पौराणिक दुर्लभ कथाएं

भारत एक बहुत आध्यात्मिक देश है। यंहा हिन्दू सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है। यह वेदों ,पुराणों, प्राचीन मंदिरों, धार्मिक स्थलों का देश है। भारत के मंदिरों और देवी देवताओं की प्राचीन एवम दुर्लभ कथाये है जिसे यंहा प्रस्तुत किया गया है। आध्यात्मिक कथाये, दुर्लभ कथाये, मंदिरो की कथाये, ज्योतिर्लिंग की कथाये।

25 June, 2019

जब भगवान राम धरती से गए तब हनुमान कहाँ थे। Story of Hanuman When Ram leave earth.

भगवान राम के अंत समय मे हनुमान कहाँ थे?

हम सब जानते है हनुमानजी भगवान राम के सबसे बड़े भक्त थे, अतः उन्हें भक्त शिरोमणि कहा जाता है। हनुमान जी जब से भगवान राम से मिले कभी उनसे दूर नही हुए। वो सुग्रीव के मंत्रिमंडल में जरूर रहते थे परंतु नित भगवान श्रीराम की सेवा में भी उपस्थित रहते थे। लेकिन जब भगवान राम का धरती में समय खत्म हो गया और वो सरयू में समाधि लेकर वैकुंठ चले गए तब उनके प्रिय भक्त हनुमान उपस्थित नही थे। तो जानते है कहाँ थे हनुमान:





कथा के अनुसार जब भगवान राम से मिलने काल आया और उसने यह सूचना दी कि आपने धरती पर रहने का जितना समय सुनिश्चित किया था वह पूर्ण होने वाला है, तो भगवान को एक चिंता हो गयी कि वो हनुमान को कैसे समझाएंगे क्योंकि हनुमान जी तो मानने वाले नही है और न ही भगवान से दूर रह सकेंगे, साथ ही हनुमानजी चिरंजीवी है अतः धरती पर उनका रहना भी जरूरी है।

अतः भगवान ने एक दिन अपनी एक अंगूठी जिसमे राम नाम अंकित था उसे धरती की एक दरार में गिरा देते है। जिसको खोजने के लिए हनुमान जी अति लघुरूप रख कर कूद जाते है। अंगूठी को खोजते खोजते वो पाताल लोक पहुंच जाते है, जहाँ उन्हें एक साधू मिलता है जो भोजन पका रहा था। हनुमान जी प्रतीक्षा करने लगते है कि साधु बाबा का भोजन हो जाय और फिर वो उनसे अंगूठी के बारे में पूछें।

परंतु वो साधु पहले एक रोटी बनाता फिर उसको खाता फिर दूसरी रोटी बनाता फिर उसको खाता । बार बार उसको ऐसा करते देख हनुमानजी से रह नही गया और उन्होंने उससे इस तरह भोजन का रहस्य पूछा।  महात्मा बोले कि अगर मैं सारी रोटियां बनाता हूँ और मृत्यु आजाए तो ब्यर्थ हो जाएगा, अतः मैं ऐसा कर रहा हूँ। 

हनुमानजी ने जब अंगूठी के बारे में पूंछा तो महात्मा एक स्थान की तरफ इशारा करते हुए बोले कि वहां देख लो अपनी अंगूठी। हनुमानजी ने देखा कि वहां तो अंगूठियों का ढेर लगा हुआ है जिसमे सब एक जैसी अंगूठी है और सब मे राम नाम अंकित है। जब हनुमानजी ने महात्मा से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि हर बार युग की समाप्ति पर एक अंगूठी ऊपर से गिरती है और उसे खोजने एक वानर आता है। जब वो वापस जाता है तो श्री राम धरती पर से जा चुके होते है। 

महात्मा ने हनुमानजी बताया कि समय चक्र की तरह घूमता रहता है, एक के बाद दूसरा और हर बार एक के बाद दूसरा युग के आता है वो सभी पात्र और समय। यही हर बार भगवान धरती पर अवतार लेते है और अपनी लीला करते है और अब तुमको भी उनके वचनों का पालन करना चाहिए।



24 June, 2019

गणेश जी और तुलसी की कथा। Story Of Ganesh and Tulsi in hindi.

श्री गणेश और तुलसी को एक साथ नही रखा जाता साथ ही गणेश पूजन में तुलसी के पत्तों का प्रयोग नही होता:


गणेश पूजन में कभी तुलसी नहीं रखी जाती, इसका कारण है तुलसी का गणेश जी के लिए एकतरफा प्रेम। आइए जानें ये कथा:-



एक बार श्री गणेश गंगा किनारे तप कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार तपस्या में विलीन गणेश जी रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान थे। उनके समस्त अंगों पर चंदन लगा हुआ था। उनके गले में पारिजात पुष्पों के साथ स्वर्ण-मणि रत्नों के अनेक हार पड़े थे। उनके कमर में अत्यन्त कोमल रेशम का पीताम्बर लिपटा हुआ था।

इसी कालावधि में धर्मात्मज की नवयौवना कन्या तुलसी ने विवाह की इच्छा लेकर तीर्थ यात्रा पर प्रस्थान किया। देवी तुलसी सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए गंगा के तट पर पंहुची। गंगा तट पर देवी तुलसी ने युवा तरुण गणेश जी को देखा जो तपस्या में विलीन थे। तुलसी श्री गणेश के रुप पर मोहित हो गई और उनके मन में गणेश से विवाह करने की इच्छा जाग्रत हुई। तुलसी ने विवाह की इच्छा से उनका ध्यान भंग किया। तब भगवान श्री गणेश ने तुलसी द्वारा तप भंग करने को अशुभ बताया और तुलसी की मंशा जानकर स्वयं को ब्रह्मचारी बताकर उसके विवाह प्रस्ताव को नकार दिया।


