदान देकर भगवान अन्तर्धान हो गये