श्री गणेश द्वारा अपने विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर देने से देवी तुलसी बहुत दुखी हुई और आवेश में आकर उन्होंने श्री गणेश के दो विवाह होने का शाप दे दिया। इस पर श्री गणेश ने भी तुलसी को शाप दे दिया कि तुम्हारा विवाह एक असुर से होगा। एक राक्षस की पत्नी होने का शाप सुनकर तुलसी ने श्री गणेश से माफी मांगी। तब श्री गणेश ने तुलसी से कहा कि तुम्हारा विवाह शंखचूर्ण राक्षस से होगा। उन्‍होंने भी तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर के साथ होगा, इसके बाद तुलसी को अपनी गलती का आभास हुआ। 

उन्‍होंने गणेश जी से माफी मांगी। गणेश जी ने उन्‍हें माफ करते हुआ कहा कि वे एक पूजनीय पौधा बनेंगी। पर उनकी पूजा में तुलसी का कभी प्रयोग नहीं किया जाएगा। बाद में तुलसी का विवाह शंखचूड़ नामक असुर से हुआ, जिसे जालंधर के नाम से भी जाना जाता है।
किंतु फिर तुम भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को प्रिय होने के साथ ही कलयुग में जगत के लिए जीवन और मोक्ष देने वाली होगी। पर मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना शुभ नहीं माना जाएगा।




19 June, 2019

तिरूपति बालाजी कि कथा, तथा क्यों चढ़ावा देने कि प्रथा है इस मंदिर में। Story of Tirupati Balaji.

तिरुपति बालाजी मंदिर कि मान्यताये:

भगवान वेंकटेश्वर का दक्षिण भारत में तिरुपति स्थित अति विशिष्ट एवं हिन्दू धर्म मे आस्था रखने वालों का महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान वेंकटेश्वर बालाजी भगवान विष्णु के अवतार है जिन्होंने महालक्ष्मी रूपी माता पद्दमावती से विवाह किया था। 
यह मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है क्योंकि यहां पर चढ़ावा चढ़ाने की विशेष मान्यता है। मान्यता है कि भगवान ने कुबेर से बहुत बड़ा कर्ज लिया था जिसे उन्होंने कलयुग के अंत तक चुकाने को कहा था अतः भक्तों के द्वारा चढ़ावा दिया जाता है ताकि भगवान का कर्ज जल्द पूरा हो जाय।




भक्तों का एवं जगत के पालक भगवान पर ऐसा कर्ज कैसे है जो उन्हें कलयुग के अंत तक चुकाना है और इसकी कथा क्या है ये जाने।

तिरुपति बालाजी की कथा:


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान एक समय भगवान विष्णु अपने धाम में छिरसागर पर शेषनाग की सय्या पर ध्यान मग्न थे और माता लक्ष्मी उनकी सेवा में थी। तभी महान तपस्वी महाऋषि भृगु वहां आये और भगवान विष्णु द्वारा उनका स्वागत न करने पर वो क्रोधित हो गए और भगवान विष्णु के छाती पर लात मारी और बोले मैं  तेरे घर आया और तू सो रहा है।

भगवान विष्णु तुरंत महर्षि भृगु के चरण पकड़ लिए और कहने लगे हे महर्षि मेरी छाती अति कठोर है, आपको कही चोट तो नही आई। 





महर्षि भृगु तो परीक्षा ले रहे थे, अतः उन्होंने अपना उद्देश्य बताया कि वो भगवान विष्णु के साहस और सहनशीलता की परीक्षा ले रहे थे और उन्हें ये पता चल गया कि विष्णु जी ही श्रेष्ठ है और अग्रपूज्य है। फिर वो वहां से चले गए।

भगवान विष्णु के ऊपर भृगु के इसतरह के वर्ताव से माता को कस्ट हुआ और विष्णु जी द्वारा ऋषि को दंड न दिए जाने का क्रोध हुआ। अतः माता लक्ष्मी क्रोधित होकर वैकुण्ठ छोड़ कर पृथ्वी पर चली गयी।

भगवान भी उनको खोजते पृथ्वी पर आए तो पता चला कि वो एक राजा की यहा पुत्री पद्दमावती रूप में अवतार ले चुकी है, अतः भगवान ने भी वेंकटेश्वर रूप में अवतार लिए। और बड़े होने पर पद्दमावती से शादी का प्रस्ताव रखा।

शादी के खर्च के लिए वेंकटेश्वर रूपी भगवान के पर धन नही था, अतः उन्होंने भगवान व्रह्मा एवं महेश को साक्षी बनाकर कुबेर से धन कर्ज के रूप में लिया और कहा कि वो ये कर्ज कलयुग के अंत तक कर देंगे और उसका सूत भी देगे।

इसी लिए इस मंदिर में धन का दान देने की मान्यता है, भक्तों का मानना है कि ताकि भगवान का कर्ज जल्द खत्म हो जाय। लेकिन सत्य ये है कि इतना धन होने पर भी भगवान कर्ज में है। क्योंकि उनके वो कर्ज कलयुग के अंत तक देना है।






16 June, 2019

पांडवो के द्वारा स्वर्ग कि यात्रा। Pandavon ki Swarg Yatra.

क्यों की थी पांडवो ने स्वर्ग कि यात्रा:

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के अनुसार जब यादवों का अमूच विनास हो गया था, तथा भगवान श्री कृष्ण का भी पृथ्वी से अपने धाम जा चुके थे और उनकी नगरी द्वारिका समुंदर में डूब चुकी थी, तब वहां के नगर निवासी स्त्रियों, बूढो और बच्चों के लेने अर्जुन गए ताकि इनको सकुशल इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर में रह सके। जब अर्जुन लौट रहे थे तो कुछ लुटेरों ने उनपर हमला कर दिया, अर्जुन ने उनसे अकेले युद्ध किये परंतु उनका दिव्य ज्ञान लुप्त हो चुका था तथा उनका अक्षय तरकस भी खाली हो गया था। इस कारण वो लुटेरों से जीत नही पाए और लुटेरे कई स्त्रियों को उठा ले गए।
जैसे तैसे अर्जुन बाकियों को लेकर हस्तिनापुर आये, और महाऋषि व्यास से मिलने अपने भाईयों के साथ गए। वेदव्यासजी ने पांडवों को बताया कि आपलोगो का तथा भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी पर आने का उद्देश्य एवं समय खत्म हो चुका है। अतः आपका दिव्य ज्ञान और दिव्यअस्त्र लुप्त हो गया है और अब आपलोगो को भी स्वर्ग की यात्रा करनी चाहिए। युधिष्ठिर ने परीक्षित को राजा बनाकर, द्रोपदी और बाकी भाईओं के साथ स्वर्ग की यात्रा सुरु की।



पांडवो की स्वर्ग यात्रा:

पांडव अपनी यात्रा में कई पर्वतों , नदियों, सागरो और सारी पृथ्वी का भ्रमण करके हिमालय के तल पर पहुचे उनके साथ एक कुत्ता भी चल रहा था। तभी अग्नि देव आये और बोले कि अस्त्रों के साथ आप नही जा सकते अतः सभी ने अपने अस्त्र उनको दे दिया।
अपने स्वर्ग के चढ़ान में सबसे पहले द्रोपती मूर्छित होकर गिरी, भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण पूछा तो युधिष्ठिर बोले वो हम पांचों में से अर्जुन को अधिक प्रेम करती थी इसलिए ऐसा हुआ।
आगे चलकर सहदेव गिरा , भीम के द्वारा कारण पूछने पर युधिष्ठिर बोले इसे अपने ज्ञान और विवेक सिलता का अहंकार था अतः ये गिरा। उसे भी वही छोड़ कर आगे बढ़े तो नकुल गिरा, फिर युधिष्ठिर बोले इसे अपने रूप सौंदर्य का अभिमान था अतः ये गिरा।




आगे चलकर अर्जुन गिरा, उसका कारण युधिष्ठिर ने उसका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का अहंकार बताया। फिर भीम गिरे उनका कारण उनका सर्वसक्तिशाली होने का अहंकार बताया।
अंत मे युधिष्ठिर और उनके साथ चलने वाला कुत्ता बचा, तभी इंद्र अपना रथ लेकर पहुचे और युधिष्ठिर को साथ मे चलने को बोले, युधिष्ठिर ने कहा कि मार्ग में मेरे भाई और पत्नी गिर गए थे उन्हें भी साथ लीजिए। इंद्र ने कहा कि वे सब देह त्यागकर अपने लोक तक पहुच चुके है। फिर युधिष्ठिर ने साथ चल रहे कुत्ते को भी साथ ले जाने को कहा तो इंद्र ने इनकार कर दिया, परंतु युधिष्ठिर नही माने और कहा कि ये हमारे साथ सारी यात्रा में था अतः इसके बिना मैं नही जायूँगा। युधिष्ठिर कि बात सुनकर कुत्ता अपने वास्तविक रूप में आ गया वो वास्तव में काल था।



युधिष्ठिर रथ में बैठे और स्वर्ग पहुचे जहाँ पर दुर्योधन सहित सभी कौरव थे परन्तु पांडव नही थे, युधिष्ठिर ने कहा कि जहाँ मेरे भाई है मुझे वहा ले चलो। दूत युधिष्ठिर को नरक के रास्ते से लेकर गए जहाँ घोर अंधेरा था, भयंकर दुर्गंध थी और कंकाल एवं चीख पुकार का सोर था। युधिष्ठिर को वह स्थान बहुत खराब लगा और बार बार बोल रहे थे कि मुझे मेरे भाईओं के पास ले चलो।
कुछ देर बाद वहां इंद्र आदि देवता आ गए उनके आते ही वहा का वातावरण अच्छा हो गया , उजाला फैल गया और वातावरण खुसबूदार हो गया। उनके भाई भी आसान में मुस्कुराते हुए बैठे दिखाई दिए। इंद्र ने बताया की महाभारत युद्ध के दौरान अश्वस्थामा के विषय मे जो झूठ तुमने बोला था उसी के लिए तुम्हे कुछ देर के लिए नरक कि तकलीफ देखनी पड़ी।
अंत मे युधिष्ठिर देवनदी गंगा में स्नान करके अपना देह त्याग किया और परमधाम को प्राप्त किया। महाभारत की कथा भी यही तक है और यही पर समाप्त हुई है।





29 May, 2019

देवऋषी नारद कि कथा: जब उनका मुख वानर का हो गया था। Story of Devrishi Narad.

देवऋषी नारद को जब अहंकार हो गया था:

अहंकार और घमंड हो जाने पर बुद्धि कुटिल हो जाती है, फिर अच्छे बुरे और धर्म-अधर्म का ज्ञान भंग हो जाता है। इससे मनुष्य तो क्या देवता भी नही बच पाते है। ऐसी ही कथा है देवऋषी नारद कि है जब उनको अपने ज्ञान तथा तपोबल का अहंकार हो गया था, और भगवान शिव कि कृपा से भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त का अहंकार दूर किया था। 
देवऋषी नारद कि इस कथा में उनका मुख वानर का हो गया था। तथा उन्होंने भगवान विष्णु सहित शिवजी के दो पार्षदों को भी श्राप दे दिया था। यह कथा शिवमहापुराण के अलावा और भी जगह वर्णित है।


देवऋषी नारद को अहंकार ग्रसित होना और चूर होने की कथा:


देवऋषी नारद भगवान विष्णु के परम भक्त होने के साथ साथ ज्ञानी, योगी एवं उन्हें तपोवल से शिध्दिया प्राप्त थी। देवऋषी नारद वृहमचारी थे, उन्होंने विवाह नही करने कि प्रतीज्ञा ले रखी थी। वे कभी एक जगह में स्थिर नही रहते थे सदा तीनो लोको में भ्रमण किया करते थे। 

एक दिन वो हिमालय के पास से गुजर रहे थे, जहां से गंगा नदी का उद्गम स्थल है। वहां का मनोरम दृश्य नारद जी को बहुत भा गया और उनके मन मे उसी स्थान पर अपने आराध्य के लिए तप करने कि प्रेरणा हुई। अतः नारद जी उसी स्थान पर तप में लीन हो गए।

जब यह बात देवराज इंद्र को पता चली की देवऋषी नारद तपस्या में लीन है तो इंद्र को संदेश हुआ कि कही नारद भगवान विष्णु को प्रसन्न करके उनके इंद्र लोक का सिंहासन न मांग ले। इंद्र देव ने नारद कि तपस्या को तोडने के लिये कामदेव को भेजा। कामदेव ने बहुत कोशिश की नारद जी के तपस्या को भंग करने के लिए, लेकिन वो असफल हो गए। कामदेव के द्वारा कई बार प्रयत्न करने पर भी जब सफलता नही मिली तो कामदेव डर गए कि असफल होकर वो देवराज के पास कैसे जायेगे। अतः वो देवऋषी नारद से तपस्या रोकने की प्राथना करने लगे।

देवऋषी नारद ने कामदेव की प्राथना मान ली और तप को रोक दिया। लेकिन उनको इस बात का बहुत अभिमान हो गया कि उनपर कामदेव का कोई प्रभाव नही हुआ और उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली।
वो अहंकार बस अपना गुणगान करने कैलाश पर्वत पर भगवान भोलेनाथ के पास गए। भगवान शिवजी को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुए अहंकार दिख गया अतः उन्होंने देवऋषी को भगवान विष्णु के पास जाने को कहा। देवऋषी अपना गुणगान करने छिरसागर में गए भगवान विष्णु को सारी बात बताई तो भगवान को देवऋषी के अंदर उत्पन्न हुआ घमंड दिख गया। 

लेकिन वो अपने भक्त को ऐसे नही छोड़ सकते थे अतः उन्होंने देवऋषी के मार्ग में माया के द्वारा एक मनोरम नगर बना दिया। जहाँ पर उत्सव का माहौल था । नगर के राजा अपनी पुत्री के स्वमन्वर की तैयारी कर रहे थे। देवऋषी भी वहां पहुच गए। नगर के राजा में उनका स्वागत किया और अपनी पुत्री का भविष्य जानने के लिए उसका हाथ दिखाया।
राजा की कन्या इतनी सुंदर थी कि वो विश्व मोहिनी लग रही थी, उसका रूप यौवन देखकर देवऋषी नारद भवचक्के रह गए। और उसी कन्या से विवाह करने की कामना करने लगे।




इस कामना को लेकर वो अपने आराध्य देव भगवान विष्णु के पास गए और अपने मन की व्यथा बताई और कहा कि आप अपना स्वरूप दे दीजिए। भगवान विष्णु ने अपना शरीर तो दे दिया पर चेहरा वानर का दे दिया।

देवऋषी नारद अपना शरीर देखकर खुश हो गए और जा कर स्वयंवर सभा में बैठ गए। उनको लगा कि यह रूप देखकर विश्व मोहनी कन्या उनपर ही वरमाला डालेगी। लेकिन ऐसा नही हुआ और उसने उनकी तरफ देखा तक नही और वरमाला वही पर आए हुए राजा का वेष रखे भगवान विष्णु पर डाल दी।

देवऋषी नारद अपना वानर का चेहरा देखकर अति क्रोधित हो गए। और भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि "धरती पर मनुष्य रूप में जाना पड़ेगा और जिस तरह मेरी पत्नी नही बनने दिया उसी तरह उनको भी पत्नी वियोग का दुख भोगना पड़ेगा और जिस वानर का रूप देकर उपहास बनाया उन्ही वानरों की मदत लेनी पड़ेगी।"

बाद में जब भगवान की माया से बाहर आये और अपने दिए हुए श्राप पर दुख हुआ परन्तु भगवान विष्णु ने उनका श्राप स्वीकार किया और राम रूप में धरती पर अवतार लिया।





27 May, 2019

श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा कि कथा, और सुदामा दरिद्रता को प्राप्त क्यों हुए। Story of Sudama friend of Shrikrishna.

सुदामा का परिचय एवं चरित्र का संछिप्त वर्णन:

सुदामा ब्राह्मण कुल में जन्मे तथा भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र के साथ साथ भक्त थे। सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता उनके बाल्य काल मे उज्जैन स्थित संदीपनी ऋषि के आश्रम में विद्या अध्ययन के साथ हुई थी। सुदामा वेदों एवं पुराणो के ज्ञाता और विद्धवान थे, जो अपना जीवन बालको को विद्या देकर तथा भिक्षा मांगकर जीवन यापन करते थे। सुदामा को अपनी गरीबी और दरिद्रता पे जरा भी दुख नही था, बल्कि वो प्रसन्नता के साथ भगवान भजन और पूजन के साथ अपना जीवन यापन करते थे।





"सुदामा चरित्र" नामक काव्य-ग्रंथ है जो कवि नरोत्तमदास जी द्वारा अवधि भाषा मे रचित है। कवि नरोत्तमदास जी ने सुदामा के जीवन एवं चरित्र का उत्तम वर्णन किया है। साथ ही श्रीमद्भागवत कथा में भी सुदामा चरित्र का वर्णन किया गया है। सुदामा को निर्धनता का कोई दुख नही था लेकिन उनकी पत्नी द्वारा बार बार प्रेरित किये जाने पर वो अपने मित्र द्वारिकाधीश के पास गए, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने मित्र का स्वागत और बिना मांगे उनकी दरिद्रता को दूर किये जाने का मनोरम कथा है।

सुदामा की गरीबी या दरिद्रता का कारण:

सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के मित्र थे उन्होंने भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ सारी शिक्षा मुनि आश्रम में ग्रहण की थी। फिर वो इतने गरीब कैसे हो गए? इसकी कथा इस प्रकार है:

सुदामा और श्रीकृष्ण उज्जैन स्थित संदीपनी के आश्रम में ग्रहण कर रहे थे। उसी के पास नगर में एक गरीब ब्राह्मणी निवास करती थी। जो अपना जीवन भिक्षा मांगकर चलाती थी। एक ऐसा समय आया जब बहुत दिनों तक उसे भिक्षा नही मिली और वो केबल जलपान करके दिन बिताती थी। उसके बाद एक दिन उसे दो मुट्ठी चने मिले जिसे उसने एक पोटली में बांधकर सुबह भगवान को भोग लगाकर फिर खाने को रख दिये।
रात में उसकी झोपड़ी में चोर घुस गए और उसकी पोटली यह सोचकर कि इसमें धन होगा, चुराकर ले गए। तभी नगर में चोरी खबर फैल गयी और लोग चोरों के पीछे भागने लगे। चोर भागकर मुनिआश्रम में छुप गए। और सुबह होने से पहले भाग गए। लेकिन चने की पोटली वही गिर गयी।



उधर जब ब्राह्मणी ने सुबह देखा कि चने की पोटली चोरी हो गयी तो उसने श्राप दे दिया कि "जो भी मेरे चने खाये वो दरिद्रता को प्राप्त हो जाय"।
गुरु आश्रम में वह पोटली गुरुमाता को मिल गयी और उन्होंने वो चने सुदामा को दे दिये जब वो रोज की तरह लकड़ी काटने जा रहे थे। भिन्न भिन्न मतों का मानना है कि वो चने जानकर या अनजाने में सुदामा खा गए और दरिद्रता को प्राप्त हो गए।




25 May, 2019

द्रोपदी के जन्म कि कथा। Draupadi Birth Story.

द्रौपदी का परिचय:

महाभारत में पांडवों कि पत्नी और राजा ध्रुपद कि पुत्री थी "द्रौपदी", जन्म से उनका नाम "कृष्णा" रखा गया है। द्रौपदी के भाई का नाम दृष्टद्युम्न था साथ ही भगवान श्रीकृष्ण को भी वो अपना भाई मानती थी। द्रौपदी का स्थान पंचकन्याओं में भी है। यह एक आम धारणा है कि महाभारत युद्ध का सबसे बड़ा कारण द्रौपदी है, जो कि सर्बदा गलत है। क्योंकि जब अधर्म कि ताकत बढ़ जाती है तो उसका अंत करने के लिए धर्म को आगे आना पड़ता है, उसी अधर्म पे धर्म का विजय के लिए महाभारत युद्ध हुआ।




द्रौपदी के जन्म की कथा:

राजा द्रुपद और पांडवों के गुरु आचार्य द्रोण मित्र थे। एक बार द्रोणाचार्य को कुछ गायों कि जरूरत थी क्योंकि उन्हें अपने पुत्र को दूध पिलाना था। परंतु ध्रुपद नरेश ने न तो गाय दी अपितु उनका बहुत अनादर किया। जब द्रोणाचार्य द्वारा कौरवों और पांडवों की शिक्षा पूर्ण हुई तो, सभी ने गुरु दक्षिणा मांगने के लिए कहा। तो द्रोणाचार्य ने बताया कि कैसे ध्रुपद ने उनका अनादर किया था अतः उन्होंने द्रुपद को बंदी बनाए जाने का गुरुदक्षिणा मांगा। 

सबसे पहले दुर्योधन अपनी अगुवाई में कौरव सेना लेकर ध्रुपद के राज्य में चढ़ाई की परंतु विजय प्राप्त नही हुई। उसके बाद पांडव बिना किसी सेना के रण में गए और ध्रुपद को हराकर बंदी बनाकर गुरु के पास ले आये। द्रोणाचार्य ने ध्रुपद का आधा राज्य लेकर छोड़ दिया।

ध्रुपद को इस हार से बहुत दुख हुआ और उन्होने एक शक्तिशाली पुत्र कि कामना से एक यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिसके द्वारा द्रोणाचार्य का वध हो सके। 
यज्ञ के अंत मे यज्ञ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम दृष्टद्युम्न रखा गया और साथ मे एक दिव्य कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम "कृष्णा" रखा गया जो बाद में "द्रोपदी" और "पांचाली" नाम से जानी गयी।

द्रोपदी के पूर्व जन्म का वरदान:

पूर्व जन्म में द्रोपदी एक ऋषि कन्या थी जो तेजस्वी थी। परंतु उनको कोई अपनी पत्नी नही बना रहा था। तो उन्होंने भगवान शिवजी की तपस्या करने लगी। तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी प्रगट हुए और द्रोपदी से वरदान मांगने को कहा।
द्रोपदी ने शिवजी से पाँच अलग अलग गुण वाले पुरुष से पति के रूप में मिलने का वरदान मांगा। शिवजी बोले तुमने जिन पांच गुण वाले पुरुष कि कामना कि है वो एक पुरुष में होना संभव नही है, पर तुमने वरदान मांगा है तो तुम्हारा विवाह पांच पुरुषो से होगा जिनके जो सर्व गुनी होंगे। शिवजी ने द्रोपदी को चीर कुमारी होने का वरदान दिया था।

द्रोपदी ने जो पति के गुण मागे थे वो थे कि उनका पति सत्यवादी हो, सर्वशक्तिमान हो, सबसे बड़ा धनुर्धर हो, सबसे अधिक सुंदर हो, तथा सबसे अधिक गभीर रणनीतिकर हो। 

द्रोपदी का विवाह:

द्रोपदी एक दिव्य कन्या थी अतः उनके विवाह के लिए ध्रुपद नरेश ने एक स्वयंवर रखा जिसमे एक दिव्य धनुष में प्रत्यंचा चढ़ाकर, मछली कि आंख में तीर मारना था वो भी नीचे तेल में देखकर।
आर्यावर्त के सभी वीर उस स्वयंवर में आये पर धनुष नही उठा सके, केवल कर्ण ने ऐसा किया पर द्रोपदी ने कर्ण का सूद्र पुत्र होने की वजह से विवाह से इनकार कर दिया था। अर्जुन जो एक मुनिवेश मे आये थे उन्होने स्वयंवर जीतकर द्रोपदी से विवाह किया। बाद में कुंती के वचन को मानकर द्रोपदी पांचों पांडवो की पत्नी बनी।

द्रोपदी और भगवान श्रीकृष्ण का रिश्ता:

द्रोपदी भगवान श्रीकृष्ण को अपना भाई, मित्र और आदर्श मानती थी। तथा जब शिशुपाल का वध करने के लिए सुदर्शन चक्र भगवान कृष्ण के छोड़ा तो उनकी उंगली कट गयी, तब द्रोपदी ने अपना पल्लू फाड़कर उनकी उंगली में बंधा था। भगवान श्रीकृष्ण ने भी जब द्रोपदी का चिर हरण हो रहा था तो अपनी माया से द्रोपदी कि लाज बचाई थी।




20 May, 2019

कालिदास के जीवनकाल कि कथा एवं मुख्य रचनायें। Story of Kalidas and top Compositions.

कालिदास का जीवन परिचय:

भारतीय साहित्य के महानतम कवि एवं नाटककारों में संस्कृत भाषा के एक महान साहित्यकार थे "कालिदास"। महाकवि कालिदास जी ने राष्ट्र को चेतना और स्वर देने का कार्य किया था। कालिदास जी ने भारतीय पौराणिक कथाओं को प्रेरणा एवं जीवन और दर्शन को आधार बनाते हुए अनेक रचनाएँ की थी। कालिदास की रचनाओं में प्रेम एवं श्रृंगार रस की प्रधानता पाई जाती है, उन्होने सरल भाषा मे अलंकृत रचनाये की थी। जन्म के स्थान तथा काल को लेकर कई मत भेद है, लेकिन उज्जैन से लेकर उनकी साहित्य में अधिक जुड़ाव है। साथ ही कालिदास जी विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे।
कालिदास जी कि अनेक साहित्यिक नाटकों में से उनकी रचना "अभिज्ञानशाकुन्तलम" को सर्वश्रेष्ठ रचना एवं कवि के रूप में "मेघदूतम" शर्वश्रेष्ट रचना मानी जाती है।


कालिदास के जीवनकाल से जुड़ी कहानी:

कालिदास कि एक चर्चित कथा है जिसमे उनके विवाह तथा ज्ञान प्राप्ति के बारे में बताया जाता है। कालिदास जी कि पत्नी का नाम विद्योत्तमा था। विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दिया तो हार को अपमान समझकर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। 
चलते चलते उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जहां पर एक व्यक्ति जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। उन्होंने सोचा कि इससे बड़ा मूर्ख तो कोई मिलेगा ही नहीं। उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा और कहा- "मौन धारण कर लो और जो हम कहेंगे बस वही करना"। उन लोगों ने स्वांग भेष दिलाकर विद्योत्तमा के सामने प्रस्तुत किया कि हमारे गुरु आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए ये हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर हम वाणी में उसका उत्तर आपको देंगे। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे। 
प्रथम प्रश्न विद्योत्तमा ने किया संकेत में एक उंगली दिखा कर कि ईस्वर एक है। परन्तु कालिदास ने समझा कि ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है। क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत किया इस भाव से कि तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों फोड़ दूंगा। तभी विद्वानों ने तर्क दिया कि आप कहना चाहती ईस्वर एक है लेकिन गुरुदेव कह रहे है "ईस्वर एक है पर उसके दो रूप है आत्मा और परमात्मा"।
राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया कि तत्व पांच है। तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया कि तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी, मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। विद्वानों ने समझाया कि गुरु कहना चाह रहे हैं कि भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी जल आकाश वायु अग्नि। परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते। परन्तु आपस में मिलकर एक होकर उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। 
इसके पश्चात राजकुमारी अपनी हर मान जाती है और विवाह हो जाता है। परंतु विवाह के पश्चात राजकुमारी को पता चल जाता है कि यह कोई ज्ञानी नही और छल से मेरा विवाह हुआ है। लेकिन वो सोचती है ज्ञानी न सही पर ये किस जाति का है पता करना चाहिए, और वो एक ऐसे कमरे में ले जाती है जहाँ सभी जातिओं से जुड़ी तस्बीरे लगी होति है, कालिदास सभी को गौर से देखते है पर एक चरवाहे की तस्बीर को उत्सुकता से देखने लगते है। राजकुमारी को क्रोध आता है और वो खिड़की से धक्का देती है, कालिदास नीचे गिरते है और उनकी जिव्हा कटकर पास में काली की प्रतिमा कर गिरती है। माता काली प्रसन्न होकर वरदान देने लगती है, कालिदास अपनी पत्नी का नाम रट रहे होते है जो देवी को विद्या सुनाई पड़ा और विद्या का वरदान दे दिया।
ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा - कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी)। विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा -- अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है)।
कालिदास जी ने अपनी पत्नी को ही अपना गुरु माना और इन्ही वाक्यो से अपनी रचनाएँ की।


कालिदास की प्रमुख रचनाओं का वर्णन:

कालिदास जी की अनेक रचनाएँ है परन्तु मुख्य रूप से उनकी सात रचनाओं को श्रेय दिया जाता है। जिसमे तीन नाटक , दो महाकाव्य, दो खण्डकाव्य है।


कालिदास के प्रमुख तीन नाटक

१) मालविकाग्निमित्रम्

कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र से प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।

२) अभिज्ञान शाकुन्तलम् 

कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। 
इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है।

३) विक्रमोर्वशीयम् 

एक रहस्यों भरा नाटक है। इसमें पुरूरवा इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम करने लगते हैं। पुरूरवा के प्रेम को देखकर उर्वशी भी उनसे प्रेम करने लगती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने जाती है तो पुरूरवा से प्रेम के कारण वह वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है। इससे इंद्र गुस्से में उसे शापित कर धरती पर भेज देते हैं। हालांकि, उसका प्रेमी अगर उससे होने वाले पुत्र को देख ले तो वह फिर स्वर्ग लौट सकेगी। विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौंदर्य और शिल्प से भरपूर है।

कालिदास रचित महाकाव्य:

१) कुमारसंभवम्  

कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है।

२) रघुवंशम् 

कालिदास ने रघुकुल के राजाओं का वर्णन किया है।

कालिदास रचित खण्डकाव्य:



१) मेघदूतम् 

मेघदूत एक गीतिकाव्य है जिसमें यक्ष द्वारा मेघ से सन्देश ले जाने की प्रार्थना और उसे दूत बना कर अपनी प्रिय के पास भेजने का वर्णन है। मेघदूत के दो भाग हैं - पूर्वमेघ एवं उत्तरमेघ। नागार्जुना ने इसका हिंदी अनुवाद किया था।

२) ऋतुसंहारम् 

इसमें सभी ऋतुओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है।






19 May, 2019

पृथ्वी के आठ चिरंजीवी पुरुष जो आज भी जीवित है। Aath chirnjivi purush.

कौन है आठ चिरंजीवी महापुरुष:

अलग अलग पुराणो, कथाओं और मान्यताओं में कहा जाता है कि इस पृथ्वी पर आठ ऐसे महापुरुष है जो चिरंजीवी है अर्थात सदा के लिए जीवित है। इनसे कुछ पृथ्वी पर रक्षा के लिए जीवित है तो कुछ अपने किये के कारण श्राप वस जीवित है। ये महापुरुष है:

१) अश्वथामा
२) राजाबलि 
३) वेदव्यास 
४) हनुमान
५) विभीषण
६) कृपाचार्य
७) परशुराम 
८) मार्कण्डेय ऋषि

 


१) अश्वथामा:

अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचर्य के पुत्र हैं, तथा उनके मस्‍तक में अमरमणि विद्यमान है।  अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडवो के पुत्रो की हत्या की थी, तथा अभिमन्यु के पुत्र को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र छोड़ा था। जिस कारण भगवान कृष्ण ने उन्हें कालांतर तक अपने पापों के प्रायश्चित के लिए इस धरती में ही भटकने का श्राप दिया था। तथा मस्तक से मणि निकाल कर उस घाव को कभी न भरने और रक्त रिसाव करते रहे ऐसा श्राप दिया था।

२) राजा बलि:

राजा बलि प्रह्लाद के वंशज हैं। राजा बलि को महादानी के रूप में जाना जाता है। उन्होंने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया, अतः भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बनाया और अमरता का वरदान दिया। 

३) वेद व्यास:

ऋषि व्यास ने महाभारत जैसे प्रसिद्ध काव्य की रचना की है। उनके द्वारा समस्त वेदों एवं पुराणो की रचना हुई। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र हैं। ऋषि वेदव्यास भी अष्टचिरंजीवियो में शामिल हैं।

४) हनुमानजी:

सीता माता ने हनुमान को अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनाने पर वरदान दिया था की, वे सदेव अजर-अमर रहेंगे। हनुमान जी श्रीराम के दूत है तथा वो सदा इस पृथ्वी पर विचरण करते है और भक्तों की रक्षा करते है।

५) विभीषण:

श्री राम ने विभीषण को अजर-अमर रहने का वरदान दिया था। विभीषण ने भगवान राम की महिमा जान कर युद्ध में अपने भाई रावण का साथ छोड़ प्रभु राम का साथ दिया।

६) कृपाचार्य:

कृपाचार्य शरद्वान गौतम के पुत्र हैं। वन में शिकार खेलते हुए शांतु को दो शिशु मिले जिनका नाम उन्होंने कृपि और कृप रखा तथा उनका पालन पोषण किया। कृपाचार्य कौरवो के कुलगुरु तथा अश्वत्थामा के मामा हैं। उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवो को साथ दिया।

७) परशुराम:

परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता का नाम रेणुका था। परशुराम का पहले नाम राम था, लेकिन इस शिव के परम भक्त थे। उनकी कठोर तपश्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें एक फरसा दिया, जिस कारण उनका नाम परशुराम पड़ा।

८) मार्कण्डेय ऋषि

ऋषि मार्कण्डेय भगवान शिव के परम भक्त हैं। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपश्या द्वारा महामृत्युंजय तप को शिद्ध कर मृत्यु पर विजयी पा ली और चिरंजीवी हो गए।




14 May, 2019

भगवान ब्रह्मा कि पूजा क्यों नही होती तथा उनका एक ही मंदिर क्यों है। Why only one temple of lord brahma.

भगवान ब्रह्मा की पूजा और मंदिर को लेकर विवाद क्यों:

वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अनेक ग्रंथों से यही निष्कर्ष निकलता है कि त्रिदेव ही श्रेष्ठ है जी है परम पिता तथा जगत की रचना करने वाले भगवान व्रह्मा, संसार के पालन कर्ता भगवान विष्णु तथा संहारक भगवान शिव शंकर। परंतु भगवान विष्णु और भगवान शिव के अनेक मंदिर स्थित है तथा घर घर मे इनकी पूजा-अर्चना की जाती है, साथ ही समस्त देवी-देवताओं की पूजा-आराधना की जाती है। लेकिन संसार के रचयिता भगवान व्रह्मा की पूजा क्यों नही होती तथा राजस्थान के पुष्कर में स्थिर एक मात्र विशेष मंदिर क्यों है, यह जानने की उत्सुकता होती है।




इसके अलग-अलग कारण तथा कथाये अलग अलग पुराणो में मिलती है जो इस प्रकार है:

१) शिव पुराण की कथा:

शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार परमात्मा शिव है जिनकी प्रेरणा से भगवान विष्णु का अवतरण हुआ तथा विष्णु जी के नाभि से एक कमल निकला जिशसे व्रह्मा जी का जन्म हुआ। अतः एक बार ब्रह्मा और विष्णु जी मे श्रेष्ठता का विवाद हो गया, तभी वहां एक अग्नि स्तंभ उत्पन्न हो गया तथा आकाशवाणी हुई कि जो इस स्तंभ के छोर को खोज लेगा वही श्रेष्ठ होगा। फिर दोनों देवता स्तंभ का छोर खोजने चल दिये, ब्रह्मा ऊपर तथा विष्णु नीचे की ओर गए।
बहुत समय बीतने के बाद भी जब छोर नही मिला तो दोनों लौट आये , तथा व्रह्मा जी मे झूठ बोला कि छोर मिल गया। तभी वह स्तंभ शिव रूप में परिर्वतित हो गया औऱ व्रह्मा जी का झूठ पकड़ा गया। इसी कारण उनकी पूजा नही होती।



२) पद्मपुराण की कथा:

कथा के अनुसार ब्रह्मा जी एक यज्ञ करना चाहते थे जिसमें उनकी पत्नी का रहना जरूरी था। उनकी पत्नी जिनका नाम "सावित्री" है जो किसी कारण वहां नही पहुच पाई और यज्ञ का समय बीत रहा था। अतः वृह्मजी ने एक ग्वाल की पुत्री "गायत्री" से विवाह कर लिए और यज्ञ करने लगे, तभी वहां सावित्री आ गयी।
अपने स्थान पर किसी अन्य स्त्री को देखकर वो क्रोधित हो गयी औऱ उन्होंने वृह्मजी को श्राप दे दिया कि उनकी इस संसार मे कई पूजा नही होगी और जो भी करेगा उसका विनाश हो जाएगा।
सभी देवता भयभीत हो गए और माता को शांत करने का प्रयत्न करने लगे, तब वो शांत होकर बोली मेरा कथन असत्य नही होगा परंतु इसी स्थान में इनकी पूजा हो सकती है। वही स्थान राजस्थान का पुष्कर मंदिर है।

३) तीसरी कथा:

यह कथा भी अनेक पुराणो में मिलती जी एक बार स्वर्ग की अप्सरा जिसका नाम "मोहिनी" था, वृह्मजी पर आसक्त हो गयी। और उन्हें रिझाने के लिए प्रयत्न करने लगी। 
वह उन्हें रिझाने के लिए नृत्य कर रही थी और जाकर उनके निकट बैठ गयी, तभी वहां शप्तऋषी आ गए। उन्होंने वृह्मजी से पूछा यह स्त्री कौन है तो वृह्मजी ने कहा कि यह एक अप्सरा है जो नृत्य कर रही थी और थक कर बैठ गयी है, ये मेरी पुत्री के समान है। शप्तऋषी तो अंतर्यामी थे उन्होंने घटना देख ली और चले गए।
परंतु अप्सरा मोहिनी क्रोधित हो गयी कि वृह्मजी ने उसका अपमान किया है, वो उनके सामने प्रेम प्रस्ताव लेकर आई थी और ब्रह्मा जी ने उसे पुत्री कह दिया। अतः उसने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया कि उनकी कोई पूजा नही करेगा।